Category Archives: फ़ासीवाद

प्रोजेक्ट पेगासस : शासक वर्ग का हाइटेक निगरानी तन्त्र और उसके अन्तरविरोधों का ख़ुलासा

पेगासस स्पाइवेयर को विकसित करनेव वाली टेक फ़र्म एन.एस.ओ. सीधे इज़रायली ख़ुफिया विभाग की देख-रेख में काम करती है। एन.एस.ओ. का दावा है कि वह पेगासस केवल सरकारों को बेचतीं है, इसे किसी निजी व्यक्तियों या संस्थाओ को नहीं दिया जाता है। भारत, यूएई, बहरीन, सऊदी अरब, कज़ाखिस्तान, मेक्सिको, मोरक्को, अज़रबैजान सहित दुनिया के 50 देश इस स्पाइवेयर के ग्राहक हैं। लगभग इन सभी देशों में निरंकुश सत्ता है। पेगासस प्रोजेक्ट के इस खुलासे से पूरी तरह साफ़ हो गया है कि इसका इस्तेमाल सरकार द्वारा अपने ही देश के नागरिकों, बुद्धिजीवियों और सरकार के ख़िलाफ़ उठने वाली हर आवाज़ की जासूसी और दमन के लिए इस्तेमाल किया जा रहा है।

लक्षद्वीप में भाजपा का फ़ासीवादी हस्तक्षेप

भाजपा के पूर्व नेता तथा आरएसएस के क़रीबी प्रफुल खोदा पटेल पिछले साल दिसम्बर में नये लक्षद्वीप प्रशासक बनाए गए थे। जिसके बाद वे लगातार वहाँ पर आरएसएस के अल्पसंख्यक विरोधी एजेण्डे के तहत काम कर रहे हैं; आम जनता तथा स्थानीय निर्वाचित प्रतिनिधियों से मशविरा किए बिना विधान बदल रहे हैं, कानूनों को संशोधित कर रहे हैं। ये तमाम परिवर्तन तथा संशोधन जनविरोधी चरित्र के हैं। लक्षद्वीप को फ़ासीवाद की नयी प्रयोगशाला बनाया जा रहा है।

ग्रेटर हैदराबाद नगर निगम चुनाव के नतीजे : तेलंगाना व आन्ध्र में संघी फ़ासीवादी राजनीति की छलाँग के संकेत

पिछले दिसम्बर की शुरुआत में हुए ग्रेटर हैदराबाद नगर निगम के चुनाव प्रचार के लिए जब अमित शाह, योगी आदित्यनाथ, स्मृति इरानी, जे.पी. नड्डा और जावड़ेकर जैसे फ़ासिस्ट नेताओं ने हैदराबाद में डेरा डाला तो कई लोगों को बहुत ताज्जुब हुआ कि भला एक स्थानीय निकाय के चुनाव में इतने दिग्गज नेता क्यों कूद पड़े हैं। यहाँ तक कि नरेन्द्र मोदी भी कोरोना वैक्सीन बनाने वाले एक निजी लैब का दौरा करने के बहाने चुनाव प्रचार के आख़ि‍री दिन हैदराबाद पहुँच गये।

साम्प्रदायिक-फ़ासीवादियों ने “लव जिहाद” के नाम पर फैलाये जा रहे झूठ को पहुँचाया क़ानून निर्माण तक

देश के पाँच राज्यों में तथाकथित लव जिहाद के विरोध के नाम पर क़ानून बनाने के ऐलान हो चुके हैं। जिन पाँच राज्यों में “लव जिहाद” के नाम पर क़ानून बनाने को लेकर देश की सियासत गरमायी हुई है वे हैं: उत्तरप्रदेश, हरियाणा, मध्यप्रदेश, असम और कर्नाटक। कहने की ज़रूरत नहीं है कि उपरोक्त पाँचों राज्यों में भारतीय जनता पार्टी की खुद की या इसके गठबन्धन से बनी सरकारें कायम हैं। उत्तरप्रदेश की योगी सरकार तो नया क़ानून ला भी चुकी है लेकिन इसने बड़े ही शातिराना ढंग से इसका नाम ‘उत्तर प्रदेश विधि विरुद्ध धर्म संपरिवर्तन प्रतिषेध क़ानून – 2020’ रखा है जिसमें लव जिहाद शब्द का कोई ज़िक्र तक नहीं है।

क्या भारत में धर्मनिरपेक्षता अब सिर्फ़ काग़ज़ पर ही है?

धर्म और आस्था किसी का भी निजी मसला हो सकता है किन्तु उसमें राज्य की या उसके सत्ता प्रतिष्ठानों की किसी भी रूप में कोई दखलन्दाजी नहीं होनी चाहिए। धर्मनिरपेक्षता या सेक्युलरिज्म का असली अर्थ है धर्म और राजनीति का पूर्ण विलगाव और राज्य व सत्ता प्रतिष्ठानों की धार्मिक मसलों से सुनिश्चित दूरी। कहने के लिए भारत भी एक धर्मनिरपेक्ष देश है लेकिन हमारे यहाँ पर सत्ता की खातिर धार्मिक मुद्दों को बेतहाशा भुनाया जाता रहा है।

कश्मीर के छात्रों का चौपट होता भविष्य

मोदी सरकार ने 5 अगस्त 2019 को अनुछेद 370 और 35ए हटाते हुए कश्मीरी आवाम से कई बड़े वायदे किए थे। जम्मू – कश्मीर के विशेष राज्य के दर्जे को समाप्त करते हुए देश के प्रधानमंत्री ने ये घोषणा की थी भाजपा सरकार के इस ऐतिहासिक कदम से कश्मीर मे बेरोज़गारी ख़त्म हो जायेगी, आतंकवाद का नामोनिशान मिट जाएगा व कश्मीर विकास के नये-नये आयाम गढ़ेगा…. मगर आज सच्चाई इसके विपरीत है।

जनता को गाय के नाम पर कुत्सित राजनीति नहीं बल्कि शिक्षा-स्‍वास्थ्य और रोज़गार चाहिए!

9 दिसम्बर को कर्नाटक विधानसभा में ‘कर्नाटक मवेशी वध रोकथाम एवं संरक्षण विधेयक-2020’ पारित कर दिया गया है। भाजपा शासित राज्यों में सरकारों के पास यही काम रह गया है कि साम्प्रदायिक नफ़रत भड़काने वाले मुद्दों को लगातार हवा देते रहना और सम्प्रदाय विशेष के उत्पीड़न की नयी-नयी तरकीबें भिड़ाते रहना। हाल ही में भाजपा शासित पाँच राज्यों में तथाकथित लव जिहाद के नाम पर क़ानून बनाने की कुत्सित योजनाओं को अमली जामा पहनाने पर भी काम चल रहा है।

भूख और बीमारी से मरते लोगों के बीच राम मन्दिर के भूमि पूजन का प्रहसन

अगर यह मुद्दा है तो हर उस स्थान के इतिहास को पीछे जाकर देखा जाना चाहिए जहाँ आज कोई मन्दिर या मस्जिद है। उसी जगह पर न जाने उससे पहले कितने क़िस्म के धर्मस्थल रहे होंगे। आप किस-किसको तोड़ेंगे और किस-किसको बनायेंगे? इस मामले पर ज़रा-सा तार्किक विचार करते ही स्पष्ट हो जाता है कि यह कितना निरर्थक, पीछे ले जाने वाला और प्रतिक्रियावादी है। इतिहास को पीछे ले जाने वाली ताक़तें ही आज इसका इस्तेमाल कर रही हैं और जनता के पिछड़ेपन का और वर्ग चेतना के अभाव का लाभ उठाकर उसे इन मुद्दों से भरमा रही हैं। उनकी दिलचस्पी आज ग़रीब मेहनतकश आबादी के साथ हो रहे अन्याय के ख़िलाफ़ लड़ने में नहीं है जो वास्तव में इतिहास को आगे ले जाता। उनकी दिलचस्पी सुदूर अतीत में हुए किसी ऐसे अन्याय के ख़िलाफ़ लड़ने में है, जिसके बारे में दावे से कहा भी नहीं जा सकता है कि वह हुआ था भी या नहीं। साम्प्रदायिक फ़ासीवाद ऐसी ही एक ताक़त है जो आम भारतीय जनता के बीच तार्किक दृष्टि की कमी, वर्ग चेतना की कमी, वैज्ञानिकता की कमी का फ़ायदा उठाते हुए उसे धर्म के आधार पर बाँट देती है। पूँजीपति वर्ग के लिए यह एक बहुत बड़ी सेवा साबित होती है क्योंकि यह सर्वहारा वर्ग के भी एक बड़े हिस्से को एक ऐसे सवाल पर आपस में बाँट देता है जो वास्तव में उसके लिए कोई सवाल है ही नहीं।

स्त्री उत्पीड़न और भाजपा का रामराज्य

स्त्री-विरोधी अपराधों में भाजपा के राज में जो अभूतपूर्व बढ़ोत्तरी हुई है, वह कोई इत्तेफ़ाक नहीं है। इतिहास गवाह है कि जब भी जनविरोधी, स्त्री-विरोधी, दलित-विरोधी व अल्पसंख्यक-विरोधी ताक़तें सत्ता में होती हैं, तो स्त्रियों के विरुद्ध बर्बर अपराधों में इज़ाफ़ा होता ही है।

फ़ासिस्टों ने किस तरह आपदा को अवसर में बदला!

भारत में फ़ासीवादी सरकार ने इस संकट को भी अपने फ़ासीवादी प्रयोग का हिस्सा बना लिया और थाली-ताली बजवाकर, मोमबत्ती जलवाकर जनता का एक सामूहिक मनोवैज्ञानिक परीक्षण कर यह पता लगाने में एक हद तक सफल भी हो गयी कि जनता का कितना बड़ा हिस्सा और किस हद तक तर्क और विज्ञान को ताक पर रखकर आरएसएस के फ़ासीवादी प्रचार के दायरे में आ चुका है। दूसरी ग़ौर करने वाली बात यह है कि ये फ़ासीवादी अनुष्ठान तब आयोजित किये जा रहे थे जब सीएए, एनआरसी और एनपीआर जैसे विभाजनकारी और आरएसएस के फ़ासीवादी मंसूबे को अमली जामा पहनाने वाले काले क़ानूनों के ख़िलाफ़ देशभर में सैकड़ों जगहों पर शाहीनबाग़ की तर्ज़ पर महिलाओं ने मोर्चा सँभाल रखा था। इन बहादुर महिलाओं के क़दम से क़दम मिलते हुए पुरुष, छात्र, कर्मचारी, मज़दूर यानि देश का हर तबक़ा बड़ी तादाद में सड़कों पर था। सत्ता की शह पर फ़ासिस्ट गुण्डों द्वारा प्रदर्शन पर गोली चलवाने, अफ़वाह फैलाकर आन्दोलन को बदनाम करने, सुधीर चौधरी, दीपक चौरसिया, अर्णब गोस्वामी जैसे पट्टलचाट सत्ता के दलाल पत्रकारों द्वारा फैलाये जा रहे झूठ, हिन्दू-मुसलमान के नाम पर आन्दोलन को कमज़ोर करने की लाख कोशिशों के बावजूद जब आन्दोलनकारी महिलाएँ बहादुरी से इसका सामना करते हुए मैदान से पीछे नहीं हटी तब इन दरिन्दों ने उत्तर-पूर्वी दिल्ली दंगो का ख़ूनी खेल खेलना शुरू कर दिया जिसमें दिल्ली पुलिस भी इन दंगाइयों के कन्धे से कन्धा मिलाकर आगजनी और तोड़फोड़ में शामिल रही।