साम्प्रदायिक फासीवादी सत्ताधारियों के गन्दे चेहरे से उतरता नकाब़

Narendra-Modi-Cartoon-Photoनरेन्द्र मोदी ने मई 2014 में सत्ता में आने के बाद कुछ रिकॉर्ड तो निश्चित तौर पर अपने नाम कर लिये हैं। स्वातन्‍त्र्योत्‍तर भारत के पूरे इतिहास पर निगाह दौड़ायी जाये तो शायद ही डेढ़ वर्ष से भी कम के शासन में कोई प्रधानमन्त्री इस कदर अलोकप्रिय हुआ है; शायद ही कोई अन्य प्रधानमन्त्री डेढ़ वर्ष से भी कम समय के प्रधानमन्त्रित्व में इस कदर मज़ाक का विषय बना हो; शायद ही कोई प्रधानमन्त्री भारत के इतिहास में आपको मिलेगा जिसका एक-एक जुमला, एक-एक तकिया कलाम, यहाँ तक कि उसका आम सम्बोधन भी चुटकुला बन चुका हो; शायद ही किसी पार्टी की सरकार ने डेढ़ वर्ष के अपने शासन काल में इस रफ्ऱतार से घपले-घोटाले किये हों; इस मामले में भाजपा सरकार निस्सन्देह गर्व के साथ दावा कर सकती है कि उसने कांग्रेस समेत सभी पूर्ववर्ती सरकारों के कीर्तिमान ध्वस्त कर दिये हैं; डेढ़ वर्ष के भीतर इतने सारे घपलों-घोटालों में फँसने के बाद भी शायद ही किसी सरकार के नेता-मन्त्री इस कदर बेशर्मी पर आमादा हुए हैं, जैसे कि सुषमा स्वराज, वसुन्धरा राजे, रमन सिंह, शिवराज सिंह चौहान और बाबूलाल गौड़ जैसे लोग हुए हैं; शायद ही कोई प्रधानमन्त्री होगा जिसने इतने सारे ग़लत-सलत बयान और ऐतिहासिक तथ्यों के प्रति भयंकर अज्ञानतापूर्ण बातें कहीं होंगी; याद करने से भी कोई ऐसा प्रधानमन्त्री याद नहीं आता जिसने अपनी मूर्खतापूर्ण हरक़तों और बयानों से पूरी दुनिया में इस कदर अपनी खिल्ली उड़वायी होगी; क्या आपको कोई सरकार याद है जिसने डेढ़ वर्ष के शासन-काल में देश और विदेश के पूँजीपतियों और कारपोरेट घरानों की इस नग्नता और राजनीतिक अश्लीलता के साथ सेवा की हो? क्या आप किसी ऐसे प्रधानमन्त्री को याद कर सकते हैं जिसे देशी-विदेशी पूँजी का ऐसा ज़बर्दस्त समर्थन हासिल हुआ हो? या फिर क्या आप ऐसा कोई शासन याद कर सकते हैं जिसने मज़दूरों-मेहनतकशों, छात्रों-युवाओं और आम आबादी के हक़ों को इस रफ्त़ार से छीना हो? या फिर कोई ऐसी सरकार जिसने स्त्रियों व दलितों के विरुद्ध आतंक का माहौल बनाने के लिए भगवा गुण्डा गिरोहों को इस कदर आज़ादी दी हो? क्या आपको और किसी सरकार का शासन-काल याद आता है जबकि तमाम प्रदेशों समेत पूरे देश में सरकार के हर प्रकार के विरोध को इस कदर कुचला गया हो, तमाम प्रगतिशील और जनवादी बुद्धिजीवियों, साहित्यकारों, अध्यापकों आदि की इस कदर हत्याएँ, उत्पीड़न और दमन किया गया हो? शायद आप याद नहीं कर पायेंगे। क्योंकि मोदी सरकार ने इन सभी मामलों में नये मानक स्थापित कर दिये हैं। कांग्रेस और संयुक्त मोर्चे की सरकारों ने भी पूँजीपति वर्ग की सेवा का ही काम किया है। मगर संकट से कराह रहे पूँजीपति वर्ग को जिस प्रकार के दमनकारी फासीवादी शासन की आवश्यकता आज है, नरेन्द्र मोदी उस ज़रूरत को पूरा करने के लिए सबसे मुफ़ीद उम्मीदवार हैं। हज़ारों करोड़ रुपये ख़र्च करके जिन उम्मीदों के साथ देश के पूँजीपति वर्ग ने विदेशी पूँजी की सहायता से नरेन्द्र मोदी को सत्ता में पहुँचाया था, उन उम्मीदों पर नरेन्द्र मोदी एकदम खरे उतर रहे हैं।

संसद चुनावों में भारी बहुमत के साथ सत्ता में आने के पहले नरेन्द्र मोदी की अगुवाई में भाजपा ने देश की जनता से “अच्छे दिनों” का जो वायदा किया था अब वह एक चुटकुले में तब्दील हो चुका है। देश की जनता को जादू की छड़ी घुमाकर महँगाई, बेरोज़गारी, भ्रष्टाचार, अपराध आदि से मुक्ति दिलाने की जो बात की गयी थी आज भाजपा नेता उसके बारे बात करना तो दूर उसका ज़िक्र करने पर भी बिफ़र पड़ते हैं। एक भाजपा मन्त्री ने तो हद ही कर दी! उन्होंने बोला कि नरेन्द्र मोदी या भाजपा ने कभी “अच्छे दिनों” का वायदा नहीं किया था, यह तो जनता ने उनके मुँह में डाल दिया! लेकिन हमें नहीं लगता कि नरेन्द्र मोदी का चुनाव के पहले तमाम मंचों पर से भयंकर रूप से विकर्षित कर देने वाले अन्दाज़ में ‘अच्छे दिन आयेंगे! अच्छे दिन आयेंगे!’ पर हुँकारी भरवाना जनता को भूला होगा। नरेन्द्र मोदी का कहना था कि देश की जनता ने कांग्रेस को 60 साल दिये इसलिए उन्हें वह कम से कम 60 महीने दे और फिर वह जनता की सभी समस्याओं का अपने “कठोर और निर्णायक नेतृत्व” से समाधान कर देंगे। अम्बानी, अदानी, टाटा, बिड़ला, जिन्दल, मित्तल जैसे लुटेरे पूँजीपतियों से मिले हज़ारों करोड़ रुपये ख़र्च करके मोदी ने रेडियो, टीवी, अख़बार आदि के ज़रिये अपना ऐसा प्रचार किया जो कि भारत के पूँजीवादी चुनावों के इतिहास में एक कीर्तिमान था। ‘अबकी बार मोदी सरकार’ के नारे को जनता के कान में इतनी बार डाला गया कि महँगाई, ग़रीबी और बेरोज़गारी से त्रस्त जनता के एक हिस्से को भी लगने लगा कि मोदी के नेतृत्व में भगवा ब्रिगेड सत्ता में आकर कुछ कमाल दिखायेगी! वास्तव में, भगवा ब्रिगेड ने अपने जर्मन चाचा गोयबल्स और जर्मन पिता हिटलर के कहे पर ही अमल किया थाः ‘एक झूठ को अगर सौ बार दुहराया जाय तो वह सच बन जाता है!’ और इस झूठ को तो मोदी के चुनाव प्रचार में लाखों बार दुहराया गया! ज़ाहिर था कि अपने जीवन के दुखदायी हालात से श्रान्त-क्लान्त जनता में यह प्रवृत्ति होती है कि वह ऐसे झूठों पर यक़ीन कर बैठती है, विशेष तौर पर तब जबकि उसके सामने पूँजीवादी चुनावों में पेश छद्म-विकल्पों के बाहर और कोई विकल्प नहीं होता। मोदी की सरकार बनने के पीछे काफ़ी हद तक यही कारक ज़िम्मेदार थे। वैसे भी पूँजीवादी व्यवस्था में पूँजीपति वर्ग के मामलों की देखरेख करने वाली ‘मैनेजिंग कमेटी’ नियमित अन्तराल पर बदलना अनिवार्य होता है क्योंकि किसी भी एक पार्टी की सरकार पाँच, दस या पन्द्रह वर्षों में इस कदर नंगी हो जाती है कि पूँजीपति वर्ग को तात्कालिक तौर पर घिस चुके सिक्के को किसी और सिक्के से बदलना ही होता है। यही कारण है कि पूँजीपति वर्ग का जनवाद आम तौर पर बहुपार्टी संसदीय लोकतन्त्र का रूप ही ग्रहण कर सकता है। ख़ैर, बेहाल ज़िन्दगी से त्रस्त देश की आम जनता के एक अच्छे-ख़ासे हिस्से ने और भयंकर प्रतिक्रियावादी उच्च मध्यवर्ग और हमेशा ही फासीवादी प्रचार पर सबसे जल्दी भरोसा करने वाला टटपुँजिया वर्ग ने “अच्छे दिनों” की उम्मीद में मोदी को बड़े पैमाने पर वोट दिया और मोदी की सरकार बन गयी।

पूँजीपतियों से मिले हज़ारों करोड़ रुपये के अलावा, भगवा ब्रिगेड ने सत्ता में आने से पहले देश के तमाम हिस्सों में दंगे भड़का कर भी साम्प्रदायिक आधार पर वोटों का ध्रुवीकरण किया। इसका चुनावों में उसे भारी लाभ मिला। मुज़फ़्फरनगर से लेकर भागलपुर तक छोटे और मँझोले पैमाने के कई दंगे हुए और जहाँ दंगे नहीं हुए वहाँ भी साम्प्रदायिक तनाव का एक माहौल बनाकर रखा गया। नतीजतन, उत्तर प्रदेश और बिहार में भाजपा को चुनावों में भारी फायदा हुआ। अगर हम उत्तर प्रदेश और बिहार में भाजपा की सीटों में हुई बढ़ोत्तरी को हटा दें तो भाजपा को सामान्य बहुमत मिलना भी मुश्किल हो जाता। सत्ता में आने के बाद भी जनता का ध्यान बुनियादी मुद्दों से भटकाने के लिए भगवा ब्रिगेड ने हिन्दुत्व, प्राचीन हिन्दू संस्कृति, प्राचीन हिन्दू विज्ञान, प्राचीन हिन्दू सभ्यता, हिन्दू शुचिता, हिन्दू नैतिकता आदि को ढोल पीटना जारी रखा है।

PM2लेकिन अब जनता को पता चल रहा है कि प्राचीन हिन्दू सभ्यता, नैतिकता, सदाचार, शुचिता के ढोल पीटने वाले भगवा फासीवादी सत्ताधारियों की सच्चाई क्या है? सत्ता में आते ही भ्रष्टाचार और घोटालों की इन्होंने ऐसी झड़ी लगायी है जो अचम्भित करने वाली है! देश के इतिहास का सबसे बड़ा घोटाला व्यापम, महाराष्ट्र में चिक्की घोटाले समेत पंकजा मुण्डे द्वारा किये गये दो घोटाले, तावड़े द्वारा किया गया घोटाला, तमाम घोटालों के गवाहों की हत्याएँ और उन्हें ग़ायब करवाना, आसाराम बापू जैसे बलात्कारी, दुराचारी बाबा का खुले तौर पर बचाव करना, आसाराम बापू मामले के गवाहों की भी एक-एक करके हत्याएँ, रमन सिंह सरकार के तहत घोटाले, ललित गेट में सुषमा स्वराज से लेकर वसुन्धरा राजे तक का फँसना, कानून से भागने वाले एक अपराधी दलाल को देश से बाहर निकल भागने में सहायता करना, गुजरात की मुख्यमन्त्री द्वारा अवैध सम्पत्ति खड़ी करना—! फेहरिस्त काफ़ी लम्बी है। इन सब घोटालों, अपराधों और हत्याओं के जनता के सामने आ जाने के बावजूद साम्प्रदायिक फासीवादी सत्ताधारियों की बेशर्मी का आलम यह है उनका एक सठिया चुका नेता बाबूलाल गौड़ व्यापम घोटाले के लगभग 50 गवाहों की हत्या पर कहता है, ‘यह तो प्रकृति का नियम है, जो आता है उसे जाना ही होता है!’ यह वही बाबूलाल गौड़ है जिसने एक बार एक रूसी महिला को धोती उतारना सिखाने की पेशकश की थी! अब चूँकि धोती उतारना सिखाने की पेशकश की गयी थी, इसलिए उसे प्राचीन भारतीय संस्कृति के अनुरूप ही माना जाना चाहिए! सरकार की विदेश मन्त्री सुषमा स्वराज कहती है कि उसने ललित मोदी को इंग्लैण्ड भागने में इसलिए मदद की क्योंकि उसकी पत्नी को कैंसर का इलाज कराना था! जिस देश में रोज़ नौ हज़ार बच्चे भूख और कुपोषण से मर जाते हैं, वहाँ उन्हें निशुल्क चिकित्सा सुविधा देने की बजाय इस नाम पर एक अव्वल दर्ज़े के दल्ले को भ्रष्टाचार करके देश से भागने में मदद की जाती है कि उसकी पत्नी को कैंसर है! और कैंसर के इलाज के नाम पर विदेश भागने वाला ललित मोदी उसके कुछ दिन बाद ही अर्द्धनग्न स्त्रियों के साथ पार्टी करते हुए अपनी फोटो इण्टरनेट पर डालता है! और इसके बावजूद सुषमा स्वराज का कहना है कि उसने मानवीय आधार पर ललित मोदी की मदद की! मानो मानवीय आधार पर मदद करने के लिए देश में उपयुक्त पात्रों की कोई कमी थी! राजनीतिक अश्लीलता और ढिठाई की सारी हदें पार करने के बाद हिन्दुत्ववादी धर्मध्वजाधारी तमाम समाचार चैनलों पर यह तर्क देते नज़र आ रहे हैं कि चूँकि कांग्रेस ने सालों-साल घोटाले किये तो अब उनके घोटालों पर शोर क्यों मचाया जा रहा है! यह ‘तू नंगा-तू नंगा’ का शोर इस बार जितनी नंगई के साथ मचा है, उतनी नंगई के साथ तो कभी नहीं मचा था।

दरअसल, पिछले दस साल से भाजपाई सत्ता को तरस गये थे; पूँजीपति वर्ग से गुहारें लगा रहे थे कि एक बार उनके हितों की सेवा करने वाली ‘मैनेजिंग कमेटी’ का काम कांग्रेस के हाथों से लेकर उसके हाथों में दे दिया जाय; वे अम्बानियों-अदानियों को लगातार याद दिला रहे थे कि गुजरात में, मध्य प्रदेश में और छत्तीसगढ़ में उन्होंने मज़दूरों-मेहनतकशों की आवाज़ को किस कदर दबा कर रखा है, उन्होंने किस तरह से कारपोरेट घरानों को मुफ़्त बिजली, पानी, ज़मीन, कर से छूट आदि देकर मालामाल बना दिया है! ये सारी दुहाइयाँ देकर भाजपाई लगातार देश की सत्ता को लपकने की फि़राक़ में थे! वहीं दूसरी ओर 2007 में शुरू हुई वैश्विक मन्दी के बाद पूँजीपति वर्ग को भी किसी ऐसी सरकार की ज़रूरत थी जो उसे लगातार छँटनी, तालाबन्दी के साथ-साथ और भी सस्ती दरों पर श्रम को लूटने की छूट दे और श्रम कानूनों से छुटकारा दिलाये। बिरले ही लागू होने वाले श्रम कानून भी मन्दी की मार से कराह रहे पूँजीपति वर्ग की आँखों में चुभ रहे हैं क्योंकि जहाँ कहीं कोई मज़बूत मज़दूर आन्दोलन संगठित होता है वहाँ कुछ हद तक वह श्रम कानूनों की कार्यान्वयन के लिए सत्ता को बाध्य भी करता है। इस ज़रूरत को पूरा करने के लिए देश के पूँजीपति वर्ग को भाजपा जैसी फासीवादी पार्टी को सत्ता में पहुँचाना अनिवार्य हो गया। यही कारण था कि 2014 के संसद चुनावों में मोदी के चुनाव प्रचार पर देश के पूँजीपतियों ने अभूतपूर्व रूप से पैसा ख़र्च किया, इस कदर ख़र्च किया कि कांग्रेस भी रो पड़ी कि मोदी को सारे कारपोरेट घरानों का समर्थन प्राप्त है और मोदी उन्हीं का आदमी है! यह दीगर बात है कि कांग्रेस की इस कराह का कारण यह था कि मन्दी के दौर में फासीवादी भाजपा पूँजीपति वर्ग के लिए उससे ज़्यादा प्रासंगिक हो गयी थी। मोदी ने सत्ता में आने के बाद देश-विदेश के कारपोरेट घरानों के जिस अश्लीलता से तलवे चाटे हैं, वह भी एक रिकॉर्ड है। श्रम कानूनों को बरबाद करने, ट्रेड यूनियन बनाने के अधिकार को एक प्रकार से रद्द करने, करों और शुल्कों से पूँजीपति वर्ग को छूट देने, विदेशों में भारतीय कारपोरेट घरानों के विस्तार के लिए मुफ़ीद स्थितियाँ तैयार करने से लेकर हर प्रकार के जनप्रतिरोध को मज़बूती से कुचलने में मोदी ने नये कीर्तिमान स्थापित किये हैं। लेकिन एक दिक्कत भी है।

फासीवादियों को सत्ता में बने रहने के लिए हमेशा एक आभा-मण्डल की ज़रूरत होती है क्योंकि उनकी पूरी राजनीति वास्तव में सौन्दर्यीकरण पर ही निर्भर करती है। यह आभा-मण्डल व्यक्तिगत शुचिता, कठोरता, नैतिकता का शोर मचाकर प्रचार करके तैयार किया जाता है। मोदी और भाजपाइयों के बारे में भी एक ऐसा आभा-मण्डल देश के कारपोरेट मीडिया ने चुनाव के पहले और चुनाव के बाद तैयार किया था। लेकिन बीसवीं सदी के फासीवादियों, यानी कि अपने जर्मन नात्सी और इतालवी फासीवादी बापों से एक मायने में भारत के भगवा हाफ़पैण्टिये अलग हैं! इनमें संयम नाम की चीज़ नहीं है! हमेशा चाल-चरित्र-चेहरे की बात करने वाले इन दोमुहों ने सत्ता में आते ही भ्रष्टाचार, घोटालों, नग्नता का ऐसा घटाटोप फैलाया है कि साल भर के भीतर ही मोदी और मोदी की सरकार का आभा-मण्डल तार-तार हो गया है! इसका एक कारण यह भी है कि आज पूँजीपति वर्ग के सदस्यों और उसकी पार्टियों के सदस्यों में एक हद तक अतिच्छादन हो गया है! जो मुनाफ़ाखोर हैं वही पार्टियों के नेता भी हैं! तरह-तरह के धन्धेबाज़, रैकेटियर, दलाल, डबल-डीलर भाजपा में नेताओं के रूप में मौजूद हैं। स्वयं इसके अध्यक्ष अमित शाह के बारे में सीबीआई ने कोर्ट को सूचित किया था कि अमित शाह वसूली गैंग चलाता था। इसी से समझा जा सकता है कि धर्मध्वजाधारी पार्टी में कैसे महानुभावों के हाथ में नेतृत्व है। दस वर्षों तक सत्ता से बाहर रहने के बाद इन धनलोलुपों के हाथ में सत्ता आयी तो ये सारा नियन्त्रण खो बैठे। भ्रष्टाचार और दलाली से पैसे पीटने पर भाजपाई सत्ताधारी इस कदर आमादा हो गये हैं कि मोदी को लेकर जो ‘फ्रयूहरर कल्ट’ तैयार किया जा रहा था, वह तैयार होने से पहले ही ध्वस्त हो गया। इस समय तो हालत यह है कि मोदी के मुँह से ‘मितरों—’ या ‘भाइयों और बहनों—’ निकलते ही बच्चों तक ही हँसी फूट जाती है! किसी की दुर्गति करने की धमकी देनी होती है, तो लोग कहते हैं कि ‘अभी तुम्हारे अच्छे दिन लाते हैं’, या ‘तेरा व्यापम कर दूँ क्या?’ भगवा ब्रिगेड के सेनानियों ने भ्रष्टाचार को उस हद तक पहुँचा दिया है कि नये मुहावरों और लोकोक्तियों का सृजन हो गया है! ठीक उसी प्रकार ‘जुमला’ शब्द का भी एक नया अर्थ अमित शाह ने पैदा कर दिया है! ग़ौरतलब है कि अमित शाह ने एक-एक करके भाजपा के सारे वायदों को जुमला क़रार दे दिया है! पहले उसने कहा कि विदेश से काला धन वापस लाने और नागरिकों के खाते में 15 लाख रुपये डालने की बात तो एक चुनावी जुमला था। अब उसने कहा है कि ‘अच्छे दिन’ आने में तो 25 साल लगेंगे! यानी भाजपा को चार बार चुनाव में और जिताओ तब अच्छे दिन आयेंगे! और अब उनका एक नेता कह रहा है कि भाजपा या मोदी ने कभी ‘अच्छे दिन’ लाने का वायदा ही नहीं किया था, यह तो जनता थी जिसने यह जुमला उसके मुँह में डाल दिया! क्या यह सब जनता के साथ एक भद्दा मज़ाक नहीं है?

देश की जनता के सामने ‘अच्छे दिनों’ की असलियत अब और ज़्यादा स्पष्ट हो गयी है। ये अम्बानियों और अदानियों के ‘अच्छे दिन’ हैं (हालाँकि उनके बुरे दिन ही कब थे!); देश की जनता को ‘अच्छे दिनों’ के नाम पर पहले से भी ज़्यादा महँगाई, बेरोज़गारी, ग़रीबी, कुपोषण, भुखमरी, बेघरी, भ्रष्टाचार और अपराध ही मिला है। नरेन्द्र मोदी और भाजपा विशेष तौर पर पूँजीपति वर्ग के सबसे प्रतिक्रियावादी हिस्से के नुमाइन्दे हैं और ये बड़ी पूँजी की नग्न तानाशाही को लागू करने वाले एजेण्ट हैं। कांग्रेस भी पूँजीपति वर्ग की नुमाइन्दगी करने वाली पार्टी है, हालाँकि मौजूदा संकट के दौर में पूँजीपति वर्ग की निगाह में उसकी प्रासंगिकता पूँजीपति वर्ग के लिए अपेक्षाकृत घटी हुई है। मगर यह ज़रूर है कि कांग्रेस ने भी सत्ता में रहते हुए नवउदारवाद की उन्हीं नीतियों को लागू किया था जिन नीतियों को आज भाजपा की सरकार और भी ज़्यादा आक्रामकता और नग्नता के साथ लागू कर रही है। भाजपा सरकार ने पूँजीपति वर्ग के पक्ष में मज़दूर वर्ग-विरोधी कदम और भी ज़्यादा खुले तौर पर और नंगे तौर पर उठाये हैं। यह क्षमता एक फासीवादी पार्टी में ही होती है क्योंकि ऐसी फासीवादी पार्टी के पीछे राजनीतिक चेतना से रिक्त एक टटपुँजिया उभार भी होता है, जिसे वह मज़दूर वर्ग के आन्दोलन के ख़िलाफ़ एक प्रतिभार (काउण्टर-वेट) के तौर पर इस्तेमाल करता है। कांग्रेस के पास ऐसा कोई सामाजिक आधार नहीं है जो कि जनता के एक हिस्से में कम-से-कम तात्कालिक तौर पर नंगी पूँजीपरस्त नीतियों के लिए वैधीकरण और सहमति निर्मित कर सके। इसी रूप में हर देश में फासीवादी पार्टियाँ संकट के दौर में पूँजीपतियों के लिए उपयोगी साबित होती हैं। यह दीगर बात है कि भाजपा सरकार के डेढ़ वर्षों में ही यह लगने लगा है कि अगला कार्यकाल एक बार फिर कांग्रेस के हाथ में जा सकता है, क्योंकि आर्थिक तौर पर भी इस बात की गुंजाइश कम है कि जनता के हालात सुधरें, चाहे मोदी सरकार कुछ भी कर ले। मोदी सरकार पूँजीपति वर्ग के कुछ हिस्सों की इच्छा की अवहेलना करके ही तात्कालिक तौर पर कुछ ऐसे कदम उठा सकती है जो जनता को भयंकर महँगाई और बेकारी से राहत दिला सकें। मगर इसकी गुंजाइश कम ही लगती है।

फिर भी, भाजपा सरकार का असली चेहरा हालिया दिनों में जनता के सामने बेनक़ाब होने का यह अर्थ नहीं निकाला जाना चाहिए कि उसके फासीवादी एजेण्डे के अमल में कहीं कोई कमी आने वाली है। एक ओर देशी-विदेशी पूँजी के लिए देश के मज़दूरों और आम घरों के युवाओं की मेहनत को लूट का खुला चरागाह बनाने तो दूसरी ओर देश की प्राकृतिक सम्पदा की लूट-खसोट करने की पूरी आज़ादी पूँजीपति वर्ग को देने की नीतियाँ बनाने की मोदी सरकार की रफ़्तार उसके भ्रष्ट गन्दे चेहरे के बेपर्द होने से कम नहीं होने वाली है। मोदी को सत्ता में लाने के लिए देशी-विदेशी पूँजीपतियों ने जो दस हज़ार करोड़ रुपये की रकम ख़र्च की है, मोदी सत्ता में आने के बाद उसे सूद-ब्याज़ समेत वापस करने का हर प्रयास कर रहा है, करता रहेगा और यह सभी को दिखायी भी पड़ रहा है। साथ ही, शिक्षा और संस्कृति के सभी संस्थानों का भगवाकरण करने के एजेण्डे पर भी मोदी सरकार पुरज़ोर तरीके से अमल कर रही है। एफटीआईआई से लेकर भारतीय विज्ञान कांग्रेस और भारतीय इतिहास अनुसन्धान परिषद तक का भगवाकरण सबके सामने है। भारतीय इतिहास अनुसन्धान परिषद का अध्यक्ष एक ऐसे व्यक्ति को बनाया गया है जो कि महाभारत और रामायण को सच्ची ऐतिहासिक घटनाएँ मानता है; एफटीआईआई के अध्यक्ष का पद ‘खुली खिड़की’ और ‘जंगल लव’ जैसी घटिया सॉफ़्ट-पॉर्न फिल्मों के अभिनेता को बनाया गया है! इसी प्रकार भारतीय विज्ञान कांग्रेस में हाफपैण्टियों ने इस बारे में पेपर पढ़े कि किस प्रकार प्राचीन भारत में विमान था, अणु बम था, वगैरह! (और फिर मध्ययुग में कुछ लोगों घोड़ों पर तलवार लेकर आये और उन्होंने विमानों और अणु बम और ड्रोन जैसी चीज़ों के स्वामियों को हरा दिया!) ऐसी बकवास को बार-बार दुहरा कर आम ग़रीब अनपढ़ जनता और टटपुँजिया वर्ग के चेतना-रिक्त और तर्क व विज्ञान से महरूम युवाओं के दिमाग़ में बिठाया जा रहा है! यह है हाफपैण्टियों का पीढ़ी-निर्माण कार्यक्रम। ऐसे दकियानूसी और कूपमण्डूकता भरे विचारों के शिकार लोग कभी अन्याय और जुर्म के ख़िलाफ़ लड़ नहीं सकते हैं। और यही कारण है कि फासीवादी बर्बर हाफपैण्टिये इन विचारों के प्रचार-प्रसार में लगे हुए हैं।

जो भी प्रगतिशील नौजवान और संगठन हैं उन्हें इन साज़िशों को कम करके नहीं आँकना चाहिए। इनका मज़ाक बनाकर भी कुछ नहीं होगा, सिर्फ़ नुकसान होगा। हमें आम ग़रीब जनता के बीच उनकी भाषा में फासीवादियों के इन दोनों एजेण्डों को बेनक़ाब करना चाहिए। हमें आम जनता के बीच इन हिन्दुत्ववादी धर्मध्वजाधारियों की नैतिकता, शुद्धता, सदाचार, मूल्य आदि का पर्दाफाश करना चाहिए और दिखलाना चाहिए कि इनका एक ही धर्म है – पूँजीपतियों की सेवा और उसके बदले में मेवा! भाजपा के ही एक नेता दिलीप सिंह जूदेव ने वाजपेयी सरकार के दौरान कहा था कि ‘पैसा खुदा नहीं तो खुदा से कम भी नहीं!’ अनजाने में यह भाजपाई हाफपैण्टिया अपने संगठन की असली सोच को बता गया! हमें इसी सच्चाई को देश के युवाओं और मज़दूरों के सामने साफ़ करना चाहिए। हमें इनके दलित-विरोधी और स्त्री-विरोधी चरित्र को भी जनता के सामने उजागर करना चाहिए। इनके नकली आभा-मण्डल को हमें क्रान्तिकारी प्रचार के ज़रिये आम जनता के बीच भंग कर देना चाहिए। यह वह जगह है जहाँ इन्हें सबसे ज़्यादा चोट लगती है।

साम्प्रदायिक फासीवादियों का मुकाबला नेहरू-ब्राण्ड ‘सर्व धर्म समभाव’ जैसे जुमलों से नहीं हो सकता है; न ही इनका मुकाबला संसदीय वामपंथी ताक़तों के प्रतीकात्मक नकली विरोध से हो सकता है! इनका मुकाबला मेहनतकश जनता और आम घरों के युवाओं की एकजुटता, गोलबन्दी और संगठन के ज़रिये ही किया जा सकता है। जो भी मौजूदा फासीवादी उभार का कारगर प्रतिरोध करना चाहते हैं, उन्हें अपने सभी प्रयासों को इस दिशा में मोड़ देना चाहिए।

मुक्तिकामी छात्रों-युवाओं का आह्वान, मई-अक्‍टूबर 2015

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