सहिष्णुता के विरुद्ध और असहिष्णुता के पक्ष में

मोदी सरकार के सत्ता में आने के बाद से ही, बल्कि कहें कि मोदी की अगुवाई में नये सिरे से भगवा फासीवादी लहर की शुरुआत के बाद से ही देश भर में मुसलमानों व अन्य धार्मिक अल्पसंख्यकों, दलितों, स्त्रियों और साथ ही प्रगतिशील व जनवादी बुद्धिजीवियों पर हमलों में अभूतपूर्व बढ़ोत्तरी हुई है। दाभोलकर, पानसरे और कलबुर्गी की हत्या से लेकर तमाम लेखकों व बुद्धिजीवियों के नाम हिन्दुत्व के ठेकेदारों के फतवों ने देश में एक ऐसा माहौल पैदा किया है जिसमें कोई भी व्यक्ति खुलकर अपने विचारों को अभिव्यक्ति नहीं दे सकता, विशेष तौर पर, अगर वह भगवा फासीवादी गिरोह और मोदी सरकार के ख़िलाफ़ हो। संघ परिवार और मोदी सरकार ने देशभक्ति को सरकार की भक्ति से जोड़ दिया है। जो भी मोदी की मुख़ालफ़त करता है, उस पर तुरन्त ही देशद्रोही और ग़द्दार होने का ठप्पा लगा दिया जाता है। इस फासीवादी लहर के विरुद्ध देश भर में, विशेष तौर पर, छात्रों-युवाओं के बीच से स्वतःस्फूर्त विरोध और आन्दोलन हो रहे हैं। लेकिन साथ ही देश की क्रान्तिकारी प्रगतिशील ताक़तें इस भगवा उभार के विरुद्ध कोई अर्थपूर्ण, कारगर, सुविचारित और योजनाबद्ध प्रतिरोध उपस्थित करने में कम-से-कम अभी तक सफल नहीं हो पायी हैं। इसके कई कारण हैं जिन पर विस्तार से चर्चा हो सकती है, लेकिन हम अभी एक विशिष्ट कारण पर चर्चा करना चाहेंगे।

मोदी सरकार द्वारा जनवादी व नागरिक अधिकारों, धार्मिक अल्पसंख्यकों, दलितों व स्त्रियों की आज़ादी और हक़ो-हुकूक पर हमलों से जो पूरा माहौल पैदा हुआ है उस पर प्रगतिशील बौद्धिक दायरों के बीच से जो प्रतिक्रिया आयी है, वह राजनीतिक तौर पर अज्ञानग्रस्त और दरिद्र है। इसका एक सबसे बड़ा लक्षण हमें कई महीनों से जारी सहिष्णुता और असहिष्णुता पर बहस में सामने दिखायी पड़ रहा है। सहिष्णुता और असहिष्णुता के मसले को लेकर देश भर में विरोध-प्रदर्शन और प्रति-विरोध प्रदर्शन जारी हैं। प्रगतिशील व जनवादी हलकों ने मोदी सरकार द्वारा पैदा किये गये ‘असहिष्णुता’ के माहौल के विरुद्ध बयान जारी करने से लेकर विरोध प्रदर्शन व धरने किये, तो जवाब में मोदी-भक्तों की ओर से मोदी के प्रति दिखलायी जा रही इस ‘असहिष्णुता’ (!) के विरुद्ध जुलूस और प्रदर्शन किये गये! लेकिन मोदी सरकार द्वारा जनता के जनवादी नागरिक अधिकारों व बौद्धिक स्वतन्त्रता पर हमलों के विरोध की मुहिम को सहिष्णुता-असहिष्णुता पर अपचयित करने के विरोधाभास अभी से ही सामने आने लगे हैं।

anti_fascismवास्तव में, सहिष्णुता और असहिष्णुता पर बहस करना ही मूर्खतापूर्ण है क्योंकि यह ‘बाइनरी’ ही एक छद्म ‘बाइनरी’ है। ज़रा करीबी से सोच कर देखा जाय। किस चीज़ के प्रति सहिष्णु होने की हम अपील कर रहे हैं? क्या हम स्वयं हर चीज़ के प्रति सहिष्णु हो सकते हैं? मिसाल के तौर पर, क्या हम असहिष्णुता के प्रति सहिष्णु हो सकते हैं? अगर हम असहिष्णुता के प्रति सहिष्णु होते हैं, तो क्या वह अपने आप में असहिष्णुता का समर्थन करना या स्वयं असहिष्णु होना नहीं होगा? सहिष्णुता के लिए की जाने वाली अपीलें निहायत विरोधाभासी और स्वयं-पराजयकारी होती हैं। मिसाल के तौर पर, जब प्रगतिशील जनवादी आन्दोलन ने सरकार पर अल्पसंख्यकों, स्त्रियों, बुद्धिजीवियों आदि के प्रति असहिष्णु होने का आरोप लगाया तो उसकी छड़ी से उसे ही पीटते हुए अनुपम खेर जैसे दलालों ने प्रगतिशील आन्दोलन पर मोदी सरकार के प्रति असहिष्णु होने का आरोप लगाया! यह अपने आप में सहिष्णुता के तर्क की दरिद्रता को दिखलाता है। प्रगतिशील अवस्थिति से हम फासीवादियों और प्रतिक्रियावादियों से सहिष्णुता की अपील नहीं कर सकते हैं। ठीक उसी प्रकार जैसे कि हम अपनी राजनीतिक-विचारधारात्मक अवस्थिति के कारण जाति प्रथा, सती, असमानता, अन्याय और शोषण के प्रति सहिष्णु नहीं हो सकते हैं, वैसे ही मोदी सरकार और संघ परिवार अपनी राजनीतिक-विचारधारात्मक अवस्थिति के चलते मुसलमानों, दलितों, औरतों, मज़दूरों, आम छात्रों-युवाओं के प्रति सहिष्णु नहीं हो सकते हैं। वे कुछ निश्चित चीज़ों के प्रति सहिष्णु और असहिष्णु होंगे और हम भी कुछ निश्चित चीज़ों के प्रति सहिष्णु और असहिष्णु होंगे। सवाल निरपेक्ष रूप से सहिष्णुता या असहिष्णुता का है ही नहीं। सवाल राजनीतिक और विचारधारात्मक वर्ग संघर्ष का है। इस वर्ग संघर्ष में न तो वे हमसे सहिष्णु होने की उम्मीद या अपील कर सकते हैं, और न ही ऐसी उम्मीद और अपील हम उनसे कर सकते हैं। इस राजनीतिक और विचारधारात्मक चुनौती को सीधे सींग से पकड़ने का साहस या क्षमता प्रगतिशील आन्दोलन अभी जुटा नहीं पा रहा है और यही कारण है कि वह ‘सहिष्णुता-असहिष्णुता’ पर अपने प्रतिवाद को अपचयित किये दे रहा है। यह लम्बी दूरी में काफ़ी नुकसानदेह साबित होने वाला है और इसके कुछ गम्भीर राजनीतिक और साथ ही ऐतिहासिक कारण है।

इन कारणों पर आने से पहले इस बहस की व्यर्थता को प्रदर्शित करने के लिए हम कुछ हाइपोथेटिकल प्रश्नों को आपके सामने रखना चाहेंगे। रोहित वेमुला की सांस्थानिक हत्या के बाद से देश भर में कैम्पस उबाल पर हैं और सामाजिक न्याय और समानता की माँग को लेकर लड़ रहे हैं। क्या दमित दलित आबादी ब्राह्मणवादियों और सवर्णवादियों से यह कह सकती है, “सवर्ण लोगों को हमारे प्रति सहिष्णु होना चाहिए”; क्या पितृसत्ता और पुरुषवाद के जुवे को ढो रही औरतें अपने संघर्ष में यह कहेंगी, “पुरुषों को हमारे प्रति सहिष्णु होना सीखना चाहिए”; क्या हिन्दुत्वादी फासीवाद के हाथों हर रोज़ सड़कों पर ‘भीड़ के न्याय’ का सामना कर रहे मुसलमान यह कहेंगे, “हिन्‍दुओं को हमारे प्रति सहिष्णु होना चाहिए”; क्या आर्थिक-सामाजिक शोषण के विरुद्ध लड़ रहे मज़दूर यह कहेंगे, “मालिकों को हमारे प्रति कुछ सहिष्णुता बरतनी चाहिए”; या फिर क्या काले लोग नस्लवाद के विरुद्ध अपनी लड़ाई में यह कहेंगे, “श्‍वेत लोगों को हम काले लोगों के प्रति सहिष्णु होना चाहिए”? हमें नहीं लगता इनमें से कोई भी शोषित-उत्पीड़ित तबका ऐसा कहेगा जो कि वास्तव में संघर्ष कर रहा है, जो अपने आत्मसम्मान के लिए लड़ रहा है। ऐसा वही दमित-शोषित व्यक्ति कह सकता है जो कि समानता और न्याय के लिए नहीं लड़ रहा है, बल्कि दमन और शोषण करने वालों की दरियादिली, उदारता, दानशीलता और महाशयता को अपील कर रहा है, उसके लिए प्रार्थना कर रहा है, भीख माँग रहा है। ऐसी सहिष्णुता का अर्थ एक सहिष्णु उच्च जातीय हिन्दू के लिए यह है,“मैं इन यवनों (मुसलमानों) को पसन्द तो नहीं करता लेकिन मैं इन्हें बर्दाश्त करने को तैयार हूँ क्योंकि यह सामाजिक आचार व नैतिकता के अनुसार सही है। हमारी अलग संस्कृतियाँ हैं और हम सहिष्णु होने के अलावा और कर भी क्या सकते हैं!” लेकिन किसी भी राजनीतिक रूप से सचेत प्रगतिशील व्यक्ति के लिए क्या सहिष्णुता का तर्क देना या अपीलें करना राजनीतिक और विचारधारात्मक अश्लीलता नहीं है?

अब इस सवाल पर थोड़ा राजनीतिक, विचारधारात्मक और साथ ही ऐतिहासिक गहराई में उतरकर विचार करते हैं। सहिष्णुता का यह तर्क आज हमारे देश में ही विमर्श का केन्द्र-बिन्दु नहीं बना हुआ है। यह पूरे विश्व में ही विशेष तौर पर 1970 के दशक के बाद से एक ‘कैचवर्ड’ बना हुआ है। यह भूमण्डलीकरण के दौर में नवउदारवादी पूँजीवाद और उसकी तमाम पतनशील विचारसरणियों का पसन्दीदा नारा बना हुआ है, जैसे कि बहुसंस्कृतिवाद (multiculturism), उत्तरआधुनिकतावाद आदि। भारत में भूमण्डलीकरण के दौर में नवउदारवाद की आर्थिक नीतियों के परिपक्व होने के साथ यहाँ भी यह सहिष्णुता-असहिष्णुता का विमर्श हावी हो गया है। विडम्बना की बात यह है कि यूरोप व अमेरिका में यह विमर्श पूँजीवादी सत्ता द्वारा लोकप्रिय बनाया गया था, लेकिन यहाँ पर इसकी शुरुआत प्रगतिशील जनवादी बौद्धिक वर्ग और आन्दोलन ने की है! इसे त्रासद विडम्बना ही कहा जा सकता है क्योंकि सहिष्णुता का नारा वास्तव में आज के दौर के पूँजीवाद का एक प्रमुख राजनीतिक-विचारधारात्मक नारा है। यह ‘इतिहास के अन्त’ के उस दौर में (!) पतनशील, मरणोन्मुख बुर्जुआ वर्ग का प्रिय जुमला है, जिसे कई दार्शनिकों व टीकाकारों ने उत्तर-राजनीति का युग (post-political era) कहा है। यह एक अराजनीतिकीकरण का नारा है, जिसे आज व्यवस्था एक ‘फेटिश’ बनाने का प्रयास कर रही है, इसे वर्चस्वकारी बनाने का प्रयास कर रही है। यह नारा हरेक अन्तरविरोध को, हरेक टकराव को, हरेक समस्या को ‘सहिष्णुता-असहिष्णुता’ पर अपचयित कर देता है। और हमारे देश में इस तर्क की पूरी ऐतिहासिक और दार्शनिक पृष्ठभूमि को समझे बिना लपक लेना, हमारे देश के प्रगतिशील आन्दोलन की दरिद्रता को ही दिखलाता है।

वैश्विक स्तर पर पूँजीवाद 1970 के ही दशक से एक सतत् मन्दी का शिकार है जोकि बीच-बीच में भयंकर संकटों के रूप में अपने आपको प्रकट करती है। 1989-90 में बर्लिन दीवार के गिरने और फिर सोवियत संघ के विघटन के साथ समाजवाद की मृत्यु और ‘इतिहास के अन्त’ का जो शोर मचा, उसकी पृष्ठभूमि में कोई अजर, अमर, स्वस्थ और फलता-फूलता पूँजीवाद नहीं था। उसके पीछे संकटग्रस्त, दीर्घकालिक मन्दी से कराहता, पूरे विश्व में युद्ध की विभीषिका रचता, पर्यावरणीय विनाश करता हुआ पूँजीवाद था। लेकिन साथ ही एक विकल्पहीनता की स्थिति भी थी। ऐसे दौर ने एक पतनशील और उन्मादी पूँजीवादी विजयवाद को जन्म दिया जो 1990 के दशक के अन्त तक जारी रहा। यही दौर था जब उत्तरआधुनिकतावाद की विचारधारा दुनिया भर के अकादमिक जगत में वर्चस्वकारी बन गयी थी, हालाँकि इसके उत्स 1960 के दशक के अन्त में ही देखे जा सकते हैं। इसी दौर में, फ्रांसिस फुकोयामा ने ‘इतिहास के अन्त’ की घोषणा करते हुए दावा किया कि उदार बुर्जुआ जनवाद की अन्तिम विजय के साथ अब एक सामंजस्यपूर्ण और शान्तिपूर्ण विश्व (पैक्स अमेरिकाना!) सम्भव बन गया है। लेकिन 1990 के दशक का अन्त आते-आते पूरी दुनिया में आर्थिक संकट के कारण पैदा हुई बेरोज़गारी, गिरती वास्तविक आय, नवउदारवादी पूँजीवाद के हाथों बचे-खुचे पूँजीवादी कल्याणवाद के ख़ात्मे के कारण मज़दूर, छात्र-युवा सड़कों पर उतर रहे थे। 1997, 2001 और फिर अन्त में 2007 में आये भयंकर संकटों ने, विशेष तौर पर 2007 से सतत् जारी ढाँचागत मन्दी और संकट ने स्पष्ट कर दिया है कि पूँजीवादी व्यवस्था अपनी तमाम सैन्य शक्तिमत्ता के बावजूद अन्दर से अभूतपूर्व रूप से खोखली और कमज़ोर हो चुकी है; अरब विश्व में आये जनउभार के कारण सैन्य रूप से अजेय दिखने वाली तानाशाह सत्ताओं का पतन हुआ, हालाँकि किसी विकल्प के अभाव में जनता को जो कुछ मिला वह उन तानाशाह सत्ताओं से कोई बेहतर नहीं था। लेकिन ये सारी उथल-पुथल एक बात की ओर इशारा तो कर ही रही थी-विश्व पूँजीवाद पहले हमेशा से ज़्यादा खोखला और मरणासन्न है। पूँजीवाद के ‘इतिहास के अन्त’ के इस दौर में जिन विचारधारात्मक उपकरणों का पूँजीवाद इस्तेमाल कर रहा है, उनमें से एक है विराजनीतिकरण (depoliticization) का उपकरण। सहिष्णुता-असहिष्णुता का तर्क इसी विराजनीतिकरण की राजनीति के युग या ‘उत्तर-राजनीति के युग’ का एक लक्षण है। यह विचारधारात्मक उपकरण किस तरह से काम करता है, इस पर थोड़ा करीबी से ग़ौर करने पर चीज़ें साफ़ होने लगती हैं।

आज हमारे सामने जो तमाम समस्याएँ हैं, उन्हें असहिष्णुता की समस्या के तौर पर पेश किया जाता है। असमानता, अन्याय और शोषण-उत्पीड़न की समस्याओं को भी सहिष्णुता और असहिष्णुता की छद्म ‘बाइनरी’ में विचारधारात्मक तौर पर अपचयित व विनियोजित किया जाता है। इस तर्क के अनुसार, इन तमाम समस्याओं का समाधान मुक्तिकामी राजनीति नहीं है, बल्कि सहिष्णुता है। यह पूरी तर्क प्रणाली वास्तव में उत्तरआधुनिक पूँजीवाद के बहुसंस्कृतिवाद की तर्क प्रणाली है। इसे ज़िज़ेक ने ठीक ही नाम दिया है-राजनीति का संस्कृतिकरण (culturelization of politics)। सामाजिक-आर्थिक और राजनीतिक अन्तरविरोधों का सांस्कृतिक अन्तर (difference) के रूप में नैसर्गिकीकरण और सारभूतीकरण कर दिया जाता है। वे विभिन्न “जीवन पद्धतियों” और “संस्कृतियों” के अन्तर के तौर पर पेश किये जाते हैं। ये ऐसे अन्तर हैं जिन्हें दूर नहीं किया जा सकता है, जिन पर विजय नहीं पायी जा सकती है। ऐसे में आपके पास, ऐसा प्रतीत होता है, दो ही विकल्प बचते हैं- इन अन्तरों को ‘टॉलरेट’ किया जाय या न ‘टॉलरेट’ किया जाय! और अगर हम अधिक करीबी से देखें तो हम पाते हैं कि ये वास्तव में दो विकल्प हैं ही नहीं! ये एक ही विकल्प है। इस प्रकार की कोई भी सहिष्णुता एक पत्ता टूटने से असहिष्णुता में तब्दील हो सकती है। एक बुत के टूटने या गाय के मरने से सहिष्णु के असहिष्णु बनते देर नहीं लगती है। ऐसी सहिष्णुता बेहद नाजुक सन्तुलन पर टिकी होती है। क्या आज पूरे यूरोप में बहुसंस्कृतिवाद का संकट और हमारे देश में साम्प्रदायिक फासीवाद का उभार इसी नाजुक सन्तुलन के अस्थिर हो जाने के चिन्ह नहीं हैं? हमें इस छद्म युग्म को ही नकारना होगा। वॉल्टर बेंजामिन से कुछ शब्द उधार लेकर बात करें तो राजनीति के इस संस्कृतिकरण या सौन्दर्यीकरण का जवाब हमें संस्कृति और सौन्दर्य के राजनीतिकरण से देना चाहिए;एक ऐसी राजनीति से देना चाहिए जो मानव-मुक्ति की राजनीति हो। ऐसी राजनीति किसी भी सूरत में ‘सहिष्णु’ नहीं हो सकती है; वह संघर्ष के ज़रिये अन्तरविरोधों के समाधान की राजनीति ही हो सकती है; ऐसी राजनीति ‘सहिष्णुता’ के नाम पर पार्थक्यपूर्ण असम्पृक्तता (segregative disengagement) की राजनीति नहीं होगी, बल्कि बेहद उथल-पुथल भरे, अन्तरविरोधों और टकरावों से भरी सम्पृक्तता की राजनीति ही हो सकती है। ऐसी राजनीति ‘डिसइंगेज’ करके ‘टॉलरेट’ करने की वकालत नहीं कर सकती, बल्कि ‘इंगेजिंग इण्टॉलरेंस’ (फासीवादी ‘डिसइंगेज्ड इण्टॉलरेंस’ के बरक्स) की राजनीति होगी।

राजनीति के संस्कृतिकरण की राजनीति या विराजनीतिकरण की यह नयी राजनीति जिसे उत्तरआधुनिकतावाद व बहुसंस्कृतिवाद की विचारधारा पेश कर रही है, उसकी ज़मीन वास्तव में वास्तविक समाधानों की प्रतीतिगत असफलता और अवास्तिवक समाधानों की वास्तविक असफलता से पैदा हुई है। मुक्तिकामी राजनीति का विकल्प पेश करने वाले प्रयोगों के तौर पर बीसवीं सदी के समाजवादी प्रयोगों की ‘असफलता’ और साथ ही भूमण्डलीकरण के दौर में नवउदारवादी पूँजीवादी असाध्य संकट के साथ कल्याणकारी राज्य के कीन्सीय नुस्खे की (सम्भवतः अन्तिम तौर पर) असफलता ने जो तात्कालिक राजनीतिक निर्वात पैदा किया है, उस निर्वात को पूँजीवाद आज इसी विराजनीतिकरण की राजनीति से भर रहा है, जिसमें समस्याओं का समाधान सहिष्णुता के तौर पर पेश किया जा रहा है। सहिष्णुता की अपीलें और नारे वास्तव में राजनीति के डोमेन से कदम पीछे हटाने (retreat) के व्यापक राजनीतिक एजेण्डे का एक अंग है। यह जनता के विराजनीतिकरण के एजेण्डे के केन्द्रीय संघटक तत्वों में से एक है। इस तर्क को खाद-पानी देने का कार्य वास्तव में ऐसी किसी भी प्रगतिशील राजनीति को नकारता है जिसमें कि सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक अन्तरविरोधों को एक सही राजनीतिक अभिव्यक्ति (articulation) देने का या फिर उसका जनता के राजनीतिक ‘इंगेजमेण्ट’ द्वारा समाधान करने का प्रयास किया जाय। इसका कारण यह है कि ऐसा कोई प्रयास जनसमुदायों को राजनीतिक बनाता है और उनके रूपान्तरण की ओर ले जाता है। दूसरी ओर सहिष्णुता का तर्क भूमण्डलीकरण के दौर के वैश्विक पूँजीवाद के लिए एक आदर्श बुर्जुआ ‘सब्जेक्ट’ का निर्माण करता है, जिसने अपने आपको राजनीति के क्षेत्र से वापस ले लिया या प्रत्याहृत (withdraw) कर लिया है।

बुर्जुआ उत्तरआधुनिक बहुसंस्कृतिवाद का यह सहिष्णुता का तर्क जिस बुनियादी विचारधारात्मक पूर्वाग्रह पर आधारित है वह है प्रकृति और संस्कृति को एक मान लेना। ऐसे में, जनसमुदायों की विभिन्न संस्कृतियाँ, मूल्य, परम्पराएँ और जीवन शैलियाँ एक ऐसी चीज़ बन जाती है, जो पूर्वप्रदत्त है, नैसर्गिक रूप से प्रदत्त है। उन्हें आस्था और अस्मिता का प्रश्न बना दिया जाता है। यहाँ संस्कृति का भी एक अनैतिहासिक सारभूतीकरण (ahistorical essentialization) किया जाता है, जो कि इस सच्चाई को समझने से एक प्रकार से इंकार करना है कि हरेक संस्कृति का एक इतिहास है। ऐसे में, संस्कृति सदा से मौजूद एक अपरिवर्तनीय राशि बन जाती है। इस रूप में हम किसी की संस्कृति, मूल्यों, परम्पराओं और जीवन शैलियों के विषय में कोई बातचीत, विमर्श या बहस नहीं कर सकते, दूसरे शब्दों में इनके विषय में कोई भी आलोचनात्मक ‘इंगेजमेण्ट’ असम्भव हो जाता है! ‘कीप सेफ डिस्टेन्स’! ऐसा कोई आलोचनात्मक ‘इंगेजमेण्ट’ करना भी असहिष्णुता के दायरे में आयेगा; इससे लोगों की आस्था को ठेस पहुँचेगी क्योंकि आस्था किसी भी किस्म के तर्क-वितर्क के दायरे में नहीं आती। राजनीति का यह भावनात्मकीकरण (sentimentalization) अन्तिम विश्लेषण में व्यक्ति के विराजनीतिकरण की ओर ले जाता है। मनुष्य की संस्कृति एक प्रकार से मनुष्य की प्रकृति बन जाती है, या कहें संस्कृति का नैसर्गिकीकरण (naturalization) हो जाता है। संस्कृति व्यक्ति के जैविक (biological) अस्तित्व का अंग बन जाती है। उसकी पूरी राजनीति उसकी इसी निर्मित जैविकता से प्रवाहित होती है। उसका विराजनीतिकरण और जैवराजनीतिकरण हो जाता है।

ऐसे में, बुर्जुआ वर्ग एक बार फिर छद्म विकल्पों का एक समुच्चय हमारे सामने पेश करता है – एक उदार बुर्जुआ विकल्प और दूसरा दक्षिणपंथी बुर्जुआ विकल्प। इन दोनों के एक दूसरे में तब्दील हो जाने में ज़्यादा वक़्त नहीं लगता है। उदार बुर्जुआ विकल्प जो कि फ्रांसिस फुकोयामा और तमाम उत्तरआधुनिकतावादी बहुसंस्कृतिवादी पेश करते हैं, यानी कि एक प्रकार की साम्राज्यवादी शान्ति, इतिहास के अन्त के साथ स्थायी पूँजीवादी सामंजस्य (पैक्स अमेरिकाना?) जिसमें कि विभिन्न धर्म, जाति और संस्कृतियों को एक-दूसरे को बर्दाश्त करते हुए सहअस्तिव में रहना होता है! दक्षिणपंथी बुर्जुआ विकल्प सैम्युएल हण्टिंग्टन जैसे नवसाम्राज्यवादी पेश करते हैं जिसमें ‘सभ्यताओं के टकराव’ की बात की जाती है। उदार बुर्जुआ विकल्प है बर्दाश्त करो, सहिष्णुता का प्रदर्शन करो और दक्षिणपंथी बुर्जुआ विकल्प है बर्दाश्त मत करो, ‘इंगेज’ मत करो, असहिष्णु बनो! ज़ाहिर है, अन्तकारी संकट के दौर में ये दोनों विकल्प लगातार ‘ट्रांस्म्यूटेट’ होते रहते हैं! वास्तव में, पूँजीवाद के ‘इतिहास के अन्त’ के युग में पूँजीवादी दायरों के भीतर अन्ततः ‘सभ्यताओं के टकराव’ की राजनीति ही सम्भव बचती है!

हम अपने देश में देख सकते हैं कि संस्कृति का ऐसा प्रकृतिकरण या नैसर्गिकीकरण किस प्रकार संस्कृति को एक ऐसी वस्तु बना देता है जो उदात्तता, मानवीय सारतत्व और बेहतर मूल्यों से मनुष्य का परिचय कराने की बजाय बर्बरता का आधार बन जाती है। हिन्दू ‘संस्कृति’ (इसका जो भी मतलब होता हो!), इस्लामी ‘संस्कृति’ (इसका भी जो भी मतलब होता हो!) इत्यादि के रूप में जनसमुदायों की संस्कृति का एक सारभूतीकरण किया जाता है और इस रूप में वे केवल बर्बरता का आधार ही बन सकती हैं। या फिर, सहिष्णुता के छोटे-छोटे कुछ अन्तरालों का! यदि लोग सीधे-सीधे अपनी अतिविशिष्टीकृत संस्कृति के साथ अपने पूरे अस्तित्व और अस्मिता को जोड़ देंगे, तो वे स्वाभाविक तौर पर अन्य अतिविशिष्टीकृत संस्कृतियों के विरुद्ध ही खड़े होंगे क्योंकि हर अतिविशिष्टीकृत संस्कृति की परिभाषा ही अन्य संस्कृति के अन्यकरण (othering) पर आधारित होती है। सहिष्णुता व असहिष्णुता की ग़लत ‘बाइनरी’ में फँसने की इस स्थिति में ज़ाहिर है कि कट्टरपंथी गिरोह असहिष्णुता का उन्माद खड़ा करेंगे (जैसा कि संघ परिवार, पेगीडा, गोल्डेन डॉन व डोनाल्ड ट्रम्प जैसे धुर दक्षिणपंथी और धार्मिक कट्टरपंथी कर रहे हैं) और तमाम उदार, प्रगतिशील, जनवादी बुद्धिजीवी सहिष्णुता की मानवतावादी अपीलें करेंगे। इतिहास गवाह है कि इन दोनों में हमेशा पहले किस्म की ताक़तें सफल होती हैं क्योंकि अन्तरविरोधों को समाधान चाहिए होता है। यह समाधान प्रगतिशील (समाजवादी जनक्रान्ति) या प्रतिक्रियावादी (जैसे कि ‘फाइनल सॉल्यूशन’) हो सकता है। सहिष्णुतावादियों के साथ दिक्कत यह है कि वह किसी किस्म का समाधान नहीं पेश करते। उनके रास्ते के अनुसार जो जैसा है वैसा ही रहेगा और सब एक-दूसरे को बर्दाश्त करेंगे! यह एक अनुत्पादक या बॉनज़ाई किस्म का तर्क है जो कुछ भी पैदा नहीं करता।

जैसा कि हमने पहले ज़ि‍क्र किया, ठीक इसीलिए मार्टिन लूथर किंग जूनियर, ज्योतिबा फुले, आदि जैसे सामाजिक व रैडिकल सुधारकों ने या फिर जैकोबिनों से लेकर बोल्शेविकों तक तमाम क्रान्तिकारियों ने कभी भी सहिष्णुता की अपील नहीं की। उनका संघर्ष अधिकार और न्याय का संघर्ष था। अधिकार और न्याय मनुष्य के अहस्तान्तरणीय (inalienable) अधिकार हैं। यह कोई किसी को देता नहीं है। सहिष्णुता एक उदार बुर्जुआ उपहार (liberal bourgeois gift) के समान है जो आप दे सकते हैं या फिर नहीं भी दे सकते हैं। यह एक भीख हो सकती है, जिसे आप किसी से माँग सकते हैं और वह उसे दे भी सकता है और नहीं भी। अधिकार, न्याय और समानता का संघर्ष इससे बिल्कुल भिन्न है और इसीलिए मुक्ति की राजनीति कभी भी सहिष्णुता और असहिष्णुता के छद्म द्वन्द्व में नहीं फँस सकती। मुक्ति के राजनीति करने वालों को इस पर कोई अवस्थिति अपनानी ही होगी तो वे अपने आपको असहिष्णु क़रार देंगे और निश्चित तौर पर इस पर गर्व करेंगे! ज़ाहिर है कि हम सहिष्णु नहीं हैं और न हम अपने विचारधारात्मक-राजनीतिक शत्रुओं से सहिष्णु होने की उम्मीद करते हैं। हम दूरी लेकर, असम्पृक्त होकर और ‘डिसइंगेज’ होकर बर्दाश्त करने के तर्क पर भरोसा नहीं करते हैं। हम करीबी लेकर, सम्पृक्तता से और ‘इंगेज’ करते हुए अन्तरविरोध के समाधान के तर्क पर भरोसा करते हैं।

निश्चित तौर पर, आज संघ परिवार जिस तरीके से अल्पसंख्यकों, स्त्रियों, दलितों आदि के अधिकारों पर हमला कर रहे हैं उसकी मुख़ालफ़त करनी ही होगी। लेकिन यह मुख़ालफ़त और इसकी शब्दावली सहिष्णुता और असहिष्णुता पर आधारित नहीं हो सकती है। इसके मुहावरे बर्दाश्त करने या न बर्दाश्त करने पर आधारित नहीं हो सकते हैं। जनता के हक़ों पर फासीवादी हमलों का प्रतिरोध करने की तात्कालिक रणनीति जनता के जनवादी और नागरिक अधिकारों की हिप़फ़ाज़त के लिए जुझारू जनान्दोलन की रणनीति होनी चाहिए और उसकी शब्दावली और मुहावरे भी जनवादी और नागरिक अधिकारों पर ही आधारित होनी चाहिए। और इस प्रतिक्रियावादी हमलों से लड़ने की लम्बी दूरी की रणनीति मेहनतकश वर्गों को लामबन्द और संगठित करने समाजवाद के लिए लड़ने की रणनीति ही हो सकती है और इसकी शब्दावली और मुहावरे भी उसी के अनुसार तय होंगे। हम हक़ों और अधिकारों, न्याय और समानता के लिए लड़ते हैं; हम कुलीन वर्गों, धार्मिक कट्टरपंथियों, सवर्णवादियों से अपने प्रति सहिष्णुता की अपमानजनक अपीलें नहीं करते। हमारा कहना है, “तुम बर्दाश्त करो या न करो, तुम सहिष्णुता दिखाओ या न दिखाओ जो हमारा हक़ है वह हमारा हक़ है और हम इसे लड़कर लेंगे। हमारी लड़ाई तुम्हारे दरियादिल, उदार और महामना होने की सम्भावना पर निर्भर नहीं करती है।“ क्या बीफ खाने के हक़, धर्मान्तरण के हक़ आदि जैसे सभी जनवादी-नागरिक अधिकारों के लिए यह रेटॉरिक सहिष्णुता-असहिष्णुता के रेटॉरिक से अधिक दुरुस्त नहीं है? अगर वैज्ञानिक दृष्टिकोण से सोचें तो इन जनवादी नागरिक अधिकारों के लिए भी यही मुहावरा दुरुस्त है।

सहिष्णुता के तर्क की कमी एक और कोण से भी उजागर हो जाती है। यह तर्क समाज में मौजूद धर्म, जाति, जातीयता, राष्ट्रीयता, नस्ल आदि के अन्तर पर ध्यान देता है, यानी कि समाज में मौजूद क्षैतिज अन्तरों (horizontal differences) पर ध्यान देता है और उन्हीं के आधार पर सहिष्णुता की अपीलें करता है। लेकिन यह ऊर्ध्वाधर अन्तरविरोधों (vertical contradictions) यानी कि सामाजिक-आर्थिक असमानता और राजनीतिक संघर्ष को नज़रन्दाज़ करता है और इस रूप में ऐसा दिखावा करता है मानो ये अन्तरविरोध मौजूद ही न हों। यही कारण है कि यह तर्क इस बात को समझने में भी नाकाम रहता है कि असल में सामाजिक अन्तरविरोध ही दबाये जाने पर अपने आपको सांस्कृतिक संघर्ष या तथाकथित असहिष्णुता के रूप में प्रकट करते हैं। बाल्कन देशों से लेकर दक्षिणी यूरोप में प्रवासी-विरोधी कट्टरपंथ और फासीवाद का उभार हो, या नये सिरे से नस्लवादी नात्सीवाद का उभार हो या फिर अमेरिका में डोनॉल्ड ट्रम्प जैसे प्रतिक्रियावादी और अज्ञानता व मूर्खता के प्रतीक एक भाँड़ के प्रवासी-विरोधी, मुसलमान-विरोधी और नंगे साम्राज्यवादी विचारों को मिल रहा समर्थन हो, क्या ये सभी इस तथ्य के जीते-जागते प्रमाण नहीं हैं? हालिया साम्प्रदायिक दंगे व तनाव पैदा करने में संघ परिवार ने सामाजिक अन्तरविरोधों का दमन व शमन करने और उन्हें सांस्कृतिक अन्तर के रूप में विनियोजित और रूपान्तरित करने का काम किस प्रकार किया है, क्या हम इससे अनभिज्ञ हैं?

स्पष्ट है कि राजनीतिक, सामाजिक व आर्थिक अन्तरविरोध या तो उपयुक्त राजनीतिक रूप में आर्टिकुलेट होंगे, या फिर उनका फासीवादी संस्कृतिकरण किया जायेगा। और सहिष्णुता का तर्क इस भयंकर सम्भावनासम्पन्नता को समझ ही नहीं पाता है। सहिष्णुता के तर्क द्वारा क्षैतिज अन्तरों को मान्यता देने और ऊर्ध्वाधर अन्तरविरोधों को नकारने का मकसद एक ऐसा बुर्जुआ सब्जेक्ट पैदा करना होता है, जिसका तुलना बुर्जुआ जनवादी जेल के कैदी से की जा सकती है! उसे अपनी पद्धति से पूजा करने और अपनी परम्पराओं व संस्कृति पर अमल की छूट होती है, मगर उसे कोई बुनियादी मानवाधिकार (हालाँकि यह शब्द भी समाधान से ज़्यादा समस्या पैदा करने वाला है, लेकिन अभी केवल विश्लेषण की सुगमता के लिए हम इसका उपयोग कर रहे हैं!) भी प्राप्त नहीं होता। इस प्रकार से बुर्जुआ तन्त्र अपनी सहिष्णुता प्रदर्शित करता है-अन्यता के साथ कोई आलोचनात्मक रिश्ता कायम करने की बजाय अन्यता का एक प्रकार फेटिशीकरण (fetishization)। यह बुर्जुआ तन्त्र में निहित प्रभुत्व और वर्चस्व को नेपथ्य में धकेल देता है। प्रतिरोध का सम्भव रास्ता केवल यह रह जाता है कि परिधिगत समुदायों के स्वरों, अस्मिता वगैरह के ‘स्पेस’ और उनकी स्वीकार्यता के लिए लड़ा जाय, यह जानते हुए कि उन्हें ‘स्पेस’ और स्वीकार्यता परिधिगत समुदायों के स्वरों या अस्मिता के तौर पर ही मिलेगी! यही आज के बहुसंस्कृतिवादी सहिष्णुता का अर्थ है। इसमें राजनीति ग़ायब है, सत्ता का प्रश्न ग़ायब है, वर्ग संघर्ष ग़ायब है, प्रभुत्व और वर्चस्व की वास्तविकता ग़ायब है और नतीजतन यह पूरा तर्क पूँजीवादी यथास्थिति का पुरज़ोर समर्थन करता है, उसे कायम रखने और उत्पादित व पुनरुत्पादित करने में सहायता करता है।

इस ख़तरनाक राजनीतिक एजेण्डे और इसके पीछे छिपी विचारधारा की मुख़ालफ़त केवल और केवल वर्ग संघर्ष की राजनीति से की जा सकती है। वर्ग संघर्ष की यह राजनीति इस यथार्थ की एक तीव्र और सम्भवतः उग्र (यहाँ तक कि हिंस्र) अनुभूति कराने की सम्भावना रखती है कि किस तरह से अपने तमाम धार्मिक, जातिगत, भाषाई, जातीय, राष्ट्रीय या किसी भी अन्य प्रकार के ‘सांस्कृतिक’ अन्तरों और निर्मित सीमा-रेखाओं के आर-पार हमारे दुश्मन मुश्तरका हैं; हमारा असल अन्तरविरोध साझा है; हमारी असल लड़ाई साझी है; यह लड़ाई है विश्व पूँजी की शक्ति और उसके उदार बुर्जुआ जनवाद की वर्चस्वकारी विचारधारा के विरुद्ध, मौजूदा फासीवादी उभार के विरुद्ध। यह लड़ाई हमारे एक-दूसरे के प्रति ‘सहिष्णु’ होने पर आधारित नहीं हो सकती। यह लड़ाई हमारे एक-दूसरे के प्रति आलोचनात्मक रूप से ‘असहिष्णु’ होने पर ही आधारित हो सकती है। इसका कारण यह है कि संस्कृति के जिस नैसर्गिकीकरण और अनैतिहासिक सारभूतीकरण पर हमारा ‘सांस्कृतिक अन्तर’ खड़ा किया गया है, वह संस्कृति स्वयं ऐतिहासिक तौर पर तमाम संघर्षों और टकराहटों की प्रक्रिया में संघटित और निर्मित तथा पुनर्संघटित व पुनर्निर्मित हुई है। और हमारा साझा संघर्ष भी आने वाले समय में एक नये किस्म की संस्कृति को संघटित करने की शक्ति रखता है। सहिष्णुता की अपीलें और दलीलें ऐसे किसी भी साझा संघर्ष की सम्भावना की हत्या कर देती हैं और ऐतिहासिक और दार्शनिक तौर पर प्रतिक्रियावादी हैं।

इसलिए हमारा नारा यह होना चाहिए कि ‘आइये एक-दूसरे के प्रति असहिष्णु हो जायें’; ‘आइये अपने अधिकारों के संघर्ष की ख़ातिर हस्तक्षेपकारी हो जायें’! हमारा तर्क संलग्न होने, शामिल होने, सम्पृक्त होने का तर्क है। इसी जैविक (organic) राजनीतिक प्रक्रिया के ज़रिये हम मौजूदा वर्चस्वकारी बुर्जुआ विचारधारा और पूँजीवादी व्यवस्था को चुनौती दे सकते हैं। इसलिए मौजूदा प्रगतिशील आन्दोलन को अपने प्रतिक्रियात्मक रक्षावाद (reactive defencism) को छोड़ना चाहिए और सहिष्णुता की अपीलों को त्यागते हुए एक रणनीतिक आक्रामकता (strategic offensive) का रास्ता अपनाना चाहिए, यानी कि वर्ग संघर्ष का रास्ता अपनाना चाहिए। यही रास्ता मौजूदा सामाजिक सम्बन्धों को चुनौती दे सकता है और उनके रूपान्तरण की ओर ले जा सकता है। यह रास्ता सहिष्णु होने या असहिष्णु होने के नकली प्रश्न को ही अप्रासंगिक बना देगा। यहाँ तक कि तात्कालिक रणनीति के तौर पर भी प्रगतिशील और जनवादी आन्दोलन सहिष्णुता-असहिष्णुता की भ्रामक ‘बाइनरी’ को छोड़कर जनवादी और नागरिक अधिकारों के लिए लड़ना चाहिए इस लड़ाई को सहिष्णुता-असहिष्णुता के फन्तासी प्रश्न से कभी गड्ड-मड्ड नहीं करना चाहिए।

 

मुक्तिकामी छात्रों-युवाओं का आह्वान,नवम्‍बर 2015-फरवरी 2016

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