फासीवाद को मात देने का रास्ता इंक़लाब से होकर जाता है चुनावी राजनीति से नहीं!
फासीवाद को चुनाव से नहीं हराया जा सकता है। फासीवाद का जन्म इसी संसदीय गणतंत्र के खोल के भीतर से हुआ है, समय को वापस कर इसे वापस इस खोल में नहीं डाला जा सकता है। इसे जीव विज्ञान के उदाहरण से समझा जा सकता है। कुकुन में से निकले नुकसानदायक कीट को पैरों के नीचे कुचल कर ही ख़त्म किया जा सकता है। परन्तु भारत के तमाम वामपन्थी बुद्धिजीवी वक्त को उलट कर नेहरु काल के ‘समाजवाद’ को लाना चाहते हैं। यह बात 2004 और 2009 के चुनाव से साफ़ हो चुकी है जब यही सारे वामपन्थी विचारक लोग फासीवाद की हार का जश्न मना रहे थे तब इनकी सोच के विपरीत भाजपा 2014 में ज्यादा वोटों के साथ सत्ता पर पहुँची। हमें यह समझना होगा कि फासीवाद निम्न मध्य वर्ग का आन्दोलन है जिसे काडर आधारित फासीवादी पार्टी नेतृत्व देती है। इसे क्रान्तिकारी पार्टी के नेतृत्व में संगठित काडर आधारित मजदूर आन्दोलन ही परास्त कर सकता है। हमें फासीवाद से लड़ने में इस सबक को बिलकुल याद रखना होगा।
















