Category Archives: शिक्षा स्‍वास्‍थ्य और रोजगार

‘चना जोर गरम’ और चमकोवाद की अवसरवादी और सस्‍ती लोकरंजकतावादी राजनीति से छात्रों-युवाओं को सावधान रहना होगा

अगर अपने आपको वाम बताने वाले आइसा व एसएफआई जैसे छात्र संगठन आन्‍दोलन में बुनियादी ढाँचागत मुद्दों का व्‍यवस्थित तौर पर प्रचार करते, सीजेपी नेतृत्‍व की समझौतापरस्‍ती और उसकी राजनीति के चरित्र की खुली दोस्‍ताना और जनवादी आलोचना पेश करते रहते, आन्‍दोलन के भीतर जनवादी तौर-तरीक़ों के पालन के लिए संघर्ष करते रहते, छात्रों को इस प्रकार आन्‍दोलन के वापस लिये जाने की सम्‍भावना के प्रति आगाह करते रहते, तो छात्रों-युवाओं के जनसमुदाय में यह चेतना पैदा हो सकती थी कि इस प्रकार 25 जुलाई को महज़ एक प्रतीकात्‍मक जीत के आधार पर आन्‍दोलन वापस लेने की सीजेपी नेतृत्‍व की पहल का वे विरोध करते और उसे बाध्‍य कर देते कि जब तक अन्‍य बुनियादी माँगें पूर्ण नहीं होतीं, तब तक जन्‍तर-मन्‍तर को नहीं छोड़ा जायेगा। यह निश्चित ही सम्‍भव था क्‍योंकि 25 जुलाई को समझौते की घोषणा के बाद भी छात्र-युवा अपने से जन्‍तर-मन्‍तर छोड़ने की मानसिकता में कतई नहीं थे, क्‍योंकि अभी कोई भी बुनियादी माँग पूरी नहीं हुई थी। 

मोदी राज में बरबाद होती शिक्षा व्यवस्था

शिक्षा पर इस हमले को यह फ़ासीवादी निज़ाम नयी शिक्षा नीति, 2020 के ज़रिए व्यवस्थित तौर पर अंजाम दे रहा है। इसके ज़रिये इन्होंने जहाँ एक ओर केन्द्रीय व राज्य विश्वविद्यालयों के भीतर आम घरों से आने वाले छात्रों के प्रवेश को मुश्किल बना दिया है, वहीं दूसरी ओर पाठ्यक्रमों में बदलाव और शिक्षण संस्थानों में संघ के काडरों की भर्ती कर शिक्षा की गुणवत्ता को घटाने व इसके साम्प्रदायिकीकरण का काम किया है। हम एक-एक करके मोदी सरकार द्वारा शिक्षा पर किये जाने वाले हमलों पर बात करेंगे।

आर्टीफ़िशियल इण्टेलिजेंस और आटोमेशन के दौर में भारत के उद्योगपतियों का 90 घण्टे काम करवाने का सपना

लगातार बयान देकर लोगों को एहसास कराया जा रहा है कि देश की तरक़्क़ी इसलिये नहीं हो रही क्योंकि मज़दूर कम काम करते हैं। लेकिन सच्चाई इससे बिल्कुल उलट है। गुड़गाँव में काम करने वाले मज़दूरों की हालत की सर्वे रिपोर्ट देखें तो इन इलाक़ों में रहने वाले मज़दूर आटोमोबाइल और टेक्सटाइल जैसे कई क्षेत्रों में ठेके पर, बिना किसी स्थायी नौकरी के, बिना सामाजिक सुरक्षा के सप्ताह के सातों दिन 14 से 18 घण्टे काम करते हैं, जिसके बदले में उन्हे 10 से 18 हज़ार मज़दूरी मिलती है। यह मेहनतकश, जो उत्पादन की नींव हैं, वे 14-18 घण्टे काम करने के बाद 6 से 10 घण्टे के लिये 10X10 फ़ीट के कमरे में आराम करने के लिये आते हैं, ताकि अगले दिन फिर 18 घण्टे के काम पर जा सकें।

पेपर लीक के लिए भाजपा सरकार, प्रशासन और शिक्षा माफ़ियाओं का नापाक गठजोड़ ज़िम्मेदार है!!

पेपर लीक के लिए भाजपा सरकार, प्रशासन और शिक्षा माफ़ियाओं का नापाक गठजोड़ ज़िम्मेदार है!! अविनाश (इलाहाबाद) फ़ासीवादी मोदी सरकार का शासनकाल छात्रों-युवाओं के लिए किसी भयानक दुःस्वप्न से कम…

पाठ्यक्रम में बदलाव : फ़ासीवादी सरकार द्वारा नयी पीढ़ी को कूपमण्डूक और प्रतिक्रियावादी बनाने की साज़िश

एक फ़ासीवादी सत्ता ऐसे ही काम करती है। वह पहले पूरे इतिहास का मिथ्याकरण करती है, फ़िर अपनी पूरी शक्ति से उसे स्थापित करने की कोशिश में लग जाती है। एक झूठे इतिहास का महिमामण्डन कर के लोगों को किसी “रामराज्य” के ख़्वाब दिखाती है, जिसका सच्चाई से दूर-दूर तक कोई रिश्ता नहीं है।

“अमृतकाल” में उच्च शिक्षा

हमें यह समझना चाहिए कि सबके लिए समान और निःशुल्क शिक्षा हासिल करने के लिए जुझारू संघर्ष संगठित करने के लिए विश्वविद्यालय कैम्पसों के अन्दर मौजूद छात्रों के साथ ही, कैम्पस के बाहर मौजूद छात्रों-युवाओं की बड़ी संख्या को भी लामबन्द करना होगा। अर्थात कैम्पस की चौहद्दियों के बाहर के दायरों को भी समेटता हुआ एक व्यापक छात्र-युवा आन्दोलन ही इस सबकी शिक्षा तक पहुँच सुनिश्चित कर सकता है।

आपस में नहीं, सबको रोज़गार की गारण्टी के लिए लड़ो!

अब इन आँकड़ों की रोशनी में सोचिए! जब सरकारी प्राथमिक विद्यालय रहेंगे ही नहीं तो क्या सारे बीटीसी वालों को नौकरी दी जा सकती है? या अगर बीएड अभ्यर्थियों को योग्य मान भी लिया जाय तो सभी को रोज़गार दिया जा सकता है? दरअसल आज नौकरियाँ ही तेज़ी से सिमटती जा रही हैं। निजीकरण छात्रों-नौजवानों के भविष्य पर भारी पड़ता जा रहा है। रेलवे, बिजली, कोल, संचार आदि सभी विभागों को तेज़ी से धनपशुओं के हवाले किया जा रहा है। अगर इस स्थिति के ख़िलाफ़ कोई देशव्यापी जुझारू आन्दोलन नहीं खड़ा होगा तो यह स्थिति और ख़राब होगी। इसलिए ज़रूरी है कि आपस में लड़ने की जगह रोज़गार गारण्टी की लड़ाई के लिए कमर कसी जाय।

अग्निपथ: ठेके पर “राष्ट्र सेवा” की योजना

सत्ता में पहुँचने के लिए भाजपा ने अपने चुनाव प्रचार में सेना, देशप्रेम, राष्ट्रवाद, राष्ट्रसेवा का ख़ूब भावनात्मक इस्तेमाल किया था। इस प्रक्रिया में फासिस्टों ने सेना का निरपेक्ष आदर्शीकरण कर इसे सवालों से परे किसी दैवीय शक्ति के रूप में प्रस्तुत किया। लेकिन आज यही सेना के जवान फासिस्टों के ख़ूनी पंजों का शिकार हो रहे हैं।

नयी शिक्षा नीति पर अमल का असर: विश्वविद्यालयों में बढ़ती फ़ीस

जिस ‘नयी शिक्षा नीति’ का गुणगान करने में मोदी-योगी समेत पूरी फ़ासिस्ट मण्डली लगी हुई है, वह कुछ और नहीं बल्कि लफ़्फ़ाज़ियों की आड़ में शिक्षा को देशी-विदेशी पूँजीपतियों को सौंपने की नीति है। जैसे-जैसे नयी शिक्षा नीति पर अमल हो रहा है, वैसे-वैसे उसकी सच्चाई भी आम जनता के सामने खुलती जा रही है। मोदी की इस नयी शिक्षा नीति में उच्च शिक्षा के प्रशासनिक केन्द्रीकरण और वित्तीय स्वायत्तता पर ज़ोर दिया गया है जिसका असर अब जगह-जगह दिखने लगा है।

एलओसीएफ़-2021 : उच्च शिक्षा के भगवाकरण और इतिहास के मिथ्याकरण का नया हथियार

सत्ता में आते ही सरकार ने तमाम शैक्षणिक और अकादमिक संस्थानों के उच्च पदों पर संघ के लोगों को भरना शुरू कर दिया था। 2014 में ही आरएसएस ने ‘भारतीय शिक्षा नीति आयोग’ बनाया जिसका मक़सद ही शिक्षा का भगवाकरण करना था। इसके बाद संस्थागत तरीके से स्कूली पाठ्यक्रमों की किताबों में साम्प्रदायिक सामग्री परोसकर और इतिहास के विकृतीकरण के ज़रिये हिन्दुत्ववादी फ़ासिस्टों द्वारा हमारे बच्चों में साम्प्रदायिक ज़हर भरने की कोशिश जारी है। ‘इण्डियन एक्सप्रेस’ की एक रिपोर्ट के अनुसार साल 2014 से 18 के बीच नेशनल काउंसिल ऑफ एजुकेशन रिसर्च एण्ड ट्रेनिंग (एनसीईआरटी) की स्कूली टेक्स्ट की 182 किताबों में से 1334 बदलाव किये जा चुके थे।