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डार्विन की कश्मकश और जीवन का उद्विकास

डार्विन को पता था कि उनकी खोज समाजवादी-भौतिकवादी विचारों को वैज्ञानिक आधार देने वाली है और इस खोज के सामाजिक निहितार्थ के चलते ही उन्होंने अपने शोध को लगभग 20 साल तक प्रकाशित नहीं किया।1859 में जब वॉलेस डार्विन की खोज तक स्वतंत्र तौर पहुँचते है तब डार्विन ने भी ‘इतिहास की जड़ शक्ति’ के ख़िलाफ़ मोर्चा खोलने का साहस किया और ‘उद्विकास के सिद्धान्त’ को एक गोष्ठी में वॉलेस के साथ पेश किया। बीगल जहाज़ पर नौजवानी में सालों एकत्रित किये गये तथ्यों के आधार पर उद्विकास के सिद्धान्त का सामान्यीकरण करते हुए डार्विन ने सालों बाद अपने शोध को पेश किया और अपने अन्तरविरोधों को पार पा लिया। उनकी पृष्ठभूमि और विचारधारात्मक चिन्तन को पारकर वे एक वैज्ञानिक के तौर पर अपनी खोजों से उन नतीजों को पेश करते हैं जो खुद उनके सामाजिक वर्ग के आम विचारों के विरुद्ध जाते थे।

मोदी राज में बरबाद होती शिक्षा व्यवस्था

शिक्षा पर इस हमले को यह फ़ासीवादी निज़ाम नयी शिक्षा नीति, 2020 के ज़रिए व्यवस्थित तौर पर अंजाम दे रहा है। इसके ज़रिये इन्होंने जहाँ एक ओर केन्द्रीय व राज्य विश्वविद्यालयों के भीतर आम घरों से आने वाले छात्रों के प्रवेश को मुश्किल बना दिया है, वहीं दूसरी ओर पाठ्यक्रमों में बदलाव और शिक्षण संस्थानों में संघ के काडरों की भर्ती कर शिक्षा की गुणवत्ता को घटाने व इसके साम्प्रदायिकीकरण का काम किया है। हम एक-एक करके मोदी सरकार द्वारा शिक्षा पर किये जाने वाले हमलों पर बात करेंगे।

मतदान के जनवादी अधिकार पर फ़ासीवादी हमले का नया दौर

भाजपा और चुनाव आयोग द्वारा की जा रही ‘वोटचोरी’ के ख़िलाफ़ और जनता के जनवादी अधिकार की रक्षा के लिए राहुल गाँधी और तमाम विपक्षी दल जो सीमित संघर्ष कर रहे हैं, उसका समर्थन करते हुए भी इस मसले को पूरी तरह इन पूँजीवादी चुनावबाज़ पार्टियों के हाथों में नहीं छोड़ा जा सकता है। सबसे बुनियादी जनवादी अधिकार पर हो रहे फ़ासीवादी हमले के ख़िलाफ़ आज क्रान्तिकारी शक्तियों को व्यापक तौर पर जनता को संगठित करना होगा। यही हमारे सामने एकमात्र विकल्प है।

भारत में हिन्दुत्ववादी फ़ासीवाद की चुनौती और छात्रों-युवाओं के कार्यभार

छात्रों-युवाओं के ऊपर भी फ़ासीवादी शासन के इन ग्यारह सालों में भयंकर कहर बरपा हुआ है। जेएनयू से लेकर जामिया, अलीगढ़, बीएचयू, हैदराबाद, एफ़टीआईआई समेत देश के लगभग सभी विश्वविद्यालयों ने इन दस सालों में फ़ासीवादी हमले का दंश झेला है। छात्रसंघ जैसी संस्थाओं को भंग करने, जनता के पक्ष में होने वाले छात्रों-युवाओं के हर आन्दोलन का बर्बर दमन करने और फ़र्ज़ी मुक़दमे लाद कर जेल में डाल देने का मॉडल लागू करके छात्र-युवा आन्दोलन की कमर तोड़ने और शैक्षणिक संस्थाओं को फ़ासीवाद की प्रयोगशाला बना देने के जो प्रयास मोदी सरकार के सत्ता में आने के साथ ही शुरु हो गये थे, वह हर दिन नये मुक़ाम पर पहुँच रहे हैं। नयी शिक्षा नीति को लागू करने के साथ ही शिक्षा के पूरे ढाँचे के फ़ासीवादीकरण की योजनाबद्ध ढंग से शुरुआत की जा चुकी है।

जन संगठन, विचारधारा और पहचान की राजनीति से सम्बन्धित प्रश्नों पर ‘दिशा’ और ‘बाप्सा’ के बीच चली बहस में ‘दिशा’ का जवाब

जन संगठन, विचारधारा और पहचान की राजनीति से सम्बन्धित प्रश्नों पर ‘दिशा’ और ‘बाप्सा’ के बीच चली बहस में ‘दिशा’ का जवाब प्रिय पाठको, हाल ही में जवाहरलाल नेहरू विश्‍वविद्यालय…

‘सेपियन्स’ की आलोचना: चेतना के उद्भव तथा मानव प्रजाति का हरारी द्वारा पूँजीवादी संस्कृति के अनुसार सारभूतीकरण

‘सेपियन्स’ की आलोचना: चेतना के उद्भव तथा मानव प्रजाति का हरारी द्वारा पूँजीवादी संस्कृति के अनुसार सारभूतीकरण सनी युवल नोआ हरारी की किताब ‘सेपियन्स’ पर बात करते हुए हमने पिछली…

पेपर लीक के लिए भाजपा सरकार, प्रशासन और शिक्षा माफ़ियाओं का नापाक गठजोड़ ज़िम्मेदार है!!

पेपर लीक के लिए भाजपा सरकार, प्रशासन और शिक्षा माफ़ियाओं का नापाक गठजोड़ ज़िम्मेदार है!! अविनाश (इलाहाबाद) फ़ासीवादी मोदी सरकार का शासनकाल छात्रों-युवाओं के लिए किसी भयानक दुःस्वप्न से कम…

लोकसभा चुनाव के नतीजे और छात्रों-युवाओं के कार्यभार

लोकसभा चुनाव के नतीजे और छात्रों-युवाओं के कार्यभार सम्पादकीय लोकसभा चुनावों के नतीजे आ चुके हैं। येन-केन-प्रकारेण मोदी का तीसरी बार प्रधानमन्त्री बनने का सपना चन्द्रबाबू नायडू और नीतीश कुमार…

मेटामॉरफ़ॉसिस

मैं सोचता हूँ कि रात भर वह नेता क्या सोच रहा होगा! ऐसा क्या हुआ कि सुबह उठते ही उसे वह सरकार इतनी पसन्द आने लगी जिसे रात में वह गाली दे रहा था। रात में उसे देश में हर जगह महँगाई-बेरोज़गारी दिख रही थी, सुबह उठने के बाद उसे देश में विकास दिखने लगा। कल तक सर्वधर्म समभाव की बात कर रहा था, आज सुबह से सनातन ख़तरे में दिखने लगा। रात भर में उसे यह दिव्य दृष्टि कहाँ से मिल गयी, सोते-सोते यह बोधिज्ञान कहाँ से प्राप्त हो गया, जो अब तक लुप्त था। क्या पता वो रात में यही सोचते-सोचते सो गया हो कि जीवन में आज तक आगे बढ़ने के लिए क्या-क्या किया और भविष्य में आगे बढ़ने के लिए क्या करना है! रात को वह सोया और सुबह उठा तो ख़ुद को एक क़िस्म के तिलचट्टे में बदला हुआ पाया। हो गया मेटामॉरफ़ॉसिस! मेटामॉरफ़ॉसिस की प्रक्रिया क्या होती है यह भी जान लीजिए! सबसे पहले रीढ़ की हड्डी मुड़ना शुरू हो जाती है और धीरे-धीरे ग़ायब हो जाती है। आँखें छोटी-छोटी हो जाती हैं, कान फैलकर चमगादड़ जैसे हो जाते हैं। हाथ-पैर छोटे-छोटे, दाँत नुकीले और और छाती-पेट सब फूलकर गोल हो जाते हैं। दिमाग़़ भी सिकुड़कर बिलकुल छोटा हो जाता है।