Tag Archives: आशीष

श्रीराम सेने की ‘राष्ट्रभक्ति’ का एक और नमूना

ये समस्त प्रतिक्रियावादी ताकतों की एक पहचान सर्वव्यापी है। ये झुण्ड में पौरुष दिखाते हैं। इनकी कायराना हरकत इस ताज़ा घटना में भी देखने को मिली। बीजापुर में सड़कों पर प्रदर्शन के दौरान बहुमुखी हिन्दुत्ववादी एक साथ जयघोष कर रहे थे। इनके सारे मुखौटे एकजुट थे, पर जैसे ही इनकी असलियत खुलकर सामने आ गयी, ये सब हर बार की तरह मैं नहीं-मैं नहीं, कहकर अपना-अपना दामन पाक-साफ बताने में लग गये। श्रीराम सेना के कर्ताधर्ता प्रमोद मुतालिक बयान देने लगे कि यह गिरफ्तारी श्रीराम सेना को बदनाम करने के लिए की गयी है और पकड़े गये सभी युवक ‘राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ’ के सदस्य हैं। वैसे तो आर.एस.एस. इस मामले पर अपने मुँह पर टेप चिपका के बैठ गयी है, अगर बोली तो मेरी मानो यही कहेगी कि आर.एस.एस. एक सांस्कृतिक संगठन है! ऐसे राष्ट्रविरोधी कुकृत्य का हम कतई समर्थन नहीं करते! यह राष्ट्र विरोधियों की सोची समझी साजिश है! आदि-आदि। यह गोयबल्सीय भाषा शैली का सुन्दर समन्वय कब तक करते रहेंगे। जब तथ्य इनके चेहरे पर पुते नकाब को बारम्बार खुरच रहे हों!

शिवसेना की ‘नज़र’ में एक और किताब ‘ख़राब’ है!

दरअसल इस घटना में और ऐसी ही तमाम घटनाओं में भी, जब अभिव्यक्ति की आज़ादी का गला घोंटा जा रहा हो तो मुठ्ठी भर निरंकुश फासिस्ट ताकतों के सामने यह व्यवस्था साष्ट्रांग दण्डवत करती नज़र आती है। दिनों-दिन इस व्यवस्था के जनवादी स्पेस के क्षरण-विघटन को साफ-साफ देखा जा सकता है। अगर ग़ौर से देखें तो यह इस पूँजीवादी व्यवस्था की मौजूदा चारित्रिक अभिव्यक्ति है। ज्यों-ज्यों पूँजी का चरित्र बेलगाम एकाधिपत्यवादी होता जा रहा है, त्यों-त्यों इसका जनवादी माहौल का स्कोप सिकुड़ता चला जा रहा है।

जनता मुझसे पूछ रही है क्या बतलाऊँ जनकवि हूँ मैं साफ़ कहूँगा, क्यों हकलाऊँ

नागार्जुन की काव्ययात्रा काफी विराट फलक लिये हुए है। बहुआयामी रूपों में वो हमारे सामने प्रकट होते हैं जिन पर विस्तार से बात कर पाना इस छोटे-से लेख में कदापि सम्भव नहीं है। तथापि हम विस्तार में जाने का लोभ संवरण करते हुए इतना ज़रूर कहेंगे कि उनकी कविताओं में, वे चाहे प्रकृति को लेकर हो या, अन्याय के विषयों पर लिखी गयी हों, सामाजिक असमानता, वर्ग-भेद, शोषण-उत्पीड़न, वर्ग-संघर्ष कभी भी पटाक्षेप में नहीं गया। बल्कि वह खुरदरी ज़मीन सदैव कहीं न कहीं बरकरार रही है, जिस परिवेश में वह कविता लिखी जा रही है। यही सरोकारी भाव नागार्जुन को जनकवि का दर्जा प्रदान करती है।

15 अगस्त के मौक़े पर कुछ असुविधाजनक सवाल!

क्या प्रधानमन्त्री जी को पता है कि जब वे लालकिला की प्राचीर से भारतीय जन-गण को सम्बोधित कर रहे थे, उसके ठीक 24 घण्टा पहले अलीगढ़ में पुलिस इस देश की ‘जन’ पर गोलियाँ बरसा कर कइयों को लहूलुहान कर चुकी थी और तीन को मौत के घाट उतार चुकी थी। मारे गये किसानों की महज़ इतनी भर माँग थी कि ‘यमुना एक्सप्रेस वे’ के नाम जे.पी. समूह के लिए उनसे जो ज़मीन सरकार ने हथिया लिया है उसका उचित मुआवज़ा दिया जाये। बस इतनी सी बात।

फ़ै़ज़ अहमद फ़ैज़: उम्मीद का शायर

फै़ज को अवाम का गायक कहा जाय तो ठीक ही होगा। उनकी कविता में भारतीय उपमहाद्वीप से लेकर दुनिया के तमाम मुल्कों में बसे हुए बेसहारा लोगों, यतीमों की आवाज़ें दर्ज है, उनकी उम्मीदों ने जगह पायी है। अदीबों की दुनियां उसे मुसलसल जद्दोजहद करते शायर के रूप में जानती है। सियासी कारकूनों की निगाह में फै़ज के लफ्ज ‘खतरनाक लफ्ज’ है। अवाम के दिलों में सोई आग को हवा देने वाले लफ्ज है। बिलाशक यही वजह होगी जिसके एवज़ में फ़ैज़ की जिन्दगी का बेहतरीन दौर या तो सलाख़ों में बीता या निर्वासन में, पर हज़ारहों नाउम्मीदी भरे आलम के बावजूद उनकी कविता में उम्मीद की चिनगियाँ कभी बुझी नहीं, उनकी मुहब्बत कभी बूढ़ी नहीं हुई।

पैसा दो, खबर लो : चौथे खम्भे की ब्रेकिंग न्यूज

इस बार का महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव काफी चर्चा में रहा है। यहाँ पैसा दो–खबर लो का बोलाबाला रहा। प्रिण्ट एवं इलेक्ट्रानिक मीडिया ने ‘चुनावी रिपोर्टिंग’ के रूप में ग्राहक उम्मीदवारों के सामने बाकायदा ‘ऑफर’ प्रस्तुत किया। वहीं उम्मीदवारों ने भी अपनी छवि को सुधारने हेतु क्षमतानुसार धनवर्षा करने में कतई कोताही नहीं की। धनवर्षा पहले भी होती रही है। मीडिया भी जनराय बनाने में सहयोगी भूमिका निभाती रही है। लेकिन ये सारा कारोबार इतना खुल्लमखुल्ला नहीं होता था। पहले दबे–दबे रूप में यह बात सामने आती थी कि अखबार वाले पैसे लेकर खबर छापते हैं। न मिलने पर छुपाते हैं। हूबहू ऐसा ही नहीं होता लेकिन प्रधान बात तो यही है कि जिसका पैसा उसका प्रचार। लेकिन इस बार तो ‘खबर’ लगाने की बोलियाँ लगीं। बिल्कुल मण्डी में खड़े होकर ‘खबर’ नामक माल बेचते मानो कह रहे हों पैसा दो–खबर लो, कई लाख दो–कई पेज लो, करोड़ दो–अखबार लो आदि आदि।

स्माइल पिंकी: मुस्कान छीनने और देने का सच

कला के मापदण्डों और मानकों की कसौटियों के कुछ बिन्दुओं पर स्माइल पिंकी एक अच्छा लघुवित्तचित्र हो सकता है; बालमन पिंकी की संवेदनाओं के बारीक पहलुओं को उजागर करने, उसकी तकलीफ़ों और खुशी को उजागर करने का कला का यह एक सफ़ल प्रयास हो सकता है लेकिन कला की अपनी सामाजिक राजनीतिक और दार्शनिक पक्षधरता होती है; समस्या के मूल कारणों पर पर्दा डालने और विश्व बाजारवादी पूँजीवादी व्यवस्था के पोषण के कारणों से व तीसरी दुनिया के बाजार के कारण स्माइल पिंकी को यह पुरस्कार दिया गया है।

संसद के गलियारे में भगतसिंह की प्रतिमा

पहला सवाल यही बनता है कि इन्हें भगतसिंह की मूर्ति लगाने की ख्याल आज के दौर में ही क्यों आया । इसके पीछे निश्चित तौर पर देश में भगतसिंह के विचारों की बढ़ती प्रासंगिकता है । उनके विचारों की ग्रहणशीलता बढ़ी है । जिस समझौतापरस्त तत्कालीन नेतृत्व से आगाह करते हुए भगतसिंह ने कहा था कि अगर आज़ादी इनके माध्यम से आयेगी तो निश्चित तौर पर मुटठीभर अमीरजादों की आज़ादी होगी । विगत साठ साल के सफरनामे ने यही साबित किया है । व्यापक जनता के सामने तथाकथित आज़ादी का मुलम्मा उतर चुका है । ऐसे में जब तमाम तरीकों से भगतसिंह के विचार आम जन में पैठ बनाने लगे हैं तब शासक वर्ग की मजबूरी बनती दिख रही है कि अब वे सीधे–सीधे भगतसिंह को नकार नहीं सकते हैं । अगर ये सच्चे मन से भगतसिंह को स्वीकार कर रहे होते तो आज़ादी के बाद गांधी, नेहरू की संकलित रचनाओं के बरक्स उनके विचारों को दबाने का प्रयास नहीं करते । उनके लेखों, दस्तावेजों केा जन–जन तक पहुँचाने का काम सरकारी महकमे ने नहीं किया बल्कि भगतसिंह की सोच को मानने वाले क्रान्तिकारी संगठनों ने किया है ।

फलस्तीनी मुक्ति संघर्ष के अमर गायक महमूद दरवेश नहीं रहे

महमूद दरवेश की कविता दरअसल फलस्तीनी सपनों की कविता है । उनकी कविता अपने लोगों की आवाज़ है जो बेइंतहा तकलीफ़, निर्वासन, दहशत और उम्मीद और सपनों से रची गयी है । फलस्तीनी कविता के बारे में उनका कहना था कि इसका महत्व हमारी धरती के कण–कण से इसके घनिष्ठ सम्बन्ध में निहित है-इसके पहाड़ों, घाटियों, पत्थरों, खण्डहरों और यहाँ के लोगों के सम्बन्ध में जो अपने कंधों पर भारी बोझ और अपनी कलाइयों तथा आकांक्षाओं पर कसी जंज़ीरों के बावजूद सिर उठाकर आगे बढ़ रहे हैं । यही प्रतिरोध का तत्व फलस्तीनी जनता की पहचान है, महमूद दरवेश की कविता की पहचान है ।

पूँजीपतियों को ज़मीन का बेशकीमती तोहफ़ा

विशेष आर्थिक क्षेत्र मजदूरों के लिए गुलामी करने जैसे होंगे। यहाँ कोई श्रम कानून लागू नहीं होंगे, न्यूनतम मजदूरी का कोई नियम लागू नहीं होगा, मजदूरों को शांतिपूर्ण ढंग से इकट्ठा होने, यूनियन बनाने का बुनियादी अधिकार भी नहीं होगा। इन क्षेत्रों के उद्योगों पर उस क्षेत्र के लोगों को रोजगार देने की भी कोई बाध्यता नहीं होगी। वे भूजल का दोहन करेंगे और आस–पास के अन्य प्राकृतिक संसाधनों का भी शोषण करेंगे। पर्यावरण और मनुष्य दोनों के लिए ही विशेष आर्थिक क्षेत्र बेहद ख़तरनाक होंगे। वे वास्तव में दरिद्रता के महासागर में ऐश्वर्य के टापू के समान होंगे।