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फ़ासीवादी साम्प्रदायिक उन्माद और आत्महत्या करते बेरोज़गार छात्र-युवा

लेकिन इस साम्प्रदायिक उन्माद के शोर में जनता के ऊपर हो रही बहुत सारी तकलीफ़ों की बारिश की तरह बेरोज़गारी की भयानक मार सहते हुए निराश, अवसादग्रस्त छात्रों-युवाओं की रिकॉर्डतोड़ आत्महत्याएँ और उनके परिवार की चीख़ें दब गयीं। मौजूदा व्यवस्था और उसके रहनुमाओं की नीतियों से निकलने वाला बेरोज़गारी का बुलडोज़र आम घरों के बेटे-बेटियों के भविष्य और सपनों को रौंदता हुआ दौड़ रहा है, चाहे वो जिस मज़हब और जाति के हों! अभी हाल ही में मोदी सरकार ने अग्निपथ योजना के ज़रिये बहुत से छात्रों-युवाओं की उम्मीदों पर बुलडोज़र चढ़ा दिया है और आगे अन्य विभागों में भी छात्रों-युवाओं की उम्मीदों पर बुलडोज़र चढ़ना तय है।

विदा कॉमरेड लालबहादुर वर्मा! लाल सलाम!

डॉ.वर्मा आजीवन प्रगति, मुक्ति और बदलाव के आकांक्षी रहे, लेकिन इन मूल्यों की व्याख्या और इन्हें हासिल करने के रास्तों के बारे में उनके विचारों में बदलाव आता गया। अपनी युवावस्था में एक उदारतावादी बुद्धिजीवी से मार्क्सवाद तक का सफ़र उन्होंने एक लम्बी प्रक्रिया में तय किया और फिर बाद के दिनों में मार्क्सवाद की अपनी अलग व्याख्या तक, उनकी विचार यात्रा बहुत उतार-चढ़ावों-भटकावों से भरी रही, लेकिन वे जिस भी विचार के साथ रहे, निरन्तर बहस-मुबाहसा और संवाद उनके व्यक्तित्व का हिस्सा रहा।

चुनावी घमासान और विकल्पहीनता का चुनाव

अब इन काठ के उल्लुओं को कौन समझाये कि ‘जहाँ कूपै में भाँग पड़ी है’ यानी कि जहाँ सारे चोर हैं और उनमें से ही किसी एक को चुनना है तो इससे क्या फर्क पड़ता है कि उन्हें एक वोट से चुना जाता है या फिर सौ वोट से! या साँपनाथ और नागनाथ के चुनाव में चाहे ‘कुछ’ ले के ‘‘अमूल्य वोट’’ दिया जाय या फिर बिना ‘कुछ’ लिए, डसी तो जनता ही जायेगी! जनता सब जानती है। वह जानती है कि चुनाव के समय तो इस ‘‘अमूल्य वोट’’ से कुछ पाया जा सकता है जबकि चुनाव के बाद तो ‘‘जनप्रतिनिधियों’’ के दर्शन निराकार ब्रह्म की तरह दुर्लभ हो जायेंगे। परन्तु ये काठ के उल्लू कितना ख़्याल रखते हैं ‘‘जनप्रतिनिधियों’’ का, उनके टेंटे से ‘कुछ’ भी निकलने ही देना नहीं चाहते। इनका वह ईमानदार प्रत्याशी अमूर्त होता है। इनके ईमानदार नेता को चुनने की बात सुनकर जनता भी ‘कन्‍फ्यूज’ हो जाती है कि वह कहाँ ठप्पा मारे कि सीधे ‘‘ईमानदार’’ को जा लगे और वह अपना अमूर्त रूप छोड़कर साकार हो उठे!

बाबा रामदेव का स्वाभिमान और खाता-पीता मध्यवर्ग

आज के अँधेरे दौर में यह बात सच है कि जनता के पिछड़ेपन, ठहराव व परिवर्तनकारी शक्तियों की ताकत कमजोर होने का लाभ तमाम पाखण्डी, अन्धराष्ट्रवादी, धार्मिक-फासीवादी उठा रहे हैं। पर आज नहीं कल जनता इनके कुकृत्यों को समझेगी। मौजूदा लुटेरी व्यवस्था से इनके नाभिनालबद्ध सम्बन्ध को समझेगी। वह जानेगी कि मेहनत की लूट पर टिकी पूँजीवादी व्यवस्था पर ही ऐसे ज़हरीले खरपतवार उगते हैं। वह जागेगी और मौजूदा व्यवस्था के साथ-साथ इन पाखण्डियों को भी इतिहास की बहुत गहरी कब्र में दफन करेगी। और निश्चित रूप से जनता इन पाखण्डियों को ‘ममी’ के रूप में तो क्या किसी अभिलेख में भी सुरक्षित रखने की ज़रूरत नहीं समझेगी।

प्रशासनिक सेवा की तैयारी में लगे “होनहारों” के सपने-कामनाएँ, व्यवस्था की ज़रूरत और एक मॉक इण्टरव्यू

“नौकरशाही” का यह चरित्र कोई नयी चीज़ नहीं है। अंग्रेज़़ों के समय में भी यह नौकरशाही ही थी, जिसने अंग्रेज़ी व्यवस्था की सेवा में जनता को लूटा, निचोड़ा, लाठियों-गोलियों से बेदर्दी से शिकार किया और बड़े-बड़े कीर्तिमान स्थापित किये। हर घण्टे हर दिन हर महीने व हर साल, आज़ादी तक अंग्रेज़ों की नौकरशाही ने जनता पर जु़ल्म ढाये। ग़ौरतलब है कि अंग्रेज़ों की नौकरशाही का केवल एक चरित्र, एक रंग-रूप होता है – मौजूदा व्यवस्था की हर हाल में हिफ़ाज़त करना। आज़ादी के बाद चूँकि शोषणकारी व्यवस्था में केवल एक परिवर्तन आया, बकौल भगतसिंह, गोरे साहबों के स्थान पर भूरे साहबों का काबिज़ होना। इससे लूट-शोषण का न केवल वही मूल ढाँचा बना रहा, बल्कि आज़ादी के बाद कितने जलियाँवाला बाग़ को भारतीय नौकरशाही ने अंज़ाम दिया इसकी कोई गिनती नहीं है।

संघ परिवार शाखाओं में बूढ़ो के बचे रह जाने पर चिन्तित!

अखबार में छपी एक ख़बर के मुताबिक, पिछले कुछ वर्षों में संघ परिवार की शाखाओं की संख्या 60 हज़ार से घटकर 20 हज़ार के करीब रह गयी है। पहले हर जगह संघ की दो शाखाएँ लगा करती थीं-तरुण और प्रौढ़। शाखाओं में युवा वर्ग की अरूचि के चलते दोनों वर्ग की शाखाओं को मिला दिया गया है! इसके बावजूद, एक तिहाई शाखाएँ बंद हो गयी हैं।

देश में स्त्रियों की स्थिति और स्त्री मुक्ति का प्रश्न

इसी व्यवस्था के भीतर रह कर स्त्री मुक्ति की बात करना बेमानी है। जब तक वर्ग विभाजित समाज और व्यवस्था कायम रहेगी तब तक स्त्री-पुरुष का विभेद भी नहीं मिट सकता। स्त्री और पुरुष के विभेद का आधार भी श्रम विभाजन था और वर्ग विभाजन का आधार भी श्रम विभाजन था। जब तक यह असमान श्रम विभाजन ख़त्म नहीं होता तब तक स्त्री-पुरुष असमानता भी ख़त्म नहीं हो सकती। स्त्री मुक्ति का प्रोजेक्ट मेहनतकशों की मुक्ति के प्रोजेक्ट के एक अंग के तौर पर ही किसी मुकाम पर पहुँच सकता है। मेहनतकशों का भी आधा हिस्सा स्त्रियों का है। यही वे स्त्रियाँ हैं जो स्त्री मुक्ति की लड़ाई को लड़ेंगी और नेतृत्व देंगी, न कि उच्चमध्यवर्गीय घरों की खाई–मुटाई–अघाई स्त्रियाँ जो अपने सोने के पिंजड़े में सुखी हैं।

मुन्नाभाई के लगे रहने से कुछ नहीं होने वाला….

दरअसल, ऐसी गाँधीगीरी की देश के हुक्मरानों को जरूरत है। यह सीधे–सीधे कहती है कि जालिमों के ख़िलाफ लड़ो मत, उन्हें फूल भेजो और एक दिन वह शर्माकर तुम्हें लूटना–खसोटना छोड़ देंगे। अब हड़ताल आदि करने की जरूरत नहीं है। बस सत्याग्रह कीजिये और मालिक आपकी तनख्वाह बढ़ा देगा, आपको काम से नहीं निकालेगा। आज तक फालतू में मजदूरों ने इतना हंगामा किया अपने हक़ों के लिए। जबकि गाँधीगीरी करने को माँगता था! इतना सीधा–सा रास्ता किसी को समझ में क्यों नहीं आया ? इसलिए क्योंकि सभी जानते हैं कि यह कोई रास्ता नहीं है। यह सिर्फ़ धोखे की टट्टी है। भयाक्रान्त शासक वर्ग के सांस्कृतिक दलालों द्वारा जनता को दी जा रही सीख है कि संघर्ष, लड़ाई छोड़ दो; गुलाब भेजो!

“पैदा इुई पुलीस तो इबलीस ने कहा…”

शैतान के गर्भ से पैदा होने वाला तो शैतान जैसा चरित्र लेकर ही पैदा होगा। परन्तु आम घरों के बच्चे तो एक साधारण इंसान की तरह पलते-बढ़ते हैं। लेकिन जब वे पुलिस के मुलाजिम बनते है तो उनमें इन्सानियत ख़त्म होती है और यह खुद-ब-खुद नहीं होता। व्यवस्था योजनाबद्ध ढँग से उन्हें ऐसा बना देती है। यह व्यवस्था पैसों पर टिकी है और थोड़े से धन्नासेठों और मुनाफ़ाखोरों के लिए बनी है। आम घरों से जाने वाले नौजवानों के कन्धों पर जिस दिन पुलिस का बिल्ला लगाया जाता है उसी दिन से उन्हें ऐसे माहौल में रखा जाता है जो उन्हें लोगों के दुःख-दर्द और परेशानियों से उदासीन बनाना शुरू कर देता है। और पूरी ट्रेनिंग के दौरान यही बात उनके दिलो-दिमाग़ में ठूँस– ठूँस कर भरी जाती है कि जनता यानी भेड़-बकरी। हाँ! दो मुख्य कामों में बहुत ही एहतियात और सावधानी बरतने की बात कदम-कदम पर बतायी जाती है। पहली, कि धन्नासेठों और विशिष्ट जनों की देखभाल करना। दूसरी, आला अधिकारियों की जेबें गरम करने में कत्तई गड़बड़ी न करना। उनकी पदोन्नति इत्यादि का रास्ता यहीं से होकर जाता है। हर थाने से पुलिस के आला अधिकारियों को जाने वाले फ़िक्स रक़म के लिए इन्हें हर तरह के कुकर्म करने पड़ते हैं। लोगों को मार-पीट कर, फ़र्जी मुकदमा गढ़कर, धमकाकर अनेकों तरीकों से ये पैसे वसूल करने होते हैं।