Category Archives: दमनतंत्र

जनवादी अधिकारों पर बढ़ता फ़ासीवादी हमला और कैम्पसों में घटता जनवादी स्पेस

जनवादी अधिकारों पर बढ़ता फ़ासीवादी हमला और कैम्पसों में घटता जनवादी स्पेस सम्पादकीय वर्तमान फ़ासीवादी दौर में जनता के लम्बे संघर्षों से हासिल सीमित जनवादी अधिकारों पर हमला बोल दिया…

प्रोजेक्ट पेगासस : शासक वर्ग का हाइटेक निगरानी तन्त्र और उसके अन्तरविरोधों का ख़ुलासा

पेगासस स्पाइवेयर को विकसित करनेव वाली टेक फ़र्म एन.एस.ओ. सीधे इज़रायली ख़ुफिया विभाग की देख-रेख में काम करती है। एन.एस.ओ. का दावा है कि वह पेगासस केवल सरकारों को बेचतीं है, इसे किसी निजी व्यक्तियों या संस्थाओ को नहीं दिया जाता है। भारत, यूएई, बहरीन, सऊदी अरब, कज़ाखिस्तान, मेक्सिको, मोरक्को, अज़रबैजान सहित दुनिया के 50 देश इस स्पाइवेयर के ग्राहक हैं। लगभग इन सभी देशों में निरंकुश सत्ता है। पेगासस प्रोजेक्ट के इस खुलासे से पूरी तरह साफ़ हो गया है कि इसका इस्तेमाल सरकार द्वारा अपने ही देश के नागरिकों, बुद्धिजीवियों और सरकार के ख़िलाफ़ उठने वाली हर आवाज़ की जासूसी और दमन के लिए इस्तेमाल किया जा रहा है।

कोरोना काल में बदस्तूर जारी रहा काले कानूनों की आड़ में दमन और गिरफ़्तारियों का सिलसिला

सात साल से सत्ता में रहते हुए फ़ासीवादी मोदी सरकार ने पूँजीपतियों की चाटुकारिता के अलावा जो काम सबसे चौकसी से किया है, वह है अपने ख़िलाफ़ उठी हर आवाज़ का क्रूर दमन। इस सरकार ने तमाम क़ानूनी और गैरक़ानूनी हथकण्डों का इस्तेमाल कर प्रतिरोध को कुचला है और आवाज़ उठाने वालों को मुस्तैदी से गिरफ़्तार किया है, उन्हें राजनीतिक अधिकारों से वंचित कर उन्हें प्रताडि़त किया है।

क्या हिरासत में होने वाली यातनाओं को रोकने के लिए सीसीटीवी कैमरे पर्याप्त हैं?

हाल ही में सुप्रीम कोर्ट के एक बेंच ने देश भर के राष्ट्रीय जांच एजेंसी (एनआईए), केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई), प्रवर्तन निदेशालय (ईडी), राजस्व खुफिया निदेशालय (डीआरआई), नारकोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो (एनसीबी) आदि जैसी सभी जांच एजेंसियों के कार्यालयों में सीसीटीवी कैमरे लगाने का आदेश जारी किया है। कोर्ट का आदेश है कि इन कैमरों में नाइट विजन व रिकॉर्डिंग उपकरण भी लगे हुए हों। सुप्रीम कोर्ट का मानना है कि इस कदम से हिरासत में होने वाले उत्पीड़न पर काबू पाया जा सकेगा।

साम्प्रदायिक-फ़ासीवादियों ने “लव जिहाद” के नाम पर फैलाये जा रहे झूठ को पहुँचाया क़ानून निर्माण तक

देश के पाँच राज्यों में तथाकथित लव जिहाद के विरोध के नाम पर क़ानून बनाने के ऐलान हो चुके हैं। जिन पाँच राज्यों में “लव जिहाद” के नाम पर क़ानून बनाने को लेकर देश की सियासत गरमायी हुई है वे हैं: उत्तरप्रदेश, हरियाणा, मध्यप्रदेश, असम और कर्नाटक। कहने की ज़रूरत नहीं है कि उपरोक्त पाँचों राज्यों में भारतीय जनता पार्टी की खुद की या इसके गठबन्धन से बनी सरकारें कायम हैं। उत्तरप्रदेश की योगी सरकार तो नया क़ानून ला भी चुकी है लेकिन इसने बड़े ही शातिराना ढंग से इसका नाम ‘उत्तर प्रदेश विधि विरुद्ध धर्म संपरिवर्तन प्रतिषेध क़ानून – 2020’ रखा है जिसमें लव जिहाद शब्द का कोई ज़िक्र तक नहीं है।

कश्मीर के छात्रों का चौपट होता भविष्य

मोदी सरकार ने 5 अगस्त 2019 को अनुछेद 370 और 35ए हटाते हुए कश्मीरी आवाम से कई बड़े वायदे किए थे। जम्मू – कश्मीर के विशेष राज्य के दर्जे को समाप्त करते हुए देश के प्रधानमंत्री ने ये घोषणा की थी भाजपा सरकार के इस ऐतिहासिक कदम से कश्मीर मे बेरोज़गारी ख़त्म हो जायेगी, आतंकवाद का नामोनिशान मिट जाएगा व कश्मीर विकास के नये-नये आयाम गढ़ेगा…. मगर आज सच्चाई इसके विपरीत है।

जनता को गाय के नाम पर कुत्सित राजनीति नहीं बल्कि शिक्षा-स्‍वास्थ्य और रोज़गार चाहिए!

9 दिसम्बर को कर्नाटक विधानसभा में ‘कर्नाटक मवेशी वध रोकथाम एवं संरक्षण विधेयक-2020’ पारित कर दिया गया है। भाजपा शासित राज्यों में सरकारों के पास यही काम रह गया है कि साम्प्रदायिक नफ़रत भड़काने वाले मुद्दों को लगातार हवा देते रहना और सम्प्रदाय विशेष के उत्पीड़न की नयी-नयी तरकीबें भिड़ाते रहना। हाल ही में भाजपा शासित पाँच राज्यों में तथाकथित लव जिहाद के नाम पर क़ानून बनाने की कुत्सित योजनाओं को अमली जामा पहनाने पर भी काम चल रहा है।

राज्यसत्ता के निरंकुश होते जाने के साथ बढ़ती पुलिस बर्बरता

रोज़-रोज़ पुलिस दमन के वाक़यों को देखकर हम महसूस कर सकते हैं कि पुलिसिया तंत्र में आमूलचूल बदलाव की किस क़दर आवश्यकता है। पुलिस व्यवस्था में सुधार और उसका जनवादीकरण बेहद ज़रूरी है, नहीं तो न जाने कितने पी. जयराम और जे. बेन्निक्स काल-कलवित होते रहेंगे। पुलिस सुधार के लिए छात्रों-युवाओं, सचेत नागरिकों और आम जनता को बढ़चढ़कर भागीदारी करनी चाहिए।

फ़ासिस्टों ने किस तरह आपदा को अवसर में बदला!

भारत में फ़ासीवादी सरकार ने इस संकट को भी अपने फ़ासीवादी प्रयोग का हिस्सा बना लिया और थाली-ताली बजवाकर, मोमबत्ती जलवाकर जनता का एक सामूहिक मनोवैज्ञानिक परीक्षण कर यह पता लगाने में एक हद तक सफल भी हो गयी कि जनता का कितना बड़ा हिस्सा और किस हद तक तर्क और विज्ञान को ताक पर रखकर आरएसएस के फ़ासीवादी प्रचार के दायरे में आ चुका है। दूसरी ग़ौर करने वाली बात यह है कि ये फ़ासीवादी अनुष्ठान तब आयोजित किये जा रहे थे जब सीएए, एनआरसी और एनपीआर जैसे विभाजनकारी और आरएसएस के फ़ासीवादी मंसूबे को अमली जामा पहनाने वाले काले क़ानूनों के ख़िलाफ़ देशभर में सैकड़ों जगहों पर शाहीनबाग़ की तर्ज़ पर महिलाओं ने मोर्चा सँभाल रखा था। इन बहादुर महिलाओं के क़दम से क़दम मिलते हुए पुरुष, छात्र, कर्मचारी, मज़दूर यानि देश का हर तबक़ा बड़ी तादाद में सड़कों पर था। सत्ता की शह पर फ़ासिस्ट गुण्डों द्वारा प्रदर्शन पर गोली चलवाने, अफ़वाह फैलाकर आन्दोलन को बदनाम करने, सुधीर चौधरी, दीपक चौरसिया, अर्णब गोस्वामी जैसे पट्टलचाट सत्ता के दलाल पत्रकारों द्वारा फैलाये जा रहे झूठ, हिन्दू-मुसलमान के नाम पर आन्दोलन को कमज़ोर करने की लाख कोशिशों के बावजूद जब आन्दोलनकारी महिलाएँ बहादुरी से इसका सामना करते हुए मैदान से पीछे नहीं हटी तब इन दरिन्दों ने उत्तर-पूर्वी दिल्ली दंगो का ख़ूनी खेल खेलना शुरू कर दिया जिसमें दिल्ली पुलिस भी इन दंगाइयों के कन्धे से कन्धा मिलाकर आगजनी और तोड़फोड़ में शामिल रही।

2022 तक सबको मकान देने का जुमला उछालने वाली मोदी सरकार ने फिर से किया दिल्ली में सैकड़ों झुग्गियों को ज़मींदोज़!

5 नवम्बर 2018 को दिल्ली के शाहबाद डेरी इलाके के सैकड़ों झुग्गीवालों के घरों को डी.डी.ए. ने ज़मींदोज़ कर दिया। 300 से भी ज़्यादा झुग्गियों को चंद घण्टों में बिना किसी नोटिस या पूर्वसूचना के अचानक मिट्टी में मिला दिया गया। सालों से शाहबाद डेरी के मुलानी कैंप की झुग्गियों में रहने वाले लोगों को सड़क पर पटक दिया गया। न तो केंद्र सरकार ने झुग्गीवालों के रहने के लिए कोई इंतज़ाम किया और न ही राज्य सरकार ने उनकी टोह ली। दिल्ली जैसे महानगर में पिछले कई सालों में सर्दी शुरू होने के साथ झुग्गियाँ टूटने की ऐसी खबरें जैसे आम सी बात बन चुकी है। आवास एवं भूमि अधिकार नेटवर्क (हाउसिंग एंड लैंड राइट्स नेटवर्क) की फरवरी 2018 की एक रिपोर्ट के मुताबिक भारत में अकेले 2017 में ही राज्य एवं केंद्र सरकारों द्वारा 53,700 झुग्गियों को ज़मींदोज़ किया गया जिसके चलते 2.6 लाख से ज़्यादा लोग बेघर हो गये।इस रिपोर्ट के मुताबिक भारत में हर घण्टे 6 घरों को तबाह किया गया।