Category Archives: शिक्षा स्‍वास्‍थ्य और रोजगार

मेडिकल की पढ़ाई पर फ़ीस बढ़ोत्तरी के रूप में हरियाणा सरकार का बड़ा हमला

हरियाणा प्रदेश में मेडिकल की पढ़ाई की फ़ीस में बेतहाशा बढ़ोत्तरी कर दी गयी है। हरियाणा सरकार स्वास्थ्य व्यवस्था सुधार के नाम पर एक नयी अधिसूचना लेकर आयी है जो कुछ और नहीं बल्कि सरकार का मेडिकल की पढ़ाई पर एक बड़ा हमला है। सरकारी कॉलेजों/संस्थानों में एमबीबीएस यानी मेडिकल में स्नातक/ग्रेजुएशन की फ़ीस पहले जहाँ सालाना तक़रीबन 53,000 होती थी वहीं अब इसे बढ़ाकर 80,000 कर दिया गया है।

जनता को गाय के नाम पर कुत्सित राजनीति नहीं बल्कि शिक्षा-स्‍वास्थ्य और रोज़गार चाहिए!

9 दिसम्बर को कर्नाटक विधानसभा में ‘कर्नाटक मवेशी वध रोकथाम एवं संरक्षण विधेयक-2020’ पारित कर दिया गया है। भाजपा शासित राज्यों में सरकारों के पास यही काम रह गया है कि साम्प्रदायिक नफ़रत भड़काने वाले मुद्दों को लगातार हवा देते रहना और सम्प्रदाय विशेष के उत्पीड़न की नयी-नयी तरकीबें भिड़ाते रहना। हाल ही में भाजपा शासित पाँच राज्यों में तथाकथित लव जिहाद के नाम पर क़ानून बनाने की कुत्सित योजनाओं को अमली जामा पहनाने पर भी काम चल रहा है।

हरियाणा में पीटीआई शिक्षक बर्ख़ास्तगी के विरुद्ध आन्दोलन की राह पर

हरियाणा में 1983 पीटीआई शिक्षकों को कोरोना संकट के बीच में नौकरी से निकाल दिया गया। हरियाणा राज्य के अलग-अलग ज़िलों में 2010 बैच के शारीरिक शिक्षक अपने रोज़गार को बचाने की लड़ाई लड़ रहे हैं। पीटीआई अध्यापक कोरोना के ख़तरे के बीच उमसभरी गर्मी के थपेड़े खाते, बारिश में भीगते हुए भी अपने हक़ के लिए आवाज़ उठाते रहे हैं। राज्य भर की कर्मचारी यूनियनें, जनसंगठन और सामाजिक संगठन भी पीटीआई अध्यापकों के न्यायपूर्ण संघर्ष के समर्थन में आगे आ रहे हैं।

हरियाणा में शिक्षा व्यवस्था पर सरकारी हमला

हरियाणा की खट्टर-दुष्यन्त के नेतृत्व वाली भाजपा-जजपा ठगबन्धन सरकार प्रदेश के 450 स्कूलों में विज्ञान की पढ़ाई बन्द करने जा रही है। यह क़दम बच्चों की कम संख्या के नाम पर उठाया जा रहा है। होना तो यह चाहिए था कि सरकारी मशीनरी द्वारा प्रचार करके और पढ़ाई का स्तर सुधारकर सरकारी स्कूलों में बच्चों की संख्या और फिर स्कूलों की संख्या को भी बढ़ाया जाता किन्तु यहाँ यह जनविरोधी सरकार विभिन्न संकायों की पढ़ाई और स्कूलों को ही बन्द करने पर तुली हुई है! हरियाणा में शिक्षा व्यवस्था लगातार सरकारी हमले की चपेट में है। मोटे तौर पर हरियाणा में शिक्षा व्यवस्था पर हमला कांग्रेस की हुड्डा सरकार के समय में ही होना शुरू हो गया था। खट्टर सरकार ने अपने पिछले कार्यकाल से ही शिक्षा व्यवस्था को बर्बाद करने में कोई कोर-कसर नहीं छोड़ी है।

राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 शिक्षा पर कॉरपोरेट पूँजी के शिकंजे को क़ानूनी जामा पहनाने की कवायद

नयी शिक्षा नीति-2020 भेदभावपूर्ण दोहरी शिक्षा प्रणाली को ख़त्म कर न्याय और समानता पर आधारित शिक्षा व्यवस्था लागू करने के नाम पर न सिर्फ़ महँगे निजी स्कूलों के शोषणकारी जाल को बनाये रखता है बल्कि उसे और ज्यादा मजबूत बनाता है। शिक्षा को सबके लिए अनिवार्य और निःशुल्क करने की जगह पीपीपी मॉडल के तहत इसे भी मुनाफ़े के मातहत कर दिया गया है। शिक्षा नीति बात तो बड़ी-बड़ी कर रही है किन्तु इसकी बातों और इसमें सुझाये गये प्रावधानों में विरोधाभास है। यह नीति शिक्षा के स्तर और गुणवत्ता को उन्नत करने की बात कहती है किन्तु दूसरी तरफ़ दूसरी कक्षा तक की पढ़ाई के लिए सरकार की ज़िम्मेदारी को ख़त्म करने की बात कहती है।

‘नयी शिक्षा नीति 2020’: लफ़्फ़ाज़ि‍यों की आड़ में शिक्षा को आमजन से दूर करने की परियोजना

नयी शिक्षा नीति 2020 लागू होने के बाद उच्च शिक्षा के हालात तो और भी बुरे होने वाले हैं। पहले से ही लागू सेमेस्टर सिस्टम, एफ़वाईयूपी, सीबीडीएस, यूजीसी की जगह एचईसीआई इत्यादि स्कीमें भारत की शिक्षा व्यवस्था को अमेरिकी पद्धति के अनुसार ढालने के प्रयास थे। अब विदेशी शिक्षा माफ़ि‍या देश में निवेश करके अपने कैम्पस खड़े कर सकेंगे और पहले से ही अनुकूल शिक्षा ढाँचे को सीधे तौर पर निगल सकेंगे। शिक्षा के मूलभूत ढाँचे की तो बात ही क्या करें यहाँ तो शिक्षकों का ही टोटा है। केन्द्रीय और राज्य विश्वविद्यालयों में क़रीब 70 हजार प्रोफ़ेसरों के पद ख़ाली हैं।

ढहती अर्थव्‍यवस्‍था, बढ़ती बेरोज़गारी

बेतहाशा बढ़ रही बेरोज़गारी को लेकर देश की छात्र-युवा आबादी में सुलगता असन्‍तोष पिछली 5 सितम्‍बर और फिर 17 सितम्‍बर को देश के कई राज्‍यों में सड़कों पर प्रदर्शनों के रूप में रूप में फूट पड़ा। शहरों ही नहीं, गाँवों के इलाक़ों में भी जगह-जगह छात्रों-युवाओं ने थाली पीटकर अपना विरोध जताया और नरेन्‍द्र मोदी के कथित जन्‍मदिवस को ‘बेरोज़गारी दिवस’ के रूप में मनाया। यह सही है कि नौजवानों की एक भारी आबादी अब भी संघी प्रचार और गोदी मीडिया व भाजपा के आईटी सेल द्वारा उछाले जा रहे झूठे मुद्दों की गिरफ़्त में है, लेकिन आने वाले दिनों में बेरोज़गारी, महँगाई और सरकारी दमन की बिगड़ती स्थिति की मार उन पर भी पड़ने वाली है।

फ़ासीवादी मोदी राज में विकराल होती बेरोज़गारी

हर साल 2 करोड़ रोज़गार पैदा करने का सपना दिखाकर सत्ता में आयी मोदी सरकार अब रहे-सहे रोज़गार के अवसरों को भी निगलती जा रही है। देश की जनता की मेहनत से खड़े किये गये पब्लिक सेक्टर को औने-पौने दामों में अपने आकाओं को सौंप रही है। 3 मार्च 2020 को लोकसभा में वित्त-राज्य मंत्री अनुराग ठाकुर ने बताया कि सरकार 28 सार्वजनिक उपक्रमों की हिस्सेदारी बेचने की सैद्धान्तिक मंज़ूरी दे दी गयी है। जिसमें ऐसी भी कम्पनियाँ हैं जो सालों से फ़ायदे में थीं और हर साल करोड़ों रुपये टैक्स के रूप में सरकार को देती भी थीं। आने वाले दिनों में छँटनी की मार सार्वजनिक और निजी दोनों ही सेक्टर में तेज़ होने वाली है।

कोरोना वायरस : नवउदारवादी भूमण्डलीकरण के दौर की महामारी

सरकारों की चौकसी और बेहतर सार्वज‍निक स्वास्थ्य व्यवस्था की बदौलत इस तरह के संक्रमण को महामारी में तब्दील होने से रोका जा सकता था। परन्तु नवउदारवादी भूमण्डलीकरण के मौजूदा दौर में दुनिया के तमाम मुल्क़ों में बेतहाशा निजीकरण के चलते सार्वजनिक स्वास्थ्य व्यवस्था लचर हो चुकी है जिसकी वजह से इस बीमारी की रोकथाम उचित ढंग से नहीं हो सकी। तमाम देशों की सरकारों ने भी इस महामारी को फैलने से रोकने के लिए सही समय पर चौकसी नहीं दिखायी। साम्राज्यवादी लूट की बदौलत विलासिता के शिखर पर बैठे अमेरिका तक में कोरोना वायरस के परीक्षण के लिए किट और N95 फ़ेसमास्क पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध नहीं हो सके जिसकी वजह से वहाँ इस बीमारी को फैलने से नहीं रोका जा सका।

‘अच्छे दिनों’ की मृगतृष्णा

ऑक्सफैम की रिपोर्ट के अनुसार 2017 में देश के 1% लोग देश की 73% सम्पत्ति पर कब्जा करके बैठे हैं। अमित शाह के बेटे जय शाह की सम्पत्ति में 16000 गुना की वृद्धि हुई है, विजय माल्या और नीरव मोदी जो 9000 करोड़ और 11000 करोड़ रुपये लोन लेकर विदेश भाग गये। पनामा और पैराडाइज़ पेपर के खुलासे के बाद सरकार की नंगयी साफ तौर पर जगजाहिर हो गयी कि इनका मकसद काला धन लाना नहीं उसे सफ़ेद धन में तब्दील करना है। इस साल रिकॉर्ड ब्रेक करते हुए सरकार ने एनपीए के मातहत 1,44,093 करोड़ रुपये माफ़ कर दिया। एक तरफ धन्नासेठों-मालिकों के लिए पलकें बिछाकर काम किया जा रहा है वहीं दूसरी तरफ कश्मीर से तूतीकोरिन तक जनता के प्रतिरोध को डंडे और बन्दूक के दम पर दबाया जा रहा है। छात्र, नौजवान, मजदूर, किसान, दलित, महिलाएँ सब पर चौतरफा हमला किया जा रहा है। 2 करोड़ नौकरियाँ हर साल देने का वादा, नमामि गंगे में 7000 करोड़ रुपये खर्च किये जाने, 2019 तक सबको बिजली जैसे लोकलुभावन वायदों की हकीकत सबके सामने खुल रही है। अच्छे दिन आये पर धन्नासेठों के लिए, आम जनता की हालात बद से बदतर ही हुई है।