Category Archives: शिक्षा स्‍वास्‍थ्य और रोजगार

आईआईटी गुवाहाटी प्रशासन की तानाशाही

हर दौर में फ़ासीवाद कॉलेजों तथा विश्वविद्यालयों को अपना निशाना बनाता है, क्योंकि विश्वविद्यालय छात्रों के लिए जनवादी स्पेस होते हैं, जहाँ वे खुलकर अपनी सहमति व असहमति दर्ज़ करा सकते हैं, जहाँ वे बहस कर सकते हैं, सरकार से लेकर संस्थानों की कार्यप्रणालियों पर सवाल कर सकते हैं। इस जनवादी स्पेस को ख़त्म कर फ़ासीवादी ताक़तें प्रतिरोध के स्वर को दबाने का हर मुमकिन प्रयास करती हैं। ताकि इंसाफ़पसन्द छात्र और नौजवान या तो डरकर चुप हो जायें या फिर उनके पक्ष में हो जायें। आज देशभर में इस जनवादी स्पेस को ख़त्म कर ये लोग इसी काम को अंजाम देने की कोशिश कर रहे हैं।

छात्रों-युवाओं में बढ़ती आत्महत्या की प्रवृत्ति का ज़िम्मेदार कौन है?

पूरे देश में छात्रों-युवाओं में बढ़ती आत्महत्याएँ विकराल रूप लेती जा रही है। छात्रों का हब कहे जाने वाले शहर अब आत्महत्याओं के हब बन गये है। भविष्य की अनिश्चितता से हताश, निराश छात्र आज ज़िन्दगी के बजाय मौत को चुनने के लिये मजबूर हैं। ये वे हत्याएँ हैं जिनका न कोई सुराग़ है, न ही सुनवाई।

समाजवादी शिक्षा व्यवस्था: शिक्षा के क्षेत्र में समाजवादी चीन में हुए प्रयोगों पर एक संक्षिप्त चर्चा

समाजवादी निर्माण प्रक्रिया के तमाम प्रयोगों में से सबसे महत्वपूर्ण प्रयोग रहें शिक्षा व्यवस्था सम्बन्धी प्रयोग। इन प्रयोगों ने एक ऐसी शिक्षा व्यवस्था को जन्म दिया जो समाजवादी सत्ता तथा मेहनतकश वर्ग के हितों की सेवा करने के साथ-साथ नयी समाजवादी चेतना को गढ़ने में अग्रणी भूमिका अदा कर रही थी। महज़ कुछ सालों की समयावधि में निरक्षरता को जड़ से मिटाते हुए समाजवादी शिक्षा व्यवस्था एक वर्ग-विहीन शोषणमुक्त समाज की ओर संक्रमण में अहम भूमिका निभा रही थी। सोवियत संघ और चीन की समाजवादी शिक्षा व्यवस्थाओं के गहन अध्ययन और उनकी उपलब्धियों तथा कमज़ोरियों का सही मूल्यांकन किये बिना आज की ठोस परिस्थितियों में एक मुक्तिकामी शिक्षा परियोजना के निर्माण की कल्पना भी नहीं की जा सकती।

जनता के पैसों से आपदा में अवसर का निर्माण करतीं वैक्सीन कम्पनियाँ

मुनाफे पर टिकी इस पूँजीवादी व्यवस्था में लोगों की जान का भी सौदा किया जाता है। तमाम शोधों के पेटेण्ट, बड़ी फ़ार्मा कम्पनियों के हित में बने क़ानून और आज पूँजीपति वर्ग के मुनाफ़े को सुनिश्चित करने वाली इन सरकारों की वजह से आज वैक्सीन की शोध के बावजूद आम आबादी का बड़ा हिस्सा वैक्सीन की कमी की वजह से कोरोना संक्रमण के ख़तरे का सामना कर रहा है।

स्वास्थ्य बजट की कहानी

भारत अपने सकल घरेलू उत्पाद का सिर्फ एक प्रतिशत (केन्द्र तथा राज्य सरकारों को मिलाकर) सार्वजनिक स्वास्थ्य पर खर्च करता है, जो देश की आबादी, जनसांख्यिकी और लगातार बढ़ते बीमारी के बोझ को देखते हुए काफ़ी कम है। साथ ही यह दुनिया की किसी भी प्रमुख अर्थव्यवस्था के लिए भी सबसे कम है। ऑक्सफैम की ‘कमिटमेण्ट टू रिड्यूसिंग इनइक्वलिटी’ रिपोर्ट के अनुसार, भारत स्वास्थ्य ख़र्च में 155वें, नीचे से चौथे, स्थान पर है।

कोरोना की दूसरी लहर और रोज़गार का संकट

कोरोना महामारी की दूसरी लहर में भी मोदी सरकार के घटिया प्रबन्धन की वजह से करोड़ों लोग अपनी नौकरियों से हाथ धो बैठे है। आँकड़ो के हिसाब से चले तो सीएमआईई के हालिया रिपोर्ट के मुताबिक मई में बेरोजगारी दर मार्च के 6.63 फ़ीसदी से बढ़कर 14.45 फ़ीसदी हो गई है। हालत का अन्दाज़ा इस बात से लगाया जा सकता है कि सीएमआईई ने उन लोगों को बेरोज़गार के रूप में वर्गीकृत किया है जिन्होंने नौकरी की तलाश की, लेकिन एक सप्ताह में एक घण्टे से कम काम प्राप्त किया।

कोरोना महामारी में चरमराई भारत की स्वास्थ्य व्यवस्था

इस बीमारी को महामारी में तब्दील करने की मुख्य़ ज़िम्मेदारी मोदी सरकार की ही है। पिछले साल की ही तरह दोबारा सरकार ने न कॉण्टैक्ट ट्रेसिंग की और न ही बीमारी को रोकने के लिए कोई क़दम उठाये। केवल मास्क‍ न पहनने पर जुर्माना लगाने के जरिये सरकारी ख़ज़ाना भरा गया जबकि असल में संक्रमण बस्ती -बस्ती फैलता रहा। जब यह संक्रमण फैल रहा था तब मोदी और भाजपा के नेताओं ने बिना किसी सामाजिक दूरी के चुनावी रैलियाँ की। पिछले साल नमस्ते ट्रम्प के आयोजन के ज़रिये तो इस साल चुनाव के ज़रिये प्रधानमन्त्री मोदी सुपरस्प्रैडर साबित हुए हैं। न सिर्फ़ बीमारी के कारण लोगों की मृत्यु हुई है बल्कि भूख और बेघर होने के डर से बीमारी में ही लोग पैदल चल पड़े। सरकार ने हर क़दम में जो लापरवाही की, वह ग़रीबों के हिस्से में आयी और जो पहलक़दमी की, उसने अमीरों के घरों को बचाया। परन्तु दूसरी लहर में न केवल ग़रीब बस्तियों पर मौत का मसीहा मंडरा रहा था बल्कि इसने अमीरों की बसावट पर भी अपने पंख फैलाये।

बेरोज़गारी की मार झेलती युवा आबादी

निजी मालिकाने पर आधारित पूँजीवादी व्यवस्था अपनी स्वाभाविक गति से समाज में एक तरफ़ कुछ लोगों के लिए विलासिता की मीनारें खड़ी करती जाती है तो दूसरी ओर करोड़ों-करोड़ छात्रों समेत आम आबादी को गरीबी और भविष्य की अनिश्चितता के अँधेरे में ढकेलती है। मुनाफ़ा पूँजीवादी व्यवस्था की चालक शक्ति होती है। आज विश्व पूँजीवाद मुनाफ़े की गिरती दर के असमाधेय संकट के दौर से गुजर रहा है। पूँजीवादी होड़ से पैदा हुई इस मंदी की कीमत छँटनी, तालाबन्दी, भुखमरी, दवा-इलाज़ का अभाव, बेरोज़गारी आदि रूपों में मेहनतकश वर्ग को ही चुकानी पड़ती है।

कश्मीर के छात्रों का चौपट होता भविष्य

मोदी सरकार ने 5 अगस्त 2019 को अनुछेद 370 और 35ए हटाते हुए कश्मीरी आवाम से कई बड़े वायदे किए थे। जम्मू – कश्मीर के विशेष राज्य के दर्जे को समाप्त करते हुए देश के प्रधानमंत्री ने ये घोषणा की थी भाजपा सरकार के इस ऐतिहासिक कदम से कश्मीर मे बेरोज़गारी ख़त्म हो जायेगी, आतंकवाद का नामोनिशान मिट जाएगा व कश्मीर विकास के नये-नये आयाम गढ़ेगा…. मगर आज सच्चाई इसके विपरीत है।

सरकारी शिक्षा पर चौतरफ़ा संकट के बादल

हर किसी के जीवन में शिक्षा की एक अहम भूमिका होती है। जीवन को उच्चतम धरातल पर ले जाने में शिक्षा की बहुत महत्वपूर्ण भूमिका मानी जाती है। शिक्षा के बिना हर कोई अपने आप को अधूरा-सा महसूस करता है। वैसे तो बच्चे की पहली पाठशाला उसका घर होता है लेकिन अक्सर यह देखा जाता है कि उसको अक्षर ज्ञान किसी स्कूल में जाने से ही प्राप्त होता है। स्कूल किसी बच्चे को केवल अक्षर ज्ञान ही नहीं देता बल्कि बहुत सारी दूसरी चीज़ों से भी ओत-प्रोत करता है जो उसके आने वाले जीवन में बहुत महत्वपूर्ण होती हैं। इसलिए किसी भी बच्चे को स्कूली जीवन जीना आवश्यक ही नहीं बल्कि बेहद ज़रूरी माना जाता है।