जयराम रमेश को गुस्सा क्यों आता है?
इस देश की जनता की धुर विरोधी, प्रगतिशीलता एवं उदारवाद का छद्म चोला पहनने वाली संसदीय पार्टियों एवं उनके पतित नेताओं की न तो औपनिवेशिक अवशेषों से कोई दुश्मनी है और न ही सामन्ती बर्बर देशी मानव विरोधी परम्पराओं से। जयराम रमेश जिस औपनिवेशिक प्रतीक चिन्ह गाउन का विरोध कर उतार फेंकने की बात करते हैं उसी औपनिवेशिक शासन की दी हुई शिक्षा व्यवस्था व न्यायपालिका को ढो रहे हैं। आज भी भारत में उसी लॉर्ड मैकाले की शिक्षा नीति को सुधारों के पैबन्दों और जालसाज़ी से लागू किया गया है। मैकाले की शिक्षा पद्धति का प्रमुख मक़सद ऐसे भारतीय मस्तिष्क का निर्माण करना था जो देखने में देशी लगे लेकिन दिमाग से पूर्णतया लुटेरे अंग्रेजों का पक्षधर हो। पिछले साठ सालों में शिक्षा को हाशिये पर रखा गया। आज़ादी के समय सबके लिए अनिवार्य और निःशुल्क शिक्षा देना राज्य का कर्तव्य बताया गया था। आज उसी शिक्षा को नित नये कानूनों द्वारा बाज़ार की वस्तु बनाया जा रहा है। अंग्रेजियत को थोपा गया और रोज़गार के तमाम क्षेत्रों को अंग्रेज़ी भाषा से जोड़े रखने की साजिश जारी रही। देश के अन्दर ही बर्बरता और असमानता को दीर्घकालिक बनाये रखने का एक कुचक्र रचा गया जो आज भी जारी है। शिक्षा के उसी औपनिवेशिक खाद से पली-बढ़ी आज की शिक्षा और उसमें प्रशिक्षित उच्च मध्यवर्गीय शिक्षित समुदाय अपने ही देश के ग़रीब मज़दूरों व अशिक्षितों से नफरत करता है, उसे गँवार समझता है और अपनी मेधा, ज्ञान और शिक्षा का प्रयोग ठीक उन्हीं औपनिवेशिक शासकों की तरह ग़रीबों के शरीर के खून का एक-एक क़तरा निचोड़ने के लिये करता है। तब जयराम रमेश को गुस्सा नहीं आता। जाहिर है, जब वे नुमाइन्दगी ही इसी खाए-पिये अघाए मध्यवर्ग की कर रहे हैं, तो उससे गुस्सा कैसा?












