इस बार भी आदमखोर शिक्षा व्यवस्था की बलि चढ़े मासूम बच्चे
भूमण्डलीकरण और उदारीकरण के दौर में बदली शिक्षा नीति ने इस प्रणाली को और अधिक अमानवीय बना दिया है जिसमें केवल सबसे पहले स्थान पर आने वाले के लिए ही मौका है, जबकि उससे कमतर छात्रों का भविष्य अंधकार में छोड़ दिया जाता है। साथ ही पूँजीवादी मीडिया और संस्कृति भी यही प्रचारित करती है “पढ़ो ताकि बढ़ा आदमी बनो और ख़ूब पैसा कमाओ’’। वह स्वयं भी गुनगुनाता है, “दुनिया जाए भाड़ में ऐश करो तुम”। यह सोच छात्रों को लालची, स्वार्थी और संवेदनशून्य बना रही है। इस शिक्षा व्यवस्था के दूसरे पहलू पर ग़ौर करना भी ज़रूरी है। कोई छात्र इस शिक्षा व्यवस्था में सफ़लता प्राप्त कर ले, तो क्या वह एक बेहतर इंसान की ज़िन्दगी जी पाएगा? इस शिक्षा व्यवस्था के केन्द्र में इंसान नहीं है आम घरों से आने वाले छात्रों को शिक्षा इसलिए दी जाती है ताकि उन्हें इस व्यवस्था के यंत्र का एक नट-बोल्ट बनाया जा सके। यानी उस भीड़ में शामिल किया जा सके जो इस व्यवस्था की सेवा में लगी है।










