मोदी राज में बरबाद होती शिक्षा व्यवस्था

केशव

आज हमारे देश में एक फ़ासीवादी ताक़त सत्ता के शीर्ष पर मौजूद है, जो हर दिन आम जनता के बुनियादी अधिकारों पर बुल्डोज़र चला रही है। तमाम सरकारी व ग़ैर-सरकारी संस्थानों में फ़ासीवादी घुसपैठ जारी है। शिक्षा तंत्र भी इससे अछूता नहीं है। हालात यह हैं कि मोदी-राज में शैक्षणिक संस्थानों में संघ के घुसपैठ के कारण जहाँ एक ओर इन संस्थानों का साम्प्रदायिकीकरण हो चुका है, वहीं दूसरी ओर इनके संस्थानों के सुचारु संचालन की धज्जियाँ उड़ चुकी हैं। शिक्षा और परीक्षा के तंत्र की बर्बादी का नतीजा यह है कि हर परीक्षा के बाद देशभर में परीक्षाओं में धाँधली की ख़बरें आने लगती हैं। यूजीसी-नेट, सीएसआईआर नेट, नीट यूजी और नीट पीजी जैसी परीक्षाओं में धाँधली कोई आकस्मिक घटना नहीं है। यह फ़ासीवादी गिरोह द्वारा पूरे शिक्षा तंत्र को बर्बाद करने की कड़ी का ही बढ़ा हुआ क़दम है।
वैसे तो देश आज़ादी के बाद से ही शिक्षा व्यवस्था की आम दिशा-दशा देश के पूँजीपति वर्ग की ज़रूरतों के हिसाब से तय की गयी थी। 1986 की नयी शिक्षा नीति के आने के साथ ही शिक्षा के क्षेत्र में निजीकरण का रास्ता साफ़ हो गया। साथ ही पूरी शिक्षा प्रणाली को बाज़ार के हवाले करने की तैयारी भी शुरू हो चुकी थी। लेकिन जो शुरुआत कांग्रेस के राज में हुई थी उसे पिछले दस वर्षों में मोदी सरकार ने दिन दूनी-रात चौगुनी रफ़्तार से आगे बढ़ाया है। एक बड़ी आबादी शिक्षा से दूर हो चुकी है। शिक्षा का सरकारी तंत्र योजनाबद्ध तरीक़े से नीतियाँ बनाकर चौपट किया जा रहा है। प्राथमिक स्तर से लेकर उच्च स्तर तक की शिक्षा को बाज़ारू माल बना दिया गया है। जिसके पास पैसा है वे बेहतर स्कूलों, कॉलेजों, विश्वविद्यालयों व तकनीकी शिक्षण संस्थानों तक पहुँच रखते हैं। जिनके पास पैसा नहीं है वे अशिक्षित रहकर या स्कूल से ड्रॉपआउट होकर अकुशल या अर्द्धकुशल मज़दूरों की ज़मात में शामिल होने या ज़्यादा से ज़्यादा आईटीआई या पॉलीटेक्निक से शिक्षित होकर कुशल मज़दूरों की ज़मात में शामिल होने और ठेका प्रथा के तहत खटने के लिए बाध्य हैं। शिक्षा पर होने वाले सरकारी ख़र्च में कटौती के मामले में मोदी सरकार ने पिछली सभी सरकारों को बहुत पीछे छोड़ दिया है।
शिक्षा पर इस हमले को यह फ़ासीवादी निज़ाम नयी शिक्षा नीति, 2020 के ज़रिए व्यवस्थित तौर पर अंजाम दे रहा है। इसके ज़रिये इन्होंने जहाँ एक ओर केन्द्रीय व राज्य विश्वविद्यालयों के भीतर आम घरों से आने वाले छात्रों के प्रवेश को मुश्किल बना दिया है, वहीं दूसरी ओर पाठ्यक्रमों में बदलाव और शिक्षण संस्थानों में संघ के काडरों की भर्ती कर शिक्षा की गुणवत्ता को घटाने व इसके साम्प्रदायिकीकरण का काम किया है। हम एक-एक करके मोदी सरकार द्वारा शिक्षा पर किये जाने वाले हमलों पर बात करेंगे।

आम छात्रों से दूर होती शिक्षा

पिछले दस सालों में मोदी सरकार के राज में फ़ीस वृद्धि के कारण देश के केन्द्रीय विश्वविद्यालयों में आम घरों से आने वाले छात्रों की संख्या में भारी कमी आयी है। इस दौरान डीयू, जेएनयू, जामिया, इफ़्लू, एचसीयू, बीएचयू समेत तमाम विश्वविद्यालयों के अलग-अलग पाठ्यक्रमों में या तो फ़ीस वृद्धि की गयी है, या फिर इसकी कोशिश की गयी है। बजट में शिक्षा पर किये जाने वाले ख़र्च पर निगाह डालें तो तस्वीर और साफ़ हो जाती है। 1990-1991 में जीडीपी का 1.4 फ़ीसदी हिस्सा शिक्षा पर ख़र्च किया जाता था, लेकिन वर्ष 2023-24 आते-आते इस ख़र्च को घटाकर 0.37 फ़ीसदी कर दिया गया। इसके अलावा, 2013-14 से 2022-23 तक नौ वर्षों के दौरान एक आम नियम के तौर पर मोदी सरकार द्वारा शिक्षा पर वास्तविक ख़र्च बजट अनुमानों से कम ही रहा है। 2020-21 में बजट की तुलना में वास्तविक ख़र्च 15,092.1 करोड़ रुपये कम था। यानी एक तरफ़ मोदी सरकार जीडीपी की तुलना में शिक्षा बजट में लगातार कटौती कर रही है तो वहीं दूसरी ओर जो बजट शिक्षा के लिए आवण्टित किया जाता है, तमाम बन्दरबाँट के बाद भी उसे ख़र्च नहीं किया जा रहा है। इतना ही नहीं, मोदी सरकार बजट की कमी का रोना रोकर स्कूलों को बन्द भी कर रही है। विश्वविद्यालयों में स्ववित्तपोषित कोर्स लाने के साथ-साथ पूरे शिक्षा तंत्र को देशी-विदेशी पूँजीपतियों को सौंपने की तैयारी हो रही है। छात्रों की जेब काटने के लिए मौजूदा सरकार के कार्यकाल में हायर एजुकेशन फण्डिंग एजेंसी (HEFA) के तहत यूजीसी की फण्डिंग को बन्द कर तमाम पाठ्यक्रमों को स्ववित्तपोषित बनाया जा रहा है, जिसकी वजह से छात्रों के ऊपर अतिरिक्त फ़ीस का बोझ और तेज़ी से बढ़ रहा है।
इन सब के बावजूद जो छात्र किसी तरह से अपनी फ़ीस जुटाकर कैम्पस तक पहुँच भी जाते हैं, उन्हें कैम्पस के भीतर तमाम समस्याओं का सामना करना पड़ता है। दिल्ली विश्वविद्यालय के कालिन्दी कॉलेज में क्लासरूम के भीतर एक प्रोफ़ेसर के ऊपर चलता हुआ पंखा गिर गया। इस विश्वविद्यालय के लक्ष्मीबाई कॉलेज में प्रिंसिपल ने क्लासरूम में एसी लगाने के बजाय गोबर पोत दिया। आज से लगभग दो साल पहले डीयू के सैण्ट स्टीफंस कॉलेज में एक कार्यक्रम के दौरान छत का एक हिस्सा टूटकर नीचे गिर गया था। दिल्ली विश्वविद्यालय के बाक़ी कॉलेजों की स्थिति भी लगभग ऐसी ही है। ये तो कुछ चुनिन्दा उदाहरण हैं, अगर कॉलेजों की जर्जर स्थिति पर बात करें तो शायद इस पत्रिका के पूरे पन्ने भी कम पड़ जायें। जब देश के केन्द्रीय और सबसे बेहतर मानी जाने वाले विश्वविद्यालयों की इमारतें ढहने के कगार पर हैं तो बाक़ी विश्वविद्यालयों की क्या स्थिति होगी, इसका अन्दाज़ा लगाया जा सकता है।
इसके अलावा विश्वविद्यालयों की व्यवस्थित बर्बादी के लिए मोदी सरकार द्वारा नया हथकण्डा अपनाया जा रहा है। पिछले वर्ष एनटीए द्वारा तमाम परीक्षाओं में धाँधली की वजह से निजी विश्वविद्यालयों के दाख़िले की दर में ज़बरदस्त बढ़ोतरी हुई थी। निजीकरण की ओर औपचारिक रूप से बढ़ने के साथ-साथ इन अनौपचारिक हथकण्डों का इस्तेमाल कर यह सरकार बड़ी सफ़ाई से आम छात्रों को निजी संस्थानों में दाख़िले लेने के लिए मजबूर कर रही है। हमें भूलना नहीं चाहिए कि स्कूली शिक्षा के स्तर पर निजी संस्थानों को बढ़ावा देने के लिए किस प्रकार सरकारी स्कूलों को तबाह-बर्बाद किया गया था, और आज तक किया जा रहा है।
यूडीआईएसई प्लस सर्वे के हालिया सर्वे के अनुसार देश में 2018-22 के औसत नामांकन 26.36 करोड़ की तुलना में 2022-23 में नामांकन घटकर 25.17 करोड़ और 2023-24 में और अधिक घटकर 24.8 करोड़ हो गया। इसकी सबसे प्रमुख वजह बड़े पैमाने पर सरकारी स्कूलों का बन्द होना है। यूडीआईएसई की ही एक अन्य रिपोर्ट बताती है कि 2018-20 के बीच देश में 50,000 सरकारी स्कूल बन्द हुए हैं। 2021 से 2024 के चार सालों में फिर से 10,000 स्कूलों को बन्द कर दिया गया। ये सिलसिला आज भी जारी है। हाल ही में, उत्तर प्रदेश सरकार ने बच्चों की कम संख्या का हवाला देकर 5,000 स्कूलों को बन्द करने का फ़ैसला लिया है। यही सर्वे बताता है िक एक तरफ़ सरकारी स्कूलों की संख्या लगातार घटती जा रही है, और दूसरी तरफ़ प्राइवेट स्कूलों की संख्या में वृद्धि हुई है
लगातार घटते फ़ण्ड की वजह से प्राथमिक व माध्यमिक शिक्षा की हालत भी बद से बदतर होती जा रही है। जिन सरकारी स्कूलों में बच्चों को शिक्षा दी जा रही है, उनमें बुनियादी सुविधाओं जैसे कि शिक्षकों, शौचालयों, पीने के पानी, प्रयोगशालाओं आदि तक की समुचित व्यवस्था नहीं है। शिक्षा मंत्रालय के स्कूली शिक्षा और साक्षरता विभाग के मुताबिक़ केन्द्र और राज्य सरकारों द्वारा 10 लाख 32 हज़ार स्कूलों का संचालन किया जा रहा है। देश में कुल संचालित विद्यालयों में 68.48 फ़ीसदी सरकारी है लेकिन सरकारी विद्यालयों में कार्यरत शिक्षकों की संख्या कुल कार्यरत शिक्षकों की संख्या का मात्र 50 फ़ीसदी है। वहीं देश भर में 22.38 फ़ीसदी विद्यालय निजी तौर पर संचालित हो रहे हैं। जबकि निजी क्षेत्र में कुल 37.1 फ़ीसदी शिक्षक कार्यरत हैं। सरकार की ओर से लोकसभा में दिये गये एक जवाब के मुताबिक़ देश के प्राथमिक विद्यालयों में 9,07,585 शिक्षकों की कमी है। वहीं उच्च प्राथमिक विद्यालयों में एक लाख से अधिक स्वीकृत शिक्षकों के पद खाली पड़े है। यानी अगर इन पर सरकार भर्ती करे तो तत्काल क़रीब 11 लाख युवाओं को रोज़गार मिल सकता है।
प्राथमिक व माध्यमिक विद्यालयों की इमारतों और इनके संचालन में समस्या के साथ-साथ परीक्षाओं में भी पिछले दिनों काफ़ी गड़बड़ियाँ सामने आयी हैं। हाल में ही दसवीं और बारहवीं की परीक्षाओं के नतीजों में काफ़ी ग़लतियाँ दिखी हैं और इसके पुनर्मूल्यांकन के लिए सीबीएसई ने काफ़ी ज़्यादा फ़ीस वसूली है। दसवीं की परीक्षा के लिए प्रति विषय 500 रुपये और बारहवीं की परीक्षा के लिए प्रति विषय 700 रुपये लिये गये हैं। छात्रों को मिलने वाली स्कॉलरशिप के लिए बजट की कमी का हवाला देने वाली मोदी सरकार के राज में मन की बात जैसे कार्यक्रमों पर होने वाले ख़र्च में 400% से अधिक की वृद्धि हो चुकी है।

पाठ्यक्रमों में बदलाव और शिक्षा का साम्प्रदायिकीकरण

मोदी सरकार के कार्यकाल में पाठ्यक्रमों में एक के बाद एक बदलाव किये जा रहे हैं। इतिहास से लेकर विज्ञान का विकृतिकरण और फ़ासीवादीकरण करने में कोई कसर नहीं छोड़ी गयी है। हाल में ही ऐसे कई उदाहरण सामने आये हैं, जब स्कूल से लेकर विश्वविद्यालय तक के पाठ्यक्रमों में अतार्किक बदलाव किये गये हैं। पिछले वर्ष एनसीईआरटी ने दसवीं कक्षा के पाठ्यक्रम से उद्विकास को हटा दिया गया। 2022 में सीबीएसई के 9-12वीं कक्षा तक के राजनीति शास्त्र और इतिहास के विषयों से कई महत्वपूर्ण बिन्दुओं जैसे शीत युद्ध, गुट निरपेक्ष आन्दोलन, मुग़लों से जुड़े इतिहास से लेकर फै़ज़ की नज़्मों तक को हटा दिया गया। 2021 में दिल्ली विश्वविद्यालय की निरीक्षण समिति ने महाश्वेता देवी, बामा और सुखारथारिणी के लेखों को अंग्रेज़ी के सिलेबस से हटा दिया। महाश्वेता देवी द्वारा लिखित लघु कथा ‘द्रौपदी’ को सन् 1999 से स्नातक में पढ़ाया जा रहा था, लेकिन निरीक्षण समिति ने बिना संकायों, पाठ्यक्रम समिति और स्थायी समिति से बातचीत किये इसे हटाने का निर्णय ले लिया। हाल ही में एनसीईआरटी की 12वीं कक्षा की राजनीति विज्ञान कि किताब से बाबरी मस्जिद, गुजरात दंगों और हिन्दुत्व की राजनीति के सन्दर्भ हटा दिये गये। इसके अलावा इतिहास की किताब में ‘हड़प्पा सभ्यता की उत्पत्ति और पतन’ और ‘आर्य आप्रवासन’ से जुड़े तथ्यों को लेकर भी बदलाव किये गये। साथ ही राजनीति विज्ञान की किताब के चैप्टर 8 में ‘भारतीय राजनीति में हालिया घटनाक्रम’ से ‘अयोध्या विध्वंस’ का सन्दर्भ हटा दिया गया। इसमें ‘राजनीतिक मोबिलाइज़ेशन के लिए राम जन्मभूमि आन्दोलन और अयोध्या विध्वंस (बाबरी मस्जिद विध्वंस) की लिगेसी क्या है?’ इसे बदलकर ‘राम जन्मभूमि आन्दोलन की विरासत क्या है?’ कर दिया गया। ऐसे कई उदाहरण मौजूद हैं, जिससे यह समझा जा सकता है कि किस प्रकार पाठ्यक्रमों में बदलाव कर फ़ासीवादी ताक़तें शिक्षा का सम्प्रदायिकीकरण करने का काम कर रही है, और तार्किक सोच पर हमले कर रही है। इसके पीछे की वजह बिल्कुल साफ़ है। फ़ासिस्ट राजनीति शुरू से ही छात्रों को अतार्किक और साम्प्रदायिक बनाने की तैयारी करती हैं, ताकि वे अपने जीवन के तमाम मसलों पर सोचने के बजाय अन्धभक्तों की भीड़ में शामिल होकर धर्म और जाति के नाम पर एक दूसरे का गला काटें।

शिक्षण संस्थानों में फ़ासीवादी हस्तक्षेप

21वीं सदी के फ़ासीवाद की एक विशिष्टता यह है कि इसने तमाम सरकारी, ग़ैर-सरकारी संस्थानों पर आन्तरिक क़ब्ज़ा करके उन्हें अन्दर से खोखला कर देता है। आज देश के बड़े शिक्षण संस्थानों मसलन आईआईटी, एनआईटी, निफ़्ट, यूजीसी समेत तमाम केन्द्रीय विश्वविद्यालयों में संघ के लोग मौजूद हैं। इसकी वजह से जहाँ एक ओर शिक्षण संस्थानों को अन्दर से खोखला कर दिया गया है, वहीं दूसरी ओर शिक्षा की गुणवत्ता में भी काफ़ी कमी आयी है। उदाहरण के लिए दिल्ली विश्वविद्यालय में हाल में हुई प्रोफ़ेसरों की भर्ती का पैमाना उनकी योग्यता के बजाय उनके राजनीतिक पक्ष से तय हुआ। यानी अगर आप संघ और भाजपा के तलवे चाटना जानते हैं तो ही आप किसी कॉलेज या विश्वविद्यालय में पढ़ाने के बारे में सोच सकते हैं, अन्यथा क़ाबिलियत होने के बावजूद आप करोड़ों नौजवानों की तरह सड़कों पर चप्पल फटकारने के लिए आज़ाद हैं। इसकी वजह से शिक्षा की गुणवत्ता पर काफ़ी असर पड़ा है। दिल्ली विश्वविद्यालय के कई कॉलेजों में तो छात्रों ने इन प्रोफ़ेसरों की क्लास में जाना ही बन्द कर दिया, जिसके बाद दिल्ली विश्वविद्यालय प्रशासन ने 67 फ़ीसदी उपस्थिति को अनिवार्य बना दिया। शिक्षण संस्थानों में बड़े पदों पर बैठे संघ के इन चाटुकारों ने उच्च शिक्षा के पूरे तंत्र को बर्बाद करने में कोई कसर नहीं छोड़ी है। हाल में ही लागू हुई ‘नयी शिक्षा नीति’ के बाद एमफिल को ख़त्म कर दिया गया, जिससे आने वाली पीढ़ी के लिए पीएचडी का शोध काफ़ी प्रभावित हुआ है। एमफिल में छात्र विस्तार में शोध के तमाम आयामों को सीख पाते थे, लेकिन अब उसे भी ख़त्म कर दिया गया। आलम यह है कि अब फ़ोर ईयर अण्डर ग्रेजुएट प्रोग्राम (एफ़वाईयूपी) के तहत आप चार साल के स्नातक के बाद सीधा पीएचडी में भी दाख़िला ले सकते हैं। उच्च शिक्षा के छात्रों के साथ इससे भद्दा मज़ाक और कुछ नहीं हो सकता है।
देशभर के तमाम संस्थानों में इस फ़ासीवादी हस्तक्षेप की वजह से जनवादी स्पेस सिकुड़ता जा रहा है। बात-बात पर एफ़आईआर दर्ज़ कराने, निलम्बन करने जैसी बातें आम हो गयी हैं। कैम्पस के भीतर पुलिस की मौजूदगी को सामान्य बना दिया गया है। ये पुलिस छात्रों के ऊपर लगातार निगरानी रखने के लिए मौजूद रहती है। अगर कहीं भी छात्र अपनी जनवादी माँगों को लेकर प्रतिरोध करने पहुँचते हैं, तो पुलिस उनसे अधिक संख्या में पहुँच जाती है और उन्हें पीटने से लेकर डिटेन करने में कोई कसर नहीं छोड़ती। पिछले वर्ष दिल्ली विश्वविद्यालय की एक छात्रा को वॉल ऑफ़ डेमोक्रेसी पर महज़ ‘स्क्रैप एनटीए’ लिखने पर विश्वविद्यालय प्रशासन ने निष्कासित कर दिया। इतना ही नहीं उस छात्रा के खिलाफ़ दिल्ली पुलिस ने एफ़आईआर तक दर्ज़ कर दी। जामिया मिलिया इस्लामिया में कैम्पस जनवाद के लिए प्रतिरोध कर रहे छात्रों और छात्राओं को आधी रात में दिल्ली पुलिस कैम्पस के भीतर से आकर हिरासत में ले लेती है। इतना ही नहीं, एक तरफ़ तो इन छात्रों पर एफ़आईआर दर्ज़ किया जाता है, वहीं दूसरी तरफ़ उन्हें निलम्बित कर दिया जाता है। एचसीयू में पिछले दिनों छात्र कैम्पस के भीतर मौजूद जंगल की तबाही के खिलाफ़ विरोध कर रहे थे तब पुलिस द्वारा उन्हें बुरी तरीक़े से पीटा गया। अब यह बात दीगर है कि कैम्पस में खुलेआम एबीवीपी की गुण्डागर्दी और छेड़खानी के वक्त पुलिस दूर-दूर तक कहीं नज़र नहीं आती, लेकिन छात्रों के वाज़िब मुद्दों पर होने वाले विरोध प्रदर्शनों को कुचलने के लिए पुलिस एक मिनट भी नहीं सोचती। एक तरफ़ विश्वविद्यालय प्रशासन अपने फ़ासीवादी एजेण्डे को लागू करने के लिए कैम्पस के भीतर प्रगतिशील आवाज़ों का गला घोंट रहा है, वहीं दूसरी तरफ़ संघ का बगलबच्चा संगठन एबीवीपी इस प्रकार के तमाम प्रगतिशील और जनवादी छात्रों, शिक्षकों, आयोजनों पर हमले कर रहा है। इस दौरान विश्ववद्यालय परिसर के भीतर छात्राओं के साथ छेड़खानी की घटनाओं में भी इज़ाफ़ा हुआ है। मानव संसाधन विकास मंत्रालय के अनुसार 2014 में मोदी सरकार के सत्ता में आने के तीन साल के भीतर ही कैम्पस में छेड़खानी की घटनाओं में 50 प्रतिशत का इज़ाफ़ा हो गया। और ये तो वे आँकड़े हैं जो कि दर्ज़ हुए हैं, छेड़खानी के ढेरों मामले तो दर्ज़ भी नहीं होते। ग़ौरतलब है कि ज़्यादातर मामलों में छेड़खानी करने वाले लोगों में एबीवीपी और संघ के लोगों की ही भागीदारी होती है। हाल में ही ऐसे कई मामले सामने आये हैं जिसमें कैम्पस के भीतर एबीवीपी और संघ के गुण्डों ने छात्रों के साथ छेड़खानी से लेकर बलात्कार जैसे जघन्य अपराधों को अंजाम दिया है। चाहे वह बीएचयू में छात्रा के साथ बन्दूक की नोंक पर बलात्कार की घटना हो या फिर दिल्ली विश्वविद्यालय में आईपी और मिराण्डा हाउस कॉलेज के फ़ेस्ट में घुसकर छेड़खानी की घटनाएँ हों, हर जगह संघ की इन गुण्डावाहिनियों को छेड़खानी और बलात्कार करने के लिए खुला हाथ दे दिया गया है। शिक्षा पर फ़ासीवादियों द्वारा किये जाने वाले ये हमले पहली बार नहीं हो रहे हैं। इससे पहले जब और जहाँ भी फ़ासीवाद ने अपनी जड़ें जमायी हैं, उनका सबसे प्रमुख हमला शिक्षा और शैक्षणिक संस्थानों पर होता है क्योंकि दुनिया के स्तर पर जब-जब अन्याय और ज़ुल्म ने अपना आधिपत्य स्थापित करने की कोशिश की है, तब-तब शैक्षणिक संस्थाओं के भीतर से उठने वाले प्रतिरोध का उनका सामना होता है। इसलिए आज मोदी सरकार और संघ ने इस गूँज से बचने के लिए शिक्षा तंत्र पर चौतरफ़ा हमला बोल दिया है। लेकिन इतिहास इस बात का गवाह है कि ज़ुल्म और अन्याय के हमलों के तेज़ होने से कभी भी प्रतिरोध के स्वर दबे नहीं हैं। हमारे देश के हालिया छात्र-आन्दोलनों ने इस बात को पुष्ट कर दिया है। लेकिन इस वक्त तमाम मसलों को लेकर छात्रों के जो भी प्रतिरोध खड़े हुए हैं, वे ज़्यादातर स्वतःस्फूर्त तरीक़े से हुए हैं। हम इन आन्दोलनों को इनकी स्वतःस्फूर्तता पर नहीं छोड़ सकते। अगर एक संगठित फ़ासीवादी ताक़त से लड़ना है, तो हमें भी ख़ुद को संगठित करना होगा। आज हमें न केवल शिक्षा तंत्र को बचाने के लिए, बल्कि छात्रों-युवाओं के अधिकारों पर फ़ासीवादी निज़ाम द्वारा किये जाने वाले हमलों के ख़िलाफ़ एक संगठित जुझारू छात्र आन्दोलन खड़ा करने की ज़रूरत है, तभी हम इस फ़ासीवादी निज़ाम और इसके द्वारा छात्रों-युवाओं पर किये जाने वाले हमलों का जवाब दे सकते हैं। •

मुक्तिकामी छात्रों-युवाओं का आह्वान, जुलाई-अगस्त 2025

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