“अमृतकाल” में उच्च शिक्षा

अमित

पिछले दो बार से देश के केन्द्रीय विश्वविद्यालयों सहित विभिन्न विश्वविद्यालयों में स्नातक में प्रवेश के लिए एनटीए की तरफ़ से सीयूईटी (यूजी) की परीक्षाएँ करायी जा रही हैं। इस बार की परीक्षा के बाद जगदेश कुमार मोमडिला ने ट्वीट करके परीक्षा सम्बन्धी आँकड़े जारी किये। इनसे पता चला कि प्रवेश परीक्षा का फॉर्म भरने वाले कुल छात्रों में से लगभग एक-चौथाई छात्रों ने परीक्षा नहीं दी। इनमें भी बड़ी संख्या अनुसूचित जाति/जनजाति से आने वाले छात्रों की थी जिनमें से लगभग आधे छात्रों ने और अनुसूचित जाति के एक-चौथाई छात्रों ने अपनी परीक्षाएँ छोड़ दीं। ये आँकड़े मीडिया में चर्चा का विषय नहीं बने।
वास्तव में यह कहानी कोई नयी नहीं है। देश में उच्च शिक्षा में सकल नामांकन अनुपात (जीईआर) लगभग 25% के आसपास है। अर्थात् जो छात्र उच्च-शिक्षा में प्रवेश की उम्र के हैं, उनमें भी केवल एक-चौथाई ही उच्च शिक्षा में प्रवेश ले पाते हैं। इन आँकड़ों की गणना में भी सरकार वैश्विक मानकों के विपरीत दूरस्थ शिक्षा, डिप्लोमा पाठ्यक्रमों आदि में प्रवेश लेने वालों को भी जोड़ लेती है। यदि सही मायने में उच्च शिक्षा में प्रवेश की स्थिति को देखें तो सच्चाई इन आँकड़ों के आसपास भी नहीं नज़र आयेगी। इतना ही नहीं, उच्च शिक्षा में प्रवेश लेने वाले इन छात्रों में एक बड़ी संख्या ऐसे छात्रों की है, जो पढ़ाई पूरी नहीं कर पाती है बल्कि बीच में ही छोड़ देती है। लेकिन मोदी सरकार ने नयी शिक्षा नीति में इन आँकड़ों के साथ बाज़ीगरी करके तस्वीर को छिपाने का पूरा इन्तज़ाम कर लिया है। ग़ौरतलब है कि नयी शिक्षा नीति में ऐसे प्रावधान किये गये हैं जो उच्च शिक्षा से ड्रापआउट छात्रों को ड्रापआउट मानने की बजाय उन्हें डिग्री/डिप्लोमा/सर्टिफिकेट कोर्स धारक मान लेंगे। ज़ाहिर है कि ऐसी स्थिति में असली तस्वीर देखने के लिए हमें आँकड़ों से अधिक गहराई में उतरना पड़ेगा। ग़ौरतलब है कि देश की आज़ादी के समय देश में 20 विश्वविद्यालय और 500 कॉलेज थे, और आज यह संख्या बढ़कर 900 विश्वविद्यालय और लगभग 40,000 कॉलेज तक पहुँच गयी है। लेकिन इसके बावजूद देश के तीन-चौथाई युवा शिक्षा हासिल करने से वंचित है।
पूरे देश में स्थिति यह है कि उच्च शिक्षा में प्रवेश के दरवाज़े आम छात्रों-युवाओं के लिए बन्द होते जा रहे हैं। मोदी सरकार की नयी शिक्षा नीति के लागू होने के बाद यह प्रक्रिया और तेज़ हो गयी है। नयी शिक्षा नीति के ज़रिये यह प्रावधान किया गया है कि अब विश्वविद्यालयों को मिलने वाली सब्सिडी को समाप्त कर दिया जायेगा, और इसके जगह उन्हें हेफा (हायर एजुकेशन फाइनेंसियल एजेंसी) से क़र्ज़ लेना होगा। पहले चरण में विश्वविद्यालयों को अपने बजट के 30 फ़ीसदी का इन्तज़ाम ख़ुद से करने को कहा गया जिसका परिणाम यह हुआ कि पिछले एक-दो सत्रों में ही बनारस, इलाहाबाद, गोरखपुर, दिल्ली, पटना समेत देश के विभिन्न विश्वविद्यालयों में फ़ीस बढ़ायी जा चुकी है। नतीज़तन बहुत से आम घरों से आने वाले छात्रों के लिए यहाँ प्रवेश लेना कठिन हो गया है। इतना ही नहीं, गोरखपुर विश्वविद्यालय ने इसी सत्र में कई पाठ्यक्रमों में लगभग 25% सीटों पर दाखिला ही नहीं कराया, अर्थात इन सीटों को ही समाप्त कर दिया गया। फ़ीस में वृद्धि और सीटों में कटौती को लेकर चलने वाले आन्दोलनों का बर्बर दमन एक आम बात हो चुकी है। छात्रों-युवाओं के अधिकारों को लेकर संघर्ष करने वाले छात्रसंघ ज़्यादातर जगहों पर समाप्त हो चुके हैं। जहाँ हैं भी, वहाँ चुनावबाज़ पार्टियों के लिए एमपी-एमएलए का ट्रेनिंग सेण्टर बने हुए हैं, जिनसे छात्रों के इन सवालों पर किसी संघर्ष की उम्मीद नहीं की जा सकती।
जो छात्र विश्वविद्यालयों में किसी तरह प्रवेश ले भी पा रहे हैं, उन्हें शिक्षकों की संख्या में भयंकर कमी, इन्फ्रास्ट्रक्चर की बदहाली से लेकर तरह-तरह की समस्याओं से जूझना पड़ता है। देश के विश्वविद्यालयों में औसतन दो-तिहाई शिक्षकों के पद ख़ाली पड़े हैं। बीएचयू, इलाहाबाद, डीयू जैसे केन्द्रीय विश्वविद्यालयों तक में हॉस्टल गिने-चुने छात्रों को ही मिल पाता है। बहुत से छात्रों के लिए बाहर रहकर कमरे के किराये आदि का ख़र्च उठा पाना ही मुश्किल हो जाता है, ऐसी स्थिति में आये दिन बहुत से छात्रों के विश्वविद्यालयों की प्रवेश परीक्षा क्वालीफाई करने के बाद भी वहाँ रह पाना सम्भव नहीं होता है।
छात्रों की जो संख्या इन समस्याओं के चक्रव्यूह से जूझते हुए किसी तरह से उच्च शिक्षा के दरवाज़ों तक पहुँच पा रही है, उनमें भी एससी/एसटी श्रेणी से आने वाले छात्रों की संख्या और भी कम है। एआईएसएचई के अनुसार भारत में उच्च शिक्षा में दाखिला लेने वाले छात्रों में 5 प्रतिशत एसटी और 14.2 प्रतिशत एससी समुदाय से थे। पीएचडी पाठ्यक्रमों तक आते-आते यह संख्या क्रमशः 2.1 प्रतिशत और 9 प्रतिशत पहुँच जाती है। 2019 में तत्कालीन शिक्षा मन्त्री रमेश पोखरियाल ने राज्यसभा में बताया कि आईआईटी और आईआईएम संस्थानों से ड्रापआउट छात्रों में 48 प्रतिशत और 62.6 प्रतिशत संख्या एससी/एसटी/ओबीसी श्रेणी से आने वाले छात्रों की है।
दूसरी तरफ़ उच्च शिक्षा में बड़े पैमाने पर खुले निजी, स्ववित्तपोषित कॉलेजों की बाढ़ आयी हुई है। 2015 में देश में ऐसे निजी या स्व-वित्तपोषित विश्वविद्यालयों की संख्या 215 थी, जो 2022 में बढ़कर 431 पहुँच चुकी है। इनमें बड़ी संख्या उनकी है, जो पैसे लेकर डिग्री बाँटने का काम करते हैं। जिनमें थोड़ी-बहुत पढ़ाई होती है, उनकी फ़ीस लाखों में हैं। ओपी ज़िन्दल विश्वविद्यालय में बीए करने के लिए एक साल की फ़ीस क़रीब 3 लाख रुपये है। एमिटी यूनिवर्सिटी में यह 3 साल में लगभग 2 लाख रुपये पहुँचती है।
वास्तव में मौजूदा दौर में जब पूँजीवाद एक भयंकर ढाँचागत संकट का शिकार है। इस संकट से निजात पाने के लिए बदहवासी में पूँजीपति वर्ग हर क्षेत्र को मुनाफ़ा कमाने के अड्डे में तब्दील कर देना चाहता है। इसी संकट की बुनियाद पर सरकारी शिक्षा तन्त्र की बर्बादी हो रही है और प्राइवेट तन्त्र को फलने-फूलने का मौका दिया जा रहा है। इसी का नतीजा है कि छात्रों की बहुत बड़ी आबादी उच्च शिक्षा से वंचित हो रही है और जिस उम्र में उन्हें विश्वविद्यालयों में होना चाहिए, उस उम्र में वो दिल्ली-मुम्बई समेत देश के औद्योगिक इलाक़ों में अपनी हड्डी गलाकर पूँजीपतियों के लिये सोने के सिक्के ढाल रही है। देश के तीन-चौथाई से भी अधिक युवा आबादी के लिए अमृतकाल का यही मतलब है।
ऐसे में हमें यह समझना चाहिए कि सबके लिए समान और निःशुल्क शिक्षा हासिल करने के लिए जुझारू संघर्ष संगठित करने के लिए विश्वविद्यालय कैम्पसों के अन्दर मौजूद छात्रों के साथ ही, कैम्पस के बाहर मौजूद छात्रों-युवाओं की बड़ी संख्या को भी लामबन्द करना होगा। अर्थात कैम्पस की चौहद्दियों के बाहर के दायरों को भी समेटता हुआ एक व्यापक छात्र-युवा आन्दोलन ही इस सबकी शिक्षा तक पहुँच सुनिश्चित कर सकता है।

मुक्तिकामी छात्रों-युवाओं का आह्वान, सितम्बर-अक्टूबर 2023

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