आर्टीफ़िशियल इण्टेलिजेंस और आटोमेशन के दौर में भारत के उद्योगपतियों का 90 घण्टे काम करवाने का सपना
लगातार बयान देकर लोगों को एहसास कराया जा रहा है कि देश की तरक़्क़ी इसलिये नहीं हो रही क्योंकि मज़दूर कम काम करते हैं। लेकिन सच्चाई इससे बिल्कुल उलट है। गुड़गाँव में काम करने वाले मज़दूरों की हालत की सर्वे रिपोर्ट देखें तो इन इलाक़ों में रहने वाले मज़दूर आटोमोबाइल और टेक्सटाइल जैसे कई क्षेत्रों में ठेके पर, बिना किसी स्थायी नौकरी के, बिना सामाजिक सुरक्षा के सप्ताह के सातों दिन 14 से 18 घण्टे काम करते हैं, जिसके बदले में उन्हे 10 से 18 हज़ार मज़दूरी मिलती है। यह मेहनतकश, जो उत्पादन की नींव हैं, वे 14-18 घण्टे काम करने के बाद 6 से 10 घण्टे के लिये 10X10 फ़ीट के कमरे में आराम करने के लिये आते हैं, ताकि अगले दिन फिर 18 घण्टे के काम पर जा सकें।







