‘चना जोर गरम’ और चमकोवाद की अवसरवादी और सस्‍ती लोकरंजकतावादी राजनीति से छात्रों-युवाओं को सावधान रहना होगा

चार्वाक

 

बीते दिनों हुए ऐतिहासिक छात्र-युवा आन्‍दोलन ने देश के छात्रों-युवाओं ही नहीं बल्कि आम जनता को बहुत-कुछ सिखाया। इसने एक ओर फ़ासीवादी मोदी-शाह सरकार के ग़ुरूर को तोड़ दिया, मोदी की अरबों-खरबों रुपये ख़र्च कर योजनाबद्ध रूप से निर्मित ‘महामहिम छवि’ और उसके आभा-मण्‍डल को ज़मींदोज़ कर दिया और साथ ही व्‍यापक आम जनता के बीच मौजूद भय को दूर कर दिया। इसने सत्‍ता को चुनौती देना, उस पर प्रश्‍न खड़ा करना, किसी को भी देवतुल्‍य मानने से इंकार करने की भावना लोगों को सिखायी। इससे मिलने वाले इन सबकों के अलावा, इस आन्‍दोलन ने एक विशेष सीख भी दी : छद्म वाम की अवसरवादी, लोकरंजकतावादी, चमकोवाद और श्रेयखोरी की राजनीति से सावधान रहने की सीख। हालिया छात्र-युवा आन्‍दोलन के दौरान और उसके बाद के दौर में इस छद्म वाम अवसरवाद और लोकरंजकतावाद की अगुवाई हमेशा की तरह मुख्‍य तौर पर सीपीआई (एमएल) लिबरेशन और उसका छात्र संगठन आइसा करते रहे हैं। इस लेख में हम इस राजनीति के कुछ प्रातिनिधिक लक्षणों और चारित्रिक अभिलाक्षणिकताओं की पड़ताल करेंगे और देखेंगे कि वह छात्र-युवा आन्‍दोलन को किस तरीक़े से नुक़सान पहुँचाती है।

जब जन्‍तर-मन्‍तर पर सीजेपी के आह्वान पर छात्रों-युवाओं का आन्‍दोलन शुरू हुआ, तो तमाम छात्र संगठन उसमें शामिल हुए। सीजेपी के नेतृत्‍व ने शुरू से ही परीक्षा घपले पर होने वाले इस आन्‍दोलन के पूरे चार्टर को वन-प्‍वाइण्‍ट चार्टर बना दिया था, यानी शिक्षा मन्‍त्री धर्मेन्‍द्र प्रधान का इस्‍तीफ़ा। इस पर चन्‍देक छात्र संगठनों ने शुरू से बात की, सीजेपी के नेतृत्‍व से भी चर्चा की और छात्रों के बीच भी प्रचार किया कि मसला महज़ प्रधान का इस्‍तीफ़ा नहीं है। प्रधान का इस्‍तीफ़ा हो भी जाये, तो यह सम्‍भव है कि उससे भी भयंकर कोई संघी शिक्षा मन्‍त्री के पद पर आकर बैठ जाये। इससे उन कारणों का निवारण नहीं होगा, जिनकी वजह से परीक्षा घपला पिछले 12 वर्षों से जारी है। इन कारणों में भी सबसे मूलभूत कारण है समूची प्रक्रिया और तन्‍त्र का ही निजीकरण, आउटसोर्सिंग, ठेकाकरण जो कि मोदी सरकारी की नवउदारवादी शिक्षा व रोज़गार नीति के ही संघटक तत्‍व हैं। जब तक इस निजीकरण व आउटसोर्सिंग के पूरे तन्‍त्र को हटाया नहीं जायेगा, जिसकी नुमाइन्‍दगी एनटीए कर रहा है, तब तक महज़ एक मन्‍त्री के इस्‍तीफ़े से कोई बदलाव नहीं आने वाला। ये सारी आशंकाएँ सही साबित हुईं। प्रधान की जगह उससे भी ज्‍़यादा असुधारणीय संघी प्रलहाद जोशी आ गया, जिसने बिलकिस बानो मामले के बलात्‍कारियों व हत्‍यारों की रिहाई का समर्थन किया था। और साथ ही प्रधान के इस्‍तीफ़े के बाद भी पेपर लीक्‍स व परीक्षा घपला ज्‍यों का त्‍यों जारी है।

वास्‍तव में, कोई भी ऐसा छात्र संगठन जो अपने आपको वाम या क्रान्तिकारी कहता है, उसे पुरज़ोर तरीक़े से सीजेपी-नीत आन्‍दोलन के दौरान यह बात उठानी चाहिए थी। इस मामले में ‘आइसा’ विशेष तौर पर विशेषाधिकार-सम्‍पन्‍न स्थिति में था, क्‍योंकि आन्‍दोलन के मंच पर किसी भी तरह से जगह बनाने के वन-प्‍वाइण्‍ट कार्यक्रम के ज़रिये उसने ठेलम-ठेली, धक्‍कम-धुक्‍की करके शुरुआती दिनों में सीजेपी के मंच पर एक कोना बना लिया था। लेकिन उसके द्वारा वहाँ से कोई ढाँचागत मसला उठाने के बजाय, लगातार नाटकीय जुमलेबाज़‍ियाँ, नाटक-नौटंकियाँ और ‘लाइम-लाइट हॉगिंग’ की राजनीति की जा रही थीं। जब सीजेपी के नेतृत्‍व ने भाजपा सरकार के मन्त्रियों के कहने पर ही भाजपा-विरोधी और मोदी-विरोधी नारों की मनाही कर दी और कहा कि प्रधान के इस्‍तीफ़े के नारे, ‘भारत माता की जय’, ‘जय भीम’ और ‘इंक़लाब ज़‍िन्‍दाबाद’ के अलावा और कोई नारा नहीं लगाया जायेगा तो इस पर भी आइसा और उसके नेतृत्‍व ने कोई प्रश्‍न नहीं उठाया। उल्‍टे आन्‍दोलन की शुरुआत से ही आइसा ‘वन्‍दे मातरम’ गीत और ‘भारत माता की जय’ के नारों पर सुर से सुर मिला रहा था! सारा ज़ोर इस बात पर था कि किसी भी क़ीमत पर लाइमलाइट हासिल होनी चाहिए, चाहे उसके लिए किसी भी उसूल की तिलांजलि देनी पड़े।

जब सोनम वांगचुक ने भूख हड़ताल की शुरुआत की तो आइसा की नेहा बोरा के साथ कुछ अन्‍य आइसा सदस्‍यों ने भी भूख हड़ताल शुरू की। लेकिन लोकरंजकतावाद के मियान में दो तलवारें कैसे रह सकती थीं? इतिहास गवाह है कि दो लोकरंजकतावादियों का राजनीतिक प्रणय-सम्‍बन्‍ध कभी लम्‍बा नहीं चलता, क्‍योंकि एक ही तो दिल (जनता की लोकरंजक छवि) है, कितने लोग जीतेंगे? तो हुआ यह कि आइसा व नेहा बोरा को सीजेपी नेतृत्‍व ने अपने मंच से ‘बाइज्‍़ज़त’ किनारे कर दिया। नतीजतन, आइसा को अपना तम्‍बू-कनात अलग लगाना पड़ा! बहरहाल, 23 दिनों की भूख हड़ताल के बाद यह प्रतीत होने लगा था कि भूख हड़ताल के आधार पर अधिक लाइम-लाइट तो वांगचुक और उसके ज़रिये उसके सीजेपी के चेलों को ही मिल रही है और आइसा द्वारा, लोकरंजकतावाद का कोई लाभ प्राप्‍त किये बिना, 7-8 नौजवानों को भूख हड़ताल पर बिठाकर रखा गया है, तो लिबरेशन नेतृत्‍व ने ग्रैण्‍ड-गाला अन्‍दाज़ में नेहा बोरा की भूख हड़ताल शबाना आज़मी और इसी प्रकार की अन्‍य लिबरल हस्तियों से तुड़वा दी। वांगचुक की हड़ताल 26 दिनों बाद टूटी। इसके बाद शुरू हुआ इस भूख हड़तालों को पॉप्‍युलिस्‍ट तरीक़े से भुनाने की होड़ का सिलसिला।

इसी बीच, 20 जुलाई को दिल्‍ली पुलिस द्वारा गृहमन्‍त्री अमित शाह की शह पर संसद मार्च के दौरान छात्रों-युवाओं का बर्बर दमन किया गया। इसमें पेलेट गंस, शॉक बेटन और कील लगी लाठियों तक का इस्‍तेमाल किया गया। यह छात्रों-युवाओं को डराकर, आतंकित करके आन्‍दोलन को तोड़ने का मोदी-शाह सरकार का एक हताश प्रयास था, क्‍योंकि फ़ासीवादी जब सत्‍ता में होते हैं तो अक्‍सर अति-आत्‍मविश्‍वास से ग्रस्‍त हो जाते हैं। नतीजा यह हुआ कि इस पुलिसिया दमन से यह आन्‍दोलन कमज़ोर पड़ने के बजाय और भड़क गया। देश में रोष की लहर दौड़ गयी। भाजपा के वोटरों का बड़ा हिस्‍सा भी भाजपा के ख़‍िलाफ़ जाने लगा। दूसरी ओर, आन्‍दोलन स्‍वत:स्‍फूर्त तरीक़े से, सीजेपी नेतृत्‍व की इच्‍छा के विपरीत, प्रधान के इस्‍तीफ़े के मुद्दे से बहुत आगे जा चुका था। अब वह आम तौर पर फ़ासीवादी भाजपा सरकार पर प्रश्‍न खड़े कर रहा था, उसकी शिक्षा नीति को और उसके रोज़गार-विहीन “विकास” को, उसकी अडाणी-अम्‍बानी परस्‍ती और पूँजीपरस्‍ती को, उसके घपलों-घोटालों को, पुलिस से लेकर मीडिया तक में संघ परिवार की आन्‍तरिक पकड़ को मुद्दा बना रहा था। सबसे अहम बात यह थी कि अब नरेन्‍द्र मोदी और अमित शाह सीधे निशाने पर थे। मोदी की ‘फ़्यूहरर-कल्‍ट’ की छवि कुछ ही दिनों के विरोध-प्रदर्शन में युवाओं ने इस क़दर ध्‍वस्‍त कर दी थी कि आज तक भी उसकी मरम्‍मत करने के सारे फ़ासीवादी प्रयास बेकार साबित हुए हैं।

इस बात से मोदी-शाह जोड़ी तो परेशान थी ही, लेकिन बिल्‍कुल अलग कारणों से आन्‍दोलन के तेज़ी से बढ़ते जुझारू चरित्र को लेकर सीजेपी का सेण्ट्रिस्‍ट लोकरंजकतावादी, सुधारवादी, क़ानूनवादी और संविधानवादी नेतृत्‍व भी असहज और असुविधाजनक महसूस कर रहा था। सवाल सीजेपी नेतृत्‍व के इरादे का नहीं बल्कि उनके टुटपुँजिया सुधारवादी व सेण्ट्रिस्‍ट लोकरंजकतावादी राजनीति के वर्ग चरित्र का है, जिसका मक़सद ही हमेशा पूँजीवादी व्‍यवस्‍था के दायरे के भीतर कुछ पैबन्‍दसाज़ी, कुछ सुधार हासिल करने से ज्‍़यादा नहीं होता। लेकिन सीजेपी की इस राजनीति के सीमान्‍तों का यह छात्र-युवा आन्‍दोलन अब अतिक्रमण कर रहा था और इसीलिए बार-बार दिपके, रांका और सौरभ दास को इसे विनियमित करने और नियन्त्रित करने का प्रयास करना पड़ रहा था। आन्‍दोलन कहीं न कहीं अब दिपके और सीजेपी के सिर पर काँटों का ताज बनता जा रहा था क्‍योंकि उसमें मौजूद क्रान्तिकारी सम्‍भावनासम्‍पन्‍नता अपने आपको विविध स्‍वत:स्‍फूर्त रूपों में अभिव्‍यक्‍त कर रही थी और सीजेपी की राजनीति के सीमान्‍तों का अतिक्रमण कर चुकी थी।

20 जुलाई को जेपी नड्डा और जितेन्‍द्र सिंह के सरकारी प्रतिनिधि-मण्‍डल से सीजेपी के रांका और दास मिले। इस मुलाक़ात के दौरान ही उन्‍हें नड्डा के घर पर ही हाउस-अरेस्‍ट कर लिया गया ताकि वे 20 जुलाई के संसद मार्च में शामिल न हो पाएँ। दूसरी ओर, 20 जुलाई के मार्च पर शाह की पुलिस ने बर्बर दमन का हर हथकण्‍डा अपनाया। इस हाउस-अरेस्‍ट से छूटने के बाद दास और रांका ने कहा कि जेपी नड्डा ‘फ्रॉड’ हैं और उनकी किसी बात पर भरोसा नहीं किया जा सकता है। लेकिन 25 जुलाई को यही जेपी नड्डा और जितेन्‍द्र सिंह अचानक भरोसे के क़ाबिल हो गये! 25 जुलाई को प्रधान ने इस्‍तीफ़ा दिया था। उसके बाद सीजेपी ने कहा था कि अब उनकी यह भी माँग है कि 20 जुलाई को छात्रों पर की गयी सारी एफ़आईआर वापस ली जाएँ। लेकिन उसी नड्डा और सिंह के मौखिक आश्‍वासन मात्र पर सौरभ दास और आशुतोष रांका ने बिना शर्त तत्‍काल प्रभाव से आन्‍दोलन वापस लेने और जन्‍तर-मन्‍तर ख़ाली करने की माँग को “गुड फ़ेथ” में मान लिया, जिन्‍हें 5 दिनों पहले ही दास और रांका ने ‘फ्रॉड’ और भरोसे के नाक़ाबिल बताया था! इन 5 दिनों में ऐसा क्‍या बदला था? कुछ भी नहीं! प्रतीत ऐसा होता है कि सीजेपी नेतृत्‍व ने ‘जान बची सो लाखों पाए’ कहते हुए आन्‍दोलन की ‘जीत’ और समापन की घोषणा कर दी! क्‍या आज तक एफ़आईआर वापस हुईं? वास्‍तव में, नहीं हालाँकि दिखावे के लिए सर्वोच्‍च न्‍यायालय का एक आदेश आ गया है जो चोर दरवाज़े से दिल्‍ली पुलिस को यह मौक़ा देता है कि आपराधिक पृष्‍ठभूमि के नाम पर आन्‍दोलनरत छात्रों व ऐक्टिविस्‍टों पर एफआईआर कर उन्‍हें प्रताड़‍ित करे। इस पर भी सौरभ दास और आशुतोष रांका कई बार “विजय” का ऐलान कर चुके हैं। क्‍या दोषी पुलिसकर्मियों पर कोई कार्रवाई हुई? नहीं। क्‍या अभी तक आत्‍महत्‍या करने वाले छात्रों को कोई मुआवज़ा मिला? नहीं। बस प्रधान का इस्‍तीफ़ा हुआ। केवल इतने पर ही सीजेपी ने आन्‍दोलन को तत्‍काल वापस ले लिया, बल्कि यह कहें कि उन्‍हें आन्‍दोलन वापस लेने का मौक़ा मिल गया क्‍योंकि अब आन्‍दोलन उनकी नियन्‍त्रण से आगे जाकर समूचे फ़ासीवादी निज़ाम पर सवाल उठाने की ओर बढ़ रहा था, हालाँकि ये सवाल अभी बिखरे-बिखरे थे, अपरिष्‍कृत थे।

अगर अपने आपको वाम बताने वाले आइसा व एसएफआई जैसे छात्र संगठन आन्‍दोलन में बुनियादी ढाँचागत मुद्दों का व्‍यवस्थित तौर पर प्रचार करते, सीजेपी नेतृत्‍व की समझौतापरस्‍ती और उसकी राजनीति के चरित्र की खुली दोस्‍ताना और जनवादी आलोचना पेश करते रहते, आन्‍दोलन के भीतर जनवादी तौर-तरीक़ों के पालन के लिए संघर्ष करते रहते, छात्रों को इस प्रकार आन्‍दोलन के वापस लिये जाने की सम्‍भावना के प्रति आगाह करते रहते, तो छात्रों-युवाओं के जनसमुदाय में यह चेतना पैदा हो सकती थी कि इस प्रकार 25 जुलाई को महज़ एक प्रतीकात्‍मक जीत के आधार पर आन्‍दोलन वापस लेने की सीजेपी नेतृत्‍व की पहल का वे विरोध करते और उसे बाध्‍य कर देते कि जब तक अन्‍य बुनियादी माँगें पूर्ण नहीं होतीं, तब तक जन्‍तर-मन्‍तर को नहीं छोड़ा जायेगा। यह निश्चित ही सम्‍भव था क्‍योंकि 25 जुलाई को समझौते की घोषणा के बाद भी छात्र-युवा अपने से जन्‍तर-मन्‍तर छोड़ने की मानसिकता में कतई नहीं थे, क्‍योंकि अभी कोई भी बुनियादी माँग पूरी नहीं हुई थी।

लेकिन वास्‍तव में आइसा और एसएफआई खु़द ही ‘जीत’ का ऐलान करने लगे और जश्‍न में डूब गये, ठीक उसी प्रकार जैसे सीजेपी ‘जीत’ का ऐलान कर जश्‍न में डूब गयी थी। सीजेपी का नेतृत्‍व बैंक्‍वेट हॉल में सेण्ट्रिस्‍ट लोकरंजकतावादी पार्टी कर रहा था! जब सवाल उठा तो बोला कि ‘अंकल लोग नहीं समझेंगे कि जेन ज़ी लड़ता भी है और पार्टी भी करता है!’ सही बात है! पार्टी करने में अपने आपमें तो कोई दिक्‍़क़त नहीं है। लेकिन जब आपके ही आह्वान पर देश भर में सड़कों पर उतरे युवाओं को बिहार से लेकर असम तक मारा-पीटा जा रहा है, जेलों में भरा जा रहा है और आप आन्‍दोलन बिना छात्रों से राय-मशविरे के वापस लेकर, अपरिपक्‍व तरीक़े से जीत का ऐलान करके पार्टी कर रहे हैं, तो सवाल उठना लाज़‍िमी है। जिस प्रकार, सीजेपी का नेतृत्‍व सेण्ट्रिस्‍ट लोकरंजकतावादी नाच-गाने में मशगूल था, उसी प्रकार, आन्‍दोलन की इस महज़ प्रतीकात्‍मक जीत का श्रेय लपकने के लिए छीना-झपटी करने के अंग के तौर पर ही नेहा बोरा भी ‘जीत’ का जश्‍न मनाने के लिए अपने साथियों के साथ “वामपंथी” लोकरंजकतावादी-अवसरवादी नृत्‍य करती बरामद हुईं! और सवाल उठे, तो उन्‍होंने भी जवाब दिया कि ‘जिस क्रान्ति में मैं नाच नहीं सकती, वह मेरी क्रान्ति नहीं है।’ यह भी सही बात है! नाचने में अपने आप में कोई समस्‍या नहीं है और अक्‍सर नृत्‍य एक प्रगतिशील राजनीतिक कार्रवाई हो सकती है! बस दिक्‍़क़त यह है कि न तो क्रान्ति हुई थी और न ही मौजूदा आन्‍दोलन में कोई बुनियादी व सारभूत विजय प्राप्‍त हुई थी! उल्‍टे 25 जुलाई को आन्‍दोलन वापस लिये जाने से भाजपा को एक जीवन-दान प्राप्‍त हो गया क्‍योंकि मोदी-शाह की हालत छात्रों-युवाओं के ज़बर्दस्‍त आन्‍दोलन की वजह से ख़राब थी। लेकिन सीजेपी नेतृत्‍व पर आन्‍दोलन को ग़ैर-जनवादी तरीक़े से भाजपा के ‘फ्रॉड’ केन्‍द्रीय मन्त्रियों के मौखिक आश्‍वासन मात्र पर वापस लेने पर पर आइसा और उसके नेतृत्‍व ने कोई प्रश्‍न नहीं उठाया। ख़ैर, आन्‍दोलन की इस ‘जीत’ का श्रेय लेने के लिए सीजेपी के लिए भी नाच-गाना करना और उसको वीडियो बनाना ज़रूरी था और आइसा के लिए भी क्‍योंकि दोनों ही लोकरंजकतावाद की राजनीति के लिए दो भिन्‍न संस्‍करणों की नुमाइन्‍दगी करते हैं।

सच्‍चाई यह है कि जन्‍तर-मन्‍तर पर मौजूद युवाओं के भारी हुजूम के बीच इस फ़ैसले को लेकर बहुत से सवाल, आपत्तियाँ और असहमतियाँ थीं और वे अभी जन्‍तर-मन्‍तर नहीं छोड़ना चाहते थे। मुखर स्‍वर में, एक संगठन दिशा छात्र संगठन ने शुरू से ही यह प्रचार किया कि महज़ मौखिक आश्‍वासनों पर आन्‍दोलन को वापस नहीं लिया जाना चाहिए और आन्‍दोलन को महज़ प्रधान के इस्‍तीफ़े की माँग पर सीमित नहीं किया जाना चाहिए बल्कि बुनियादी ढाँचागत माँगों, यानी एनटीए को भंग करने, नेप-2020 वापस लेने, 20 जुलाई की पुलिस बर्बरता के लिए गृहमन्‍त्री अमित शाह के इस्‍तीफ़े और दोषी पुलिसकर्मियों पर कार्रवाई और छात्रों पर की गयी सभी फ़र्जी एफआईआर्स को वापस लिये जाने तक आन्‍दोलन को जारी रखा जाना चाहिए और जन्‍तर-मन्‍तर को तब तक छोड़ा नहीं जाना चाहिए। कुछ अन्‍य प्रगतिशील छात्र संगठन भी थे जो ऐसा मानते तो थे, लेकिन मुखर स्‍वर में यह बात बोल नहीं रहे थे। बहरहाल, सीजेपी के नेतृत्‍व के अथक प्रयासों के बाद युवाओं ने धीरे-धीरे जन्‍तर-मन्‍तर ख़ाली कर दिया और भाजपा की घिरी हुई सरकार को एक जीवनदान मिल गया।

इसके बाद, क्रेडिटखोरी, लाइम-लाइट में आने, कल्‍ट-बिल्डिंग करने, और लिबरलों को प्रिय लोकरंजकतावादी नाटक-नौटंकी का एक प्रहसनात्‍मक चक्र लिबरेशन और आइसा ने जारी किया जो अभी तक जारी है और जिसका छात्र-युवा आन्‍दोलन को कोई फ़ायदा नहीं होने वाला। पहले यह दावा किया गया कि इस आन्‍दोलन की नेता नेहा बोरा थीं। फिर यह दावा किया गया कि नेहा बोरा के पटना जाने के कारण गिरफ़्तार छात्रों को छोड़ा गया। ज़ाहिर है, ये बेतुके दावे थे जिसका छात्रों के बीच से ही विरोध हुआ। इसके बाद नेहा बोरा का देश भर में हवाई दौरा शुरू करवाया गया। इन उपक्रमों को आयोजित करने के पीछे निगाह में कहीं न कहीं कई विश्‍वविद्यालय छात्र संघों के आने वाले चुनाव भी थे। इसके अलावा, 2027 का उत्‍तर प्रदेश विधानसभा चुनाव और 2029 के आम चुनाव तो निगाह में हैं ही। कुल मिलाकर, इस सारी लोकरंजकतावादी राजनीति की निगाह में ये ही चुनावबाज़ लक्ष्‍य हैं, न कि क्रान्तिकारी छात्र-युवा आन्‍दोलन को निर्मित करने का लक्ष्‍य। इनका छात्र-युवा आन्‍दोलन के हितों से कोई लेना-देना नहीं है। झारखण्‍ड में पेपर लीक्‍स के विरुद्ध हुए आन्‍दोलन को भी भुनाने की आइसा ने पूरी कोशिश की, लेकिन वहाँ घुसने के सारे उपक्रम बेकार हो गये क्‍योंकि आम आन्‍दोलनरत छात्रों ने ही ऐसे प्रयासों को असफल कर दिया। जो मीडिया कवरेज मिली वह सिर्फ़ एक संघी तत्‍व द्वारा नेहा बोरा पर स्‍याही फेंके जाने की वजह से मिली। कुछ जगहों पर नाम चमकाने के आइसा के ऐसे अवसरवादी लोकरंजकतावादी प्रयासों के जवाब में आन्‍दोलनरत छात्रों-युवाओं ने ही आइसा को अपने मंच पर चढ़ने नहीं दिया या मंच से उतार दिया, क्‍योंकि छात्रों-युवाओं के एक हिस्‍से को उनकी अवसरवादी राजनीति का चरित्र समझ में भी आ रहा है।

इस सारे अवसरवादी और लोकरंजकतावादी प्रपंच की कुछ विशिष्‍टताओं पर नज़र डाली जाये, तो यह प्रतीत होता है कि यह अवसरवादी संसदीय-वाम लोकरंजकतावाद कई मायनों में दक्षिणपंथी लोकरंजकतावाद के विभिन्‍न संस्‍करणों की एक ‘मिरर इमेज’ है। आप ने ग़ौर किया होगा कि जब नरेन्‍द्र मोदी पंजाब जाते हैं तो पगड़ी पहन लेते हैं, जब आदिवासियों के बीच जाते हैं तो उनका चोला ओढ़ लेते हैं, जब पहाड़ जाते हैं जो पहाड़ी टोपी पहनकर पहाड़ी बन जाते हैं और जब दक्षिण जाते हैं तो ‘वड़क्‍कम’ करने लग जाते हैं! इस प्रकार के ‘ऑप्टिक्‍स’ का इस्‍तेमाल करना हर प्रकार लोकरंजकतावाद की एक ख़ासियत होती है और हर प्रकार का लोकरंजकतावाद किसी न किसी रूप में इसका इस्‍तेमाल करता ही है। नतीजतन, दक्षिणपंथी लोकरंजकतावाद की एक औंधी पड़ी छवि लिबरेशन के वाम अवसरवाद व लोकरंजकतावाद में नज़र आती है। लिहाज़ा, जब नेहा बोरा दलितों के बीच जाती हैं तो ‘जय भीम-जय संविधान’ का नीला पटका ओढ़ लेती हैं, जब आदिवासियों के बीच जाती हैं तो आदिवासियों का पटका ओढ़ लेती हैं, जब लिबरलों के बीच जाती हैं तो संविधान की किताब पकड़ लेती हैं और जब “वामपंथियों” के किसी जुटान में जाती हैं, तो लाल कपड़ा ओढ़ लेती हैं, उत्‍तर प्रदेश जाती हैं जो कहती हैं कि ‘यहाँ बाबा का राज नहीं बाबा साहब का राज चलेगा’ और इसी प्रकार के सस्‍ते नाटकीय जुमले और डायलॉगबाज़‍ियाँ करती हैं! मार्क्‍सवादी उसूल इसमें कहीं आड़े नहीं आते क्‍योंकि लिबरेशन वाले शुरू से ऐसे उसूलों को अपने लोकरंजकतावाद के रास्‍ते में बाधा बनने ही नहीं देते! भले ही अम्‍बेडकर की राजनीति एक बुर्जुआ लिबरल व्‍यवहारवादी और सुधारवादी राजनीति हो, जिसके पास दलित मुक्ति का कोई रास्‍ता न हो और जो वस्‍तुगत तौर पर दलित जनसमुदायों को किसी भी आमूलगामी क्रान्तिकारी रास्‍ते पर जाने से रोकने और संविधानवाद, अर्ज़ीवाद, सुधारवाद की अन्‍धी गलियों में घुमाते रहने का काम करती हो; लेकिन अगर किसी जगह दलितों को लुभाने के लिए ज़रूरी है तो ‘जय भीम’ का नीला दुपट्टा ओढ़ लो, ‘बाबा साहब के राज’ के जुमले बकने लगो और जो भी कारगर लगे, वह कर लो! भले ही संविधानवाद और क़ानूनवाद का मार्क्‍सवादी उसूलों से कोई रिश्‍ता न हो, लेकिन जहाँ लिबरलों का मन मोहना हो, वहाँ संविधान की किताब पकड़ लो! यह एक प्रकार रूपवाद होता है, जो लोकरंजकतावादी-अवसरवादी राजनीति का एक अंग होता है। अगर आप नेहा बोरा के ऐसे भाषणों का नज़दीकी से अध्‍ययन करें तो आप पाएँगे कि उसमें राजनीतिक अन्‍तर्वस्‍तु एकदम नगण्‍य होती है, लेकिन नाटकीय जुमलेबाज़‍ियों, डायलॉगबाज़‍ियों, वन-लाइनर्स आदि की भरमार होती है, जिसे विशेष प्रकार की बॉडी-लैंगुएज, भाव-भंगिमा और थियेट्रिकल अन्‍दाज़ में पेश किया जाता है और यह लगभग सभी आइसा नेताओं में एकसमान रूप से पाया जाता है। एक छात्र ने इस लेख के लेखक को आने वाले डूसू चुनावों में आइसा के उम्‍मीदवार की घोषणा होने से पहले ही उसके बारे में बता दिया कि ये ही आइसा की उम्‍मीदवार बनेगी। जब लेखक ने पूछा कि तुम्‍हें कैसे पता, तो उसने कहा कि भाषण देते हुए जब कोई आइसा का नेता कमर पर हाथ रखने लगे, तो समझ जाइये कि अगले छात्रसंघ चुनावों में वही उम्‍मीदवार बनेगा! यह एक आम छात्र की अभिव्‍यक्ति है।

ग़ौरतलब है कि भारत के संविधान के द्वारा दिये गये सीमित नागरिक और जनवादी अधिकारों की हिफ़ाज़त के लिए संघर्ष करने के लिए संविधानवादी होना या संविधान-पूजा आवश्‍यक नहीं है, उल्‍टे हानिकारक है। संविधान के ग़ैर-जनवादी प्रावधानों की आलोचना करने, उसकी कमियों-ख़ामियों को उजागर करने और जनपक्षधर दृष्टिकोण से इस संविधान के औपनिवेश‍िक मूल की आलोचना करने का संविधान द्वारा दिये गये सीमित अधिकारों के लिए संघर्ष करने के साथ कोई अन्‍तरविरोध नहीं है। मसलन, दुनिया के चन्‍देक देशों में ही संविधान प्रिवेण्टिव डिटेंशन का क़ानून बनाने की इजाज़त विधायिका को देता है। उनमें से भारत भी एक है जिसका संविधान धारा 22 (5) के तहत ऐसे क़ानून की आज्ञा देता है। इसी धारा के मातहत भारत में एनएसए, यूएपीए आदि जैसे तमाम काले क़ानून जनता पर थोपे गये हैं। क्‍या कोई क्रान्तिकारी संगठन ऐसी धारा का समर्थन करेगा? जब कोई संविधान का एकमुश्‍त बिना शर्त समर्थन करता है, तो वह समूचे संविधान का ही समर्थन करता है। जबकि ऐसा करने की कोई आवश्‍यकता नहीं है क्‍योंकि संविधान द्वारा दिये गये सीमित जनवादी-नागरिक अधिकारों के ही अनुसार आप संविधान की आलोचना अवश्‍य कर सकते हैं। भारतीय संविधान में ऐसे दर्जनों जनविरोधी व ग़ैर-जनवादी प्रावधान हैं, जिनकी आलोचना अतीत में जनपक्षधर वक़ीलों, पत्रकारों और बुद्धिजीवियों ने बार-बार की है। लेकिन ऐसे तमाम प्रासंगिक मसलों पर संविधान की आलोचना करने से लिबरेशन और आइसा घबराते हैं क्‍योंकि इससे अम्‍बेडकरवादी नाराज़ हो जायेंगे और उन्‍हें ऐसा लगता है कि अगर अम्‍बेडकरवादी नाराज़ हुए तो दलित जनसमुदाय उनसे दूर चले जायेंगे! इस आशंका में कोई दम नहीं है, लेकिन लोकरंजकता की लहर में बहने वाली लिबरेशन की राजनीति और विनोद मिश्रा के “सतरंगा समाजवाद” के सिद्धान्‍त पर अमल करने वाले इसके नेतृत्‍व की यह बाध्‍यता है कि वह ऐसे सारे उसूली समझौते करे और मार्क्‍सवाद और कम्‍युनिज्‍़म के वैज्ञानिक क्रान्तिकारी उसूलों की ऐसी-तैसी करे। वैसे इसमें कोई अचरज की बात भी नहीं है क्‍योंकि संशोधनवादी “सतरंगा समाजवाद” में शुरू से ही समाजवाद तो कहीं नहीं था बस सतरंगा ही सतरंगा था! और लिबरेशन के इस सतरंगे में भी लाल रंग पहले ही उड़ा हुआ था और अब वह फीका गुलाबी हो चुका है और इस सतरंगे स्‍पेक्‍ट्रम में कहीं नेपथ्‍य में दबा पड़ा है!

यह लोकरंजकतावाद और अवसरवाद ही था जिसने दीपांकर भट्टाचार्या को संघ की राजनीति की गोद में बैठे नीतीश ‘पलटू’ कुमार जैसे ग़लीज़ “समाजवादी” के बरामदे की सीढ़‍ियों पर गुलदस्‍ते के साथ खड़ा कर दिया था। यही अवसरवादी लोकरंजकतावाद था जिसने चन्‍दू के हत्‍यारों के साथ हाथ मिलाने के लिए लिबरेशन को बाध्‍य कर दिया था। यही अवसरवादी लोकरंजकतावाद था जिसके कारण एक साल आइसा ने एबीवीपी और एसएफ़आई के ख़‍िलाफ़ नारा दिया ‘न नक़ली वाम न भगवा राम – नक्‍सलबाड़ी लाल सलाम’ और उसके अगले ही साल इस ‘नक़ली वाम’ के साथ चुनावी गठजोड़ बना लिया था। इस साल भी डूसू चुनावों में यह गठजोड़ बन गया है! यही अवसरवादी लोकरंजकतावाद है जिसके कारण लिबरेशन नियमित तौर पर अपने किंचित छात्र नेताओं की कल्‍ट-बिल्डिंग पर पूरी ऊर्जा लगा देती है, इस प्रक्रिया में लिबरलिज्‍़म, पहचानवाद और व्‍यवहार की राजनीति से हर प्रकार के घटिया समझौते करती है और जब ऐसे छात्र नेता लिबरेशन के क़द से (जो कि बहुत बड़ा नहीं है) बड़े हो जाते हैं, तो लिबरेशन और उसके साथ मार्क्‍सवाद पर कीचड़ उछालते हुए खुले तौर पर बुर्जुआ विचारधारा के साथ जाकर खड़े हो जाते हैं (जैसे कि कविता कृष्‍णन), या सीधे संघ की गोद में जा बैठते हैं (जैसे शेहला रशीद) या फिर किसी पूँजीवादी पार्टी के नेतृत्‍व के सलाहकार बन जाते हैं (जैसे कि सन्‍दीप सिंह)। लेकिन लोकरंजकतावादी वाम अवसरवाद की गति ही ऐसी होती है कि वह उसे अपने पिछले अनुभवों से कभी सीखने नहीं देती। वजह यह कि हमेशा लोक-लुभावन चना जोर गरम राजनीतिक कचौड़‍ियाँ बेचने का दबाव लिबरेशन और आइसा की राजनीतिक फेरी व रेहड़ी-खोमचों पर काम करता रहता है। नतीजतन, ऐसे राजनीतिक प्रहसन इसके साथ घटित होते रहते हैं। अभी एक नया प्रहसन निर्माणाधीन है। जल्‍द ही इसके नतीजे भी सामने आयेंगे।

सवाल यह नहीं है कि किसी भी आन्‍दोलन या अभियान के दौरान क्रान्तिकारी छात्र संगठन या कोई भी क्रान्तिकारी जनसंगठन विशिष्‍ट मुद्दों और साझा न्‍यूनतम कार्यक्रम के आधार पर अन्‍य संगठनों से मोर्चा बनाते हैं। यह रणकौशल तो किसी भी क्रान्तिकारी जनसंगठन को अपनाना ही चाहिए। यह जनता के अधिकतम सम्‍भव विशाल जनसमुदायों को सही व्‍यावहारिक क्रान्तिकारी कार्यक्रम पर जीतने और इसी प्रक्रिया में विजातीय पूँजीवादी राजनीतिक प्रवृत्तियों को उनके समक्ष व्‍यवहार में बेनक़ाब करने के लिए अनिवार्य होता है। लेकिन ऐसे मुद्दा-आधारित मोर्चों के लिए क्रान्तिकारी जनसंगठनों को अपने क्रान्तिकारी उसूलों को, क्रान्तिकारी राजनीतिक लाइन को तिलांजलि देना कतई आवश्‍यक नहीं होता। ग़ौरतलब है कि कोई बुर्जुआ संगठन ऐसा कभी नहीं करता। क्‍या सीजेपी का सेण्ट्रिस्‍ट लोकरंजकतावादी नेतृत्‍व अपने जो भी अस्‍पष्‍ट और बिखरे उसूल हैं, उससे कोई समझौता करता है? क्‍या पहचानवादी राजनीति करने वाले संगठन जैसे कि बापसा कभी अपने राजनीतिक विचारों पर ऐसे समझौते करते हैं? नहीं! ये मोर्चों के दौरान भी मार्क्‍सवाद, क्रान्तिकारी धारा और जनता के साथ खड़े कम्‍युनिस्‍ट क्रान्तिकार‍ियों पर ऊल-जुलूल आरोप लगाकर सस्‍ते क़‍िस्‍म के हमले करते रहते हैं। ये तो समझौते करने में माहिर संशोधनवादी और वाम लोकरंजकतावादी और अवसरवादी संगठन ही हैं जो अपना ‘चना जोर गरम’ औरों से ज्‍़यादा सस्‍ता, खस्‍ता और कुरमुरा साबित करने के लिए ऐसे अस्मितावादी, व्‍यवहारवादी और बुर्जुआ राजनीति पर अमल करने वाले संगठनों के सामने पूर्ण आत्‍मसमर्पण कर लम्‍बलेट हो जाते हैं। और इसमें भी आइसा और लिबरेशन का कोई जोड़ नहीं है, हालाँकि विशेषकर जेएनयू में अन्‍य कई तथाकथित वाम छात्र संगठन इसी शर्मनाक समझौतापरस्‍ती और घुटनाटेकू रवैये का परिचय देते हैं। एक क्रान्तिकारी जनसंगठन जब किसी मुद्दा-आधारित व साझा न्‍यूनतम कार्यक्रम-आधारित किसी व्‍यापक मोर्चे में, मसलन फ़ासीवाद-विरोधी मोर्चे में, शामिल होते भी हैं तो वे अपनी राजनीतिक स्‍वतन्‍त्रता को क़ायम रखते हैं, अपने वैज्ञानिक उसूलों पर समझौता नहीं करते और मोर्चे की साझी गतिविधियों को तय मुद्दों और साझा न्‍यूनतम कार्यक्रम पर केन्द्रित करने का संघर्ष करते हैं।

वाम अवसरवाद और लोकरंजकतावाद की राजनीति के कारण छात्र-युवा आन्‍दोलन में और सभी जनान्‍दोलनों में बहुत नुक़सान हुआ है। लोगों के सामने वैचारिक स्‍पष्‍टता और वैज्ञानिक समझदारी आने के बजाय, एक सड़ी हुई भ्रामक बौद्धिक खिचड़ी बनती है, जो अन्‍त में मौजूदा व्‍यवस्‍था और शासक वर्गों को ही फ़ायदा पहुँचाती है। जारी छात्र-युवा आन्‍दोलन में भी इस प्रकार संसदीय वाम अवसरवाद और लोकरंजकतावाद की राजनीति के प्रति सोचने-समझने वाले ज़हीन नौजवानों को सावधान रहना चाहिए। यह किसी भी तरीक़े से छात्र-युवा आन्‍दोलन के हितों की पूर्ति नहीं करती। उल्‍टे यह संसदीय वाम की चुनावी राजनीति के लक्ष्‍यों की पूर्ति के मद्देनज़र ही की जाती है। उनके संकीर्ण सांगठनिक हितों के पूर्ण होने से छात्र-युवा आन्‍दोलन को कुछ भी हासिल नहीं होने वाला। इतिहास से सबक लेना चाहिए और इस बात को सुनिश्चित करने का प्रयास करना चाहिए कि इस प्रकार की अवसरवादी और लोकरंजकतावादी संसदीय वाम राजनीति छात्र-युवा आन्‍दोलन में जड़ें न जमा सके। उसके विरुद्ध फ़ैसलाकुन संघर्ष अनिवार्य है। छात्रों की अच्‍छी-ख़ासी संख्‍या इस बात को समझ भी रही है, लेकिन इसके बारे में व्‍यापक छात्र जनसमुदाय में सघन और व्‍यापक शिक्षण और प्रचार की आवश्‍यकता है।