Category Archives: शिक्षा स्‍वास्‍थ्य और रोजगार

मीडिया ने फ़ूलाया नौकरियां बढ़ने का गुब्बारा। नौजवानों के साथ एक मज़ाक!

पिछले दिनों दो प्रमुख बाज़ारू मीडिया संस्थानों-इंडिया टुडे और टाइम्स ऑफ़ इंडिया, ने देश भर में नौकरियों की भरमार का जो हो-हल्ला मचाया, उसकी असलियत जानने के लिए कुछ और पढ़ने या कहने की जरूरत नहीं है, बस खुली आँखों से आस-पड़ोस में निगाह डालिये; आपको कई ऐसे नौजवान दिखेंगे जो किसी तरह थोड़ी-बहुत शिक्षा पाकर या महँगी होती शिक्षा के कारण अशिक्षित ही सड़कों पर चप्पल फ़टकारते हुए नौकरी के लिए घूम रहे है या कहीं मज़दूरी करके इतना ही कमा पाते है कि बस दो वक्त का खाना खा सके। शायद आप स्वयं उनमे से एक हों और नंगी आँखों से दिखती इस सच्चाई को देखकर कोई भी समझदार और संवेदनशील आदमी मीडिया द्वारा फ़ैलाई गई इस धुन्ध की असलियत को समझ सकता है।

राष्ट्रीय ग्रामीण रोज़गार गारण्टी योजना – एक विशालकाय सरकारी धोखे का सच!

कुल मिलाकर यही है वह रोज़गार गारण्टी योजना जिसे ‘ऐतिहासिक’ बताया जा रहा था और जिसके लिए अभी भी इतना शोर मचाया जा रहा है, साल भर में महज़ 100 दिन का रोज़गार वह भी मात्र 50 रुपए की मज़दूरी पर! लेकिन साल के बाकी 265 दिन वह सौ दिन का (कहना चाहिए) ठेका मज़दूर और उसका परिवार क्या करेगा, क्या ख़ाकर ज़िन्दा रहेगा? ख़ैर, एक तरफ़ जहाँ सरकार इस पहलू पर आश्चर्यचकित ढंग से चुप्पी साधे हुए है, वहीं दूसरी ओर इस योजना के हिमायती यह कहते हुए घूम रहे हैं कि चलो कुछ लोगों को कुछ दिन के लिए ही सही कुछ तो मिल ही रहा है। लेकिन मनमोहन सिंह जी आपका यह “कुछ-कुछ” का सिद्धान्‍त तो वाकई में कुछ भी नहीं कर पा रहा है!

सूचना प्रौद्योगिकी सेक्टर में रोज़गार के अवसर: किसके लिए?

इस व्यवस्था का मकसद सबको रोज़गार देना है ही नहीं। इसलिए शिक्षा को लगातार महँगा किया जा रहा है ताकि एक व्यापक हिस्से को पहले ही कॉलेजों में आने से रोका जाए। यूँ तो अर्थव्यवस्था के बढ़ते वृद्धि दर का भोंपू लगातार बजाया जा रहा है पर अब तो सरकार भी बड़ी बेशर्मी से यह कहती है कि जो विकास हो रहा है वह ‘‘रोज़गारविहीन विकास’’ है। अब यह सरकार की ज़िम्मेदारी नहीं है कि वह सबको रोज़गार मुहैया कराये। इसलिए जल्द से जल्द इस इस बात को समझने की ज़रूरत है कि उच्च शिक्षा संस्थानों में दाखिला हो पाने के बावजूद आम घरों के लड़के-लड़कियों को रोज़गार मिलने की गारण्टी नहीं है। क्योंकि ये रोज़गार के अवसर उस ‘‘कुलीन’’ मध्यमवर्ग के लिए है जिनके पास पैसे की कोई कमी नहीं है। वैसे भी पूँजीवादी व्यवस्था में तो हर चीज़ माल की तरह बेची जाती है, इसलिए शिक्षा भी माल का रूप अपना लेती है-यानी जिसकी औकात हो, वो आकर खरीदे उसे! और जो खरीद नहीं सकता वह ज़िन्दगी भर सड़कों पर चप्पलें फ़टकारता फ़िरे! इसलिए साधारण परिवेश से आए छात्र जो सूचना प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में अपना सुरक्षित भविष्य तलाश रहे हैं, उनके लिए ज़रूरी है कि इस क्षे़त्र में बढ़ते रोज़गारों का जो धूम्रावरण खड़ा किया गया है, उसे हटाकर सच्चाई पहचानने की कोशिश करे।

देशी-विदेशी पूँजी की सेवा में मैकाले के मानसपुत्रों की कवायद

किसी स्वतन्त्र देश के लिए इससे बड़ी त्रासद विडम्बना क्या हो सकती है कि साठ वर्षों के बाद भी उच्च शिक्षा के माध्यम के रूप में एक औपनिवेशिक भाषा मजबूरी बनी हुई है। 1948 में डा. राधाकृष्णन ने उच्च शिक्षा के माध्यम के रूप में अंग्रेजी को एक तात्कालिक विवशता बताया था और इसे जल्द से जल्द दूर कर लेने की बात कही थी। लेकिन 60 वर्षों से बदस्तूर चली आ रही इस विवशता को अब अपरिहार्य मानते हुए ज्ञान आयोग ने उसे औपचारिक रूप प्रदान कर दिया है। आयोग ने अब उच्च शिक्षा के माध्यम के रूप में अंग्रेज़ी को विवशता नहीं आवश्यकता मानते हुए उसे प्राथमिक स्तर से ही अनिवार्य बना देने की सिफ़ारिश की है। भूमण्डलीकरण के इस दौर में ज्ञान आयोग का यह कदम एक किस्म से सांस्कृतिक उपनिवेशन की स्थिति को औपचारिक रूप प्रदान करना है।

राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारण्टी योजना – आखिर गारण्टी किसकी और कैसे?

बेरोज़गारों की एक रिज़र्व आर्मी की पूँजीवाद को हमेशा ही आवश्यकता रहती है जो रोज़गारशुदा मज़दूरों की मोलभाव की क्षमता को कम करने के लिए पूँजीपतियों द्वारा इस्तेमाल की जाती है। अगर बेरोज़गार मज़दूर न हों और श्रम आपूर्ति श्रम की माँग के बिल्कुल बराबर हो, तो पूँजीपति वर्ग मज़दूरों की हर माँग को मानने के लिए विवश होगा। इसलिए पूँजीपति वर्ग तकनोलॉजी को उन्नत करके, मज़दूरों का श्रमकाल बढ़ाकर एक हिस्से को छाँटकर बेरोज़गारों की जमात में शामिल करता रहता है। लेकिन जब बेरोज़गारी एक सीमा से आगे बढ़ जाती है और सामाजिक अशान्ति का कारण बनने लगती है और सम्पत्तिवानों के कलेजे में भय व्यापने लगता है तो सरकार के दूरदर्शी पहरेदार कुछ ऐसी योजनाओं के लॉलीपॉप जनता को थमाकर उनके गुस्से पर ठण्डे पानी का छिड़काव करते हैं। यह व्यवस्था की रक्षा के लिए आवश्यक होता है कि कुछ ऐसे ‘चेक्स एण्ड बैलेंसेज़’ का तंत्र हो जो व्यवस्था की दूरगामी रक्षा का काम करता हो। जब पूँजीपति वर्ग मुनाफ़े की हवस में अन्धा होकर जनता को लूटने लगे और सड़कों पर धकेलने लगे तो कुछ कल्याणकारी नीतियाँ लागू कर दी जाती हैं। संयुक्त प्रगतिशील गठबन्धन सरकार में ऐसे तमाम पहरेदार–चौकीदार बैठे हैं जो समझते हैं कि कब जनता को भरमाने के लिए कोई कल्याणकारी झुनझुना उनके हाथ में थमा देना है। रोज़गारी गारण्टी योजना, अन्त्योदय योजना आदि ऐसे ही कुछ कल्याणकारी झुनझुने हैं जिनसे होता तो कुछ भी नहीं है लेकिन शोर बहुत मचता है।

संगठित क्षेत्र में भी बेरोज़गारी में तीव्र वृद्धि

बेरोज़गारी का कारण उन्नत तकनीक नहीं है बल्कि वह उत्पादन प्रणाली व उत्पादन सम्बन्ध हैं जिनमें इन तकनीकों का इस्तेमाल किया जाता है। बेरोज़गारी को तो वैसे ही बेहद कम किया जा सकता है अगर मज़दूरों से जानवरों की तरह काम लेना बन्द कर दिया जाय। मिसाल के तौर पर, भारत में मज़दूरों को आज 10 से 14 घण्टे तक काम करना पड़ता है। उन्नत तकनीकों को बढ़ाकर तो लागत में सापेक्षिक कटौती की ही जाती है लेकिन साथ ही मज़दूरों के श्रम काल को बढ़ाकर उसमें निरपेक्ष रूप से भी कटौती की जाती है। ये दोनों परिघटनाएँ पूँजीवादी व्यवस्था में साथ-साथ घटित होती हैं। जबकि होना तो यह चाहिए कि उन्नत तकनीकों का प्रयोग करके श्रमकाल को घटाया जाय और कामगारों के जीवन में भी मानसिक, सांस्कृतिक उत्पादन और मनोरंजन की गुंजाइश पैदा की जाय। लेकिन मुनाफ़े की हवस में पूँजीपति वर्ग स्वयं एक पशु में तब्दील हो चुका है। मज़दूर उसके लिए महज मशीन का एक विस्तार है, कोई इंसान नहीं, जिसे वह बेतहाशा निचोड़ता है। आज अगर मज़दूरों से 6 घण्टे ही काम लिया जाय तो भी रोज़गार के अवसरों में दो से ढाई गुना की बढ़ोत्तरी हो जाएगी। लेकिन ऐसा इस पूँजीवादी व्यवस्था में असम्भव है। इसलिए बेहतर है विकल्प के बारे में सोचें।

कैम्पसों में सिमटते जनवादी अधिकार

कहीं भी कोई व्याख्यान, नाटक, म्यूजिक कंसर्ट, गोष्ठी आदि का आयोजन करने के लिए इतने चक्कर लगवाये जाते हैं कि आप वहाँ ऐसे कार्यक्रमों के आयोजन का विचार ही त्याग दें। इनकी जगह अण्डरवियर की कम्पनियों की वैन, फैशन शो, जैम सेशन और इस तरह की गतिविधियों को आयोजित करवाने का काम स्वयं छात्र संघ में बैठे चुनावबाज करते हैं। इस तरह से कैम्पस का विराजनीतिकरण (डीपॉलिटिसाइजेशन) करने की एक साजिश की जा रही है। इसकी वजह यह है कि ऊपर बैठे हुक्मरान डरते हैं। उन्हें डर है कि अगर कैम्पस में इतना जनवादी स्पेस होगा तो उसका इस्तेमाल क्रान्तिकारी ताक’तें छात्रों को एकजुट, गोलबन्द और संगठित करने में कर सकती हैं। तो जनवादी अभिव्यक्ति की जगहों को ख़त्म किया जा रहा है और पुलिस का आतंक छात्रों के दिल में बैठाया जा रहा है। जनतंत्र के नाम पर छात्र संघ तो है ही! वहाँ किस तरह की राजनीति होती है यह किसी से छिपा तथ्य नहीं है। वैसी राजनीति की तो सत्ता पर काबिज लोगों को जरूरत है। वे छात्र राजनीति को अपने जैसी ही भ्रष्ट, दोगली और अनाचारी राजनीति की नर्सरी के तौर पर इस्तेमाल करते हैं। इस काम में बाधक क्रान्तिकारी राजनीतिक शक्तियों का गला घोंटने के लिए ही तरह–तरह के नियम–क़ायदे–क़ानूनों की आड़ में जनवादी स्पेस को सिकोड़ा और जनवादी अधिकारों का धीरे–धीरे हनन किया जा रहा है। जिम्मेदार क्रान्तिकारी छात्र शक्तियों को इस साजिश को समझना होगा और इसे नाक़ाम करना होगा।

आरक्षण पक्ष, विपक्ष और तीसरा पक्ष

सत्ताधारी वर्ग जब नौकरियों या उच्च शिक्षा में आरक्षण का लुकमा फेंकते हैं तो पहले से नौकरियों पर आश्रित, मध्यवर्गीय, सवर्ण जातियों के छात्रों और बेरोज़गार युवाओं को लगता है कि आरक्षण की बैसाखी के सहारे दलित और पिछड़ी जातियाँ उनके रोज़गार के रहे-सहे अवसरों को भी छीन रही हैं। वे इस ज़मीनी हक़ीक़त को नहीं देख पाते कि वास्तव में रोज़गार के अवसर ही इतने कम हो गये हैं कि यदि आरक्षण को एकदम समाप्त कर दिया जाये तब भी सवर्ण जाति के सभी बेरोज़गारों को रोज़गार नहीं मिल पायेगा। इसी तरह दलित और पिछड़ी जाति के युवा यह नहीं देख पाते कि यदि आरक्षण के प्रतिशत को कुछ और बढ़ा दिया जाये और यदि वह ईमानदार और प्रभावी ढंग से लागू कर दिया जाये, तब भी दलित और पिछड़ी जातियों के पचास प्रतिशत बेरोज़गार युवाओं को भी रोज़गार नसीब न हो सकेगा। उनके लिए रोज़गार के जो थोड़े से नये अवसर उपलब्ध होंगे, उनका भी लाभ मुख्यतः मध्यवर्गीय बन चुके दलितों और आर्थिक-सामाजिक-राजनीतिक रूप से प्रभावशाली पिछड़ी जातियों के लोगों की एक अत्यन्त छोटी-सी आबादी के खाते में ही चला जायेगा तथा गाँवों-शहरों में सर्वहारा-अर्द्धसर्वहारा का जीवन बिताने वाली बहुसंख्यक आबादी को इससे कुछ भी हासिल नहीं होगा।

Reservation Support, Opposition and Our Position

when the ruling class hurls the bait of reservation in employment or higher education, the students and unemployed youth belonging to middle class and upper castes, who are already dependent on jobs for their livelihood think that the “dalits” and backward castes are now even robbing them off their remaining opportunities of employment with the aid of the crutches of reservation. They are unable to perceive this ground reality that in fact the opportunities for employment have dwindled away so much that even if the reservation is completely brought to an end, not all the unemployed from the upper castes will get employment. Similarly the youth belonging to “dalit” and backward castes fail to realise that if the percentage of reservation is raised a little more and if it is implemented in an honest and effective manner, even then not even fifty percent of unemployed youth from “dalit” and the backward castes will obtain employment. Whatever meagre opportunities for employment will be available to them, even their benefits will primarily be reaped by an exceedingly small population of “dalits” who have joined middle class and people belonging to economically, socially and politically influential backward castes; and the vast majority of population living their lives as proletariat-semi proletariat will obtain almost nothing from it.

शिक्षा में सुधार बनाम एनजीओकरण

पाठ निर्माण और अन्यान्य क्षेत्र में एन.सी.ई.आर.टी. की भावी भूमिका किस तरह महत्वपूर्ण होने जा रही है, यह जान लेना भी जरूरी है। आज़ादी के 58 साल के अनुभव के बाद साफ़ है कि सरकारों की समानता पर आधारित शिक्षा की लाख घोषणाओं के बावजूद प्राइवेट स्कूलों और निजी प्रकाशकों की महँगी व तोड़ी-मरोड़ी गई पाठ सामग्रियों के कारण शिक्षा क्षेत्र में भयावह विषमता और अराजकता बढ़ी है। मूल्य निर्माण का नतीजा तो सामने है। ऐसे में निदेशक का यह कहना कि एन.सी.ई.आर.टी. का काम किताब निर्माण का व्यवसाय नहीं है, शिक्षा में आगामी सुधारों का संकेत दे देता है।