Category Archives: विज्ञान

डार्विन की कश्मकश और जीवन का उद्विकास

डार्विन को पता था कि उनकी खोज समाजवादी-भौतिकवादी विचारों को वैज्ञानिक आधार देने वाली है और इस खोज के सामाजिक निहितार्थ के चलते ही उन्होंने अपने शोध को लगभग 20 साल तक प्रकाशित नहीं किया।1859 में जब वॉलेस डार्विन की खोज तक स्वतंत्र तौर पहुँचते है तब डार्विन ने भी ‘इतिहास की जड़ शक्ति’ के ख़िलाफ़ मोर्चा खोलने का साहस किया और ‘उद्विकास के सिद्धान्त’ को एक गोष्ठी में वॉलेस के साथ पेश किया। बीगल जहाज़ पर नौजवानी में सालों एकत्रित किये गये तथ्यों के आधार पर उद्विकास के सिद्धान्त का सामान्यीकरण करते हुए डार्विन ने सालों बाद अपने शोध को पेश किया और अपने अन्तरविरोधों को पार पा लिया। उनकी पृष्ठभूमि और विचारधारात्मक चिन्तन को पारकर वे एक वैज्ञानिक के तौर पर अपनी खोजों से उन नतीजों को पेश करते हैं जो खुद उनके सामाजिक वर्ग के आम विचारों के विरुद्ध जाते थे।

‘सेपियन्स’ की आलोचना: चेतना के उद्भव तथा मानव प्रजाति का हरारी द्वारा पूँजीवादी संस्कृति के अनुसार सारभूतीकरण

‘सेपियन्स’ की आलोचना: चेतना के उद्भव तथा मानव प्रजाति का हरारी द्वारा पूँजीवादी संस्कृति के अनुसार सारभूतीकरण सनी युवल नोआ हरारी की किताब ‘सेपियन्स’ पर बात करते हुए हमने पिछली…

सेपियंस : युवल नोआ हरारी के प्रतिक्रियावादी बौद्धिक कचरे और सड़कछाप लुगदी को मिली विश्‍वख्‍याति

अफ़सोस की बात है कि बहुत से प्रगतिशील लोग इस पुस्‍तक को इतिहास और मानव की उत्‍पत्ति समझने हेतु पढ़ और पढ़वा रहे हैं। स्‍कूल तथा कॉलेज के छात्र अक्सर पॉपुलर विज्ञान की क़िताबों को पढ़कर विज्ञान की नयी खोजों तथा ब्रह्माण्‍ड के रहस्यों को जानना चाहते हैं, वे भी आजकल हरारी की क़िताब के ज़रिये विज्ञान की अधकचरी और ग़लत समझदारी बना रहे हैं। युवल नोआ हरारी विशुद्ध मूर्ख है जो विज्ञान और इतिहास के जटिल प्रश्‍नों के लिए चना जोर गर्म रास्‍ता सुझाता है। लेकिन उसकी मूर्खता भी आज एक बड़ी आबादी में विभ्रम फैला रही है और हुक्‍मरानों की ही राजनीति की नुमाइश करती है।

कोविड-19 के षड्यंत्र सिद्धान्तों का संकीर्ण अनुभववाद और रहस्यवाद की परछाई

कोरोना महामारी (पैंडेमिक) के साथ इस वायरस के उत्पत्ति की फेक न्यूज़ महामारी(इंफोडेमिक) का भी विस्फोट बहुत तेज़ी से हुआ। लाखों लोग इस बीमारी की वजह से अपनी जान गंवा चुके हैं लेकिन कुछ लोग कोरोना वायरस और लॉकडाउन को षड्यंत्र बताते रहे। भारत में बीमारी पर मुनाफ़ा कमाने के लिए टीका बनाने वाली कम्पनियों में भी धींगामुश्ती चल रही है वहीं अभी तक हमारे कोविडियट्स यह नहीं तय कर पाए हैं कि कोरोनावायरस है क्या?

धरती पर जीवन का उद्भव और उद्विकास (इवोल्यूशन)

यह प्रश्न मानवता के समक्ष आदिम काल से मौजूद है कि सितारों की दुनिया और हमारी दुनिया के बीच क्या सम्बन्ध है? धरती पर मौजूद पेड़-पौधों से लेकर नदी, पहाड़, जंगल ज़मीन का मनुष्य से क्या वास्ता है? मनुष्य अपने उद्भव पर आदिकाल से चिन्तन करता रहा है। आधुनिक काल में प्राकृतिक विज्ञान ने अपने विकासक्रम में इस सवाल पर तरह-तरह के धार्मिक मकड़जालों को हटाकर साफ़ कर दिया है। इतिहास में पहले सितारों और धरती पर भौतिक वस्तुओं की गतिकी के अध्ययन से साफ़ नज़र होने के बाद इन्सान ने जैव जगत और अपने उद्गम का वैज्ञानिक विश्लेषण किया। जीवन के रूपों के बदलाव को उद्विकास (इवोल्यूशन) कहते हैं और यह सवाल जीवन की उत्पत्ति से जुड़ा हुआ है। जीवाश्म, डीएनए और क्लैडिस्टिक्स के अध्ययन से जीवन के रूपों और उनके उद्विकास के नियमों को जाना गया है। 19वीं शताब्दी में जाकर ही उद्विकास और जीवन के उद्भव पर विज्ञान निर्णायक कदम उठा सका।

पूँजीवाद और महाविनाश की आहट

पूँजीवाद मानवजाति की एक ऐसी बीमारी है जो परजीवी की तरह न केवल मानवजाति को बल्कि पूरी प्रकृति को खाये जा रही है। और अगर यह यूँ ही जारी रहा तो जैसा कि रोजा लक्ज़मबर्ग ने कहा था कि समाजवाद न आने की कीमत मानवता को बर्बरता के तौर पर चुकानी पड़ेगी। लेकिन आज के सन्दर्भ में रोजा लक्ज़मबर्ग का यह कथन भी अधूरा प्रतीत होता है। आज हम निश्चित तौर पर दृढ़ता के साथ कह सकते हैं और न सिर्फ कह सकते हैं बल्कि हमें यह कहना ही चाहिए कि समाजवाद के न आने की कीमत हमको न केवल बर्बरता से बल्कि महाविनाश से चुकानी पड़ेगी।

रिचर्ड लेविंस – विज्ञान और समाज को समर्पित द्वन्द्वात्मक जीववैज्ञानिक

एक मार्क्सवादी होने के नाते लेविंस केवल एक क्लर्क वैज्ञानिक बनने में यकीन नहीं रखते थे, उनका मानना था कि विज्ञान एक सामाजिक सम्पत्ति है और इसका अध्ययन बिना उस समाज को बनाने वाली बहुसंख्यक जनता के जीवन को शोषण से मुक्त किये और बिना समृद्ध बनाने के लिए समर्पित किये व्यर्थ है। उनका कहना था कि विज्ञान को समझना समाज और दुनिया को बदलने के लिए ज़रूरी है क्योंकि बिना बदलाव के विज्ञान को समझे बदलाव ला पाना सम्भव नहीं है ।

भारत के शोध संस्थानों का संकट

दर्शन, इतिहास व सामाजिक विज्ञान से कटे वैज्ञानिक ही इस संस्थान की बुनियाद होते हैं। एक संस्थान व दूसरे संस्थान के बीच बेहद सीमित बौद्धिक व्यवहार होता है व नीतियों का निर्धारण करने में किसी शोधार्थी की कोई भूमिका नहीं होती है। निर्धारक तत्व वित्त होता है जो कि शोध को तय करता है। यह सिर्फ भारत की नहीं बल्कि पूरी दुनिया के शोध संस्थानों की कहानी है, हालाँकि भारत की परिस्थिति में इस वैश्विक परिघटना में एक विशेषता भी है। भारत जैसे उत्तर औपनिवेशिक देश में जहाँ आजा़दी किसी क्रान्तिकारी आन्दोलन की गर्मी और उथल-पुथल के ज़रिये नहीं बल्कि औपनिवेशिक पूँजीपति वर्ग और भारतीय पूँजीपति वर्ग के बीच समझौता-दबाव-समझौता की प्रक्रिया से आयी, वहाँ भारतीय मानस की चेतना बेहद पिछड़ी रही जिसका प्रतिबिम्ब यहाँ की बौनी शोध संरचना में दिखता है। आज़ादी के बाद भारतीय पूँजीवाद साम्राज्यवाद के साथ भी चालाकी से समझौते-दबाव-समझौते की नीति पर काम करता रहा और अपनी स्वतंत्रता कायम रखते हुए इसने पब्लिक सेक्टर उद्योग व संरचनात्मक ढाँचा खड़ा किया। अगर उद्योग-निर्देशित विज्ञान व शोध की ही बात करें तो भी न तो भारत का पूँजीवाद अमरीकी या अन्य विकसित पूँजीवादी देशों की बराबरी कर सकता था और न ही इसका विज्ञान ही उतना विकसित हो सकता था। भारत के पूँजीपतियों ने इसका प्रयास ही नहीं किया है।

‘पाप और विज्ञान’: पूँजीवादी अमेरिका और समाजवादी सोवियत संघ में नैतिक प्रश्नों के हल के प्रयासों का तुलनात्मक ब्यौरा

सोवियत सरकार द्वारा व्यभिचार के अड्डों को ध्वस्त करने की मुहिम छेड़े जाने से घबराये ठेकेदारों और वेश्यागृहों के मालिकों ने अदालत का दरवाज़ा खटखटाना शुरू कर दिया। वे सोवियत अख़बारों में पत्र भेजकर यह कहने लगे कि सोवियत सरकार वेश्याओं को पनाह देकर और भोले-भाले मालिकों को दण्ड देकर घोर पाप कर रही है। किन्तु सोवियत अधिकारियों ने उनकी चीख-पुकार का उत्तर सेना की ओर से और भी कड़ी कार्रवाई से दिया। ठेकेदारों ने यह दलील देनी शुरू की कि वेश्याओं को अपना पेशा ज़ारी रखने का हक़ है। अधिकारियों ने प्रश्न-पत्र का ज़िक्र करते हुए कहा कि औरतों ने व्यभिचार को मजबूरी की हालत में अपनाया है और समाज का यह कर्तव्य है कि वह उन्हें अच्छे काम देकर व्यभिचार से मुक्त करे।

विज्ञान के विकास का विज्ञान

औज़ार का इस्तेमाल, ख़तरे को भाँपना, कन्द-मूल की पहचान, शिकार की पद्धति से लेकर जादुई परिकल्पना को भी आने वाली पीढ़ी को सिखाया जाता है। इंसान ने औज़ारों और अपने उन्नत दिमाग से ज़िन्दा रहने की बेहतर पद्धति का ईजाद की। इसकी निरन्तरता मनुष्य संस्कृति के ज़रिए बरकरार रखता है। यह इतिहास मानव की संस्कृति का इतिहास है न कि उसके शरीर का! विज्ञान औज़ारों और जादुई परिकल्पना और संस्कृति में गुँथी इंसान की अनन्त कहानी में प्रकृति के नियमों का ज्ञान है। कला, संगीत और भाषा भी निश्चित ही यही रास्ता तय करते हैं। विज्ञान और कला व संगीत सामाजिकता का उत्पाद होते हुए भी अलग होते हैं। लेकिन हर दौर के कला व संगीत पर विज्ञान की छाप होती है। बुनियादी तौर पर देखा जाए तो ये इतिहास की ही छाप होती है।