Category Archives: छात्र आन्‍दोलन

‘चना जोर गरम’ और चमकोवाद की अवसरवादी और सस्‍ती लोकरंजकतावादी राजनीति से छात्रों-युवाओं को सावधान रहना होगा

अगर अपने आपको वाम बताने वाले आइसा व एसएफआई जैसे छात्र संगठन आन्‍दोलन में बुनियादी ढाँचागत मुद्दों का व्‍यवस्थित तौर पर प्रचार करते, सीजेपी नेतृत्‍व की समझौतापरस्‍ती और उसकी राजनीति के चरित्र की खुली दोस्‍ताना और जनवादी आलोचना पेश करते रहते, आन्‍दोलन के भीतर जनवादी तौर-तरीक़ों के पालन के लिए संघर्ष करते रहते, छात्रों को इस प्रकार आन्‍दोलन के वापस लिये जाने की सम्‍भावना के प्रति आगाह करते रहते, तो छात्रों-युवाओं के जनसमुदाय में यह चेतना पैदा हो सकती थी कि इस प्रकार 25 जुलाई को महज़ एक प्रतीकात्‍मक जीत के आधार पर आन्‍दोलन वापस लेने की सीजेपी नेतृत्‍व की पहल का वे विरोध करते और उसे बाध्‍य कर देते कि जब तक अन्‍य बुनियादी माँगें पूर्ण नहीं होतीं, तब तक जन्‍तर-मन्‍तर को नहीं छोड़ा जायेगा। यह निश्चित ही सम्‍भव था क्‍योंकि 25 जुलाई को समझौते की घोषणा के बाद भी छात्र-युवा अपने से जन्‍तर-मन्‍तर छोड़ने की मानसिकता में कतई नहीं थे, क्‍योंकि अभी कोई भी बुनियादी माँग पूरी नहीं हुई थी। 

भारत में हिन्दुत्ववादी फ़ासीवाद की चुनौती और छात्रों-युवाओं के कार्यभार

छात्रों-युवाओं के ऊपर भी फ़ासीवादी शासन के इन ग्यारह सालों में भयंकर कहर बरपा हुआ है। जेएनयू से लेकर जामिया, अलीगढ़, बीएचयू, हैदराबाद, एफ़टीआईआई समेत देश के लगभग सभी विश्वविद्यालयों ने इन दस सालों में फ़ासीवादी हमले का दंश झेला है। छात्रसंघ जैसी संस्थाओं को भंग करने, जनता के पक्ष में होने वाले छात्रों-युवाओं के हर आन्दोलन का बर्बर दमन करने और फ़र्ज़ी मुक़दमे लाद कर जेल में डाल देने का मॉडल लागू करके छात्र-युवा आन्दोलन की कमर तोड़ने और शैक्षणिक संस्थाओं को फ़ासीवाद की प्रयोगशाला बना देने के जो प्रयास मोदी सरकार के सत्ता में आने के साथ ही शुरु हो गये थे, वह हर दिन नये मुक़ाम पर पहुँच रहे हैं। नयी शिक्षा नीति को लागू करने के साथ ही शिक्षा के पूरे ढाँचे के फ़ासीवादीकरण की योजनाबद्ध ढंग से शुरुआत की जा चुकी है।

पेपर लीक के लिए भाजपा सरकार, प्रशासन और शिक्षा माफ़ियाओं का नापाक गठजोड़ ज़िम्मेदार है!!

पेपर लीक के लिए भाजपा सरकार, प्रशासन और शिक्षा माफ़ियाओं का नापाक गठजोड़ ज़िम्मेदार है!! अविनाश (इलाहाबाद) फ़ासीवादी मोदी सरकार का शासनकाल छात्रों-युवाओं के लिए किसी भयानक दुःस्वप्न से कम…

परिसरों में कम होता जनवादी स्पेस और बढ़ता प्रशासनिक दमन

यह सोचने वाली बात है कि अगर गुण्डागर्दी और अराजकता के बहाने छात्रसंघ पर प्रतिबन्ध लगाना उचित है तब तो इसी तर्क को आगे बढ़ाते हुए देश की संसद और विधानसभाओं, प्रशासनिक संस्थाओं आदि पर भी ताला जड़ देना चाहिए क्योंकि इन सभी संस्थाओं में गाली-गलौच, गुण्डागर्दी, भ्रष्टाचार और अपराध का बोलबाला है। लेकिन इन पर कभी प्रतिबन्ध नहीं लगाया जायेगा क्योंकि वह शासक वर्ग का अड्डा है।

आपस में नहीं, सबको रोज़गार की गारण्टी के लिए लड़ो!

अब इन आँकड़ों की रोशनी में सोचिए! जब सरकारी प्राथमिक विद्यालय रहेंगे ही नहीं तो क्या सारे बीटीसी वालों को नौकरी दी जा सकती है? या अगर बीएड अभ्यर्थियों को योग्य मान भी लिया जाय तो सभी को रोज़गार दिया जा सकता है? दरअसल आज नौकरियाँ ही तेज़ी से सिमटती जा रही हैं। निजीकरण छात्रों-नौजवानों के भविष्य पर भारी पड़ता जा रहा है। रेलवे, बिजली, कोल, संचार आदि सभी विभागों को तेज़ी से धनपशुओं के हवाले किया जा रहा है। अगर इस स्थिति के ख़िलाफ़ कोई देशव्यापी जुझारू आन्दोलन नहीं खड़ा होगा तो यह स्थिति और ख़राब होगी। इसलिए ज़रूरी है कि आपस में लड़ने की जगह रोज़गार गारण्टी की लड़ाई के लिए कमर कसी जाय।

जनवादी अधिकारों पर बढ़ता फ़ासीवादी हमला और कैम्पसों में घटता जनवादी स्पेस

जनवादी अधिकारों पर बढ़ता फ़ासीवादी हमला और कैम्पसों में घटता जनवादी स्पेस सम्पादकीय वर्तमान फ़ासीवादी दौर में जनता के लम्बे संघर्षों से हासिल सीमित जनवादी अधिकारों पर हमला बोल दिया…

नयी शिक्षा नीति पर अमल का असर: विश्वविद्यालयों में बढ़ती फ़ीस

जिस ‘नयी शिक्षा नीति’ का गुणगान करने में मोदी-योगी समेत पूरी फ़ासिस्ट मण्डली लगी हुई है, वह कुछ और नहीं बल्कि लफ़्फ़ाज़ियों की आड़ में शिक्षा को देशी-विदेशी पूँजीपतियों को सौंपने की नीति है। जैसे-जैसे नयी शिक्षा नीति पर अमल हो रहा है, वैसे-वैसे उसकी सच्चाई भी आम जनता के सामने खुलती जा रही है। मोदी की इस नयी शिक्षा नीति में उच्च शिक्षा के प्रशासनिक केन्द्रीकरण और वित्तीय स्वायत्तता पर ज़ोर दिया गया है जिसका असर अब जगह-जगह दिखने लगा है।

आईआईटी गुवाहाटी प्रशासन की तानाशाही

हर दौर में फ़ासीवाद कॉलेजों तथा विश्वविद्यालयों को अपना निशाना बनाता है, क्योंकि विश्वविद्यालय छात्रों के लिए जनवादी स्पेस होते हैं, जहाँ वे खुलकर अपनी सहमति व असहमति दर्ज़ करा सकते हैं, जहाँ वे बहस कर सकते हैं, सरकार से लेकर संस्थानों की कार्यप्रणालियों पर सवाल कर सकते हैं। इस जनवादी स्पेस को ख़त्म कर फ़ासीवादी ताक़तें प्रतिरोध के स्वर को दबाने का हर मुमकिन प्रयास करती हैं। ताकि इंसाफ़पसन्द छात्र और नौजवान या तो डरकर चुप हो जायें या फिर उनके पक्ष में हो जायें। आज देशभर में इस जनवादी स्पेस को ख़त्म कर ये लोग इसी काम को अंजाम देने की कोशिश कर रहे हैं।

इलाहाबाद विश्वविद्यालय में छात्रों ने जीती एक और लड़ाई : प्रमोशन और अंक सुधार के मुद्दे पर प्रशासन को किया झुकने पर मज़बूर

इलाहाबाद विश्वविद्यालय में छात्रों ने जीती एक और लड़ाई : प्रमोशन और अंक सुधार के मुद्दे पर प्रशासन को किया झुकने पर मज़बूर आह्वान संवाददाता इलाहाबाद विश्वविद्यालय प्रशासन को दमन…

हरियाणा में प्रत्यक्ष छात्र संघ चुनाव के लिए छात्रों का आन्दोलन और सरकार की तानाशाही

हरियाणा मे 22 साल बाद छात्र संघ चुनाव हुए। 1996 मे बंसीलाल सरकार ने गुण्डागर्दी का बहाना बनाकर छात्र संघ चुनावों को बन्द कर दिया था। उसके बाद से ही प्रदेश के छात्रों की यह माँग लगातार उठती रही है कि छात्र संघ चुनाव बहाल किये जायें ताकि प्रदेश के छात्र अपने हकों की आवाज़ उचित मंच के माध्यम से उठा सकें। पिछले लम्बे समय से हरियाणा में चाहे किसी भी पार्टी कि सरकार रही हो, छात्रों को उनके इस लोकतान्त्रिक अधिकार से वंचित रख रही है। सरकारी पक्ष का कहना है कि इससे गुण्डागर्दी बढ़ जायेगी। अगर ऐसा है तो फिर एमपी, एमएलए से लेकर सरपंच तक के चुनाव भी बन्द कर दिये जाने चाहिए क्योंकि उन चुनावों मे गुण्डागर्दी, बाहुबल और धनबल के के सिवाय और तो कुछ होने की सम्भावना ही नगण्य है।