‘चना जोर गरम’ और चमकोवाद की अवसरवादी और सस्ती लोकरंजकतावादी राजनीति से छात्रों-युवाओं को सावधान रहना होगा
अगर अपने आपको वाम बताने वाले आइसा व एसएफआई जैसे छात्र संगठन आन्दोलन में बुनियादी ढाँचागत मुद्दों का व्यवस्थित तौर पर प्रचार करते, सीजेपी नेतृत्व की समझौतापरस्ती और उसकी राजनीति के चरित्र की खुली दोस्ताना और जनवादी आलोचना पेश करते रहते, आन्दोलन के भीतर जनवादी तौर-तरीक़ों के पालन के लिए संघर्ष करते रहते, छात्रों को इस प्रकार आन्दोलन के वापस लिये जाने की सम्भावना के प्रति आगाह करते रहते, तो छात्रों-युवाओं के जनसमुदाय में यह चेतना पैदा हो सकती थी कि इस प्रकार 25 जुलाई को महज़ एक प्रतीकात्मक जीत के आधार पर आन्दोलन वापस लेने की सीजेपी नेतृत्व की पहल का वे विरोध करते और उसे बाध्य कर देते कि जब तक अन्य बुनियादी माँगें पूर्ण नहीं होतीं, तब तक जन्तर-मन्तर को नहीं छोड़ा जायेगा। यह निश्चित ही सम्भव था क्योंकि 25 जुलाई को समझौते की घोषणा के बाद भी छात्र-युवा अपने से जन्तर-मन्तर छोड़ने की मानसिकता में कतई नहीं थे, क्योंकि अभी कोई भी बुनियादी माँग पूरी नहीं हुई थी।












