भारत में हिन्दुत्ववादी फ़ासीवाद की चुनौती और छात्रों-युवाओं के कार्यभार

सम्पादकीय

‘मुक्तिकामी छात्रों-युवाओं का आह्वान’ का यह अंक हम आपके हाथों में ऐसे समय में सौंप रहे हैं जब देश में हिन्दुत्ववादी फ़ासीवादी ताक़तों के सत्तारोहण के ग्यारह साल पूरे हो चुके हैं। 2014 से 2025 तक के इन ग्यारह सालों ने देश के छात्रों-युवाओं समेत जनता के हर हिस्से के सामने तबाही-बर्बादी का भयावह मंज़र पेश किया है। इस एक दशक से अधिक के समय में हिन्दुत्ववादी फ़ासीवादी ताक़तों ने रामजन्मभूमि के प्रोजेक्ट को एक मुक़ाम तक पहुँचा कर काशी, मथुरा, अजमेर समेत फ़ासीवादी प्रयोग के नये मॉडल खड़े किये हैं। ये ग्यारह साल एक तरफ़ पानसरे, कलबुर्गी, दाभोलकर, गौरी लंकेश जैसे बुद्धिजीवियों की ख़ुलेआम हत्या करने तो दूसरी तरफ़ काले क़ानूनों और फ़र्ज़ी मुक़दमों के ज़रिये उमर ख़ालिद से लेकर आनन्द तेलतुम्बडे जैसी जनपक्षधर आवाज़ों को जेल में क़ैद करने और फ़ादर स्टेन स्वामी जैसे लोगों की न्यायिक हत्याएँ करने के साल रहे हैं। इन सालों में हमने देखा कि किस तरह फ़ासीवादी ताक़तों ने न्यायपालिका से लेकर ईडी, चुनाव आयोग समेत सभी बुर्जुआ जनवादी संस्थाओं में घुसपैठ कर इनके थोड़े-बहुत जनवादी अन्तर्य को भी नष्ट कर डाला है और इनका इस्तेमाल करके अपने फ़ासीवादी प्रयोगों को अंजाम दे रहे हैं। बुल्डोज़र न्याय का एक नया मॉडल खड़ा किया गया है जिसने पूँजीवादी संविधान और कोर्ट-कचहरी की रही-सही विश्वसनीयता को भी तार-तार कर दिया है। इसी तरह पिछला दशक फ़ासीवादी कार्यप्रणाली के एक और रूप का भी गवाह बना जहाँ उत्तर-पूर्व को फ़ासीवाद की एक नयी प्रयोगशाला बनाने का प्रयास किया गया। इसके नतीज़े के तौर पर लगभग दो सालों से सुलगता हुआ छोड़ दिया गया मणिपुर हमारे सामने है। इसी तरह माओवादियों के ख़ात्मे के नाम पर देश की प्राकृतिक सम्पदा को पूँजीपतियों की लूट का चरागाह बना देने के लिए ऑपरेशन कगार के रूप में एक बर्बर-हत्यारी परियोजना के ज़रिये देश के आम नागरिकों का फ़ासीवादी शासकों द्वारा शिकार किया जा रहा है।
छात्रों-युवाओं के ऊपर भी फ़ासीवादी शासन के इन ग्यारह सालों में भयंकर कहर बरपा हुआ है। जेएनयू से लेकर जामिया, अलीगढ़, बीएचयू, हैदराबाद, एफ़टीआईआई समेत देश के लगभग सभी विश्वविद्यालयों ने इन दस सालों में फ़ासीवादी हमले का दंश झेला है। छात्रसंघ जैसी संस्थाओं को भंग करने, जनता के पक्ष में होने वाले छात्रों-युवाओं के हर आन्दोलन का बर्बर दमन करने और फ़र्ज़ी मुक़दमे लाद कर जेल में डाल देने का मॉडल लागू करके छात्र-युवा आन्दोलन की कमर तोड़ने और शैक्षणिक संस्थाओं को फ़ासीवाद की प्रयोगशाला बना देने के जो प्रयास मोदी सरकार के सत्ता में आने के साथ ही शुरु हो गये थे, वह हर दिन नये मुक़ाम पर पहुँच रहे हैं। नयी शिक्षा नीति को लागू करने के साथ ही शिक्षा के पूरे ढाँचे के फ़ासीवादीकरण की योजनाबद्ध ढंग से शुरुआत की जा चुकी है। विश्वविद्यालयों की बढ़ती फ़ीसें-घटती सीटें तथा निजी और डीम्ड विश्वविद्यालयों का हर दिन विकसित होता बाज़ार आम घरों के छात्रों के लिए शिक्षा के दरवाज़े बन्द करता जा रहा है। करोड़ों युवा पढ़-लिख कर बेरोज़गारों की भीड़ में खड़े हैं। सारे सरकारी विभागों को औने-पौने दामों में पूँजीपतियों को सौंपने के चलते सरकारी विभागों में भर्तियाँ साल-दर-साल घटती चली जा रही हैं। नौकरी और प्रतियोगी परीक्षाओं के पूरे तंत्र को बरबाद कर दिये जाने के कारण बची-खुची सारी नौकरियाँ परचा लीक, धाँधली और भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ती जा रही हैं। इस पूरी स्थिति के ख़िलाफ़ पिछले दिनों यूपीपीसीएस/आरओ-एआरओ के आन्दोलन से लेकर बिहार के हालिया बीपीएससी और एसटीईटी के आन्दोलन तक, छात्रों-युवाओं का असन्तोष सड़कों पर तमाम रूपों में फूट रहा है। अग्निवीर के ख़िलाफ़ आन्दोलन के दमन से लेकर इलाहाबाद में छात्रों के आन्दोलनों का दमन और हाल में बीपीएससी तथा एसएससी के छात्रों पर लाठीचार्ज से यह स्पष्ट है कि फ़ासीवादी भाजपा सरकार इस समस्या का समाधान पुलिसिया डण्डों और बूटों के दम पर ही कर सकती है।
देश की करोड़ों-करोड़ मेहनतकश आबादी की स्थिति और भी अधिक भयावह है। बढ़ती मँहगाई के अनुपात में आमदनी में कोई वृद्धि न होने के कारण वास्तविक मज़दूरी बहुत नीचे जा चुकी है और मेहनतकश जनता का बहुत बड़ा हिस्सा नर्क जैसी ज़िन्दगी जीने को मजबूर है। सत्ता में आने के साथ फ़ासीवादी भाजपा सरकार ने मज़दूरों के सारे हक़-अधिकारों को छीनकर उनको पूँजीपतियों की अन्धी ग़ुलामी में झोंकने के लिए हर पैंतरे आजमाने शुरु कर दिये थे। एक-एक कर सारे श्रम क़ानूनों को समाप्त कर दिया गया। कोविड के समय में भी, जब देश की मेहनतकश आबादी भूख से सड़कों पर मरते हुए सैकड़ों-हज़ारों किलोमीटर तक पैदल चलते हुए दर-बदर हो रही थी और कोविड जैसी भयंकर महामारी का सामना कर रही थी; मोदी सरकार ने उनके ऊपर और भयंकर कुठाराघात करते हुए उनके पक्ष में बने सभी श्रम क़ानूनों को निरस्त कर दिया। याद रखने की बात यह भी है कि यह वही दौर था जब दूसरी ओर अम्बानी-अडानी जैसे धनपशुओं की विलासिता की मीनारें लगातार ऊँची होती जा रही थीं। चार लेबर कोड लागू होने के साथ ही मज़दूर-मेहनतकश आबादी पर जारी यह हमला एक नये मुक़ाम पर पहुँच गया है। असंगठित क्षेत्र में काम करने वाली आबादी तो इन हमलों की सबसे बुरी मार झेलती ही है, लेकिन अब संगठित क्षेत्र की आबादी से भी सारी सुरक्षा छीन कर उन्हें असंगठित मज़दूरों की ही स्थिति में पहुँचाया जा रहा है।
इन ग्यारह सालों में फ़ासीवादी सत्ता ने यूएपीए जैसे क़ानूनों में संशोधन करके फ़ासीवादी दमन तंत्र के शिकंज़े को और मजबूत किया है। न्याय प्रणाली में सुधार और औपनिवेशिक दौर के क़ानूनों को ख़त्म करने के नाम पर हर तरह के जनवादी अधिकारों को कुचलने के लिए नयी आपराधिक प्रक्रिया संहिताएँ लागू कर दी गयी हैं। लेकिन सच्चाई यह है कि इन नयी आपराधिक प्रक्रिया संहिताओं में औपनिवेशिक दौर से भी ज़्यादा बर्बर और दमनकारी प्रावधान मौजूद हैं जो न्याय की पूरी प्रक्रिया को ही प्रहसन बना कर रख देते हैं। यूएपीए जैसे क़ानूनों में बदलाव करके इसे और जनविरोधी बनाने और महाराष्ट्र में विशेष जनसुरक्षा विधेयक के लागू किये जाने के पीछे की असली मंशा फ़ासीवादी शिकंज़े को और चाक-चौबन्द करना ही है। अपने शासन काल के बीच में ही भाजपा सरकार ने कुख्यात विभाजनकारी क़ानून एनआरसी-सीएए को लोगों के ऊपर थोपने की कोशिश की थी, जिसका देश की जनता द्वारा बड़े पैमाने पर विरोध हुआ था। लेकिन बिहार में चुनावों के दौरान वोटर लिस्ट की समीक्षा करने के नाम पर भाजपा सरकार एक बार फिर चोर दरवाज़े से एनआरसी-सीएए को लागू करने की फ़िराक़ में है।
आम आबादी का ध्यान असल मुद्दों से भटकाने के लिए अन्धराष्ट्रवादी युद्धोन्माद फ़ासीवाद का एक प्रमुख हथकण्डा होता है। हाल ही में पहलगाम की घटना के बाद जिस तरह से पूरे देश में अन्धराष्ट्रवाद और युद्धोन्माद की लहर पैदा की गयी, वह इस फ़ासीवादी हथकण्डे के इस्तेमाल का सबसे ताज़ा उदाहरण है। दुनिया के सबसे ज़्यादा सैन्यकृत इलाक़ों में से एक कश्मीर में दिनदहाड़े आतंकी हमला करके 24 सैलानियों की हत्या कर दी जाती है। घटना के बाद जिस तरह से फ़ासीवादी प्रचार तंत्र ने सक्रिय होकर इस पूरी घटना के ज़रिये साम्प्रदायिक उन्माद पैदा करना शुरु किया, उससे यह प्रतीत हो रहा था कि मानो यह किसी ऐसी घटना के लिए पहले से ही तैयारी करके बैठे हुए हों। इसके बाद शुरु हुआ देश के भीतर सवाल उठाने वाली हर आवाज़ को दबाने का सिलसिला शुरु हो गया। युद्धोन्माद का माहौल तैयार करने के बाद पाकिस्तान में कई जगहों पर मिसाइलें और बम दागे गये और पाकिस्तान से भी जवाबी कार्रवाइयाँ हुईं। दोनों देशों के शासकों ने अपने-अपने देश में इस युद्धोन्माद का फ़ायदा उठाते हुए आन्तरिक संकट को थोड़ा और आगे टालने का हर सम्भव प्रयास किया। सत्ता के विरुद्ध आवाज़ उठाने वालों की गिरफ़्तारियाँ हुईं। दोनों ही देशों में युद्ध जीत लेने का जश्न मनाते हुए रैलियाँ निकाली गयीं और युद्ध जीत लेने के दावे किये गये। यह बात अलग है विश्व स्तर पर विभिन्न साम्राज्यवादियों के साथ और अन्य देशों के बुर्जुआ शासक वर्गों के साथ अन्तरविरोधों के चलते फ़ासिस्टों के झूठ का भाँडा फूटता रहा। पिछले ग्यारह सालों में दुनिया भर में घूम-घूम कर ख़ुद से ही ख़ुद को वैश्विक नेता होने बना लेने का जो विदूषकीय प्रयास किया जा रहा था, उसकी कलई भी इस दौरान खुल गयी। बेशक जिस उम्मीद के साथ फ़ासिस्टों ने इस युद्धोन्माद को भड़काने का प्रयास शुरु किया था, वह इसे अंजाम तक नहीं पहुँचा सके लेकिन इसने यह साबित कर दिया कि अपने आन्तरिक संकट से निपटने का कोई भी मौक़ा ये फ़ासिस्ट छोड़ते नहीं हैं।
इस ग्यारह सालों में पूँजीवादी मीडिया का वास्तविक जनविरोधी चरित्र भी पूरी तरह बेनकाब हुआ है। 2014 में मोदी के सत्तारोहण से पहले ही देश के सभी पूँजीपति घरानों ने अपनी तिजोरियाँ भाजपा के लिए खोल दी थीं। सभी पूँजीवादी चैनलों ने गुजरात मॉडल के झूठे प्रचार के ज़रिये ‘विकासपुरुष’ की जो छवि पेश करते हुए झूठ परोसने की शुरुआत की थी, यह गोएबल्सी प्रचार हर बीतते दिन के साथ विकृततम होता जा रहा है। गोदी मीडिया के नाम से एक नयी परिघटना का जन्म हुआ जो वास्तव में संगठित फ़ासीवादी प्रचार तंत्र है। ‘व्हाट्सऐप यूनिवर्सिटी’ के रूप में सोशल मीडिया के भी हर स्पेस का फ़ासिस्ट ताक़तों ने पूरी बेशर्मी और नंगई के साथ इस्तेमाल किया। कोविड के दौर में मौतों का आँकड़ा छुपा ले जाने जैसे बर्बर आपराधिक कृत्यों को इसी गोदी मीडिया की मदद से अंजाम दिया, जो ब्रिटिश राज्य में बंगाल में अकाल से होने वाली मौतों को छिपा ले जाने जैसी औपनिवेशिक हुक़ूमत की बर्बरता की कहानियों को भी पीछे छोड़ देता है।
उपरोक्त तथ्य पिछले ग्यारह सालों में फ़ासीवाद द्वारा देश पर बरपा किये गये कहर का एक संक्षिप्त लेखा-जोखा पेश करते हैं। यह समझने की बात है कि आज़ादी के बाद नेहरूवादी “समाजवाद” से कांग्रेसी नवउदारवाद की नीतियों और फ़िर फ़ासीवाद का सत्तारोहण एक अटूट श्रृंखला की कड़ी है, लेकिन अभी हम इसके विस्तार में नहीं जायेंगे। इतना कह देना काफ़ी है कि जिस तरह वाइमर गणराज्य के खण्डहरों पर थर्ड राइख खड़ी हुई थी, हमारे देश में भी कांग्रेसी नवउदारवाद के दौर के आगे बढ़ने और फ़ासीवाद तक की यात्रा करने को भी उसी तरह समझा जा सकता है।

फ़ासीवाद की आम चारित्रिक अभिलाक्षणिकताएँ और आज के दौर में फ़ासीवाद की विशिष्टताएँ

वास्तव में फ़ासीवाद को समझने के लिए हमें सबसे पहले उन चारित्रिक अभिलाक्षणिकताओं को समझना होगा जिनसे हम फ़ासीवाद को परिभाषित करते हैं। साथ ही में आज के फ़ासीवाद की विशिष्टताओं को भी समझना होगा ताकि हम फ़ासीवादी संकट के इस दौर में छात्रों-युवाओं के कार्यभारों को समझ सकें।
पूँजीवादी उत्पादन प्रणाली अपनी गतिकी से लाभप्रदता के संकट को जन्म देती रहती है। पूँजीवादी उत्पादन प्रणाली में उत्पादन का आकार बढ़ने के साथ ही पूँजी निवेश में स्थिर पूँजी का अनुपात बढ़ता है, जिसके फलस्वरूप मुनाफ़े की औसत दर में कमी होती जाती है। नतीजतन लाभप्रदन निवेश के अवसर कम होते जाते हैं और पूँजीपतियों के बीच गलाकाटू प्रतियोगिता और तेज़ होती जाती है। लाभप्रदता के इस संकट के कारण न केवल बेरोज़गारों की फ़ौज़ का आकार बढ़ता जाता है बल्कि पूँजीपति वर्ग के निम्न-बुर्जुआ संस्तरों की तबाही-बर्बादी और असुरक्षा भी बढ़ती जाती है। आर्थिक संकट के किसी विशिष्ट सन्धिबिन्दु पर पहुँचने पर पूँजीवादी राज्यसत्ता के लिए पूँजीपति वर्ग के अलग-अलग धड़ों के हितों का सामूहिकीकरण कर पाना असम्भव हो जाता है। इस राजनीतिक संकट के पैदा होने पर फ़ासीवादी विकल्प का उभार होता है। यह फ़ासीवाद की पहली सामान्य अभिलाक्षणिकता है।
वास्तव में किसी भी समाज में फ़ासीवादी विचारधारा और संगठन की उपस्थिति लम्बे समय तक बनी रह सकती है, लेकिन एक राजनीतिक शक्ति के रूप में फ़ासीवाद का उभार या पूँजीपति वर्ग के सामने फ़ासीवादी विकल्प का चुनाव आर्थिक संकटों के एक विशिष्ट सन्धिबिन्दु पर पैदा हुए राजनीतिक संकट की ही देन होता है। मसलन, भारत में 1925 से ही आरएसएस के रूप में एक फ़ासीवादी संगठन की उपस्थिति रही जो लम्बे समय तक, विशेष तौर पर महात्मा गाँधी की हत्या के बाद, मुख्यधारा की राजनीति से बाहर हाशिये पर पड़ा रहा। लेकिन बढ़ते आर्थिक संकट के दौर में पहले 80 के दशक में और फ़िर नवउदारवाद के दौर में हम फ़ासीवादी शक्तियों के उभार के साक्षी बने।
इसकी दूसरी चारित्रिक अभिलाक्षणिकता इसकी फ़ासीवादी विचारधारा होती है। यह एक विशेष क़िस्म की प्रतिक्रियावादी विचारधारा होती है जो सभी सामाजिक-राजनीतिक-आर्थिक समस्याओं के लिए एक नक़ली शत्रु की छवि का निर्माण करती है। इस शत्रु की छवि को स्थापित करने की प्रक्रिया में तमाम तरह के मिथकों, अफ़वाहों को कॉमन-सेंस के रूप में स्थापित कर दिया जाता है। हिन्दुत्ववादी फ़ासीवादी अपनी ज़रूरत के मुताबिक़ दलितों, महिलाओं, कम्युनिस्टों आदि की शत्रु छवि निर्मित करते हैं, लेकिन भारत में मुख्यतः यह नक़ली शत्रु मुसलमान है।
इन नक़ली शत्रु के बरक्स यह विचारधारा एक विचारधारात्मक समुदाय का निर्माण करती है। इस विचारधारात्मक समुदाय के सदस्यों के बीच एकमात्र साझा बात यह होती है इनकी पहचान उस कल्पित/नक़ली शत्रु से भिन्न होती है। उदाहरण के लिए भारत में किसी भी जाति, धर्म, क्षेत्र, भाषा, राष्ट्रीयता आदि के लोग हिन्दुत्ववादी फ़ासीवादी विचारधारात्मक समुदाय का हिस्सा हो सकते हैं, क्योंकि उनकी साझा पहचान है उनका का मुसलमान न होना।
फ़ासीवादी विचारधारा इस विचारधारात्मक समुदाय के लिए एक फ़्यूहरर छवि का निर्माण करती है जो इस समुदाय का एकमात्र प्रवक्ता/एकमात्र नेता, हमारे देश की परिस्थितियों में यह फ़्यूहरर ‘हिन्दू हृदय सम्राट’ होता है। इस एकमात्र प्रवक्ता/नेता का विरोध करने वाले हर व्यक्ति/समुदाय/विचारधारा को उस कल्पित शत्रु छवि के साथ जोड़ दिया जाता है और उसे पूरे राष्ट्र और बहुसंख्यक समुदाय का शत्रु बना दिया जाता है।
फ़ासीवाद की तीसरी चारित्रिक अभिलाक्षणिकता एक काडर आधारित संगठन है। इसके बूते ही ये पूँजीवादी अर्थव्यवस्था के सबसे असुरक्षित वर्गों यानी निम्नपूँजीवादी वर्गों के आर्थिक संकट से पैदा होने वाले अन्तर्विरोधों, समस्याओं और असुरक्षाओं की ग़लत व्याख्या प्रस्तुत करने, उसे ‘चैनेलाइज़’ करने और प्रतिक्रियावादी आन्दोलन का रूप देने दे पाते हैं। इस रूप में एक काडर आधारित संगठन होना फ़ासीवाद की एक ऐसी विशिष्टता है जो फ़ासीवाद के सभी रूपों में मौजूद होती है। संघ परिवार और इसके सैकड़ों छोटे-बड़े आनुषंगिक संगठनों जैसे विश्व हिन्दू परिषद, बजरंग दल, विद्यार्थी परिषद् आदि के ज़रिये हिन्दुत्ववादी फ़ासीवाद के आधार के रूप में काडर आधारित फ़ासीवादी सांगठनिक ढाँचा मौजूद है।
फ़ासीवाद की चौथी चारित्रिक अभिलाक्षणिकता यह है कि यह निम्न पूँजीवादी टुटपूँजिया वर्गों का एक संगठित प्रतिक्रियावादी सामाजिक आन्दोलन होता है। यह सामाजिक आन्दोलन वास्तव में निम्न पूँजीवादी वर्गों का रहस्यात्मक और रूमानी उभार होता है। वास्तव में यह टुटपूँजिया वर्ग एक ऐसी आर्थिक-सामाजिक स्थिति में होता है जहाँ इसकी आकांक्षाएँ ऊपर की सीढ़ी चढ़कर बुर्जुआ वर्ग की ओर बढ़ने की होती हैं। लेकिन पूँजीवाद की गति इसके बड़े हिस्से को आर्थिक-सामाजिक असुरक्षा में ढकेलती रहती है। इसकी हताशा-निराशा और असफलता इसे प्रतिक्रिया की तरफ़ ले जाती है। फ़ासीवाद इस प्रतिक्रिया के सामने एक नक़ली दुश्मन को खड़ा कर देता है, उदाहरण के लिए भारत में सभी समस्याओं के ज़िम्मेदार मुसलमान आबादी बन जाती है। ऐसे में असली दुश्मन यानि पूँजीवाद को छिपा लिया जाता है। यानी फ़ासीवाद असल समस्याओं का ‘मिसर्टिक्युलेशन’ करता है, जो इसके चरित्र को रहस्यात्मक रूप देता है। रूमानी इसलिए कि यह प्रतिक्रियावादी सामाजिक आन्दोलन एक ऐसे गौरवशाली अतीत का आह्वान करता है जो कभी था ही नहीं।
फ़ासीवाद की अन्तिम चारित्रिक अभिलाक्षणिकता यह है कि यह इस निम्न-पूँजीवादी प्रतिक्रिया को विशेष तौर पर बड़ी पूँजी, और आम तौर पर पूँजी की सेवा में सन्नद्ध कर देता है। यानि इस वर्ग के वास्तविक अन्तर्विरोधों को ‘मिसआर्टिक्युलेट’ और ‘डिसलोकेट’ करके इसके हितों के विपरीत इसे बड़ी पूँजी का पुछल्ला बना दिया जाता है।
जैसा कि हमने पहले उल्लेख किया है कि पूँजीवादी आर्थिक संकट फ़ासीवादी उभार की अनिवार्य पूर्वशर्त है। पूँजीवादी उत्पादन प्रणाली के कारण बार-बार पैदा होने वाले आर्थिक संकटों का चक्र हर बार पहले से अधिक लम्बा होता जा रहा है और आज की स्थिति यह है कि 2006 की आर्थिक मन्दी के बाद से विश्व पूँजीवाद के सामने का संकट हर दिन गहराता ही जा रहा है। पूँजीवादी व्यवस्था के “अच्छे दिनों” की उम्मीद लगाये बैठे नीम-हक़ीमों के सारे नुस्ख़े फेल हो चुके हैं और पिछले लम्बे समय से विश्व पूँजीवाद ने तेज़ी का कोई दौर देखा ही नहीं है। नवउदारवाद के मौजूदा दौर में आर्थिक संकट चिरकालिक, दीर्घकालिक बन गया है। इस कारण राजनीतिक संकट की भी सतत मौजूदगी बनी हुई है। ऐसे में समकालीन फ़ासीवाद भी कमोबेश एक दीर्घकालिक, स्थायी परिघटना का रूप ले चुका है। यह आज के दौर के फ़ासीवाद की पहली विशिष्टता है।
इतिहास ने जब पहली बार फ़ासीवादी का उभर देखा तो यह एक आकस्मिक परिघटना, एक इवेण्ट की तरह घटित हुआ था। लेकिन आज के दौर का फ़ासीवाद किसी ‘इवेण्ट’ की तरह नहीं है जिसकी पहचान उसके तीव्र उभार और तीव्र ध्वंस से हो बल्कि अब यह कमोबेश एक स्थायी परिघटना, एक सतत जारी परियोजना का रूप ले चुका है। यह एक लम्बे ऊष्मायन काल से हो कर गुज़रता है।  इस लम्बे ऊष्मायन काल में यह राज्य सत्ता के विभिन्न अंगों-उपांगों में अपनी घुसपैठ करता है, दूसरी तरफ़ संस्थाबद्ध सुधार कार्यों के ज़रिये समाज के पोर-पोर में अपनी आणविक व्याप्ति को अंजाम देता हुआ अपनी अवस्थितियों को मजबूत करता है। यह आज के दौर के फ़ासीवाद की दूसरी विशिष्टता है।
आज के दौर के फ़ासीवाद की तीसरी विशिष्टता यह है कि आज के दौर में यह पूँजीवादी जनवाद के खोल यानी संसद, चुनाव आदि को बनाये रखता है, लेकिन इसे अन्दर से इसे खोखला बना देता है। अभी वोट चोरी के मुद्दे या चुनाव आयोग और न्याय पालिका के बर्ताव को देख कर समझ सकते हैं कि किस तरह जनवाद के स्तम्भों में फ़ासीवाद की घुसपैठ हो चुकी है। यह वास्तव में उनके खोल को बनाये रखकर रखकर इसके जनवादी अन्तर्य को लगातार रिक्त करता जाता है। यानी औपचारिक तौर पर किसी आपवादिक क़ानून आदि के ज़रिये पूँजीवादी संसदीय जनवाद के बाहरी आवरण का त्याग नहीं किया जाता है, लेकिन पूँजीवादी जनवाद की सभी संस्थाओं का आन्तरिक टेकओवर कर लिया जाता है। यानी पूँजीवादी जनवाद की अन्तर्वस्तु लगातार क्षरित होती रहेगी, लेकिन उसका बाहरी खोल बरक़रार रहेगा।
आज के दौर के फ़ासीवाद की चौथी विशिष्टता यह है कि एक त्रुटि-निवारक गतिविधि (redemptive activity) के तौर पर फ़ासीवादियों ने भी अपने अतीत से सबक़ लिया है कि बुर्ज़ुआ जनवाद को औपचारिक तौर पर समाप्त कर देने की अन्तिम परिणति फ़ासीवादी शक्तियों के सम्पूर्ण विनाश में हुई थी। फ़ासीवादी नेतृत्व ने सचेत तौर पर अपनी रणनीति में बदलाव किया है और बुर्जुआ जनवाद का औपचारिक समापन करना अब फ़ासीवादी शक्तियों की ज़रूरत नहीं रह गयी है। इसकी एक वजह तो यह है कि नवउदारवाद के दौर में बुर्जुआ जनवाद अपनी सारी जनवादी सम्भवनासम्पन्नता से पहले ही रिक्त हो चुका है। दूसरे जैसा कि हमने पहले ही स्पष्ट किया है, बुर्जुआ जनवादी संस्थाओं के आन्तरिक टेकओवर के ज़रिये फ़ासीवादी शक्तियाँ बुर्जुआ जनवाद के खोल/रूप को बनाये रखते हुए, बिना किसी आपवादिक क़ानून को लागू किये अपने कृत्यों को अंजाम देने में सक्षम है। इसके लिए संसद भंग करने जैसे आपराधिक क़ानून आदि की कोई आवश्यकता नहीं है। बेशक, इसका अर्थ यह नहीं है कि ऐसे किसी आपवादिक क़ानून की सम्भावना से ही इनकार कर दिया जाये लेकिन इसकी सम्भावना नहीं के बराबर रह गयी है।
21वीं सदी के फ़ासीवाद की पाँचवी विशिष्टता यह है कि आज नवउदारवाद के इस दीर्घकालिक संकट के दौर में फ़ासीवाद पूँजीवादी समाज की स्थायी परिघटना बन चुका है। समाज और राज्यसत्ता में अपनी अवस्थितियों को सुदृढ़ कर यह अपनी मौजूदगी बनाये रखता है। बेशक यह चुनाव में हारकर सत्ता से बाहर जा सकता है लेकिन यह इसकी निर्णायक हार नहीं होगी।
लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि फ़ासीवाद अप्रतिरोध्य है। हमें यह समझना चाहिए फ़ासीवाद को एक निर्णायक चुनौती देने की सबसे बुनियादी शर्त है कि तृणमूल स्तर पर मज़दूर वर्ग और मध्यवर्ग के रैडिकल हिस्से की क्रान्तिकारी लामबन्दी की जाये। लेकिन फ़ासीवाद के ख़िलाफ़ आम मेहनतकश जनता की क्रान्तिकारी लामबन्दी की दिशा में आगे बढ़ने से पहले देश के क्रान्तिकारी छात्र-युवा आन्दोलन के सामने भी ऐसी चुनौतियाँ हैं, जिनसे पार पाना बहुत ज़रूरी है।
क्रान्तिकारी छात्र-युवा आन्दोलन को सही अर्थों में क्रान्तिकारी होने के लिए उन वर्गों से आने वाले छात्रों-युवाओं को संगठित करने की दिशा में बढ़ना होगा जो आज विश्वविद्यालय-कॉलेजों तक पहुँच ही नहीं पा रहे हैं। यानी मज़दूर वर्ग और निम्न-मध्यवर्ग से आने वाली छात्रों-युवाओं की वह आबादी जिसकों बढ़ती फ़ीसों-घटती सीटों और शिक्षा के बढ़ते निजीकरण ने शिक्षा से दूर ढकेल दिया है।
विश्वविद्यालयों में स्ववित्तपोषित सीटों को बढ़ावा देने की लहर चल पड़ी है। पूँजीपतियों द्वारा विश्वविद्यालयों से लेकर तमाम वैज्ञानिक और शोध संस्थानों में निवेश करके उन्हें अपने इण्टरप्राइज़ेज में तब्दील किया जा रहा है। यूजीसी जैसे संस्थानों द्वारा मिलने वाले ग्राण्ट में हर साल कमी की जा रही है। विश्वविद्यालयों को मजबूर किया जा रहा है कि हेफ़ा से क़र्ज़ लेकर वह शिक्षा का सारा ख़र्च आम छात्रों की जेब से वसूलें या फिर विश्वविद्यालयों को पूँजीपतियों के शॉपिंग कॉम्प्लेक्स में बदल दें। भाजपा की राज्य सरकारें भी इसमें पीछे नहीं हैं। एक बड़ी आबादी किसी तरह से दूर-दराज़ के कॉलेजों से प्राइवेट डिग्री लेकर, डिप्लोमा कोर्स करके या दूरस्थ माध्यमों से शिक्षा हासिल करके, अथवा किये बिना ही रोज़गार की दौड़ में लग जाती है या दिल्ली, मुम्बई, पंजाब जैसे औद्योगिक इलाक़ों में जाकर खटने लगती है। युवाओं का यह तबका सही मायने में औपचारिक शिक्षा प्रणाली का हिस्सा ही नहीं बन पाता है। साथ ही यह पूरी प्रक्रिया शिक्षा के रहे-सहे अकादमिक स्तर को भी रसातल में पहुँचा देती है। यह वह आबादी है जिसके लिए शिक्षा और रोज़गार का सवाल सबसे अधिक ज्वलन्त सवाल है। जो छात्र-युवा किसी तरह से कैम्पस पहुँच जा रहे हैं, उनके लिए कैम्पस को हर तरह के सामाजिक सरोकारों से कटा हुआ एक घेट्टो बना दिया गया है जहाँ उनका काम रट्टा मारकर रोज़गार की दौड़ में जुट जाना है। साथ ही कैम्पस में पहुँचने वाले छात्रों को शासक वर्ग की विचारधारा के रंग में रंगने के लिए हर तरह के प्रावधान कर दिये गये हैं। नयी शिक्षा नीति – 2020 में मोदी सरकार द्वारा विश्वविद्यालयों के संचालन की प्रक्रिया में स्थानीय ‘मानिन्द’ लोगों को शामिल करने का प्रावधान किया गया था। इस प्रावधान के आने के बाद से ही यह पता था कि यह ‘मानिन्द’ लोग संघ और भाजपा के लोग ही हो सकते हैं। यानी एक तरफ़ तो विश्वविद्यालय में पूरी तरह से जनवाद का ख़ात्मा करते हुए छात्रसंघ जैसी संस्थाओं को समाप्त कर दिया गया है ताकि छात्रों का विश्वविद्यालय में लागू होने वाले फ़ैसलों में कोई प्रतिनिधित्व ही न हो सके। बात-बात पर निलम्बन निष्कास एक आम नियम बन चुका है। दूसरी ओर फ़ासीवादी घुसपैठ के लिए तरह-तरह के दरवाज़े खोल दिये गये हैं। अभी हाल ही में बीएचयू की कार्यकारिणी परिषद में भाजपा के तीन नेताओं को शामिल किया जाना इसका सबसे ताज़ा उदाहरण है। ऐसे में विश्वविद्यालय परिसरों के भीतर जनवादी स्पेस के लिए जुझारू छात्र आन्दोलन खड़ा करना भी आज के समय में हमारे सामने एक महत्वपूर्ण कार्यभार है।
इसके साथ ही क्रान्तिकारी छात्र-युवा आन्दोलन को निम्न-मध्यवर्गीय अथवा मध्यवर्गीय आबादी के बीच से आने वाले छात्रों-युवाओं के बीच में भी क्रान्तिकारी प्रचार करके उन्हें अपने पक्ष में लामबन्द करना चाहिए। छात्रों-युवाओं की यह आबादी बेशक मज़दूर वर्ग से आने वाले छात्रों-युवाओं की तुलना में थोड़ी बेहतर जीवन स्थितियों में होती है लेकिन पूँजीवादी व्यवस्था में असुरक्षा की तलवार लगातार इनके ऊपर भी लटकती रहती है। पूँजीवाद के मौजूदा संकट की स्थिति में इस वर्ग की असुरक्षा और अधिक बढ़ जाती है, जिस असुरक्षा को आज फ़ासीवादी संगठन सम्बोधित करते हुए ‘मिसआर्टिक्युलेट’ करने में सफल हुए हैं। लेकिन सतत क्रान्तिकारी प्रचार और आन्दोलनात्मक कार्रवाइयों के ज़रिये इस आबादी के एक बड़े हिस्से को अपने पक्ष में मोड़ा जा सकता है। इस प्रक्रिया में इस आबादी के बीच से ऐसे छात्रों-युवाओं की एक संख्या सामने आयेगी जो अपनी वर्गीय चेतना और सीमाओं का अतिक्रमण करेगी।
क्रान्तिकारी छात्र-युवा आन्दोलन के सामने एक प्रमुख चुनौती यह भी है कि जहाँ एक तरफ़ उत्पादक शक्तियों के विकास ने समाज के निचले संस्तर तक के मज़दूरों की औसत चेतना को ऊपर उठाने का काम किया है, वहीं पूँजीवादी संस्कृति ने इस चेतना को वर्गीय दृष्टिकोण से भ्रष्ट करने का पूरा प्रयास किया है। यानी क्रान्तिकारी छात्र-युवा आन्दोलन के सामने व्यक्तिवाद, करियरवाद और अराजकता की चुनौती आज पहले से कहीं अधिक गम्भीर चुनौती के रूप में मौजूद है।
इसके अलावा, नयी शिक्षा नीति के ज़रिये शिक्षा व्यवस्था के फ़ासीवादीकरण और संघ परिवार द्वारा अपने विभिन्न आनुषंगिक संगठनों के ज़रिये छात्रों-युवाओं के एक आबादी के बीच बहुत शुरुआती दौर से ही फ़ासीवादी विचारधारा का प्रभुत्व स्थापित कर दिया जाता है। विश्वविद्यालयों-कॉलेजों के स्तर पर स्थिति यह है कि ज़्यादातर जगहों पर छात्रसंघ जैसी संस्थाएँ हैं ही नहीं। जहाँ कहीं यह है भी, वहाँ भी लिंगदोह कमेटी की सिफ़ारिशों ने इसे पंगु बना दिया है। रही-सही कसर चुनावबाज पार्टियाँ और उनके छात्र संगठन पूरी कर देते हैं जो छात्रसंघ की पूरी राजनीति को एमपी-एमएलए के ट्रेनिंग सेण्टर और अपनी चुनावी राजनीति में भर्ती के केन्द्रों के रूप में इस्तेमाल करते हैं। कुल मिलाकर कहा जाये तो यह पूरी राजनीति भी छात्रों-युवाओं के संजीदा हिस्से को विराजनीतिकरण की दिशा में ढकेलती है।
ऐसी स्थिति में क्रान्तिकारी छात्र-युवा आन्दोलन को न केवल छात्रों-युवाओं के सवाल को वर्गीय दृष्टिकोण से देखने की ज़रूरत है बल्कि छात्र-युवा आबादी के तात्कालिक सवालों जैसे शिक्षा व रोज़गार के सवाल को भी एक व्यापक परिप्रेक्ष्य में देखने की ज़रूरत है। यानी शिक्षा और रोज़गार के सवाल को छात्रों-युवाओं के तात्कालिक सवाल तक सीमित रखने की बजाय व्यवस्था विरोधी आन्दोलन की दिशा में लेकर जाना। इस दिशा में बढ़ने पर ही क्रान्तिकारी छात्र-युवा आन्दोलन देश की आम मेहनतकश जनता के आन्दोलनों के साथ एकता स्थापित कर सकता है।
वास्तव में फ़ासीवाद का सामाजिक आधार निम्न-पूँजीवादी वर्ग होता है। यह वर्ग अपनी आर्थिक और सामाजिक असुरक्षा व अनिश्चितता से परेशान होता है। पूँजीवादी व्यवस्था के पदानुक्रम में ऊपर पहुँचने की इसकी महत्वाकांक्षा पर पूँजीवादी व्यवस्था की गतिकी और पूँजीपति वर्ग द्वारा कुठाराघात होता रहता है। इसके पीछे काम के वास्तविक वर्गीय अन्तरविरोधों पर पर्दा डालकर फ़ासीवादी इसकी इस स्थिति को मिसआर्टिक्युलेट करते हैं। इसके सामने एक नक़ली दुश्मन पेश करते हैं जिसे इसकी सभी समस्याओं के लिए ज़िम्मेदार ठहराया जाता है। इस रूप में पैदा की गयी टुटपूँजिया प्रतिक्रिया को फ़ासीवादी विशेष तौर पर बड़ी पूँजी और आमतौर पर पूँजी के हितों की सेवा में सन्नद्ध कर देते हैं। इसी तरह मज़दूर वर्ग का भी एक हिस्सा, जिसकी पहचान उसकी विघटित वर्ग चेतना से होती है, फ़ासीवादी क़तारों का हिस्सा बनता है। निम्न-बुर्जुआ वर्ग की चेतना के फ़ासीवादी मिसआर्टिक्युलेशन का ज़वाब हमें सही क्रान्तिकारी चेतना के प्रसार से देना होगा। यानी इस निम्न-बुर्जुआ वर्ग के निचले संस्तरों को ज़्यादा से ज़्यादा रैडिकलाइज़ करना आज के दौर में फ़ासीवाद विरोधी क्रान्तिकारी छात्र-युवा आन्दोलन का एक अहम कार्यभार है। इसके लिए छात्रों-युवाओं को इस आबादी के बीच निरन्तर, गहन और व्यापक क्रान्तिकारी प्रचार करना चाहिए। इस प्रचार के माध्यम से इस आबादी को इनकी वास्तविक समस्याओं के ठोस कारणों की पहचान करानी होगी। इन समस्याओं पर इन्हें जागरूक-संगठित-गोलबन्द करते हुए इस आबादी के नियमित शिक्षण-प्रशिक्षण के कार्यक्रम हाथ में लेने होंगे। इन्हें क्रान्तिकारी सामाजिक आन्दोलन का हिस्सा, मज़दूर वर्ग का वास्तविक साथी बनाना होगा। हम फ़ासीवाद के सामाजिक आधार से इस आबादी के जितने बड़े हिस्से को तोड़ पायेंगे, फ़ासीवाद के विरुद्ध संघर्ष में हम उतनी बड़ी चोट कर पाने में सफल होंगे।

मुक्तिकामी छात्रों-युवाओं का आह्वान, जुलाई-अगस्त 2025

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