Category Archives: विज्ञान

मानव ज्ञान का चरित्र और विकास

ज्ञान मूल रूप से व्यवहार पर टिका होता है। व्यवहार के दौरान ही इंसान ख़ुद के संवेदनाबोध को परखता है तथा संवेदनाबोध द्वारा पैदा हुई धारणाओं का भी व्यवहार में ही निर्माण करता है। व्यवहार का तात्पर्य सामाजिक व्यवहार है। ज्ञान सिर्फ सामाजिक व्यवहार से ही पैदा होता है। सामाजिक सम्बन्धों में रहते हुए सामाजिक इंसान का व्यवहार। अगर कोई इंसान किसी वस्तु को जानना चाहता हो तो उसको वस्तु के वातावरण में आना ही होगा। कोई भी विद्वान किसी वस्तु या प्रक्रिया का ज्ञान घर बैठे नहीं प्राप्त कर सकता है। हालाँकि आज के वैज्ञानिक तथा इण्टरनेट के युग में यह बात चरितार्थ लगती है कि विद्वान सचमुच ही घर बैठे-बैठे कम्प्यूटर पर क्लिक करके ज्ञान प्राप्त कर सकते हैं। परन्तु सच्चा व्यक्तिगत ज्ञान उन्हीं लोगो को प्राप्त होता है जो व्यवहार में लगे होते हैं। यह ज्ञान विद्वानों तक (लेखन तथा तकनीक द्वाराद्ध तभी पहुँचता है जब व्यवहार में लगे लोग वह ज्ञान प्राप्त करते हैं। इसलिए मानव ज्ञान के दो भाग होते हैं – प्रत्यक्ष ज्ञान व अप्रत्यक्ष ज्ञान। अप्रत्यक्ष ज्ञान दूसरों के लिए प्रत्यक्ष ज्ञान होता है। इस तरह सम्पूर्ण ज्ञान भी सामाजिक होता है। यह मुख्यतः इंसान की उत्पादक कार्यवाही पर निर्भर करता है।

नाभिकीय ऊर्जा की शरण: देशहित में या पूँजी के हित में?

सवाल यह है ही नहीं कि नाभिकीय ऊर्जा का उपयोग किया जाना चाहिए या नहीं। किसी भी ऊर्जा स्रोत का उपयोग किया जा सकता है, बशर्ते कि उस पूरे उपक्रम के केन्द्र में मुनाफा नहीं बल्कि मनुष्य हो। नाभिकीय ऊर्जा के जिन स्वरूपों के सुरक्षित उपयोग की तकनोलॉजी आज मौजूद है, उनकी भी उपेक्षा की जाती है और उचित रूप से उनका उपयोग नहीं किया जा सकता है। दूसरी बात, नाभिकीय रियेक्टर बनाने का काम किसी भी रूप में निजी हाथों में नहीं होना चाहिए क्योंकि इन कम्पनियों का सरोकार सुरक्षा नहीं बल्कि कम से कम लागत में अधिक से अधिक मुनाफा होगा। तीसरी बात, नाभिकीय ऊर्जा के जिन रूपों का उपयोग सुरक्षित नहीं है, उन पर कारगर शोध और उसके बाद उसे व्यवहार में उतारने के कार्य किसी ऐसी व्यवस्था के तहत ही हो सकता है, जिसके लिए निवेश कोई समस्या न हो। यानी, कोई ऐसी व्यवस्था जिसके केन्द्र में पूँजी न होकर, मानव हित हों।

एस-बैण्ड घोटाला: सारे घोटालों का नया सरदार!

एक ऐसे समाज में जहाँ हर काम को करने की प्रेरक शक्ति निजी मुनाफ़ा और लालच हो, वहाँ विज्ञान और वैज्ञानिक अनुसन्धान भी इसके प्रभाव से अछूते नहीं रह सकते। एस-बैण्ड स्पेक्ट्रम घोटाले ने इसी बात को एक बार फिर रेखांकित किया है। जहाँ विज्ञान और तकनोलॉजी का मकसद ही मानव जीवन की बेहतरी न होकर निजी कम्पनियों का मुनाफ़ा हो वहाँ पर इसरो जैसा स्वच्छ छवि वाला संस्थान भी भ्रष्टाचार के कलंक से अछूता नहीं रह सकता।

आस्था मूलक दर्शनों से विज्ञान की मुठभेड़ सतत् जारी है

विज्ञान और आस्था के बीच के टकराव में विज्ञान आज तक विजयी रहा है और उसने आस्था के प्रभाव-क्षेत्र को संकुचित करने का काम किया है। मौजूदा अवैज्ञानिक पूँजीवादी व्यवस्था कूपमण्डूकता और अतार्किकता फैलाने के अपने प्रयासों के ज़रिये नये सिरे से मूर्खतापूर्ण आस्थाओं को जन्म दे रही है। विज्ञान को इन नयी कूपमण्डूकताओं पर विजय पानी होगी और इसके लिए सिर्फ कुछ वैज्ञानिक प्रतिभाओं की आवश्यकता नहीं है, बल्कि सामाजिक-आर्थिक बदलाव की भी आवश्यकता है।

मानव जाति के अन्त की भविष्यवाणी!

यह आज का सच है कि इस पूँजीवादी व्यवस्था ने, अपनी-अपनी आलीशान लक्ज़री गाड़ियों की गद्दीदार सीटों में मोटी-मोटी तोंदें लेकर धँसे धनपुशओं ने अधिक से अधिक मुनाफा पीटने की हवस में पृथ्वी के पर्यावरण को बेहिसाब क्षति पहुँचायी है और अभी भी पहुँचा रहे हैं। लेकिन इसके साथ ही यह भी सच है कि आज यह अहसास लोगों के दिलों में घर बना रहा है कि यह व्यवस्था आज लगभग समस्त मानव जाति के लिए एक बोझ बन चुकी है। आज यह व्यवस्था मानव जाति को कुछ भी सकारात्मक देने की अपनी शक्ति खो चुकी है। अब इसका स्थान इतिहास की कचरापेटी में ही है और इससे पहले कि पूँजीवाद पृथ्वी के पर्यावरण को मानवजाति के रहने लायक न छोड़े, यह व्यवस्था उखाड़ फेंकी जायेगी। मानव जाति ने इससे पहले भी अत्याचार और शोषण के अन्धकार में डूबी समाज व्यवस्थाओं को नष्ट किया है और प्रगति की ओर कदम बढ़ाये हैं।

कृत्रिम कोशिका का प्रयोग और नैतिकता

विज्ञान को इस व्यवस्था के भीतर आमतौर पर पूँजी की चाकरी और अत्यधिक मुनाफा लूटने की गाड़ी में बैल की तरह नाँध दिया गया है। निश्चित रूप से दार्शनिक रूप से विज्ञान के हर उन्नत प्रयोग ने भौतिकवाद को पुष्ट किया है और तर्क और रीज़न के महाद्वीपों को विस्तारित किया है। इस प्रयोग ने भी अध्यात्मवाद, भाववाद और अज्ञेयवाद की कब्र पर थोड़ी और मिट्टी डालने का काम किया है। इस रूप में ऐतिहासिक और दार्शनिक तौर पर इस प्रयोग की एक प्रगतिशील भूमिका है। लेकिन हर ऐसे प्रयोग का पूँजीवादी व्यवस्था के भीतर आमतौर पर मुनाफे और मुनाफे को सुरक्षित रखने वाले दमन-तन्त्र को उन्नत बनाने के लिए ही उपयोग किया जाता है। इसलिए आज हर युवा वैज्ञानिक के सामने, जो विज्ञान की सही मायने में सेवा करना चाहता है, जो मानवता की सही मायने में सेवा करना चाहता है, मुख्य उद्देश्य इस पूरी मानवद्रोही अन्यायपूर्ण विश्व पूँजीवादी व्यवस्था का विकल्प पेश करना और उसके लिए संघर्ष करना होना चाहिए। एक अनैतिक व्यवस्था के भीतर नैतिक-अनैतिक की बहस ही अप्रासंगिक है।

भौतिकवाद के लिए संकट?

अगर फील्ड्स थियरी सही सिद्ध होती है और हिग्स बुसॉन मिलता है तो भी द्वन्द्वात्मक भौतिकवाद के लिए कोई संकट नहीं है। यदि हिग्स बुसॉन मिलता है तो बस इतना ही साबित होगा कि भौतिक विश्व का एक नया पहलू था जो अब तक उद्घाटित नहीं हुआ था। द्वन्द्वात्मक भौतिकवाद इसकी व्याख्या, विस्तार और अन्य क्षेत्रों में इसके डेरिवेशन से और अधिक उन्नत होगा। भौतिकवाद ने द्रव्यमान वाले पदार्थ (मास्सिव मैटर) की मौजूदगी को अपना आधार कभी नहीं माना, बल्कि भौतिक विश्व या सामान्य रूप में भौतिकता को अपना आधार माना है। इसलिए पदार्थ की पैदाइश साबित होने से भौतिकवाद की सेहत पर कोई प्रतिकूल असर नहीं पड़ेगा बल्कि उसके उत्तरोत्तर विकास का एक नया रास्ता दिख जाएगा ।

पूँजी की सेवा में विज्ञान

विज्ञान, वैज्ञानिक, शोधकर्ता और विज्ञान के छात्रों – इन सबका उत्पादक श्रम और उत्पादक श्रम करने वाली मेहनतकश जनता से अलगाव अधिक से अधिक होता जाता है। परिणामत: विज्ञान अपनी जीवन शक्ति से वंचित होता जाता है। उसमें सतही कृत्रिम विकास तो क्रमिक प्रक्रिया में जारी रहता है लेकिन समाज से सापेक्षित रूप से पूर्ण कटाव उसे मृत और अबोधगम्यता की हद तक “अमूर्त” बनाता जाता है, एक ऐसा अमूर्तन जो वैज्ञानिक अमूर्तन नहीं कहा जा सकता। विज्ञान का विकास अधिक से अधिक श्रम–विरोधी रूप लेता चला जाता है और यह केवल अमीरज़ादों को आराम व मनोरंजन के नए–नए साधन प्रदान करने वाला उपकरण और मेहनतकश आबादी के शोषण को और अधिक दक्ष, सूक्ष्म और व्यापक बनाने वाला साधन मात्र बनकर रह गया है। इस प्रकार पूँजीवादी व्यवस्था में विज्ञान समाज से कटकर बाज़ार के अधीन होता जाता है और इन अर्थों में पूँजी की सेवा करने वाला एक उपकरण मात्र बनकर रह जाता है।

पूँजीवाद का ढकोसला और डार्विन का सिद्धान्‍त

योग्यतम की उत्तरजीविता का सिद्धांत अलग-अलग प्रजातियों के बीच लागू होता है न कि एक ही प्रजाति के सदस्यों के बीच। डार्विन के अनुसार किसी भी प्रजाति की उत्तरजीविता व विकास के लिए उसके सदस्यों के बीच आपसी निर्भरता व सहयोग की आवश्यकता होती है। इसलिए योग्यतम की उत्तरजीविता का सिद्धान्त मानव समाज के ऊपर लागू नहीं किया जा सकता।