सिरिज़ा की विजय पर क्रान्तिकारी ताक़तों को ख़ुश क्यों नहीं होना चाहिए
सिरिज़ा ने सरकार बनते वक़्त ही देश के पूँजीपतियों और कारपोरेट घरानों के डर को दूर करते हुए कहा था कि उन्हें सिरिज़ा सरकार से डरने की ज़रूरत नहीं है। सिरिज़ा की राजनीति स्पष्ट तौर पर क्रान्तिकारी परिवर्तन का निषेध करती है। सिप्रास ने एक बार कहा था कि उनकी पार्टी बोल्शेविक विचारधारा को नहीं मानती है और ‘शीत प्रासाद पर धावे’ का युग बीत चुका है। स्पष्ट तौर पर नयी समाजवादी क्रान्तियों में शीत प्रासाद पर धावे जैसी कोई चीज़़़ होगी, इसकी अपेक्षा करना बेकार है। लेकिन सिप्रास का ‘शीत प्रासाद पर धावे’ वाक्यांश का प्रयोग वास्तव में क्रान्तिकारी रास्ते से व्यवस्था-परिवर्तन के लिए एक रूपक था और उनके अनुसार वास्तव में बल प्रयोग से एक वर्ग द्वारा दूसरे वर्ग से सत्ता छीनने के प्रयास ही व्यर्थ हैं। चुनाव जीतकर सरकार बनाने के बाद सिरिज़ा सरकार वही कर रही है जो कि उसकी राजनीतिक विचारधारा है– एक नये किस्म की सामाजिक जनवादी विचारधारा, एक किस्म का नवसंशोधनवाद! सामाजिक जनवाद के इस नये अवतरण में बुर्जुआ नारीवाद, अस्मितावाद, एनजीओ-ब्राण्ड ‘सामाजिक आन्दोलन’, तृणमूल जनवाद, भागीदारी जनवाद आदि जैसी विश्व बैंक पोषित अवधारणाओं का छौंका लगाया गया है। इस नये छौंके से इस सामाजिक जनवादी चरित्र प्रतीतिगत तौर पर कुछ धुँधला हो जाता है और इसके जुमले गर्म हो जाते हैं। लेकिन वास्तव में इस नये सामाजिक जनवाद का कार्य वही है जो पुराने सामाजिक जनवाद का था– पूँजीवादी व्यवस्था की आख़िरी सुरक्षा पंक्ति की भूमिका निभाना!















