खुदरा व्यापार में प्रत्यक्ष विदेशी निवेशः समर्थन, विरोध और सही क्रान्तिकारी अवस्थिति
पूँजीवादी विकास की नैसर्गिक गति छोटी पूँजी को तबाह करेगी ही करेगी और छोटे उत्पादकों, उद्यमियों और व्यापारियों के एक बड़े हिस्से को बरबाद कर सर्वहारा की कतार में ला खड़ा करेगी। ऐसे में, एक वैज्ञानिक क्रान्तिकारी का काम इस छोटी पूँजी को ज्यों-का-त्यों बचाये रखने की गुहार लगाना नहीं, बल्कि इस टटपुंजिया वर्ग में और ख़ास तौर इसके सबसे निचले हिस्सों में (जिसमें कि वास्तव में अर्द्धसर्वहाराओं की बहुसंख्या है) यह क्रान्तिकारी प्रचार करना है कि पूँजीवादी व्यवस्था में छोटी पूँजी की यही नियति है और पूँजीवादी व्यवस्था और समाज के दायरे में रहते हुए इस तबाही और बरबादी से छोटा निम्न पूँजीपति वर्ग नहीं बच सकता है। अगर उसे इस नियति से बचना है तो उसे इस व्यवस्था की चौहद्दी के पार सोचना होगा; एक ऐसी व्यवस्था के बारे में सोचना होगा जो हरेक नागरिक को रोज़गार, शिक्षा, चिकित्सा, आवास और हर प्रकार की बुनियादी सामाजिक व आर्थिक सुरक्षा मुहैया करा सके। ऐसी व्यवस्था एक समाजवादी व्यवस्था ही हो सकती है। पूँजीवाद का यही एकमात्र सही, व्यावहारिक और वैज्ञानिक विकल्प है।












