• मारुति सुजुकी के मज़दूरों का संघर्ष और भारत के ‘‘नव-दार्शनिकों” के “अति-वामपन्थी” भ्रम और फन्तासियाँ मारुति सुजुकी के मज़दूरों का संघर्ष और भारत के ‘‘नव-दार्शनिकों” के “अति-वामपन्थी” भ्रम और फन्तासियाँ मारुति सुजुकी के मज़दूरों का संघर्ष निस्सन्देह हमारे समय का एक बेहद महत्वपूर्ण संघर्ष है। अपने संघर्ष में मज़दूरों ने शानदार साहस और एकजुटता का प्रदर्शन किया है। हो सकता है कि फिलहाल मज़दूर थोड़ा पस्तहिम्मती का शिकार हों और राज्यसत्ता की एजेंसियों के उत्पीड़न से बचने के लिए दर-दर भटक रहे हों। लेकिन वे बार-बार गिरकर खड़े हो रहे हैं, हार मानने को तैयार नहीं हैं और अपना संघर्ष जारी रखे हुए हैं। इसीलिए, उनके संघर्ष ने पूँजी की ताकतों में भय का संचार किया है। मानेसर प्लाण्ट को दोबारा चालू करने से पहले कम्पनी ने एक वक्तव्य में कहा कि मारुति सुजुकी धीरे-धीरे कम्पनी में ठेके की व्यवस्था को समाप्त करेगी, या बहुलांश मज़दूरों को स्थायी अनुबन्ध पर रखा जायेगा। कम्पनी ऐसा करे या न करे, यह बयान उसके भय को अवश्य दिखलाता है। ऐसा मज़दूर जुझारूपन, जो कि मारुति सुजुकी के मज़दूरों ने दिखाया है, वह कुचल दिया जाये तो भी लम्बे दौर में कुछ उपलब्धियाँ अवश्य हासिल करता है। मारुति सुजुकी के मज़दूरों के संघर्ष के इन सकारात्मक नतीजों के बावजूद, इसे एक रैडिकल और आलोचनात्मक दृष्टिकोण से समझना ज़रूरी है।
    • केजरीवाल एण्ड पार्टी के “आन्दोलन” से किसको क्या मिलेगा? केजरीवाल एण्ड पार्टी के “आन्दोलन” से किसको क्या मिलेगा? भ्रष्टाचार-विरोधी महातमाशा अब नये दौर में प्रवेश कर चुका है। अण्णा हज़ारे और अरविन्द केजरीवाल के रास्ते अलग हो चुके हैं। केजरीवाल ने चुनावी राजनीतिक पार्टी बनाकर संसद और विधानसभा का रास्ता पकड़ने का फैसला किया है, जबकि अण्णा हज़ारे ने अपनी नयी टीम बनाकर अपना जनान्दोलन जारी रखने का फैसला किया है। दोनों के बीच के सम्बन्ध अपरिभाषित हैं। अरविन्द केजरीवाल अण्णा का सम्मान करते हैं, और अण्णा बीच-बीच में केजरीवाल के बारे में कुछ सन्देह व्यक्त करते हुए दिन के अन्त में उनकी “ईमानदारी” में यक़ीन करते हैं। लेकिन स्पष्ट है कि दोनों अलग-अलग तरह से अहम भूमिकाएँ निभा रहे हैं, जिसकी आज की राजनीतिक व्यवस्था को ज़रूरत है।
    • बाल ठाकरे: भारतीय फासीवाद का प्रतीक पुरुष बाल ठाकरे: भारतीय फासीवाद का प्रतीक पुरुष ज़्यादातर टी.वी. चैनलों और अख़बारों में देश के तमाम जाने-माने पत्रकार और बुद्धिजीवी ठाकरे के अपराधों को दरकिनार कर उनकी कार्टून कला और करिश्माई व्यक्तित्व की भूरि-भूरि प्रशंसा करते दिखे। ऐसे में बाल ठाकरे जैसे फासिस्ट तानाशाह के काले कारनामों का पर्दाफाश कर जनता तक उसकी राजनीति के जनविरोधी चरित्र की असलियत को ले जाना एक बेहद ज़रूरी कार्यभार है।
    • एरिक हॉब्सबॉमः एक हिस्टोरियोग्राफिकल श्रद्धांजलि एरिक हॉब्सबॉमः एक हिस्टोरियोग्राफिकल श्रद्धांजलि अपने तमाम भटकावों, विच्युतियों और विचलनों के बावजूद हॉब्सबॉम का नाम 20वीं सदी के महान इतिहासकारों की अग्रणी कतारों में सुरक्षित रहेगा। हॉब्सबॉम की मृत्यु के साथ ब्रिटिश मार्क्सवादी इतिहासकारों के प्रसिद्ध समूह की एक और बड़ी शख्सियत हमारे बीच से चली गयी है। लेकिन यह तय है कि हॉब्सबॉम की रचनाएँ आने वाली पीढ़ियों के लिए भी अपनी तमाम कमज़ोरियों के बावजूद उतनी ही बहुमूल्य और ज़रूरी बनी रहेंगी।
    • और कितने बेगुनाहों की बलि के बाद समझेंगे हम? आपस में लड़ना छोड़, अपने असली दुश्मन को पहचानना ही होगा!! और कितने बेगुनाहों की बलि के बाद समझेंगे हम? आपस में लड़ना छोड़, अपने असली दुश्मन को पहचानना ही होगा!! लेकिन असम के दंगों से भी अधिक त्रासदपूर्ण, इन दंगों के फलस्वरूप हुई देशव्यापी प्रतिक्रिया है। दंगों के पीछे के मूल कारणों का पता लगाने और दोषियों को सज़ा देने के लिए दबाव बनाने की बजाये; दंगों के कारण पैदा हुई असम की संकटपूर्ण स्थिति को सामान्य बनाने और दंगा पीड़ितों को आर्थिक, मानवीय व मनोवैज्ञानिक सहायता देने के लिए देश की आम जनता का आह्वान करने की बजाये अवैध बंग्लादेशी मुस्लिमों का हौव्वा खड़ा कर देश के आम जनमानस में साम्प्रदायिक ज़हर घोलने की मुहिम शुरू कर दी गयी।
    • कौन जिम्मेदार है इस पाशविकता का? कौन दुश्मन है? किससे लड़ें? कौन जिम्मेदार है इस पाशविकता का? कौन दुश्मन है? किससे लड़ें? मौजूदा तौर पर, पूरे देश में बलात्कार व अन्य स्त्री-विरोधी अपराधों की संख्या हर साल बढ़ रही है। दिल्ली, उत्तर प्रदेश, हरियाणा, राजस्थान इस तरह के मामलों में सबसे आगे हैं। पिछले बीस वर्षों में स्त्री-विरोधी अपराधों में हुई असामान्य बढ़ोत्तरी के कारणों को समझना भी ज़रूरी है। 16 दिसम्बर को दिल्ली में जो हुआ वह कोई एक अकेली घटना नहीं, बल्कि एक लगातार बढ़ते रुझान की प्रतीक घटना है। ये कौन-सी सामाजिक ताक़तें हैं जो इन अपराधों के लिए जिम्मेदार हैं? वह कौन-सी मानसिकता है जो इनके लिए जिम्मेदार है और कौन-से वर्ग इस मानसिकता को खाद-पानी दे रहे हैं?

कौन जिम्मेदार है इस पाशविकता का? कौन दुश्मन है? किससे लड़ें?

स्त्री-विरोधी अपराध कोई नयी बात नहीं है। जबसे पितृसत्तात्मक समाज अस्तित्व में आया है, तबसे ये अपराध लगातार होते रहे हैं। पहले इनका रूप अलग था और आज इनका रूप अलग है। सामन्ती समाज में तो स्त्रियों के उत्पीड़न को एक प्रकार की वैधता प्राप्त थी; जिस समाज में कोई सीमित पूँजीवादी अधिकार भी नहीं थे, वहाँ परदे के पीछे और परदे के बाहर स्त्रियों के खिलाफ अपराध होते थे और वे आम तौर पर मुद्दा भी नहीं बनते थे। पूँजीवादी समाज में इन स्त्री-विरोधी अपराधों ने एक अलग रूप अख्तियार कर लिया है। अब कानूनी तौर पर, इन अपराधों को वैधता हासिल नहीं है। लेकिन इस पूँजीवादी समाज में एक ऐसा वर्ग है जिसके जेब में कानून, सरकार और पुलिस सबकुछ है। यह वर्ग ही मुख्य रूप से वह वर्ग है जो ऐसे अपराधों को अंजाम देता है।

और कितने बेगुनाहों की बलि के बाद समझेंगे हम? आपस में लड़ना छोड़, अपने असली दुश्मन को पहचानना ही होगा!!

और कितने बेगुनाहों की बलि के बाद समझेंगे हम? आपस में लड़ना छोड़, अपने असली दुश्मन को पहचानना ही होगा!!

असम के दंगे और उसकी देशव्यापी प्रतिक्रिया और कितने बेगुनाहों की बलि के बाद समझेंगे हम? आपस में लड़ना छोड़, अपने असली दुश्मन को पहचानना ही होगा!! प्रशान्त असम के चार जिलों, कोकराझार, ढुबरी, बोगाईगाँव और चिरंग, में बोडो और मुस्लिम समुदायों के बीच भड़की जातीय-साम्प्रदायिक हिंसा निस्सन्देह रूप से …पूरा पढ़ें

बाल ठाकरे: भारतीय फासीवाद का प्रतीक पुरुष

बाल ठाकरे: भारतीय फासीवाद का प्रतीक पुरुष

बाल ठाकरे: भारतीय फासीवाद का प्रतीक पुरुष आनन्द विगत नवम्बर के तीसरे सप्ताह में मुम्बई की फिज़ाओं में एक भय मिश्रित सन्नाटा पसरा हुआ था। वजह थी बाल ठाकरे की आसन्न मृत्यु की ख़बर। खौ़फ के इस माहौल में लोग इस बात के क़यास लगा रहे थे कि जिस शख़्स …पूरा पढ़ें

एरिक हॉब्सबॉमः एक हिस्टोरियोग्राफिकल श्रद्धांजलि

एरिक हॉब्सबॉमः एक हिस्टोरियोग्राफिकल श्रद्धांजलि

एरिक हॉब्सबॉमः एक हिस्टोरियोग्राफिकल श्रद्धांजलि अभिनव एरिक हॉब्सबॉम नहीं रहे। 1 अक्टूबर 2012 को लम्बी बीमारी के बाद उनका निधन हो गया। उनकी उम्र 95 वर्ष थी। ल्यूकेमिया से लम्बे संघर्ष के बाद 1 अक्टूबर को लन्दन के रॉयल फ्री हॉस्पिटल में उन्होंने अन्तिम साँसें लीं। सामाजिक विज्ञान के किसी …पूरा पढ़ें

मारुति सुजुकी के मज़दूरों का संघर्ष और भारत के ‘‘नव-दार्शनिकों” के “अति-वामपन्थी” भ्रम और फन्तासियाँ

मारुति सुजुकी के मज़दूरों का संघर्ष और भारत के ‘‘नव-दार्शनिकों” के “अति-वामपन्थी” भ्रम और फन्तासियाँ

मारुति सुजुकी के मज़दूरों का संघर्ष और भारत के ‘‘नव-दार्शनिकों” के “अति-वामपन्थी” भ्रम और फन्तासियाँ अभिनव सिन्हा हाल के कुछ वर्षों में, हम भारत में मज़दूर वर्ग के जुझारू संघर्षों में ज़बर्दस्त उभार के साक्षी रहे हैं। 1980 के दशक के अन्त से भारतीय बुर्जुआ वर्ग द्वारा किए जा रहे …पूरा पढ़ें

पटना में दिशा छात्र संगठन और नौजवान भारत सभा द्वारा ‘जन तक कविता-कविता तक जन’ का आयोजन

पटना में दिशा छात्र संगठन और नौजवान भारत सभा द्वारा ‘जन तक कविता-कविता तक जन’ का आयोजन

पटना में दिशा छात्र संगठन और नौजवान भारत सभा द्वारा ‘जन तक कविता-कविता तक जन’ का आयोजन दिशा छात्र संगठन और नौजवान भारत सभा की पटना इकाइयों ने बाँकीपुर गर्ल्स हाई स्कूल में 27 नवम्बर को ‘जन तक कविता-कविता तक जन’ का आयोजन किया। इस आयोजन में कविता पोस्टर प्रदर्शनी …पूरा पढ़ें

भगतसिंह के जन्मदिवस के अवसर पर ‘शहीदेआज़म भगतसिंह विचार यात्रा’

भगतसिंह के जन्मदिवस के अवसर पर ‘शहीदेआज़म भगतसिंह विचार यात्रा’

भगतसिंह के जन्मदिवस के अवसर पर ‘शहीदेआज़म भगतसिंह विचार यात्रा’ दिल्ली, 28 सितम्बर। शहीदे-आजम भगतसिंह के 106वें जन्मदिवस के अवसर पर नौजवान भारत सभा की अगुवाई में ‘‘शहीदेआजम भगतसिंह विचार यात्रा’’ का आयोजन किया गया। दिल्ली के करावल नगर इलाके में नौभास और दिशा छात्र संगठन द्वारा इस अवसर पर …पूरा पढ़ें

शहीदे-आज़म भगतसिंह युवा सम्मेलन का आयोजन

शहीदे-आज़म भगतसिंह युवा सम्मेलन का आयोजन

शहीदे-आज़म भगतसिंह युवा सम्मेलन का आयोजन 28 सितम्बर, 2012 के दिन जो भगतसिंह का 106वाँ जन्मदिवस पड़ता है, नौजवान भारत सभा व दिशा छात्र संगठन के द्वारा शहीदे आज़म भगतसिंह युवा सम्मेलन का आयोजन किया गया। यह सम्मेलन हरियाणा के जिला जीन्द के नरवाना नामक कस्बे में सम्पन्न हुआ। नौजवान …पूरा पढ़ें

स्कूल बचाओ अभियान मुस्तफाबाद में ‘नागरिक निगरानी समिति’ का गठन

स्कूल बचाओ अभियान मुस्तफाबाद में ‘नागरिक निगरानी समिति’ का गठन दिल्ली के सरकारी स्कूलों के हालात सुधारने व ‘एकसमान स्कूली शिक्षा’ की माँग को लेकर चल रहे ‘स्कूल बचाओ अभियान’ ने मुस्तफाबाद में संघर्षों में जीत प्राप्त की और मुस्तफाबाद इलाके की ‘नागरिक निगरानी समिति’ का गठन किया गया। इस …पूरा पढ़ें

‘मैं-फिसड्डी-तो-तू-भी-फिसड्डी’

‘मैं-फिसड्डी-तो-तू-भी-फिसड्डी’ आनन्द, नोएडा मनमोहन और ओबामा के बीच फिसड्डीपन की होड़ के पीछे की दास्तान की वजह से पूँजीवादी मीडिया पारम्परिक रूप से उनका गुणगान करता आया है। लेकिन मौजूदा दौर में जब भारतीय अर्थव्यवस्था के संकट की आहटें सुनायी दे रही हैं तो बुर्जुआ बुद्धिजीवी मीडिया में मनमोहन सिंह …पूरा पढ़ें

स्वास्थ्य तन्त्र में अमानवीयता पूँजीवाद का आम नियम है

स्वास्थ्य तन्त्र में अमानवीयता पूँजीवाद का आम नियम है प्रेमप्रकाश जालंधर के एक अस्पताल में पाँच दिन की एक बच्ची को इनक्यूबेटर (समयपूर्व नवजात शिशु को जिन्दा रखने की मशीन) से निकाल दिया गया और उसकी मृत्यु हो गयी। बच्ची को चिकित्सा से इसलिए वंचित कर दिया गया क्योंकि उसके …पूरा पढ़ें

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