• 20 Aug ’17

    साथी नितिन नहीं रहे… साथी नितिन को लाल सलाम

    11 मई की भोर में दिल का दौरा पड़ने से नौजवान भारत सभा की राष्ट्रीय केन्द्रीय परिषद के सदस्य और दिल्ली  में आंगनबाड़ी स्त्री मज़दूरों के बीच संगठनकर्ता के तौर पर काम कर रहे साथी नितिन का आकस्मिक निधन हो गया। वह मात्र 30 वर्ष के थे। पिछले कुछ दिनों से उनकी तबीयत ख़राब चल रही थी और परीक्षणों में कोलेस्ट्रॉल के बढ़ने की रपट सामने आयी थी। आज भोर में उन्होंने सीने में तेज़ दर्द की शिकायत की जिसके बाद उनके परिवार वालों ने उन्हें एण्टैसिड दी क्योंंकि वे दर्द का असली कारण नहीं समझ पाये। वास्तव में, दर्द दिल का दौरा पड़ने से हो रहा था। उन्हें समय पर अस्पतताल नहीं ले जाया जा सका जिसके कारण अन्तत: भोर में 5:30 पर उनके दिल की धड़कन बन्द  हो गयी और पिछले 10 वर्षों से युवाओं और मज़दूरों के हक़ों के लिये निरंतर संघर्ष करने वाला और शहीदेआज़म भगतसिंह के आदर्शों को यथार्थ में बदलने के लिये जीने वाला यह शानदार युवा साथी हमारा साथ छोड़ गया। नितिन की मौत युवा आन्दो लन और मज़दूर आन्दोलन की क्षति है और उनके जाने से खाली हुई जगह को लम्बे  समय तक नहीं भरा जा सकेगा।

  • 20 Aug ’17

    इण्टरनेट की बुरी लत

    एक इण्टरनेट छुड़ाओ केन्द्र में इलाज़ करा रहा 21 वर्षीय नौजवान बताता है कि: “मैं महसूस करता हूँ कि यह तकनीक मेरी ज़िन्दगी में बहुत खुशियाँ लेकर आयी है और कोई भी काम मुझे इतना उत्तेजित नहीं करता और आराम नहीं देता जितना कि यह तकनीक देती है। जब मैं उदास होता हूँ तो मैं खुद को अकेला करने और दुबारा खुश होने के लिये इस तकनीक का इस्तेमाल करता हूँ। जो नौजवान वर्ग ‘नये’ जैसे प्यारे शब्द को जिन्दा रखता है, जिनके पास नये कल के सपने, नये संकल्प, नयी इच्छाएँ, नया प्यार और नये विश्वास होते हैं वही नौजवान आज बेगानगी और अकेलेपन से दुखी होकर आभासी यथार्थ की राहों पर चल रहे हैं जिसका अन्त अत्यन्त बेगानगी में होता है।

  • 20 Aug ’17

    ओअक्साका शिक्षकों का संघर्ष: जुझारूपन और जन एकजुटता की मिसाल

    नागरिक और शिक्षकों की मजबूत एकता का लम्बा इतिहास सत्ता के लिये बिना शक  चुनौती है। निजीकरण, नवउदारवाद और खुले बाज़ार की नीतियों को धड़ल्ले  से लागू करने के लिये इस एकता को समाप्त करना सत्ता की  प्राथमिक आवश्यकता थी क्योंेकि यह एकजुटता सत्ता  के शोषण और दमन के विरुद्ध मजबूत दीवार की तरह आज तक खड़ी रही है। सत्ता द्वारा नियोजित चौकसी की ठण्डी हिंसा राज्यों द्वारा प्रायोजित उग्र हिंसा के काल में बर्बरता को बहुत हद तक मान्य बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका अदा करती है। लेकिन शिक्षकों और नागरिकों के बीच दरार पैदा करने की तमाम कोशिशों के बावजूद; मुख्य मीडिया और सोशल मीडिया पर बदनाम करने के धुआँधार अभियान के बावजूद; पूँजीवादी सत्ता द्वारा लोहे के हाथों से लागू नवउदारवाद और निजीकरण की नीतियाँ  शोषित जनता को साथ ले आती है।

  • 20 Aug ’17

    चिलकोट रिपोर्ट: च्यूँटी तक नहीं काटती

    क्या किसी भी देश को एक दूसरे सम्प्रभु देश पर जबरन हमला करने का अधिकार सिर्फ इस बात से प्राप्त हो जाता है कि फलाँ देश के पास जानलेवा हथियार है। इस आधार पर तो सबसे पहले हमला अमेरिका और ब्रिटेन पर होना चाहिए, क्योंकि उनके पास रासायनिक ही नहीं बल्कि उससे भी कई गुना खतरनाक परमाणु और अन्य किस्म के हथियार हैं। दरसल इस तर्क का मकसद अमेरिकी-आंग्ल साम्राज्यवाद के एक विचलन को प्रस्तुत करने का प्रयास करते हुए (जो दरअसल साम्राज्यवाद के तर्क को ही पुष्ट करता है और उसकी स्वाभाविक चेतस तार्किकता का अंग है) अरब देशों में दशकों से जारी उनके इस साम्राज्यवादी मुहिम को सवालों से परे करना है।

  • 20 Aug ’17

    फिदेल कास्त्रो: जनमुक्ति के संघर्षों को समर्पित एक युयुत्सु जीवन

    क्यूबा और फिदेल अमेरिकी साम्राज्यवाद के लिये हमेशा चुनौती बने रहे। अमेरिका ने क्यूबा पर कई आर्थिक प्रतिबन्ध लगाये और फिदेल की हत्या की भी कोशिश की गयी लेकिन हर बार उन्हें निराशा ही हाथ लगी। उन्होंने हमेशा अमेरिकी साम्राज्यवाद की इच्छा के विरुद्ध काम किया। क्यूबा ने दक्षिण अफ्रीकी देशों अंगोला और नामिबिया में रंगभेद की नीति अपनाने वाली ताकतों के ख़िलाफ़ अपनी सैन्य शक्ति की मदद भेजी। यही वे तमाम कारण हैं कि आज जब फिदेल हमारे बीच नहीं हैं तो साम्राज्यवाद का भोंपू मीडिया उन्हें क्रूर तानाशाह और ‘दोन किहोते’ की संज्ञा दे रहा है। लेकिन जबतक दुनिया भर में मानवमुक्ति के सपने देखे जाते रहेंगे और लोग लड़ते रहेंगे; अपनी कई सैद्धान्तिक और मानवीय कमजोरियों के बावजूद फिदेल कास्त्रो जीवन्तता, बहादुरी, निर्भीकता और जनमुक्ति के संघर्षों के समर्पण के लिये याद किये जाते रहेंगे!