साक्षी की हत्या को ‘लव जिहाद’ बनाने की संघ की कोशिश को किया गया असफल

भारत

बीती 28 मई की रात को शाहाबाद-डेरी के बी-ब्लॉक में 16 वर्षीय साक्षी नाम की एक नाबालिग़ लड़की की चाकू से गोद कर और उसके बाद पत्थर से कुचल कर आरोपी साहिल द्वारा हत्या कर दी गयी। पूरे मामले की जानकारी सीसीटीवी फुटेज से हुई। लड़की इलाक़े के ई-ब्लॉक में रहती थी। गत रात साक्षी अपनी एक दोस्त के बेटे के जन्मदिन पार्टी में शिरकत करने जा रही थी। आरोपी साहिल युवती का कई महीनों से पीछा कर रहा था। उस रात दोनों के बीच झगड़ा हुआ जिसके फलस्वरूप साहिल ने साक्षी की जान ले ली।
शाहाबाद डेरी में यह घटना अनायास ही नहीं हो गयी। पूरे इलाक़े में नशाखोरी-छेड़खानी बड़े पैमाने पर फैली हुई है। हर नुक्कड़ चौराहे पर लम्पट तत्व महिलाओं को छेड़ते हैं। साहिल भी उनमें से एक था। बहुत से लम्पट तो भाजपा-आम आदमी पार्टी से भी जुड़े होते हैं। इन पार्टियों के तमाम नेता इन गुण्डों को शह देते हैं ताकि चुनाव के समय इनका इस्तेमाल कर सकें। इस इलाक़े में इस तरह की यह कोई पहली घटना नहीं है। इससे पहले भी कई बार बच्चियों व स्त्रियों से बलात्कार के मामले सामने आ चुके हैं। कुछ वर्ष पहले पाँच साल की बच्ची मुस्कान के साथ भी बलात्कार और हत्या की घटना सामने आयी थी। इलाक़े के लोगों के एकजुट होने के बाद ही इस पर कार्रवाई हुई। अन्यथा पुलिस प्रशासन कान में तेल डाल कर सोया था। इसके बाद भी इलाक़े में छेड़खानी और स्त्री-उत्पीड़न की घटनाएँ सामने आती रहीं, पर भाजपा और आम आदमी पार्टी के नेता आँख बन्द करके बैठे रहे। इस इलाक़े में सुरक्षा व्यवस्था की हालत खस्ता है। यहाँ पिछले छः महीने में बर्बर हत्या की चार घटनाएँ सामने आ चुकी हैं। इससे पहले दो युवकों के शव इलाक़े के नाले से बरामद हुए थे, एक युवक का शव सड़क के किनारे मिला था और एक युवक का शव पास के गाँव मे मिला था।
आज समझने की ज़रूरत है कि देश भर में लगातार स्त्री-विरोधी अपराध बढ़ क्यों रहे हैं? आज स्त्रियों पर हमला करने वाले आदम-ख़ोर भेड़िये बेख़ौफ़ घूमते रहते हैं। हिफ़ाज़त के लिए बनी संस्थाएँ ही स्त्रियों की सबसे बड़ी दुश्मन बन चुकी हैं। ऐसी हर घटना के बाद सरकार से लेकर सभी विपक्षी चुनावी पार्टियाँ जमकर घड़ियाली आँसू बहाती हैं। लेकिन यही पार्टियाँ हैं जो लोकसभा और विधानसभा चुनावों में स्त्री-विरोधी अपराधों के सैकड़ों आरोपियों को टिकट देती हैं। हर चुनावी पार्टी में बलात्कार, भ्रष्टाचार, हत्या आदि के आरोपी भरे हुए हैं। लेकिन ऐसे अपराधियों का बेशर्मी से बचाव करने में भाजपा और संघ परिवार ने सबको पीछे छोड़ दिया है। पिछले तीन दशकों से जारी आर्थिक नीतियों ने ‘खाओ-पियो, ऐश-करो’ की संस्कृति में लिप्त एक नवधनाढ्य वर्ग पैदा किया है जिसे लगता है कि पैसे के बूते पर वह सबकुछ ख़रीद सकता है। पूँजीवादी लोभ-लालच और हिंस्र भोगवाद की संस्कृति ने स्त्रियों को एक ‘माल’ बना डाला है, और पैसे के नशे में अन्धे इस वर्ग के भीतर उसी ‘माल’ के उपभोग की उन्मादी हवस भर दी है। इन्हीं लुटेरी नीतियों ने एक आवारा, लम्पट, पतित वर्ग भी पैदा किया है जो पूँजीवादी अमानवीकरण की सभी हदों को पार कर चुका है। आज हर नुक्कड़-गली-चौराहे पर शोहदे महिलाओं को छेड़ते हैं और इनकी ऐसी मानसिकता इस व्यवस्था द्वारा बनायी जाती है। बार-बार स्त्रियों के साथ होने वाली नृशंसता इसकी गवाही देती है। हमारे समाज के पोर-पोर में समायी पितृसत्तात्मक मानसिकता इस सबको निरन्तर खाद-पानी देती है, जो स्त्रियों को भोग की वस्तु और बच्चा पैदा करने का यन्त्र भर मानती है, और हर वक़्त, हर पल स्त्री-विरोधी मानसिकता को जन्म देती है। समाज में अपनी स्वतन्त्र पहचान बनाने के लिए आगे बढ़ी स्त्रियाँ ऐसे लोगों की आँखों में खटकती है और वे उन्हें “सबक़ सिखाने” में जुट जाते हैं। आज पूँजीवादी व्यवस्था में स्त्रियों को उपभोग की सामग्री के तौर पर पेश किया जा रहा है और स्त्री-विरोधी मानसिकता को बल प्रदान किया जा रहा है।
वहीं मोदी सरकार के आने के बाद से स्त्री-विरोधी घटनाएँ अपने चरम पर है। आज भारत महिलाओं के लिये सबसे असुरक्षित देश बन चुका है। हर एक घण्टे में 3 महिलाओं के साथ बलात्कार होता है। तमाम केन्द्र शासित प्रदेशों में सबसे अधिक महिलाओं के ख़िलाफ़ अपराध दिल्ली में दर्ज़ हुए हैं। दिल्ली पुलिस द्वारा जारी आँकड़ों के आधार पर ‘द हिन्दू’ में छपी एक रिपोर्ट के मुताबिक़ देश की राजधानी दिल्ली में 2021 के पहले छः महीने में महिलाओं के ख़िलाफ़ होने वाले अपराध में 63.3% की बढ़ोत्तरी हुई है। वहीं देश भर में स्त्री-विरोधी अपराधों की जैसे बाढ़ आ गयी है। ‘राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो’ की एक रिपोर्ट के अनुसार 2019 में महिलाओं के ख़िलाफ़ होने वाले अपराधों में 7% की वृद्धि हुई है। 2018 में 3,78,236 महिला-विरोधी आपराधिक मामले दर्ज़ किये गये। नवम्बर 2017 में आयी ‘राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो’ की रिपोर्ट के मुताबिक़ साल 2016 में कुल 3,38,954 स्त्री-विरोधी आपराधिक मामले दर्ज़ हुए हैं। 2016 में अकेले बलात्कार के 38,947 मामले दर्ज़ हुए थे! 18 जुलाई, 2018 को किरण रिजिजु के संसदीय बयान के अनुसार 2014 से 2016 के बीच बलात्कार के 1,10,333 केस सामने आये हैं। एनसीआरबी की रिपोर्ट के अनुसार 2007 से 2016 तक स्त्री-विरोधी अपराधों में 83 प्रतिशत की बढ़ोत्तरी हुई है। ये वो आँकड़े हैं जिनकी शिकायत दर्ज़ हो पाती है, जबकि सच्चाई इससे कहीं अधिक भयावह है क्योंकि बहुतेरे मामलों में तो शिकायत भी नहीं दर्ज़ हो पाती है।
आज सत्ता में वे ही लोग हैं जिन्होंने कुलदीप सिंह सेंगर से लेकर चिन्मयानन्द जैसे बलात्कारियों-अपराधियों को बचाने में दिन-रात एक कर दिये थे। जम्मू में एक 8 वर्षीय बच्ची के बलात्कारियों और हत्यारों के समर्थन में इन्होंने रैलियाँ तक आयोजित की थीं। यह भी भूलना नहीं चाहिए कि 2002 में गुजरात में सैकड़ों मुस्लिम स्त्रियों के साथ सामूहिक बलात्कार के बाद उनकी हत्या करने वाले लोग यही थे। हाथरस में बलात्कार और हत्या की शिकार लड़की के अपराधियों को बचाने के लिए योगी सरकार ने आधी रात को जबरन उसकी लाश जलवा दी थी। इनके नारी सशक्तीकरण और बेटी-बचाओ के नारों के ढोल की पोल इस बात से खुल जाती है कि आज भारत महिलाओं के लिए सबसे असुरक्षित देशों की सूची में सबसे ऊपर पहुँच चुका है। जिन लोगों की विचारधारा में बलात्कार को विरोधियों पर विजय पाने के हथियार के रूप में इस्तेमाल किया जाता हो, जिस पार्टी का इतिहास ही बलात्कारियों को संरक्षण देने का रहा हो क्या उनसे हम स्त्रियों के लिए न्याय, सम्मान, सुरक्षा और आज़ादी की उम्मीद कर सकते हैं? जब सत्ता में ही ऐसे फ़ासिस्ट विराजमान होंगे तो समाज में भी इनके द्वारा पोषित पितृसत्तात्मक पाशविकता और घोर स्त्री-विरोधी मानसिकता को बल मिलेगा। ज्ञात हो कि भाजपा के 40 प्रतिशत से अधिक सांसदों, विधायकों के ऊपर बलात्कार, हत्या के गम्भीर मामले दर्ज़ हैं। भाजपा ऐसे अपराध करने वालों के लिये सबसे भरोसेमन्द पार्टी है, इसी कारण आज भाजपा में अच्छी-ख़ासी संख्या में स्त्री-विरोधी अपराधी भरे पड़े हैं। महिला पहलवानों का संघर्ष भी भाजपा सांसद बृजभूषण के ख़िलाफ़ ही है। आज बलात्कारी भाजपा में शामिल होकर “संस्कारी” बन जाता है!
इस मसले को भाजपा सरकार व संघ ‘लव-जिहाद’ का नाम देने में लगी हुई है। स्त्री-विरोधी अपराधों पर लगाम लगाने के बजाय भाजपा सरकार और गोदी मीडिया एड़ी-चोटी तक का ज़ोर लगा कर इस मसले को धार्मिक रंग देने की कोशिश कर रही थी। कपिल मिश्रा ने बयान दिया कि हिन्दू लड़की के साथ यह घटना घटी है। भाजपा-संघ और गोदी मीडिया द्वारा प्रचार किया जा रहा था कि साहिल एक मुसलमान है, इसलिए उसने साक्षी की हत्या की। इस प्रचार के पीछे इनका मक़सद इलाक़े में साम्प्रदायिक तनाव भड़काना और हिन्दू-मुस्लिम के बीच झगड़े करवाना था। जैसा कि इन्होंने उत्तराखण्ड के पुरोला में किया व हिमाचल प्रदेश व देश के अन्य इलाक़ों में करने की कोशिश कर रहे हैं। ‘लव जिहाद’ के हल्ले का एक मक़सद यह भी है कि हिन्दुओं में बेबुनियाद भय पैदा किया जाये कि “मुसलमान आपकी औरतों को ले जायेंगे या मार देंगे!” अब ज़रा सोचिये कि भाजपा के तमाम शीर्ष नेताओं या उनके बेटे-बेटियों, भतीजा-भतीजियों ने मुसलमान पुरुष या स्त्री से शादियाँ की हैं, तो फिर ये हमें ‘लव जिहाद’ के नाम पर क्यों लड़वा रहे हैं? आइये कुछ तथ्यों पर निगाह डालते हैं।
भाजपा के मुसलमान नेता शाहनवाज़ हुसैन की शादी एक हिन्दू स्त्री रेणु शर्मा से 1994 में हुई थी। इनके बीच प्रेम विवाह हुआ था। भाजपा के मुसलमान नेता मुख़्तार अब्बास नक़वी ने भी एक हिन्दू औरत सीमा से 1983 में शादी की थी। यह भी प्रेम विवाह था। भाजपा के मुखर नेता सुब्रमण्यम स्वामी की हिन्दू बेटी सुहासिनी ने नदीम हैदर से शादी की। क्या यह ‘लव जिहाद’ की परिभाषा में नहीं आयेगा? आज हमें समझने की ज़रूरत है कि स्त्री-विरोधी घटनाएँ धर्म को देख कर नहीं होती बल्कि आज हर धर्म की महिलाएँ इसका शिकार हैं। वास्तव में, ‘लव जिहाद’ कोई मसला है ही नहीं। ‘लव जिहाद’ तो बहाना है, जनता ही निशाना है। मोदी सरकार जनता को रोज़गार नहीं दे सकती, महँगाई से छुटकारा नहीं दिला सकती, खुले तौर पर अडानी-अम्बानी के तलवे चाटने में लगी है और सिर से पाँव तक भ्रष्टाचार में लिप्त है, तो वह उन असली मसलों पर बात कर ही नहीं सकती, जो आपकी और हमारी ज़िन्दगी को प्रभावित करते हैं। शाहाबाद डेरी में संघ के ‘लव जिहाद’ के प्रयोग को असफल कर दिया गया। पहले तो इलाक़े में भारत की क्रान्तिकारी मज़दूर पार्टी के कार्यकर्ताओं के नेतृत्व में लोगों ने एकजुट होकर संघियों को इलाक़े से खदेड़ा। इसके बाद इलाक़े में संघियों को चेतावनी देते हुए और हत्यारे साहिल को कठोर सज़ा देने की माँग करते हुए रैली निकाली गयी। इलाक़े से खदेड़े जाने के बाद से और ‘लव जिहाद’ का मसला न बन पाने के कारण संघी बौखलाये हुए थे। संघ के अनुषांगिक संगठनों द्वारा इलाक़े का माहौल ख़राब करने के मक़सद से सभा भी बुलायी गयी और मुस्लिमों के ख़िलाफ़ खुलकर ज़हर उगला गया, पर इनकी यह कोशिश भी नाकाम रही। इनकी सभा के बरक्स ही भारत की क्रान्तिकारी मज़दूर पार्टी की सभा भी जारी रही। और महिला सुरक्षा के मद्देनज़र दुर्गा भाभी स्क्वॉड की भी स्थापना की गयी जिसके तहत महिलाओं व लड़कियों को मार्शल आर्ट और आत्मरक्षा की ट्रेनिंग देना शुरु किया गया, ताकि आगे से लम्पटों-शोहदों को जवाब दिया जा सके और स्त्री-विरोधी अपराधों पर रोक लगायी जा सके। पूरा घटनाक्रम यह दिखलाता है कि लोग एकजुट हों तो इन दंगाइयों को रोका जा सकता है। साथ ही बढ़ते स्त्री-विरोधी अपराधों पर भी लगाम लगायी जा सकती है।

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