पूँजीवादी न्याय-व्यवस्था का घिनौना सच
जाँच एजेंसियों के इन भारी मतभेदों और कृत्रिम गवाहों के झूठे बयानों के बावजूद न्यायालय ने अभियुक्तों को दोषी मानते हुए सज़ाएँ दीं। जबकि इसके उलट गुजरात दंगों (विशेषकर बेस्ट बेकरी) में जहाँ हज़ारों अल्पसंख्यक लोग मारे गये, जहाँ हैवानियत का नंगा नाच किया गया, जहाँ मानवजाति को शर्मसार किया गया, जहाँ छोटे-छोटे बच्चों तक को नहीं छोड़ा गया, जहाँ वे चीख़ते-चिल्लाते रहे, जहाँ हज़ारों सबूत चीख़-चीख़कर आज भी उस मंजर की हुबहू कहानी कह रहे हैं, वहाँ यह न्याय-व्यवस्था अपंग नज़र आती है, शैतानों के पक्ष में खड़ी नज़र आती है, पीड़ितों से दूर नज़र आती है।














