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इतने शर्मिंदा क्यों हैं प्रो. एजाज़ अहमद?

किसी भी क्रान्तिकारी मार्क्‍सवादी की पहचान जिन बातों से होती है उनमें से एक यह है कि वह अपने विचारों को छिपाता नहीं है; और दूसरी अहम बात यह होती है कि वह अपने विचारों को लेकर शर्मिन्दा भी नहीं होता। इन कसौटियों को ध्यान में रखें तो आप प्रो. एजाज़ अहमद से यह सवाल पूछ सकते हैं कि आप अपने विचारों को लेकर इतने शर्मिंदा क्यों हैं? आप यह भी पूछ सकते हैं कि आप इतने हताश क्यों हैं?

ग़रीबी रेखा के निर्धारण का दर्शन, अर्थशास्त्र और राजनीति

1973-74 के बाद सरकार ने कभी भी सीधे तौर पर नहीं देखा कि देश के कितने प्रतिशत लोग 2100/2400 किलो कैलोरी से कम उपभोग कर पा रहे हैं। उसने बस 1974 की ग़रीबी रेखा को कीमत सूचकांक में होने वाले परिवर्तनों के अनुसार संशोधित करना जारी रखा। नतीजा यह है कि आज योजना आयोग रु.26/रु.32 प्रतिदिन की ग़रीबी रेखा पर पहुँच गया है! साफ़ है कि देश के शासक वर्ग ने बहुत ही कुटिलता के साथ एक ऐसी पद्धति अपनायी जो कि ग़रीबी को कम करके दिखला सके। यह पद्धति शुरू के 10 वर्षों तक अपना काम कर सकती थी; लेकिन उसके बाद यह बेतुकेपन के प्रदेश में प्रवेश कर गयी। आज साफ़ नज़र आ रहा है कि ऐसी ग़रीबी रेखा पर सिर्फ हँसा जा सकता है। इसके लिए अर्थव्यवस्था के बहुत गहरे ज्ञान की ज़रूरत नहीं है। वास्तव में, जिन्हें बहुत गहरा “ज्ञान” है, वही यह धोखाधड़ी का काम कर रहे हैं। जैसे कि मनमोहन-मोण्टेक की जोड़ी! वास्तव में, बुर्जुआ अर्थशास्त्र के ज्ञान का मुख्य काम ही इस प्रकार की जालसाजियाँ करना होता है।

राम शरण शर्मा (1920-2011): जनता का इतिहासकार

निश्चित तौर पर, हर इंसान कभी न कभी मरता है। लेकिन कुछ ही इंसान होते हैं जो अपने जीवन के दौरान अपने क्षेत्र की संरचना और सीमा को परिभाषित करते हैं। प्रो. शर्मा ऐसे ही शख़्स थे। वे जब तक जीवित रहे, उन्होंने भारतीय प्राचीन इतिहास के लेखन के क्षितिज को परिभाषित किया। उनका योगदान महज़ ऐतिहासिक शोध के धरातल पर नहीं था, बल्कि इतिहास-लेखन की पहुँच (अप्रोच) और पद्धति (मेथड) के धरातल पर था। और यही वह चीज़ है जो उन्हें महान इतिहासकार बनाती है और इस मामले में उन्हें डी-डी- कोसाम्बी, गॉर्डन चाइल्ड, हेनरी पिरेन, ई-पी- थॉमसन, मार्क ब्लॉक, क्रिस्टोफर हिल, ज्यॉफरी स्टे डि क्रोआ, एरिक हॉब्सबॉम आदि जैसे अन्तरराष्ट्रीय ख्याति के इतिहासकारों की श्रेणी में खड़ा करता है। ऐसे उत्कृष्ट मनुष्य और मार्क्सवादी इतिहासकार को हमारी हार्दिक श्रद्धांजलि।

कश्मीर में सामूहिक कब्रों ने किया भारतीय राज्य को बेपर्द

1989 से 2009 के बीच करीब 10,000 लोग ग़ायब हुए जो कभी वापस नहीं लौटे। बुजुर्ग अपने जवान बेटे-बेटियों का इन्तज़ार कर रही हैं, औरतें अपने पतियों और बच्चे अपने पिताओं का। कश्मीर की जनता लगातार इस बर्बर जुल्म को झेल रही है और इसलिए उसे ऐसे किसी खुलासे की ज़रूरत नहीं थी यह जानने के लिए भारतीय सुरक्षा बल उसके साथ क्या करते रहे हैं। लेकिन भारत के अन्य हिस्सों में रहने वाले आम नागरिकों के लिए यह एक अहम खुलासा है, जो बचपन से कश्मीर को भारत माता के ताज के रूप में स्कूली किताबों में देखते आये हैं; जिन्हें बचपन से बताया जाता है कि अगर कश्मीर को सख़्ती से पकड़कर न रखा गया तो पाकिस्तान उसे हड़प लेगा; जिसे मीडिया बचपन से सनी देओल मार्का फिल्में दिखला-दिखला कर उसके दिमाग़ में ऐसे जुमले भर देता है: ‘दूध माँगोगे, खीर देंगे-कश्मीर माँगोगे, चीर देंगे’!

अण्णा हज़ारे का भ्रष्टाचार-विरोधी अभियान और मौजूदा व्यवस्था से जुड़े कुछ अहम सवाल

हज़ारे का वर्तमान भ्रष्टाचार-विरोधी आन्दोलन भी आंशिक तौर पर उनकी इसी राजनीति और विचारधारा से पैदा हुआ है। और यह इस समय इसलिए पैदा हुआ है क्योंकि भ्रष्टाचार के विरुद्ध आम जनता में व्याप्त गुस्से के झटके को सोख जाने वाला कोई ऐसा ‘शॉक एब्ज़ॉर्बर’ व्यवस्था को भी चाहिए था, जो व्यवस्था के लिए ही ख़तरा न बन जाये। ऐसे में, भ्रष्टाचार का नैतिकता-अनैतिकता, सदाचार-अनाचार के जुमलों में विश्लेषण करने वाले किसी अण्णा हज़ारे से बेहतर उम्मीदवार और कौन हो सकता था, जो यह समझने में अक्षम हो कि भ्रष्टाचार एक ऐसी परिघटना है जो पूँजीवाद का अभिन्न अंग है; जो वास्तव में यह समझने अक्षम हो, कि पूँजीवादी कानूनी परिभाषा के अनुसार जो कार्य भ्रष्टाचार माने जाते हैं, अगर वे न भी हों, तो पूँजीवादी व्यवस्था अपने आपमें भ्रष्टाचार है जो ग़रीब मज़दूर आबादी, किसान आबादी और आम मेहनतकश जनता के शोषण-उत्पीड़न पर टिकी हुई है। आदमखोर पूँजीवादी आर्थिक-राजनीतिक व्यवस्था कठघरे में न खड़ी हो, इसके लिए अण्णा हज़ारे की ‘‘परिघटना’‘ का पूँजीवादी व्यवस्था ने कुशल उपयोग किया।

अण्णा हज़ारे का भ्रष्टाचार-विरोधी अभियान और मौजूदा व्यवस्था से जुड़े कुछ अहम सवाल

एक ऐसे समाज में जिसमें पैसे की ताकत सबसे बड़ी ताकत है, जिसमें लालच, लोभ और मुनाफे का ही राज हो, वहाँ जन लोकपाल की अभ्रष्टीयता पर ऐसा दिव्य विश्वास क्यों? जन लोकपाल को नहीं ख़रीदा जा सकता, वह भ्रष्ट नहीं होगा, वह लालच-लोभ के वशीभूत नहीं होगा, या कारपोरेट घरानों की ताकत के आगे घुटने नहीं टेक देगा, इसकी क्या गारण्टी है? जब ऐसे जन लोकपाल को नियुक्त करने वाली समिति के प्रस्तावित सदस्य तक आज बिक रहे हैं, तो जन लोकपाल क्यों नहीं बिक सकता? सन्दर्भ आप समझ गये होंगे। न्यायपालिका में पोर-पोर तक में समाये भ्रष्टाचार के बारे में आज सभी जानते हैं। और यह जिला मजिस्ट्रेट के स्तर से लेकर सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीशों तक में मौजूद है। एक पूँजीवादी समाज में जहाँ भौतिक प्रोत्साहन ही सबसे बड़ा प्रोत्साहन है, वहाँ हर चीज़ बिक सकती है। ऐसे में, जन लोकपाल के रूप में एक भस्मासुर ही पैदा होगा और कुछ नहीं।

प्रो. प्रभात पटनायक के नाम एक खुला पत्र

आपकी राजनीतिक पक्षधरता आपको बौद्धिक तौर पर भी ईमानदार नहीं रहने देती है। इन दोनों के बीच द्वन्द्व चलता रहता है और अन्त वही होता है, जैसा कि हमेशा होता आया है – राजनीति की विजय होती है, और अर्थशास्त्र की पराजय! बेहतर होगा कि अपने मस्तिष्क के इस द्वन्द्व को किसी एक पार लगा दें। क्योंकि यह द्वन्द्व आपकी हर रचना में प्रकट हो जाता है और उसे ‘मास्टरपीस’ बनने से रोक देता है। या तो राजनीति के पक्ष में इस द्वन्द्व का समाधान हो जाये, या फिर आपकी अर्थशास्त्रियों वाली बौद्धिक ईमानदारी के ही पक्ष में इसका समाधान हो जाये। दोनों ही सूरत में तब आपका लेखन मास्टरपीस बनने की पूर्वशर्तें पूरा करने लगेगा। पहली सूरत में यह शानदार काउत्स्कीपन्थी लेखन बनेगा (जैसे कि साम्राज्यवाद पर आपका अति-साम्राज्यवाद वाला सिद्धान्त आया था, जिसकी आपने चर्चा ही करनी बन्द कर दी इस महामन्दी के बाद!) और दूसरी सूरत में यह एक अच्छा मार्क्सवादी आर्थिक लेखन बनेगा। और ऐसे में हम जैसे अर्थशास्त्र के विनम्र विद्यार्थी आपके लेखन से कन्फ्यूज़ हो जाने की बजाय, अधिक अच्छी अन्तर्दृष्टि विकसित कर पाने में समर्थ होंगे।

इराक से अमेरिका की वापसी के निहितार्थ

आश्चर्य की बात नहीं है कि ओबामा ने अपने भाषण में एक जगह भी इराकियों के दुख-दर्द के बारे में कुछ नहीं कहा। इसके लिए इराकियों से कभी माफी नहीं माँगी गयी कि इराकी जनता के 10 लाख से भी अधिक लोगों की इस साम्राज्यवादी युद्ध में हत्या कर दी गयी; इराक की पूरी अवसंरचना को नष्ट कर दिया गया; इराकी अर्थव्यवस्था की कमर टूट गयी, जो वास्तव में दुनिया के सबसे समृद्ध अर्थव्यवस्थाओं में से हुआ करती थी; आज इराक के बड़े हिस्सों में बिजली और पीने का पानी तक मयस्सर नहीं है; बेरोज़गारी आसमान छू रही है और जनता के पास शिक्षा और स्वास्थ्य जैसी बुनियादी सुविधाएँ भी नहीं हैं। आज के इराक को देखकर कोई अन्धा भी बता सकता है कि सद्दाम हुसैन के शासन के अन्तर्गत वह कहीं बेहतर स्थिति में था।

यूरोपीय महाद्वीप के रंगमंच पर इक्कीसवीं सदी की ग्रीक त्रासदी

‘‘सभी ने सोचा था कि अब ‘दास कैपिटल’ की कभी कोई माँग नहीं होगी, लेकिन अब यह समझने के लिए तमाम बैंकर और मैनेजर भी ‘दास कैपिटल’ पढ़ रहे हैं कि वे हमारे साथ क्या कारस्तानी करते रहे हैं।’‘ ये शब्द हैं जर्मनी के एक प्रतिष्ठित प्रकाशक कार्ल डिएट्ज़ वर्लेग के प्रबन्ध निदेशक जोअर्न श्यूट्रम्फ के जिन्होंने प्रसिद्ध समाचार एजेंसी रायटर को एक साक्षात्कार में यह बताया। इस वर्ष के मात्र चार महीनों में कार्ल डिएट्ज़ वर्लेग ने मार्क्स की महान रचना ‘पूँजी’ की 1500 प्रतियाँ बेची हैं। बैंकर और मैनेजर ही नहीं बल्कि पूँजीवादी राजसत्ता के मुखिया भी आजकल उस जटिल वित्तीय ढाँचे को समझने के लिए ‘पूँजी’ पढ़ रहे हैं जो उन्होंने अपने मुनाफे की हवस में अन्धाधुन्ध बना दिया है। हाल ही में एक कैमरामैन ने फ्रांस के राष्ट्रपति सरकोज़ी को ‘पूँजी’ पढ़ते हुए पकड़ लिया था!

‘‘सक्षमकारी राज्य’’ का फण्डा यानी धनपतियों की चाँदी और जनता की बरबादी

इस बार के आर्थिक सर्वेक्षण में सरकार ने पहली बार एक ऐसा हिस्सा रखा था जो मौजूदा सरकार के आर्थिक दर्शन को खोलकर रख देता है। पहले के आर्थिक सर्वेक्षण अधिकांशत: आय–व्यय की गणनाओं और लाभ–घाटे के आकलन में ही ख़त्म हो जाया करते हैं। प्रणब मुखर्जी मौजूदा संयुक्त प्रगतिशील गठबन्धन सरकार के सबसे अनुभवी राजनीतिज्ञों में से एक हैं, बल्कि शायद सबसे अनुभवी राजनीतिज्ञ हैं। अपने लम्बे राजनीतिक जीवन और पूँजीवादी अर्थनियोजन की गहरी समझदारी के आधार पर अपनी टीम के साथ मिलकर उन्होंने आर्थिक सर्वेक्षण में कहा है कि सरकार का काम जनता की ज़रूरतों को पूरा करना नहीं होना चाहिए। इसकी उन्होंने काफ़ी आलोचना की है और कहा है कि ऐसी सरकार उद्यमिता और कर्मठता की राह में बाधा होती है। वास्तव में तो सरकार को एक “सक्षमकारी” भूमिका में होना चाहिए। उसका काम यह सुनिश्चित करना होना चाहिए कि लोग बाज़ार के खुले स्पेस में एक–दूसरे की ज़रूरतों को पूरा करें, एक–दूसरे से प्रतिस्पर्द्धा करें और बाज़ार की प्रणाली में हस्तक्षेप किये बगैर उसे सामाजिक–आर्थिक समतुलन करने दें! वित्त मन्त्री महोदय आगे फरमाते हैं कि जो राज्य जनता की आवश्यकताओं जैसे शिक्षा, चिकित्सा, रोज़गार, आवास, भोजन आपूर्ति आदि को पूरा करने का काम अपने हाथ में ले लेता है वह लोगों को “सक्षम” नहीं बनाता; प्रणब मुखर्जी की राय में ऐसी सरकार एक “सक्षमकारी” सरकार नहीं होती बल्कि “हस्तक्षेपकारी” सरकार होती है! हमें ऐसी सरकार से बचना चाहिए! वाह! क्या क्रान्तिकारी आर्थिक दर्शन पेश किया है वित्तमन्त्री महोदय ने! लेकिन अगर आप पिछले कुछ दशकों की विश्व बैंक व अन्तरराष्ट्रीय मुद्रा कोष की आर्थिक रपटों का अध्‍ययन करें, तो आपको इस आर्थिक दर्शन की मौलिकता पर शक़ होने लगेगा। जिस शब्दावली और लच्छेदार भाषा में प्रणब मुखर्जी ने विश्व बैंक और अन्तरराष्ट्रीय मुद्रा कोष द्वारा अनुशंसित नवउदारवादी नीतियों को लागू करने के इरादे को जताया है, वह कई लोगों को सतही तौर पर काफ़ी क्रान्तिकारी नज़र आ सकता है। लेकिन वास्तविकता क्या है, यह बजट 2010–2011 के विश्लेषण पर साफ़ ज़ाहिर हो जाता है।