Category Archives: साहित्‍य और कला

संदीप/नीतू/बेबी/पवन की कविताएं

सपनों के देश में
आकांक्षाओं की पीठ पर
यथार्थ की जीन में टिकाए अपने पैर
ज़िन्दगी की राह पर
सरपट दौड़ना, चाहता नहीं कौन?
‘आसमान बेधते’ अरुणिम शिखर को
हृदय में बसाना नहीं चाहता है कौन?
मगर
यांत्रिकता की कैद से
आज़ाद नहीं होंगे जब तलक स्वप्न!
स्मृतियों के अपने ही गुंजलक में
भटकेगा मन!

उद्धरण

जब भी नैतिकता धर्मशास्त्र पर आधारित होगी, जब भी अधिकार किसी दैवी सत्ता पर निर्भर होंगे, तो सबसे अनैतिक, अन्यायपूर्ण, कुख्यात चीज़ें सही ठहरायी जा सकती हैं और स्थापित की जा सकती हैं।

होसे मारिया सिसों की पाँच कविताएँ

दफ़्न कर देना चाहता है दुश्मन हमें
जेलख़ाने की अँधेरी गहराइयों में
लेकिन धरती के अँधेरे गर्भ से ही
दमकता सोना खोद निकाला जाता है
गोता मारकर बाहर लाया जाता है
झिलमिलाता मोती
सागर की अतल गहराइयों से।
हम झेलते हैं यंत्रणा और अविचल रहते हैं
और निकालते हैं सोना और मोती
चरित्र की गहराइयों से
ढला है जो लम्बे संघर्ष के दौरान।

पाठक मंच

राजस्थान विश्वविद्यालय (जयपुर) के बाहर दो युवा साथियों (भूलवश नाम याद नहीं) के आत्मीय वार्तालाप द्वारा (ताः 20/12) आह्वान से परिचित हुआ। दोनों साथियों को धन्यवाद कि उन्होंने मेरे वैचारिक स्तर को बढ़ाने के लिए एक महत्वपूर्ण पत्रिका से परिचित कराया।

कहानी : डिप्‍टी कलेक्‍टरी / अमरकांत

शकलदीप बाबू मुस्कराते हुए उठे। उनका चेहरा पतला पड़ गया था, आँखे धँस गई थीं और मुख पर मूँछें झाडू की भाँति फरक रही थीं। वह जमुना से यह कहकर कि ‘तुम अपना काम देखो, मैं अभी आया’, कदम को दबाते हुए बाहर के कमरे की ओर बढ़े। उनके पैर काँप रहे थे और उनका सारा शरीर काँप रहा था, उनकी साँस गले में अटक-अटक जा रही थी।

रोना स्त्रियोचित है?

यह एक आम धारणा है कि रोना स्त्रियों का गुण है, मर्द नहीं रोते। वह कवि-कलाकार हो तो दीगर बात है। कवि-कलाकारों में थोड़ा स्त्रैणता तो होती ही है। यह पुरुष प्रधान सामाजिक ढांचे में व्याप्त संवेदनहीनता और निर्ममता की मानवद्रोही संस्कृति की ही एक अभिव्यक्ति है। शासक को रोना नहीं चाहिए। रोने से उसकी कमजोरी सामने आ जायेगी। इससे उसकी सत्ता कमजोर होगी। पुरुष रोयेगा तो औरत उससे डरना बंद कर देगी। वह रोयेगा तो औरत उसके हृदय की कोमलता, भावप्रवणता या कमजोरी को ताड़ लेगी। तब भला वह उससे डरेगी कैसे? उसकी सत्ता स्वीकार कैसे करेगी? वस्तुत: यह पूरी धारणा स्त्री-पुरुष सम्बन्धों के ‘शासक-शासित फ्रेम’ की बुनियाद पर खड़ी है।

आदर प्रकट करने के लिए कानून बनाने के राजनाथ सिंह के विचार के बारे में कुछ बहके-बहके विचार

तुलसीदास ने मानस में कई जगह लिखा है कि रावण अपने दसों सिरों से बोल उठा या दसों मुँह से ठठाकर हँस पड़ा। रावण ज़्यादातर अपने एक मुँह का इस्तेमाल करता था और जब दसों मुँहों से बोलता भी था तो एक ही बात। पर भाजपा एक ऐसे रावण जैसा व्यवहार करती है जो हमेशा दसों मुँह से दस परस्पर विरोधी बातें करता रहता है।

कविता : तूफानी पितरेल पक्षी का गीत – मक्सिम गोर्की

यह विख्‍यात कविता गोर्की ने 1905 की पहली रूसी क्रान्ति के दौरान क्रान्तिकारी मज़दूर वर्ग की अपार ताकत और साहसिक युगपरिवर्तनकारी भूमिका से परिचित होने के बाद उद्वेलित होकर लिखी थी जो पूँजीवादी दुनिया की अमानवीयता को सर्वहारा वर्ग द्वारा दी गर्इ चु‍नौती का अमर दस्‍तावेज बन गई। अपनी गुलामी की बेड़ि‍यों को तोड़कर पूरी मानवता की मुक्ति और उत्‍कर्ष के लिए पूँजीवादी विश्‍व के जालिम मालिकों के विरूद्ध तफानी रक्‍तरंजित संघर्ष की घोषणा करने वाले शौर्यवान और साहसी सर्वहारा को गोर्की ने इस कविता में बादलों और समुद्र के बीच गर्वीली उड़ानें भरते निर्भीक पितरेल पक्षी के रूप में देखा है जो भयानक तूफान का चुनौतीपूर्ण आहावन कर रहा है। समाज के कायर, बुजदिल बुद्धिजीवियों तथा अन्‍य डरपोक मध्‍यमवर्गीय जमातों को गोर्की ने तूफान की आशंका से भयाक्रान्‍त गंगाचिल्लियों, ग्रेब और पेंगुइन पक्षियों के रूप में देखा है। जिस क्रान्तिकारी तूफानी परिवर्तन का आना निश्चित है, ऐतिहासिक नियति है और जिसके बिना मानव समाज और मानवीय मूल्‍यों की मुक्ति और उत्‍कर्ष असम्‍भव है, उसके भय से अपनी मान्‍दों में दुबकने वाले समाज के ग्रेब, पेंगुइन और गंगाविल्लियों के समानान्‍तर पितरेल सर्वहारा वर्ग के साहस, जीवन दृष्टि और भावनाओं-मूल्‍यों को जितने सुन्‍दर बिम्‍बों-रूपकों में बान्‍धकर गोर्की ने यहां प्रस्‍तुत किया है वह अद्वितीय है।

खुशवंत सिंह — एक सच्चा जनशत्रु

खुशवंत सिंह, स्वार्थी होने के साथ ही क्या आप अव्वल दर्जे के अहमक और परले दर्जे के बेवक़ूफ़ भी हैं? जिस डाल को आप काट डालना चाहते हैं, उसी पर तो आप विराजमान भी हैं। आप यह क्यों नहीं सोचते कि नर्क की ज़िन्दगी जीने वालों ने ही आपका स्वर्ग सजाया है। आपकी ज़िन्दगी और उनकी ज़िन्दगी एक ही सामाजिक ढाँचे के दो पहलू हैं। एक के बिना दूसरे का अस्तित्व मुमकिन ही नहीं। पीड़ा-व्यथा और आँसुओं के अथाह समुद्र में ही समृद्धि के मूँगा-द्वीप निर्मित होते हैं। जिन पर विलासिता की स्वर्णमण्डित मीनारें खड़ी होती हैं। खुशवंत सिंह यदि खुद ही पूँजीपति होते तो एकदम से ऐसी बातें नहीं करते। पर वे तो पूँजीपति के टट्टू हैं, भाड़े के कलमघसीट हैं। इसीलिये उन्हें पूँजीवाद की सारी खुशियाँ तो चाहिए, पर उन खुशियों को रचने की शर्त मंज़ूर नहीं। उन्हें पूँजीवाद द्वारा उत्पादित आवश्यकता और विलासिता की सारी चीज़ें चाहिए, पर उसी के द्वारा पैदा किये गये आबादी के बहुलांश के अभिशप्त, नारकीय जीवन को वे देखना भी नहीं चाहते। वे चाहते हैं, ये सभी लोग उनकी सुख-सुविधा का सारा इंतज़ाम करके रोज़ अपने-अपने गाँव को वापस लौट जायें, उनकी नज़रों से दूर हो जायें।

आम लोग, बुद्धिजीवी और अलेक्जेण्ड्रिया के पुस्तकालय की त्रासदी

बुद्धिजीवी समुदाय के ईमानदार लोगों की निजी लड़ाइयों या पूरे समुदाय की निहायत न्यायसंगत लड़ाइयों को समाज के आम लोगों का समर्थन मिलना तो दूर, उनकी हमदर्दी तक हासिल नहीं होती। यदि आप बुद्धिजीवी समुदाय के ही किसी व्यक्ति से इस प्रश्न का उत्तर पूछें तो वह या तो इसके लिए हमारे देश की जनता की पिछड़ी हुई चेतना और अशिक्षा या ”जाहिलपन और कूपमण्डूकता“ को जिम्मेदार ठहराता नजर आयेगा, या यह कहेगा कि जब बुद्धिजीवी समुदाय या एक ही पेशे में लगे हुए बुद्धिजीवी ही एकजुट नहीं हैं तो आम जनता की बात क्या की जाये। जहाँ तक पहली धारणा का प्रश्न है, हम समझते हैं कि यह बौद्धिक आभिजात्य की अहम्मन्यता से युक्त एक भ्रान्त धारणा है। और दूसरी धारणा समस्या के एक पहलू का यथातथ्य बयान है। मूल प्रश्न का उत्तर नहीं।