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क्यों है ऐसा पाकिस्तान?

आख़िर क्यों पाकिस्तान को बार-बार सैनिक तानाशाहों का मुँह देखना पड़ता है? आख़िर क्यों सैनिक सरकार न होने पर भी राजनीतिक से लेकर प्रशासनिक मामलों तक में सेना का इतना हस्तक्षेप होता है? क्यों बार-बार नागरिक सरकारें सेना के सामने घुटने टेक देती हैं? क्या इसके कारण पाकिस्तान के ऐतिहासिक विकास की विशिष्टताओं में निहित हैं? यह समझने के लिए हमें पाकिस्तान के राजनीतिक इतिहास पर एक निगाह डालनी होगी और अलग-अलग दौरों में सेना की भूमिका को भी समझना होगा।

विश्व पूँजीवादी व्यवस्था का गहराता संकट

पूँजीवाद का अन्तकारी रोग बता रहा है कि वह इस शताब्दी के आगे नहीं जा सकता। अगर जाएगा तो जनता की तबाही, किसी विनाशकारी युद्ध, आणविक युद्ध या फ़िर प्रकृति के अपूरणीय विध्वंस के साथ जो मानवता को ही ख़ात्मे की तरफ़ ले सकता है। यह एक आत्मघाती व्यवस्था है जो मुनाफ़े के उन्माद में कुछ भी कर सकती है। इसका एक-एक दिन हमारे लिए भारी है। विश्व के ताज़ा हालात और इतिहास इशारा कर रहे हैं कि हमें अपनी तैयारियाँ शुरू कर देनी होंगी!

इज़रायली जियनवादियों का फ़िलिस्तीनी जनता पर नया हमला

इतने वर्षों के संघर्ष के बाद इज़रायली जनता का भी एक बड़ा हिस्सा इस बात को समझने लगा है कि इज़रायल-फ़िलिस्तीन समस्या का “दो-राज्य समाधान” ही सम्भव और वांछित समाधान है। लेकिन साम्राज्यवाद और उसके टुकड़ों पर पलने वाले जियनवाद के रहते यह समाधान प्राप्त नहीं किया जा सकता। इनके ख़िलाफ़ संघर्ष आज अरब जनता के एजेण्डे पर सबसे ऊपर है और इस संघर्ष के नतीजे पर ही इज़रायल-फ़िलिस्तीन समस्या का समाधान निर्भर करता है। फ़िलिस्तीनी जनता को कोई सेना और हथियारों का जखीरा नहीं हरा सकता।

महामंदी – ll

पूँजी की गति को विनियमित करना पूँजीवादी सरकारों के बूते की बात नहीं होती है । मुनाफ़े की हवस से चलने वाली एक अनियंत्रित, अनियोजित और निजीकृत अर्थव्यवस्था में यही हो ही सकता है । बीच–बीच में होने वाला सरकारी कीन्सियाई हस्तक्षेप संकट को कुछ समय के लिए टाल सकता है, सिर्फ दुबारा और अधिक तूफानी गति और संवेग के साथ आने के लिए । यह विनियमन एक शेखचिल्ली का सपना है । ऐसा कोई भी विनियमन पूँजीवादी विश्व को इन चक्रीय संकटों से नहीं बचा सकता है ।

पूँजीवाद का नया तोहफा : खाद्यान्न संकट

खाद्यान्न संकट एक व्यवस्था–जनित संकट है । मुनाफे पर टिकी पूँजीवादी व्यवस्था इस दुनिया के लोगों को और कुछ दे भी नहीं सकती । इसका इलाज ‘‘कल्याणकारी’’ राज्य नहीं है । उसका युग बीत गया । इतिहास पीछे नहीं जाता । आज विश्व पूँजीवाद की मजबूरी है कि वह एक–एक करके सारे कल्याणकारी आवरण उतारकर फेंक दे । इन आवरणों का खर्च उठाने की औकात अब उसके पास नहीं रही । मौजूदा पूँजीवादी व्यवस्था का कोई इलाज नहीं है । हमें इसका विकल्प प्रस्तुत करना ही होगा । नहीं तो इसी तरह हज़ारों निर्दोष स्त्री–पुरुष भुखमरी और कुपोषण की भेंट चढ़ते रहेंगे ।

अमेरिकी सबप्राइम संकट: गहराते साम्राज्यवादी संकट की नयी अभिव्यक्ति

ऋण द्वारा वित्तपोषित कोई भी उपभोग, निवेश या किसी भी अन्य तरह की आर्थिक तेज़ी न सिर्फ़ वृद्धि की दर को कम करती जाती है बल्कि पूरे पूँजीवादी अर्थतंत्र को संकटों के सामने और अरक्षित बना देती है। एक ओर पूँजीवाद में अस्थिरता बढ़ती जाती है और दूसरी ओर वृद्धि भी ख़त्म होती जाती है। यानी एक मन्द मन्दी लगातार बरकरार रहती है जो समय-समय पर किसी बड़ी मन्दी में तब्दील होती रहती है। सबप्राइम संकट में यही बात साबित हो रही है। जिस-जिस बात की आशंका अर्थशास्त्रि‍यों ने अभिव्यक्त की थी, बिल्कुल वही हो रहा है। सबप्राइम संकट के कारण डॉलर का हृास हो रहा है जो पूरी विश्व अर्थव्यवस्था को एक लम्बी मन्दी की ओर धकेल रहा है। इससे बचने का कोई तात्कालिक रास्ता तो समझ में नहीं आ रहा है।

साम्राज्यवादियों के लिए कुछ सबक

साम्राज्यवादियों की इतिहास से कुछ ख़ास दुश्मनी या खुन्नस है। इतिहास उन्हें जो सबक सिखाना चाहता है वे उसे सीखते ही नहीं हैं। पहले वियतनाम युद्ध में, कोरिया युद्ध में, इराक और अफगानिस्तान में, और भी तमाम देशों में हुए साम्राज्यवादी हमलों और हस्तक्षेपों में यह बात साबित हुई है कि युद्ध में निर्णायक जनता होती है हथियार नहीं। वियतनाम में अमेरिकी साम्राज्यवादियों के मंसूबों को नाकाम बनाते हुए वियतनामी कम्युनिस्ट पार्टी के नेतृत्व में वहाँ की जनता ने अमेरिकी सेना को मार–मारकर खदेड़ा। कोरिया में भी अमेरिकी सेना का हश्र उत्तर कोरिया की कम्युनिस्ट पार्टी ने कुछ ऐसा ही किया। इराक और अफगानिस्तान पर कब्जे के बावजूद यह बात साबित हो गई कि युद्ध अभी ख़त्म नहीं हुआ है बल्कि जनता का जवाब तो अब मिलना शुरू हुआ है और कब्जे के बाद हुए छापामार हमलों में हजारों अमेरिकी और मित्र देशों के सैनिक मारे जा चुके हैं। और सबसे नया उदाहरण है इजरायल की अत्याधुनिक हथियारों और अमेरिकी हथियारों से लैस सेना की लेबनान के एक छोटे–से छापामार समूह हिज़्बुल्लाह के हाथों शर्मनाक शिकस्त।

तारीख़ सभी साम्राज्यवादियों की मुश्तरक़ा दुश्मन है…. और तारीख़ जनता बनाती है!

यह तथ्य किसी से छिपा नहीं है कि साम्राज्यवाद ने एशिया और अफ्रीका के प्राकृतिक और मानव संसाधनों की जो लूट मचाई वह इतिहास में अद्वितीय है। पश्चिम ने हमें सिविलाइज नहीं किया है। बल्कि यह कहना चाहिए कि पश्चिम में सभ्यता, जनवाद, आजादी, समानता, भ्रातृत्व आदि के सिद्धान्त पैदा करने का अतिरिक्त समय वहाँ के लोगों को पूरब से लूटी गई भौतिक सम्पदा के कारण मिल पाया। ब्रिटेन का औद्योगीकरण भारत से होने वाली लूट के कारण हो पाया। यही बात फ्रांस, स्पेन, पुर्तगाल और उनके उपनिवेशों के बारे में भी कही जा सकती है। यह सच है कि पश्चिम में प्रबोधन और नवजागरण के कारण तमाम मुक्तिदायी विचारों ने जन्म लिया। लेकिन ऐसा इसलिए नहीं हुआ कि हम नस्ली तौर पर कमजोर हैं और वे नस्ली तौर पर श्रेष्ठ। नस्ली श्रेष्ठता और हीनता के तमाम सिद्धान्त विज्ञान ने गलत साबित कर दिये हैं। आज पश्चिम का जो शानदार विकास हुआ है उसके पीछे बहुत बड़ा कारण एशिया और अफ्रीका की साम्राज्यवादी लूट है।

संसदीय बातबहादुरों के कारनामे

जब भूमण्डलीकरण की रफ़्तार तेज़ थी तो लगने लगा था कि ऐसे नकली मार्क्सवादियों की ज़रूरत बुर्जुआ राजनीति में समाप्त हो जाएगी। लेकिन विश्व पूँजीवाद के थिंक टैंक्स को यह बात जल्दी ही समझ में आ गई कि एन.जी.ओ. और नकली वामपंथ जैसे कुछ सेफ्टी वाल्वों की ज़रूरत अभी लम्बे समय तक बनी रहेगी। नतीजतन, यूरोप, एशिया और अफ्रीका में नकली वामपंथ के नए-नए रूप पैदा हो रहे हैं। नकली वामपंथ पूँजीवादी व्यवस्था की एक सुरक्षा पंक्ति का काम कर रहा है। यह उदारीकरण की बेलगाम होती प्रक्रिया में स्पीड ब्रेकर का काम इस व्यवस्था के दूरगामी हित में कर रहा है। यह लाल मिर्च खाकर ‘‘विरोध-विरोध’’ की रट लगाने वाले तोते हैं। ये तब तक शोर मचाते रहेंगे जब तक जनता के युवा अगुआ दस्ते इस ज़ालिम व्यवस्था के साथ-साथ इनकी गर्दन भी न मरोड़ दें।

प्रधानमंत्री महोदय की अमेरिका-यात्रा

भारत का पूँजीपति वर्ग कोई कठपुतली दलाल या घुटनाटेकू पूँजीपति वर्ग नहीं है। वह सभी से सम्बन्ध रखकर अपना हित साधाने में माहिर है। इस बात से कोई इंकार नहीं है कि साम्राज्यवाद पर उसकी आर्थिक निर्भरता है, लेकिन यह निर्भरता किसी एक साम्राज्यवादी देश पर नहीं है बल्कि पूरे विश्व साम्राज्यवाद पर है। वह किसी एक पर निर्भर होकर अपनी राजनीतिक स्वतंत्रता पर ख़तरा मोल नहीं लेना चाहता और इसलिए वह विश्व पूँजीवाद-साम्राज्यवाद के अलग-अलग धड़ों पर अपनी आर्थिक निर्भरता के बीच इतनी कुशलता से तालमेल करता रहा है कि उसकी निर्णय लेने की क्षमता बरकरार रहे।