Category Archives: जातिवाद

मौजूदा किसान आन्दोलन में भागीदारी को लेकर ग्राम पंचायतों और जातीय पंचायतों का ग़ैर-जनवादी रवैया

अपनी आर्थिक माँगों के लिए विरोध करना हरेक नागरिक, संगठन और यूनियन का जनवादी हक़ है। बेशक लोगों के जनवादी हक़ों को कुचलने के सत्ता के हर प्रयास का विरोध भी किया जाना चाहिए। इसी प्रकार किसी मुद्दे पर असहमति रखना और विरोध न करना भी हरेक नागरिक और समूह का जनवादी हक़ है। इस हक़ को कुचलने के भी हरेक प्रयास को अस्वीकार किया जाना चाहिए और इसके लिए दबाव बनाने के हर प्रयत्न का विरोध किया जाना चाहिए।

लगातार बढ़ रही दलित उत्पीड़न की घटनाओं के ख़िलाफ़ एकजुट हो

जातीय उत्पीड़न की भयावह स्थिति के बावजूद जातिवाद-विरोधी प्रगतिशील आन्दोलन खड़ा होने की बजाय चारों तरफ़ अपनी-अपनी जातीय पहचान को लेकर अस्मितावादी राजनीति ज़ोरों पर है। अस्मितावाद की नैया में सवार होकर तमाम जातीय ठेकेदार पलक झपकते ही भाजपा-कांग्रेस से लेकर तमाम क्षेत्रीय चुनावबाज़ पार्टियों की गोद में जा बैठते हैं और अपनी जाति के ही ग़रीबों के हितों के साथ सौदा करने लगते हैं। जाति-व्यवस्था विरोधी और वर्ग-आधारित आन्दोलन खड़ा करने का कार्यभार आज देश की मेहनतकश जनता और उसके युवा बेटे-बेटियों के कन्धों पर ही टिका है। अस्मितावादी रंगे सियारों और चुनावबाज़ धन्धेबाज़ों से हमें कोई उम्मीद नहीं रखनी चाहिए।

‘आज़ादी कूच’ के सन्दर्भ में – एक सम्भावना-सम्पन्न आन्दोलन के अन्तरविरोध और भविष्य का प्रश्न

हमारी इस कॉमरेडाना आलोचना का मकसद है इस आन्दोलन के सक्षम और युवा नेतृत्व के समक्ष कुछ ज़रूरी सवालों को उठाना जिनका जवाब भविष्य में इसे देना होगा। आज समूचा जाति-उन्मूलन आन्दोलन और साथ ही हम जैसे क्रान्तिकारी संगठन व व्यक्ति जिग्नेश मेवानी की अगुवाई में चल रहे इस आन्दोलन को उम्मीद, अधीरता और अकुलाहट के साथ देख रहे हैं। किसी भी किस्म का विचारधारात्मक समझौता, वैचारिक स्पष्टवादिता की कमी और विचारधारा और विज्ञान की कीमत पर रणकौशल और कूटनीति करने की हमेशा भारी कीमत चुकानी पड़ती है, चाहे इसका नतीजा तत्काल सामने न आये, तो भी।

जाति प्रश्न, मार्क्सवाद और डॉ. अम्बेडकर की राजनीतिक विरासत – सुधीर धवले को एक जवाब

जाति के प्रश्न को समझना और उसके हल का रास्ता निकालना भारत में इंक़लाब का एक बुनियादी सवाल है। लेकिन इसके लिए विचारधारात्माक स्पष्टपता और दृढ़ता की आवश्यकता है, न कि सुधीर धवले-ब्राण्ड विचारधारात्मक सारसंग्रहवाद, अवसरवाद और तुष्टिकरण की। लेनिन के शब्दों में, ‘दो स्टूलों पर एक साथ बैठने का प्रयास करने के चक्कर में उसके बीच में गिर पड़ना’ न सिर्फ अवांछनीय है, बल्कि मूर्खता भी है और इससे न सिर्फ अब तक कुछ हासिल नहीं हुआ है, बल्कि नुकसान ही हुआ है।

भगतसिंह और अम्बेडकर को मिलाने की कीमियागिरी: किसके रास्ते और किसके वास्ते

बेशक अम्बेडकर भी जाति उत्पीड़न के सवाल को ऐजेण्डे पर लाने वालों में से एक थे और अपने तौर पर जाति व्यवस्था के सवाल से जूझते भी रहे, इस तौर पर इन्हें याद करने में कोई हर्ज भी क्या हो सकता है लेकिन दिक्कत तब आती है जब अम्बेडकर और भगतसिंह के रास्ते पर चलने की बात की जाती है जैसे कि दोनों के रास्ते एक ही हों! कोई व्यक्ति एक साथ पूर्व और पश्चिम दिशा में कैसे जा सकता है या फ़िर विपरीत दिशा में जा रही दो नावों पर एक साथ सवारी कैसे की जा सकती है?

हरियाणा पुलिस का दलित विरोधी चेहरा एक बार फिर बेनकाब

दलित उत्पीड़न के मामलों का समाज के सभी जातियों के इंसाफ़पसन्द लोगों को एकजुट होकर संगठित विरोध करना चाहिए। अन्य जातियों की ग़रीब आबादी को यह बात समझनी होगी की ग़रीब मेहनतकश दलितों, गरीब किसानों, खेतिहर मज़दूरों और समाज के तमाम ग़रीब तबके की एकजुटता के बल पर ही तमाम तरह के अन्याय की मुख़ालफ़त की जा सकती है। उन्होंने अपनी बात में कहा सवर्ण और मंझोली जातियों की गरीब-मेहनतकश आबादी को श्ह बात समझनी होगी कि यदि हम समाज के एक तबके को दबाकर रखेंगे, उसका उत्पीड़न करेंगे तो स्वयं भी व्यवस्था द्वारा दबाये जाने और उत्पीड़न किये जाने के लिए अभिशप्त होंगे।

कुछ अहम सवाल जिनका जवाब जाति उन्मूलन की ऐतिहासिक परियोजना को आगे बढ़ाने के लिए अनिवार्य है

अभी हमारी चर्चा का मूल विषय है एक निहायत ज़हीन, संजीदा, इंसाफ़पसन्द नौजवान की असमय मौत और उसके नतीजे के तौर पर हमारे सामने उपस्थित कुछ यक्षप्रश्न जिनका उत्तर दिये बग़ैर हम जाति के उन्मूलन की ऐतिहासिक परियोजना में ज़रा भी आगे बढ़ने की उम्मीद नहीं कर सकते हैं। कार्ल सागान जैसा वैज्ञानिक बनने की आकांक्षा रखने वाले रोहित ने आत्महत्या क्यों की? तारों की दुनिया, अन्तरिक्ष और प्रकृति से बेपनाह मुहब्बत करने वाले इस नौजवान ने जीवन की बजाय मृत्यु का आलिंगन क्यों किया? वह युवा जो इंसानों से प्यार करता था, वह इस कदर अवसाद में क्यों चला गया? वह युवा जो न्याय और समानता की लड़ाई में अगुवा कतारों में रहा करता था और जिसकी क्षमताओं की ताईद उसके विरोधी भी किया करते थे, वह अचानक इस लड़ाई और लड़ाई के अपने हमसफ़रों को इस तरह छोड़कर क्यों चला गया? इन सवालों की पहले ही तमाम क्रान्तिकारी कार्यकर्ताओं, बुद्धिजीवियों और छात्र-युवा साथियों ने अपनी तरह से जवाब देने का प्रयास किया है। हम कोई बात दुहराना नहीं चाहते हैं और इसलिए हम इस मसले पर जो कुछ सोचते हैं, उसके कुछ अलग पहलुओं को सामने रखना चाहेंगे।