कश्मीर: यह किसका लहू है कौन मरा!

श्वेता कौल

कश्मीर में पिछले एक साल से अवाम फासीवादी मोदी सरकार और उसकी सेना के ख़िलाफ़ विरोध कर रही है। घाटी “शान्ति” के एक दौर के बाद फिर से “अशान्ति” के रास्ते चल रही है। दरअसल “शांति” का हर दौर “युद्ध” की तैयारी होता है। कश्मीरी अवाम इस बात को आज़ादी के बाद से समझती है जिसे अब अरुण जेटली ने नंगे तौर पर स्वीकार भी किया कि कश्मीर में युद्ध सरीखी स्थिति है। भारतीय राज्यसत्ता के अविराम आतंक के विरोध में कश्मीर की घाटी के नौजवान फिर से सड़क पर हैं। स्कूल की लड़कियों द्वारा सड़कों पर पुलिस पर पत्थर फेंकना कश्मीर की वह तस्वीर है जिसने कश्मीरियों के गुस्से को अभिव्यक्ति दी है। कश्मीरी नौजवानी को फासीवादी मोदी सरकार की फौजी बन्दूकों से डरने के बजाय सड़क पर गोली खाना मंज़ूर है। संघी फासीवादी कश्मीरियों को इजराइल सरीखे कश्मीर की ज़मीन से यतीम बनाने का ख्वाब देख रहे हैं।

2014 में केंद्र में तथा महबूबा मुफ़्ती के साथ जम्मू कश्मीर के साथ सरकार बनाने के बाद से इन्होंने कश्मीर में सत्ता ने जनता पर भयंकर दमन बरपाया है। कश्मीरी नौजवान को गाड़ी से बाँधकर घुमाना, घर-घर जाकर जाँच करना, पेलेट गन से हजारों को अँधा कर देना, सैकड़ों को मौत के घाट उतार दिया जाना वे घटनाएँ हैं जो फासीवादी सरकार के खूनी शासन काल को बयाँ करती है।

पर कश्मीर की यह लड़ाई 2014 से शुरू नहीं होती है बल्कि यह तो भारतीय राज्यसत्ता द्वारा थोपी हुई लड़ाई है जिसकी जड़ें भारत सरकार के कश्मीरी जनता के साथ किये गये ऐतिहासिक धोखे में है जिसे दमन के कईं चक्रों ने कमजोर नहीं बल्कि और जुझारू बनाया है। परन्तु यह भी सच है कि जनता सही राजनीतिक विकल्प के अभाव में राजकीय दमन के ख़िलाफ़ मजहबी कट्टरपन्थियों का समर्थन करती है जो इस लड़ाई को किसी भी मुकाम तक ले जाने में अक्षम हैं। वहीं तमाम मध्यमार्गी और उदारपन्थी नेताओं (जिसमेंं भारत के संसदमार्गी वामपन्थी भी शामिल हैं) का सारा ज़ोर धारा 370 को बचाने में लगा है पर यह महज कागज़ी लड़ाई है क्योंकि पहले ही तमाम कानूनों के जरिये सरकार ने इसे कमज़ोर बना दिया है और ये बातबहादुर इस पर महज भाषणबाजी करके अपनी प्रासंगिकता बनाये रखने के लिये करते हैं और दूसरी ओर कश्मीर की आज़ादी के सवाल पर या बुनियादी जनवादी अधिकारों के मसले पर चुप रहते हैं। भारत के संसदमार्गी वामपन्थियों तक ने ‘राष्ट्रवादी’ होकर कश्मीर को भारत का अभिन्न अंग घोषित किया है। वहीं संघ के एजेण्डे को बखूबी लागू कर कश्मीरियों के ख़िलाफ़ मोदी सरकार ‘ओफेंसिव’ पर है। मोदी के “टूरिज्म या टेररिज्म” के सन्देश और राजनाथ की तमाम बयानबाजियों में हिंसा का दोष कश्मीरियों पर डाला जाता है और आतंकवाद का बहाना बताकर सत्ताधारी राजकीय आतंक को ज़रूरी हस्तक्षेप बताते हैं। पर ये बार-बार भूल जाते हैं कि 7 लाख सैन्य बल कुछ कश्मीरियों को मार गिरा सकते हैं परन्तु पूरी कश्मीरी जनता को नहीं हराया जा सकता। भारतीय सेना की असंख्य गोलियों, पेलेट बन्दूकों और बमों के ख़िलाफ़ कश्मीरी अवाम तब तक सड़क पर लड़ती रहेगी जब तक वह जीत नहीं जाती है।

2016 से शुरू हुआ संघर्ष का नया दौर

8 जुलाई को सुरक्षा बलों ने एक संयुक्त कार्यवाही के दौरान हिज़बुल मुजाहिदीन से जुड़े बुरहान वानी को मार डालने से संघर्ष का नया दौर शुरू हुआ। अनुमान है कि बुरहान की मौत के बाद हुई प्रार्थना सभाओं में करीब 2 लाख कश्मीरियों ने हिस्सेेदारी की। इस घटना के साथ ही कश्मीर में प्रदर्शनों का सिलसिला शुरू हुआ जो अब तक जारी है। कश्मीर के अलग-अलग इलाकों में हज़ारों की तादाद में प्रदर्शनकारी सड़कों पर उतरे। ‘‘कानून-व्यवस्था’’ और ‘‘आतंकवाद’’ का हवाला देकर भारतीय राज्यसत्ता ने इन प्रदर्शनों में शामिल लोगों का बर्बर तरीके से दमन किया। यह संघर्ष सिर्फ बुरहान वानी की मौत का बदला नहीं था परन्तु लम्बे समय से कश्मीर घाटी में असंतोष की लहर व्याप्त थी जिसे अभिव्यक्ति बुरहान वानी की मौत होने पर उठे रोष से मिली।

दमन के नये कीर्तिमान

बल एवं हथियारों के प्रयोग सम्बन्धी अन्तरराष्ट्रीय नियम-कानूनों की धज्जियाँ उड़ाते हुए भारतीय राज्यसत्ता ने कश्मीरी जनता का दमन करने में नये कीर्तिमान स्थापित किये। पेलेट गन का जमकर इस्तेेमाल किया गया। ये पम्प करने वाली ऐसी बन्दूक है जिसमेंं कई तरह के कारतूस इस्तेमाल होते हैं। कारतूस 5 से 12 के रेंज में होते हैं, 5 को सबसे तेज़ और ख़तरनाक माना जाता है। इसका असर काफ़ी दूर तक होता है। पेलेट गन से तेज़ गति से छोटे लोहे के बॉल फायर किये जाते हैं और एक कारतूस में 500 तक ऐसे लोहे के बॉल हो सकते हैं। फायर करने के बाद कारतूस हवा में फूटते हैं और छर्रे एक जगह से चारों दिशाओं में जाते हैं। निशाने की तरफ फायर करने के बाद छर्रे सभी दिशाओं में बिखरते हैं जिससे पास से गुज़रते या दूर खड़े किसी को भी चोटें आ सकती हैं जो प्रदर्शन या भीड़ का हिस्सा भी नहीं हैं। यहाँ यह भी बताते चलें कि पेलेट गन, आम तौर पर शिकार के लिये इस्तेमाल की जाती हैं, क्योंकि इससे छर्रे चारों तरफ बिखरते हैं और शिकारी को अपने लक्ष्य पर निशाना साधने में आसानी होती है। लेकिन दरिन्दगी का आलम यह है कि कश्मीर में यह गन इन्सानों पर इस्तेमाल हो रही है जिसमेंं मासूम बच्चे भी शामिल हैं। जिस पेलेट गन के इस्तेमाल को सुरक्षा बल यह कहकर जायज़ ठहराने की बेहूदा कोशिश कर रहे है कि इससे जान को कोई ख़तरा नहीं है, उससे हालिया प्रदर्शनों में दो लोगों की मौत हो चुकी है, सैकड़ों लोग अपनी आँख की रोशनी गँवा चुके हैं, और साथ ही उनके शरीर के कई अंगों में एक साथ गम्भीर चोटें आयी हैं।

इस दौरान इण्टरनेट और टेलीफोन की सेवाएँ बन्द कर दी गयीं। कश्मीर के हालातों के बारे में कोई ख़बर बाहर न जा सके इसके लिये स्थानीय अख़बार के दफ्तरों पर छापे मारे गये, वहाँ रखी अख़बारों की प्रतियाँ ज़ब्त की गयी और चार दिन के लिये अख़बारों पर प्रतिबन्ध लगाया गया। बुजुर्आ अख़बारों और न्यूज़ चैनलों में अपवादस्व़रूप एकाध को छोड़कर बाकी सबने कश्मीर के मुद्दे पर अन्धराष्ट्रवादी उन्माद फैलाने का काम करते हुए एक ऐसा चित्र प्रस्तुत किया जैसे कि समूची कश्मीरी जनता “पाकिस्ता‍न-परस्त” और “आतंकवादी” है। कई ख़बरिया चैनलों ने तो फर्जी और पुरानी वीडियो को प्रसारित करके पत्रकारिता को कलंकित करने की रही-सही कसर भी पूरी कर दी। यही नहीं फेसबुक ने कश्मीर में जारी राज्यसत्ता की बर्बरता पर पोस्ट लिखने वाले कई लोगों का एकाउण्ट यह कहकर ब्लॉक कर दिया कि वे “राष्ट्रविरोधी” काम कर रहे हैं। वैसे यह घटनाक्रम मोदी की फेसबुक ऑफिस की यात्रा तथा मार्क जुकरबर्ग से मुलाकात के पीछे छिपे गूढ़ रहस्यों में से कुछ पर से तो पर्दा हटाने के लिये काफ़ी है!

कश्मीर क्यों गुस्सा है ?

भारतीय राज्यसत्ता और सैन्य दलों द्वारा स्थानीय लोगों पर ढ़ाए जाने वाले ज़ुल्मों –सितम की न तो यह पहली घटना है न ही आखिरी। उनके वहशियाना हरकतों की फेहरिस्त काफ़ी लम्बी है। फरवरी 1991 में कुपवाड़ा जि़ले के कुनन-पोशपोरा गाँव में राजपूताना राइफल्स के सैन्यकर्मियों ने पहले गाँव के पुरूषों को हिरासत में लिया, यातनाएँ दी और बाद में गाँव की लगभग 53-100 महिलाओं का उनके छोटे-छोटे बच्चों के सामने बलात्कार किया गया। वर्ष 2009 में सशस्त्र बल द्वारा शोपियाँ जि़ले में दो महिलाओं का बलात्कार करके उन्हें बेरहमी से मौत के घाट उतारा गया। बढ़ते जनदबाव के बाद कहीं जाकर राज्य पुलिस ने एफआयीआर दर्ज की। सीबीआयी को जाँच के आदेश जारी किये गये और बेशर्मी का परिचय देते हुए उसने सैन्य बल द्वारा महिलाओं के साथ किये गये बलात्कार और हत्या की बात को ही ख़ारिज कर दिया। यही नहीं जनवरी 1990 में गावकदल में पैरामिलिट्री बलों द्वारा 52 प्रदर्शनकारियों की निमर्म हत्या, 2000 में छत्तीलसिंहपुर, पथरीबल, बराकपुर और 2010 की माछिल फर्जी मुठभेड़ों और वर्ष 2010 में ही तुफैल मट्टू की सेना की गोलाबारी में हुई मौत के बाद पूरी कश्मीर घाटी में उठे व्यापक जनउभार में सैन्य बल द्वारा अपनी गोलियों से 100 से अधिक युवाओं, किशोरों और बच्चों की जान लिये जाने की घटनाएँ चीख-चीखकर भारतीय राज्यसत्ता के कुकर्मों की दास्ताँ बयान करती हैं। अगर आँकड़ों की बात करें तो जनवरी 1989 से लेकर मार्च 31, 2016 तक करीब 94,332 कश्मीरियों की हत्या की गयी है जिसमेंं 7,043 हत्याएँ हिरासत में हुई हैं। एक लाख से अधिक कश्मीरी जेल की सलाखों के पीछे हैं। दस हज़ार से अधिक महिलाओं का सेना द्वारा बलात्कार किया गया है। कश्मीर की जनता अपनी ही ज़मीन पर रोज़-रोज़ संगीनों के साये में रहते हुए जिस जि़ल्लत का सामना कर रही है उसकी कल्पना देश की बाकी जनता के लिये करना काफ़ी मुश्किल है।

ग़ौरतलब है कि भारतीय राज्य द्वारा सशस्त्र बल विशेषाधिकार अधिनियम यानी आफ्स्पा कानून 1958 में बनाया गया। आफ्स्पा और कुछ नहीं राज्यसत्ता द्वारा जनता के दमन और उत्पीड़न का एक ऐसा औज़ार है जो जनवाद की चादर ओढ़े इस पूँजीवादी निज़ाम की हकीकत को तार-तार कर देता है। आफ्स्पा कानून को उत्तर-पूर्वी राज्यों और पंजाब के बाद 1990 में आतंकवाद का बहाना बनाकर कश्मीर में भी लागू किया गया जिसके तहत सेना को असीमित अधिकार दिये गये। इस कानून के तहत सेना महज़ शक के आधार पर किसी को भी बिना अरेस्ट वारंट के गिरफ्तार कर सकती है, गोली मार सकती है और किसी भी इमारत को तबाह कर सकती है। आज जब कश्मीर में 100 से भी कम आतंकवादी रह गये हैं, तब भी आफ्स्पा कानून की और 7 लाख सशस्त्र सुरक्षा बलों की मौजूदगी एक सवालिया निशान छोड़ देती है। सेना की गैर-ज़रूरी मौजूदगी को कश्मीरी जनता भारतीय राज्य सत्ता द्वारा उनकी ज़मीन पर कब्ज़ा समझती है और इसलिये भारतीय राज्यसत्ता के हर प्रतीक से वह तहेदिल से नफ़रत करती है। भारतीय राज्यसत्ता द्वारा कश्मीर की जनता के दमन, उत्पीड़न और ऐतिहासिक विश्वासघात का एक लम्बा इतिहास है जिसे कश्मीरी अवाम की आने वाली पीढ़ियाँ कभी नहीं भूलेंगी। कश्मीरी जनता जिस भी हद तक सम्भव है उस हद तक भारतीय राज्य सत्ता की बेशर्म कारगुजारियों का विरोध कर रही है और आगे भी करती रहेगी।

आम तौर पर लोग सोचते हैं कि कश्मीर का मसला भारत बनाम पाकिस्तान का एक मसला है और कश्मीर की जनता तो पाकिस्तान-परस्त है। हालाँकि सोचने का यह तरीका ग़लत है। अगर हम इतिहास में थोड़ा पीछे की ओर मुडें तो हमें भारतीय राज्यसत्ता‍ के प्रति कश्मीरी जनता में मौजूद नफ़रत और अलगाव के कारणों को पता चलेगा। अंग्रेज़ों की गुलामी से आज़ाद होने के समय जम्मू और कश्मीर उन 562 रियासतों में से एक था जो अंग्रेजी राज्य के अधीन था। आज़ादी के बाद हैदराबाद, जूनागढ़ और जम्मू और कश्मीर को छोड़कर अन्य सभी रियासतों के राजे-रजवाड़ों ने या तो भारत या फिर पाकिस्तान में शामिल होने का फैसला लिया। हैदराबाद का निज़ाम एक स्वतंत्र राष्ट्र के सपने देख रहा था और जूनागढ़ का नवाब पाकिस्तान में शामिल होना चाहता था। इन दोनों रियासतों के विलय के संदर्भ में भारतीय राज्य सत्ता ने दलील दी कि उनके विलय से सम्बन्धित फैसले का अधिकार उन रियासतों के शासकों को नहीं बल्कि वहाँ की जनता को हासिल होगा। इसके मद्देनज़र जूनागढ़ में आत्मनिर्णय का अधिकार दिया गया और जनमत संग्रह कराया गया। अन्तत: दोनों ही रियासतें भारत में शामिल हुई।

अंग्रेज़ी गुलामी से आज़ादी के बाद भी कश्मीर में हरी सिंह अपने वंश के शासन को बरकरार रखने के लिये भारत और पाकिस्तान में विलय की अपेक्षा एक स्वतन्त्र राष्ट्र बनाना चाहता था। सरदार पटेल सहित कई नेता कश्मीर के पाकिस्तान में विलय के पक्षधर थे। कश्मीरी जनता में आज़ादी की लड़ाई के दौर से ही जिस नेता की सबसे अधिक साख़ थी वे थे शेख अब्दुल्लाह। शेख अब्दुाल्लाह साम्प्रदायिक आधार पर पाकिस्तान में शामिल होने के हिमायती नहीं थे। आज़ादी के तुरन्त बाद पाकिस्तान द्वारा समर्थित कबायली हमले के बाद तो शेख अब्दुल्लाह पाकिस्तान में शामिल होने के विरोधी हो गये, हालाँकि वे भारतीय राज्य में शामिल होने को लेकर भी काफ़ी सशंकित थे। वर्ष 1947 से 1953 तक शेख अब्दुाल्लाह कश्मीर के पाकिस्तान में विलय और जनमत संग्रह की अपेक्षा स्वायत्तता के पक्षधर थे। अपनी राष्ट्रीय अस्मिता के प्रति सचेत कश्मीरी जनता भी बिना किसी शर्त के भारत में शामिल होने को लेकर दुविधा में थी। आखि़रकार काफ़ी राजनीतिक मन्थन के बाद कश्मीर इस शर्त पर भारत में शामिल हुआ कि विदेशी मामलों, मुद्रा चलन और सुरक्षा मसलों के अतिरिक्त भारतीय राज्य कश्मीर के मामलों में दख़ल नहीं देगा। इसी आधार पर संविधान में धारा 370 को शामिल किया गया। कश्मीर के भारत में शामिल होने पर कश्मीरी जनता से भविष्य में जनमत संग्रह कराने का वायदा किया गया था जो कभी पूरा नहीं किया गया। नेहरू का तर्क था कि पाकिस्तान समर्थित हमले के बाद जब पाकिस्तान कश्मीर के उत्तर-पश्चिमी हिस्से से अपनी सेना वापस बुला लेगा तब जनमत संग्रह कराया जाएगा। पाकिस्तानी हुक्मरानों ने अपना कब्ज़ा छोड़ा नहीं और इस प्रकार भारतीय राज्य सत्ता ने जनमत संग्रह से इंकार कर दिया।

दूसरी ओर जम्मू में श्यामा प्रसाद मुखर्जी के नेतृत्व में भारतीय जनसंघ द्वारा समर्थित प्रजा परिषद आन्दोलन के बाद कश्मीर समस्या का तेज़ी से साम्प्रदायिकीकरण हुआ। इसका नतीजा़ था कि कश्मीरी जनता का भारत से अलगाव बढ़ने लगा और साथ ही साथ शेख अब्दुल्लाह अब भारतीय राज्य के भीतर कश्मीर की स्वायत्तता की बजाय कश्मीर की आज़ादी के बारे में विचारने लगे। इसके बाद नेहरू और शेख अब्दुल्लाह के बीच दूरियाँ बढ़ने लगी और अन्तत: 1953 में नेहरू ने शेख अब्दुल्लाह की चुनी हुई सरकार को बर्खास्त कर दिया। शेख अब्दुल्लाह की जगह भारतीय राज्य ने अपने पिट्ठू बख्शी गुलाम मोहम्मद को जम्मू-कश्मीर का जि़म्मा सौंप दिया। इसके बाद तो नेहरू कश्मीर में जनमत संग्रह के अपने वायदे से पूरी तरह मुकर गये। 1964 में शेख अब्दुल्लाह जब रिहा हुए तब तक कश्मीर के जनमत संग्रह और स्वायत्तता के मसले पर उनका रुख काफ़ी समझौता परस्त हो चुका था। 1971 के भारत-पाकिस्तान युद्ध के बाद उन्होंने भारत सरकार के सामने अपने घुटने पूरी तरह टेक दिये। 1975 में इंदिरा गाँधी-शेख अब्दुमल्लाह के बीच हुए समझौते के तहत शेख अब्दुल्लाह ने धारा 370 की प्रभावहीनता को भी मंज़ूरी दे दी।

इस ऐतिहासिक विश्वासघात ने कश्मीर की जनता में अलगाव को और अधिक बढ़ाया। बहरहाल इस पूरे दौर में कश्मीर में जनमत संग्रह और स्वायत्तता की माँग को लेकर धर्मनिरपेक्ष और अलग-अलग कट्टरपन्थी संगठन (जैसे हुर्रियत कांफ्रेंस) कश्मीरी जनता के बीच सक्रिय रहे। शुरूआती दौर में 1978 में जेकेएलएफ के नेतृत्व में कश्मीर की आज़ादी का जो आन्दोलन शुरू हुआ वह धर्मनिरपेक्ष था और भारत और पाकिस्तान दोनों द्वारा कब्ज़ा किये गये कश्मीर की आज़ादी की बात करता था। लेकिन जे के एल एफ के नेता मकबूल भट्ट के फाँसी पर चढ़ा दिये जाने के साथ ही जे के एल एफ का भी भारतीय राजसत्ता द्वारा बर्बर दमन कर दिया गया। 1984 में मकबूल भट्ट की फाँसी, 1987 के चुनावों में भारी धाँधली, 1988 में बिजली की दरों में बढ़ोत्तरी के खि़लाफ़ जनता के शान्तिपूर्ण आन्दोलन पर अन्धाधुन्ध गोलियाँ चलाये जाने के बाद कश्मीरी अवाम में भारतीय राजसत्ता के ख़िलाफ़ बगावत और तेज़ हुई। 1990 तक आते-आते कश्मीर घाटी में लाखों लोग आज़ादी के नारे लगाते हुए सड़कों पर उतर पड़े। यही वह दौर था जब पाकिस्तान ने प्रशिक्षित मुजाहिद्दीनों को कश्मीर में जेहाद के लिये भेजकर कश्मीर की आज़ादी के संघर्ष को इस्लामिक कट्टरपन्थी रंग देने की चाल चली और लगभग उसी समय हिन्दू फ़ासिस्टों ने कश्मीरी पण्डितों के बीच अपना आधार मज़बूत करने के लिये संघी टट्टू जगमोहन को कश्मीर का राज्यपाल बनाकर भेजा और कश्मीर मसले के ज़बरदस्त साम्प्रदायिकीकरण करने की घृणित योजना को अंजाम दिया। यह अनायास नहीं था कि कश्मीर में सदियों से जो पंडित और मुस्लिम आबादी एक साथ रह रही थी, अचानक एक दूसरे की दुश्मन हो गयी। इस दौरान(1990-2004) 219 कश्मीरी पण्डित मारे गये और उन्होंने घाटी छोड़ी। हालाँकि जो संघ आज खुद को कश्मीरी पण्डितों का सबसे बड़ा रहनुमा बताता है, वह उस दौरान कश्मीरी पण्डितों का कत्लेआम देखता रहा और उसे रोकने की न तो उसने कोई कोशिश की न ही कश्मीरी पण्डितों को कोई सुरक्षा मुहैया करायी।

भारतीय राज्यसत्ता के विश्वासघात, उसके द्वारा धर्मनिरनेक्ष आन्दोलनोंका सुनियोजित सफ़ाया और सेना द्वारा कश्मीरी जनता पर ढाए जाने वाले दमन और बर्बरता ने वह ज़मीन काफ़ी पहले तैयार की थी जिसकी एक प्रतिक्रिया के तौर पर और साथ ही विकल्पहीनता के चलते कश्मीरी नौजवान बड़ी तादाद में आतंकवाद और धार्मिक कट्टरपन्थ के रास्ते पर आगे बढ़ने लगे। 1989 से भारतीय राज्य ने आतंकवाद के ख़िलाफ़़ बड़े पैमाने पर सैन्य अभियान चलाया और इसी दौर में कुख्यात कानून आफ्सपा भी लागू किया गया। इस दौरान आतंकवाद का मुकाबला करने के नाम पर सेना ने कश्मीरी जनता का बर्बर दमन और उत्पीड़न किया जो कि आज तक बदस्तूर जारी है। आतंकवाद के काफ़ी हद तक कुचल दिये जाने के बावजूद सैन्य उपस्थिति को भारतीय राज्यसत्ता एक हज़ार एक बहानों से जायज़ ठहराकर जनमानस को भी बड़े पैमाने पर प्रभावित कर रही है।

हमें यह बात समझनी होगी कि राजकीय आतंकवाद प्रतिक्रिया स्वरूप जनता के कुछ हिस्सों को आतंकवाद की तरफ ले जाता है, पर इसका यह अर्थ कत्तई नहीं कि समूची जनता आतंकवादी है। आज कश्मीर में यही हो रहा है। आज कश्मीर की जनता का यह संघर्ष भारतीय राज्यसत्ता के सालों से बर्बर दमन, उत्पीड़न और नागरिक हत्याओं के ख़िलाफ़ उनके आत्मनिर्णय और आज़ादी का संघर्ष है। भारतीय राज्यसत्ता का विश्वासघात, दमन, और इस सबके खि़लाफ़ उठने वाले प्रतिरोध के सही विकल्प और सही नेतृत्व का अभाव कश्मीरी नौजवानों को आतंक के रास्ते पर ले जाने के लिये जि़म्मेदार है.

लेकिन भारतीय राज्यसत्ता द्वारा सारी कश्मीर की अवाम को आतंकी के रूप में दिखाने की कोशिश कश्मीरी जनता के संघर्ष को बदनाम करने और कश्मीर में भारतीय राज्यसत्ता के हर जुल्म को जायज ठहराने की घृणित चाल है। पिछले लगभग छ: दशकों से भी अधिक समय के दौरान भारतीय राज्यसत्ता द्वारा कश्मीरी जनता के दमन, उत्पीड़न और वायदाखि़लाफ़ी से उसकी आज़ादी की आकांक्षाएँ और प्रबल हुई हैं और साथ ही भारतीय राज्यसत्ता से उसका अलगाव भी बढ़ता रहा है। बहरहाल सैन्य दमन के बावजूद कश्मीरी जनता की स्वायत्तता और आत्मनिर्णय की माँग कभी भी दबायी नहीं जा सकती। मगर यह बात भी उतनी ही सच है कि पूँजीवाद के भीतर इस माँग के पूरा होने की सम्भावना नगण्य है। भारतीय शासक वर्ग अलग-अलग रणनीतियाँ अपनाते हुए कश्मीर पर अपने अधिकार को बनाये रखेगा। भारत और पाकिस्तान दोनों के शासक वर्ग अपने हितों को साधने के नज़रिये से कश्मीर को राष्ट्रीय शान का प्रश्न बनाए रखेंगे।

कश्मीर के अवाम की महत्वाकांक्षा की पूर्ति तो एक समाजवादी समाज में ही सम्भव है जहाँ कश्मीर सहित अन्य दमित राष्ट्रीयताओं को आत्मनिर्णय का पूरा अधिकार हासिल होगा। कश्मीर और अन्य राष्ट्रीयताओं के आत्मानिर्णय के अधिकार का संघर्ष समाजवाद के लिये सर्वहारा क्रान्ति के संघर्ष के साथ जुड़ा है।

मुक्तिकामी छात्रों-युवाओं का आह्वान,जुलाई-अगस्‍त 2017 

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