ऑक्यूपाई यूजीसी आन्दोलनः शिक्षा का यह संघर्ष, संघर्ष की सोच को बचाने का संघर्ष है

प्रेमप्रकाश

88 दिनों तक यू.जी.सी. (विश्वविद्यालय अनुदान आयोग) को घेर कर बैठे छात्र अब अपनी माँगों को लेकर देश भर के विश्वविद्यालयों में प्रचार और छात्र एकजुटता के लिए चले गये हैं। यूजीसी के बाहर 88 दिनों से लगातार गूँजते नारों की आवाज़ अब पूरे देश में नये सिरे से छिटकायी जा रही है। सरकार छात्रों पर लगातार हमले तेज़ कर रही है। साम्प्रदायिकता की आग में देश को झोंककर लोगों की लाशों पर वोट की रोटियाँ सेंकने वाली सरकार अब जनता से उनके प्रतिरोध के बौद्धिक अस्त्र को छीन लेना चाहती है। छात्रों से उनके सोचने की आज़ादी ही नहीं उनके पढ़ने तक के अधिकार छीने जा रहे हैं। फासीवादी शासन तंत्र न केवल जनता के बीच भय का माहौल बनाकर वर्चस्व स्थापित करने की कोशिश कर रहा है बल्कि सोच और सृजन के हर एक अवसर से लोगों को वंचित कर देना चाहता है। मौजूदा समय में शैक्षणिक संस्थाओं पर हिन्दुत्ववादी विचार के पोषक व्यक्तियों की नियुक्तियाँ एवं शिक्षा के भगवाकरण की नीतियाँ प्रतिरोध की हर सोच को कुचल देने, उनको भ्रूण रूप में ही नष्ट कर देने और आज़ाद ख़यालों की ज़मीन को बंजर करने की साजिश हैं।

जिन्हें कक्षाओं में होना चाहिए वे सड़कों पर क्यों हैं?

छात्रों को कहाँ होना चाहिए? इस सवाल का शायद सबसे पहला उत्तर जो हमारे दिमाग में आता है वह यह है कि स्कूल में, विश्वविद्यालयों में, अपनी कक्षाओं में। लेकिन आज उक्त सवाल का सबसे तार्किक और न्यायसंगत उत्तर हमारे समय में यह है कि जहाँ अन्याय और शोषण हो, सोच, सृजन और पढ़ने के भी अधिकार पर हमला हो उसके विरोध में होना चाहिए और उसके खि़लाफ़ लड़ी जा रही हर लड़ाई के मोर्चे पर होना चाहिए। ऑक्‍युपाई यूजीसी आन्दोलन के छात्रों ने दूसरे उत्तर को चुना है।

आंदोलन का विस्तृत घटनाक्रम

UGC-Protest7 अक्टूबर 2015 को यूजीसी की एक बैठक में शोध छात्रों को दिये जा रहे ‘नॉन-नेट स्कोलरशिप’ (यह वजीफ़ा उन शोध छात्र-छत्रओं को दिया जाता था जिनका नेट जेआरएफ उत्तीर्ण नहीं होता तथा जो शोध कर रहे होते हैं) को खत्म करने का फैसला लिया गया। उसी दिन ने सामूहिक रूप से यह फैसला किया कि जब तक इस विषय पर कोई ठोस निर्णय नहीं आ जाता वे वहीं यूजीसी कार्यालय को घेर कर बैठे रहेंगें। 22 अक्टूबर को दिन में भी जब यूजीसी की तरफ से कोई जवाब नहीं मिला तब शाम को छात्रों ने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का पुतला जलाया। इसी शाम अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद् (एबीवीपी) के छात्र भी यूजीसी कार्यालय पहुँचे तथा वजीफे की माँग को लेकर आन्दोलनरत छात्रों के साथ गाली-गलौच करते हुए उन्हें भड़काने तथा मारपीट कर आन्दोलन को तोड़ने का प्रयास करने लगे। आन्दोलनकारी छात्रों ने इस बात की तरफ ध्यान नहीं दिया तथा वे यूजीसी के अहाते के अन्दर अपनी माँग को लेकर बैठे रहे। 22 अक्टूबर की रात यूजीसी के अहाते के अन्दर कुल 112 विद्यार्थी थे जिसमें 30 छात्राएँ भी थीं। छात्र इस बात की आशा में बैठे थे कि जब अगले दिन यूजीसी कार्यालय खुलेगा तो उनकी बात सुनी जायेगी। लेकिन 23 अक्टूबर को सुबह 4 से 5 बजे के बीच लगभग 300 पुलिस वालों ने यूजीसी कार्यालय को घेर लिया और छात्रों को ज़बरन बसों में भर कर दिल्ली के उत्तर में भलस्वा थाने ले जाया गया। अपने शिक्षा के अधिकार और वजीफे की माँग को लेकर जवाब ढूँढते छात्रों के साथ ऐसा व्यवहार क्या लोकतांत्रिक देश की सरकार का व्यवहार है? या यह हमारे हर सुबह को सत्ता की बन्दूक से अधिकार छीनने वाले तानाशाहों की करतूत की बानगी है। इसे समझना हमारे समय के हर ज़िन्दा इंसान के लिए ज़रूरी है। छात्रों को पुलिस द्वारा यूजीसी से उठाये जाने की घटना को सुनकर दिल्ली के तमाम छात्र यूजीसी कार्यालय पर आ गये और जवाब माँगने लगे। इस पर पुलिस ने इन छात्रों पर लाठीचार्ज किया और छात्राओं तक को पीटा गया। और उधर यूजीसी कार्यालय पर हुए लाठी चार्ज की घटना की खबर जब भलस्वा थाने पहुँची तो वहाँ पुलिस हिरासत में छात्रों ने भूख हड़ताल शुरू कर दी। छात्र आन्दोलन के दबाव, तमाम शिक्षकों-सामाजिक कार्यकर्ताओं के प्रयास से शाम को पुलिस ने छात्रों को यह कहते हुए छोड़ा कि अब वे दोबारा यूजीसी नहीं जायेंगे।

इसी बीच इस मुद्दे पर छात्रों को गुमराह करने के लिए केन्द्रीय मंत्री स्मृति ईरानी से एबीवीपी के छात्र मिले और उन्होंने एकतरफा जीत का प्रचार करना शुरू कर दिया जबकि न तो यूजीसी और न ही मानव संसाधान विकास मंत्रालय से कोई लिखित आश्वासन मिला था। संघी गुण्डों के इस गिरोह की छात्र विरोधी हरकत पहले भी नज़र आयी थी। 26 अक्टूबर को लगभग 500 छात्र दोबारा यूजीसी पर अपनी माँगों के लिए आ डटे परन्तु पुलिस ने उन्हें अन्दर नहीं जाने दिया और न ही उनके प्रतिनिधि मण्डल को मिलने दिया गया। 27 अक्टूबर को जब छात्रों ने एक बार पुनः यूजीसी में अन्दर जाने की कोशिश की तो उन्हें पुलिस ने बैरिकेड पर रोक दिया और छात्रों पर बर्बर लाठीचार्ज किया, छात्राओं को पुरुष पुलिसकर्मियों द्वारा घसीटा गया, मारा-पीटा गया। कइयों के हाथ टूटे, कइयों ने खून बहाया। इसी बीच यूजीसी प्रमुख वेदप्रकाश का बयान आया कि वह कुछ नहीं कर सकते और इसमें मंत्रालय ही फैसला करेगा। मंत्रालय ने मामले की लीपापोती करते हुए 28 अक्टूबर को एक रिव्यू कमेटी का गठन किया। इस रिव्यू कमेटी में वजीफे से जुड़े मुद्दे में ‘मेरिट’ व अन्य ‘आर्थिक मानदण्डों’ की बात कही गयी है जो छात्रों को स्वीकार नहीं उनका कहना है कि जब पहले से ही एक प्रक्रिया मौजूद है जिसके तहत लोगों को यह शोधवृत्ति दी जाती है तो यह मानदण्ड समाज में सामाजिक रूप से पिछड़े तबकों और महिलाओं को शोध शिक्षा से दूर कर देगा। साथ ही यह शोध की नियमितता को भी प्रभावित करेगा जिससे शोध की गुणवत्ता प्रभावित होगी।

सामूहिक निर्णय द्वारा छात्रों ने आन्दोलन को आगे बढ़ाने के लिए यूजीसी का घेराव जारी रखा और ऑक्यूपाई यूजीसी आन्दोलन की एक समन्वय कमेटी बनायी जिसमें 16 संगठन और कई विश्वविद्यालयों के स्वतन्त्र छात्र शामिल हैं। आन्दोलनरत छात्रों पर हुए लाठी चार्ज और दमन के खि़लाफ़ देशभर में विरोध प्रदर्शन हुए। तमाम विश्वविद्यालयों में पुलिस प्रशासन व मंत्रियों के पुतले जलाये गये और पूरे देश भर में सरकार के इस कदम के खि़लाफ़ छात्र सड़कों पर आये। छात्रों ने आन्दोलन को आगे बढ़ाते हुए सड़क पर ही अपनी कक्षाओं का आयोजन किया। दिल्ली की तमाम महिला संगठन, मज़दूर यूनियनें इस आन्दोलन के समर्थन में आयीं। समन्वय कमेटी के आह्वान पर 5 नवम्बर 2015 को मानव संसाधन विकास मंत्रालय (एमएचआरडी) पर हजारों छात्र और सामाजिक कार्यकर्ता पहुँचे और उन्होंने मंत्री स्मृति ईरानी से मिलने की बात कही। मंत्री महोदया छात्रों के प्रतिनिधि मण्डल से मिलने के लिए बाहर आयीं और उन्होंने कहा कि ‘सबको वजीफा दिया जायेगा’ यानी उक्त स्कॉलरशिप बन्द नहीं होगी। परन्तु जब छात्रों ने यह पूछा कि ‘जब सबको वजीफा दिया जाना है तो फिर मेरिट और अन्य आर्थिक आधार के मापदण्ड की बात क्यों की जा रही है? इस पर मंत्री ने सारी बात रिव्यू कमेटी पर टाल दी और चली गयीं। अब भी छात्रों के प्रश्न अनुत्तरित थे। छात्रों की माँग है कि ‘नॉन-नेट फेलोशिप’ को ख़त्म न किया जाये, उसे बढ़ाया जाये और उसे राज्यों के विश्वविद्यालयों में भी लागू किया जाये, शिक्षा में होने वाले बजट में कटौती को बन्द किया जाये। होता यह है कि सम्बन्धित सुझावों को शिक्षा के लिए ज़िम्मेदार संस्थान यूजीसी उन्हें मंत्रालय के पास भेजता है और मंत्री उसे रिव्यू कमेटी का हवाला देते हुए टाल देती हैं। कमेटियाँ रिपोर्टें लिखने में सालों साल लगाती हैं और विरोधाभासी प्रस्ताव देती हैं। सरकारें उसे लागू करने के लिए बाध्य नहीं हैं। इस बीच न्याय और तंत्र के बीच झूलते हैं लोग, उनके सपने और लटकते हैं लोगों के अरमाँ व ज़िन्दगी और फाँसी पर झूल जाते हैं छात्र-नौजवान, मज़दूर-ग़रीब किसान और जारी रहता है तो सत्ताधारियों और सरकारों द्वारा लोकतंत्र की रक्षा की कसम खाकर उसे कत्ल करने का निरन्तर खूनी खेल! क्या इसकी जवाबदेही महज सत्तालोलुप भेड़ियों की है? हम सभी जो अपने को महज सांस ले लेने के अर्थों में ज़िन्दा नहीं समझते अपनी ज़िम्मेदारी कब समझेंगे और इस निज़ाम-ए-कोहना के खि़लाफ़ कब आवाज़ उठायेंगे?

ख़ैर, पुनः अपने मुद्दे पर लौटते हैं, अनुत्तरित लेकिन हताश नहीं बल्कि संघर्ष के नये जज़्बे के साथ छात्र वापस यूजीसी कार्यालय पर आते हैं। पूरे देश में हस्ताक्षर अभियान चलाया जाता है कई विश्वविद्यालयों से इस हस्ताक्षरित चिट्ठों के साथ माँगों का एक ज्ञापन सौंपने के लिए छात्र 18 नवम्बर को यूजीसी से एमएचआरडी तक मार्च करते हैं। लेकिन उनको एमएचआरडी भवन के पास रोक दिया जाता है। न तो उनसे मिलने के लिए मंत्रालय से मंत्री आती हैं और न ही कोई अन्य सरकारी प्रतिनिधि। छात्रों ने अपना एक प्रतिनिधि मण्डल अन्दर भेजने की बात कही इसे भी नहीं सुना गया और कहा गया कि अभी अन्दर बैठक चल रही है। शाम को सात बजे पुलिस द्वारा यह बताया गया कि मंत्रालय बंद हो चुका है अब कोई नहीं है। इस पर छात्रों ने यह फैसला किया कि वे वहीं बैठेगें और जब मंत्रालय को समय मिलेगा तो वह उन्हें बुलाकर ज्ञापन ले ले। परन्तु छात्रों को वहाँ नहीं बैठने दिया गया, उन्हें घसीटते हुए मारपीट करते हुए पुलिस ने बसों में भर लिया और बदसलूकी की गयी। उन्हें पार्लियामेण्ट थाने में ले जाया गया और देर रात यूजीसी पर छोड़ दिया गया। ये वही मंत्री हैं और उनकी सरकार है जो देश के विकास और युवाओं के लिए शिक्षा-रोज़गार की लम्बी-चौड़ी बात करते हुए वोट के लिए जीभ लपलपाते हुए फिरा करते थे। और जब कई सौ छात्र मंत्रालय के सामने गये व अपनी माँगों का ज्ञापन सौंपने लगे और उनकी बात तक नहीं सुनी गयी व इनसे मिले तक नहीं।

इसके बाद यूजीसी और मंत्रालय के अड़ियल रवैये के खि़लाफ़ पूरे देश भर में छात्रों ने आन्दोलन तेज़ कर दिया। अबकी बार 9 दिसम्बर को संसद मार्च का फैसला लिया गया। छात्रों ने यह तय किया कि जब शिक्षा के लिए जवाबदेह यूजीसी और मंत्रालय अड़ियल बना हुआ है तो देश की संसद को उनके प्रश्नों का जवाब देना चाहिए। समन्वय कमेटी ने पूरे देश से दिल्ली चलो का आह्वान किया। 9 दिसम्बर को यूजीसी से संसद मार्च के लिए हजारों छात्रों ने यात्र शुरू की। ‘जनता के प्रतिनिधियों’ से मिलने जा रहे छात्रों को मण्डी हाउस पर ही पुलिस द्वारा रोकने का प्रयास किया गया। उन पर लाठियाँ बरसायी गयीं। दिल्ली के कनाट प्लेस के पास उनका स्वागत लाठियों, आँसू गैस के गोलों, पानी के टैंकरों से किया गया। फ़िर से कइयों के सर फूटे, हड्डियाँ टूटी, छात्राओं के साथ पुरुष पुलिस कर्मिर्यों द्वारा बदसलूकी की गयी। सैकड़ों छात्रों को पार्लियामेण्ट थाने ले जाया गया। 20 छात्रों को अस्पताल में भरती करवाया गया। एक बार फ़िर से देश की सुरक्षा के नाम पर खड़े किये गये पुलिस तंत्र का असली चेहरा बेनकाब हुआ कि यह जनता के शोषक नेताओं और पूँजीपतियों की सुरक्षा में कितनी मुस्तैदी से खड़े रहते हैं और जनता पर अपनी लाठियाँ बरसाने से जरा भी नहीं चूकते हैं। छात्र ‘जनप्रतिनिधियों’ से अपने जनतांत्रिक अधिकारों से जुड़े सवालों को लेकर मिलने जा रहे थे और उनके साथ यह सुलूक? पार्लियामेण्ट थाने में छात्राएँ अपने ऊपर हुए अत्याचार की शिकायत के लिए कई घण्टे जूझती रहीं तब जाकर उनकी शिकायत लिखी गयी और रात के करीब 2 बजे सभी को  वापस यूजीसी छोड़ दिया गया। छात्र एक बार फ़िर इकट्ठा हुए और समन्वय कमेटी का विस्तार किया गया।

छात्रों की समन्वय कमेटी ने आन्दोलन को जनवादी तरीके से चलाने की कोशिश जारी रखी और विभिन्न संगठनों तथा स्वतन्त्र छात्रों से बहस-मुबाहिसे के द्वारा तथा विभिन्न मुद्दों पर सहमति के आधार पर चीजों को आगे बढ़ाया। इस बीच यूजीसी स्थल को घेरने को लेकर बरती जा रही ढील पर कमेटी में कड़े शब्दों में बात हुई। छात्र संगठन ‘आइसा’ द्वारा 9 दिसम्बर के मार्च के समय पैदा किये गए विभ्रम-जिसमें उसके पोस्टर और परचों से यह बात पैदा हुई कि समन्वय कमेटी का मार्च 9 दिसम्बर को न होकर 8 दिसम्बर को ही था-पर भी लम्बी बात हुई। आइसा द्वारा ऐसी सांगठनिक संकीर्णता की बात पर भी कमेटी में चर्चा हुई और आगे से ऐसे विभ्रमों को दूर करने की बात की गयी। विभिन्न संगठनों एवं स्वतंत्र छात्रों के समन्वय कमेटी के मोर्चे के रूप में  इस आन्दोलन में तमाम सही बातों और मुद्दों को लेकर खड़ी हुई एकजुटता के बावजूद आन्दोलन में एक स्वच्छन्दतावादी प्रवृत्ति और समन्वय कमेटी में अराजकतावादी रुझान भी हावी रही। कमेटी को आन्दोलन को और जुझारू बनाने व आगे ले जाने के लिए जवाबदेही की प्रक्रिया को और मजबूत बनाने पर काम करना होगा और साथ ही समन्वय और सूचनाओं के आपसी आदान-प्रदान व मोर्चे के आन्तरिक जनवाद पर काफ़ी काम करने की ज़रूरत है।

9 दिसम्बर के मार्च के बाद समन्वय कमेटी के सदस्यों का एक प्रतिनिधि मण्डल लगातार एमएचआरडी से मिलने की कोशिश करता रहा ताकि वह अपनी माँगों का लिखित ज्ञापन सौंप सके और इस मुद्दे पर चर्चा की जा सके। परन्तु पहले तो उसे समय न देते हुए मंत्रालय टालता रहा और अन्त में यह कहते हुए मना कर दिया कि मंत्री स्मृति ईरानी ने उनसे मिलने से मना कर दिया है। रिव्यू कमेटी की रिपोर्ट दिसम्बर 2015 में आनी थी और वह नहीं आयी। दिल्ली समन्वय कमेटी ने 13 जनवरी को मंत्रालय द्वारा मुद्दे को लटकाने के खि़लाफ़ एमएचआरडी पर प्रदर्शन किया। इस दिन पाँच छात्रों का एक प्रतिनिधि मण्डल सचिव विनयशील ओबराय, उप सचिव इशिता रॉय और निदेशक से मिला। सारे मामले को सुनने के बाद सचिव ने पुनः आश्वासन देते हुए कहा कि वे भी छात्रों के साथ हैं। परन्तु छात्रों की माँगों पर उनका कहना यही था कि रिव्यू कमेटी के रिपोर्ट आने पर इस मामले पर कार्रवाई मंत्रालय शुरू करेगा। छात्रों के प्रतिनिधि के यह पूछने पर कि 16 जनवरी 2016 को रिव्यू कमेटी की बैठक प्रस्तावित है पर उन्होंने कहा कि इसे अन्तिम बैठक नहीं मानना चाहिए और रिपोर्ट में अभी समय लग सकता है। प्रतिनिधि मण्डल ने हैदराबाद केन्द्रीय विश्वविद्यालय से निकाले गये पाँच दलित छात्रों का मुद्दा भी सचिव के सामने रखा और इस पर तुरन्त कार्रवाई और न्याय की माँग की। फ़िर एक आश्वासन और अनिश्चय की स्थिति के साथ प्रतिनिधि मण्डल बाहर आया। सरकार की पूरे मामले को लम्बित करने और देरी को लेकर छात्रों में व्यापक रोष था। अब पूरे मामले को एक दूसरे स्तर पर ले जाकर पूरे देश में आन्दोलन को लेकर जाने की जरूरत है। 16 दिसम्बर को एक प्रेस सम्मलेन करके यूजीसी आन्दोलन के दूसरे चरण में ले जाया गया है अब यूजीसी कार्यालय के बाहर चौबीस घण्टे बैठने की बजाय हर विश्वविद्यालय में हस्ताक्षर अभियान और प्रचार सघन करने का फैसला लिया गया है। अगले चरण में विश्वविद्यालय स्तर पर हड़ताल, रेल रोको-रास्ता रोको  आदि चीज़ें की जायेंगी और पुनः फरवरी में व्यापक एकजुटता के साथ एमएचआरडी पर दस्तक दी जायेगी। इसी बीच देश भर में शिक्षा को लेकर प्रदर्शन जारी हैं। साम्प्रदायिक फासीवादी सरकार द्वारा विद्यार्थियों पर लगातार दमन जारी है। हैदराबाद के छात्र रोहित वेमुला की आत्महत्या दरअसल फासिस्ट सरकार के तंत्र द्वारा की गयी हत्या है जिसे लेकर पूरे देश में प्रदर्शन हो रहे हैं। लखनऊ में मोदी की सभा के दौरान विरोध करने वाले छात्रों को विश्वविद्यालय से निकालने की भी खबर है। यह सब घटनाक्रम अभूतपूर्व है जिसे शिक्षा संस्थानों पर एक नये सुनियोजित हमले के रूप में देखा जा सकता है।

दरअसल पूँजीवादी संकट की इस बेला में फासीवाद के नये उभार और भारत में साम्प्रदायिक हिन्दूवादी सरकार के आने के बाद शिक्षा संस्थाओं और ज्ञान तथा शोध की संस्थाएँ निशाने पर हैं। फासीवाद अपनी कार्य प्रणाली में अपने एजेण्डे को लाने की हर सम्भव कोशिश करता है और जनता के बीच  फासीवादी वर्चस्व की अपनी विचारधारा को हरसम्भव तरीके से स्थापित करने का काम करता है। वह जनता के बीच ऐसे मुद्दों को स्थापित करने की कोशिश करता है जिसके उत्स प्राक-पूँजीवादी जीवन में होता हैं। लेकिन वह उन्हें उन्हीं रूपों में नहीं बल्कि पूँजीवाद द्वारा सहयोजित और शोषण की नयी परिस्थितियों के लिए उन्हें पुनरुत्पादित करता है। इस रूप में राष्ट्रवाद के नए संस्करण, संस्कृति की फासीवादी व्याख्या, धार्मिक आधार पर बंटवारा और उन्माद, दंगे, प्रतीकों के पवित्रीकरण आदि शामिल हैं। जनता के बीच ‘संस्कृति उन्मादी गुण्डों’ द्वारा भय की राजनीति से, दंगों द्वारा भय और आभासी असुरक्षा बोध के द्वारा भयनिर्माण से वह अपने पक्ष में राय निर्माण का काम तो करता ही है साथ ही वह स्वतन्त्र चिन्तन, आज़ादी, जनवाद, और अवाम के सही प्रश्नों के बारे में जागरूक जनसंगठनों और शिक्षा और ज्ञान की संरचनाओं पर सुनियोजित हमले करता है। प्रतिरोध के हर एक स्वर स्रोत को तबाह बर्बाद करने और हर एक क्षेत्र को पूँजीवाद के मुनाफे का नया क्षेत्र बनाने पर वह आमादा होता है। इस रूप में वर्तमान शिक्षा संस्थानों पर हमला इसके इस दोहरे नापाक उद्देश्य का नतीजा है।

वर्तमान सरकार उच्च शिक्षा को विश्व व्यापार संगठन में शामिल करने के लिए प्रतिबद्ध है। दिसम्बर 2015 के दोहा बैठक में उच्च शिक्षा को गैट (जनरल एग्रीमेण्ट ऑन ट्रेड) के तहत लाने का प्रस्ताव था। भारत सरकार ने इस मुद्दे पर दोहा सम्मलेन में कोई विरोध दर्ज नहीं किया और न ही इसको चर्चा के लिए खोला। इससे यह स्पष्ट है कि भारत सरकार उच्च शिक्षा में डब्ल्यूटीओ के समझौते को लाने वाली है। एक बार अगर उच्च शिक्षा को इस समझौते के तहत लाया जाता है तो न तो सरकार किसी भी सरकारी विश्वविद्यालय को कोई अनुदान देगी और न ही शिक्षा से सम्बन्धित अधिकार संविधान के दायरे में होंगे। क्योंकि किसी भी देश के लिए जो डब्ल्यूटीओ और गैट्स पर हस्ताक्षर करता है उसके लिए इसके प्रावधान बाध्यताकारी होते हैं। इससे देश में रहा-सहा उच्च शिक्षा का ढाँचा भी तबाह हो जायेगा और यह इतना महँगा हो जायेगा कि देश की ग़रीब जनता की बात तो दूर मध्यवर्ग के एक ठीक-ठाक हिस्से के लिए भी यह दूर की कौड़ी होगा। एमिटी यूनिवर्सिटी, लवली प्रोफेशनल यूनिवर्सिटी और शारदा यूनिवर्सिटी तथा अन्य निजी शिक्षा संस्थानों की फीस आज भी सामान्य पाठ्क्रमों के लिए 50,000 से 1,00,000 रुपये प्रति सेमेस्टर है। अगर यह समझौता उच्च शिक्षा में लागू होता है तो जहाँ एक और देशी-विदेशी पूँजीपतियों के लिए शिक्षा से मुनाफा वसूलने की बेलगाम छूट मिल जायेगी वहीं जनता से भी शिक्षा का मौलिक अधिकार छिन जायेगा। जिस तरह से आज सरकारी अस्पतालों की दुर्दशा के बाद निजी अस्पतालों का मुनाफा लोगों की ज़िन्दगी की कीमतों पर फल रहा है उसी तरह शिक्षा के रहे-सहे ढाँचे में जो थोड़ी बहुत ग़रीब आबादी आम घरों से पहुँच रही है वह भी बन्द हो जायेगी। इस प्रकार यह पूरी नीति हमारे बच्चों से न सिर्फ़ उनके पढ़ने का अधिकार छीन लेगी वरन उनसे सोचने, सपने देखने का हक भी छीनेगी।

दूसरी तरफ देश में लगातार शिक्षा के बजट में कटौती हो रही है । पिछले सत्र में 17 प्रतिशत बजट कटौती हुई है तथा उच्च शिक्षा संस्थाओं पर लगातार स्वयं अपना फण्ड जुटाने का दबाव डाला जा रहा है। इस पूरी प्रक्रिया में शिक्षा उनके लिए ही सम्भव हो पायेगी जिनके पास उसे खरीदने की कूव्वत होगी। और इस रूप में शिक्षा से व्यापक आम आबादी का एक छोटा हिस्सा जो आज विश्वविद्यालयों तक पहुँच रहा है वह भी वंचित हो जायेगा। इस रूप में सरकार की यह नीति एक और पूँजीपतियों को मालामाल करेगी दूसरी और जनता के हिस्से से सोचने समझने वाले और जनता का पक्ष लेने वाले लोगों को शिक्षा से दूर करेगी और अन्ततः जनता को उसके पक्ष में लड़ने वाली चेतस बौद्धिक आबादी से भी वंचित करेगी।

इस पूरे पहलू में आज के समय शिक्षा संस्थानों पर हमला एक विवेकवान तार्किक प्रतिरोध पर हमला है और जनता की शिक्षा तक हर पहुँच को रोक देने की साजिश संघर्ष के बौद्धिक और सैद्धान्तिक मोर्चे से भी जनता की आवाज़ को हटाकर इसकी जगह एक ‘सत्ताधर्मी फासिस्ट सोच’ को स्थापित करना है।

परन्तु इतिहास गवाह रहा है कि आज़ाद इंसान की सोच और संघर्ष को तमाम फासिस्ट दुरभिसन्धियों षड़यंत्रों और दमन के बावजूद दबाया नहीं जा सका है। यूजीसी का आन्दोलन जारी है शिक्षा संस्थाओं के अन्दर व्याप्त गैर जनवाद, जातिवाद के आयाम नये सिरे से छात्रों को आत्महत्या तक के लिए विवश कर रहें हैं। रोहित वेमुला की मौत ने पूरे देश में उच्च शिक्षा संस्थाओं को लेकर एक नये आन्दोलन की शुरुआत कर दी है। आज शिक्षा का यह संघर्ष फासीवादी पूँजीवाद से संघर्ष से जुड़कर ही अपनी मंजिल पा सकता है। यह आज हम सबके सामने एक ज़िन्दा सवाल है कि हमें महज ज़िन्दा रहना है या जीने की जंग में हिस्सा लेना है। शिक्षा के लिए संघर्ष जारी है।

 

मुक्तिकामी छात्रों-युवाओं का आह्वान,नवम्‍बर 2015-फरवरी 2016

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