जमाल ख़शोज़ी की मौत पर साम्राज्यवादियों के आँसू परन्तु यमन के नरसंहार पर चुप्पी!

सनी

सऊदी अरब के खुफिया एजेंटों ने सऊदी अरब मूल के अमरीकन पत्रकार जमाल ख़शोजी को तुर्की के सऊदी अरब के कॉन्सुलेट में मार दिया और उसके शरीर के टुकड़े-टुकड़े कर दरिया में बहा दिया। इसपर पश्चिमी जगत की मुख्यधारा मीडिया हाय तौबा करने में लगा हुआ है। यह बात समझ लेनी होगी कि ख़शोजी कोई जनपक्षधर पत्रकार नहींं था। कुछ समय पहले तक वह सऊदी अरब की सत्ता के घोर प्रतिक्रियावादी विचारों का समर्थक था। अमरीका में रहते हुए उसने अमरीका के ‘प्रगतिशील’ विचारों का प्रचार करना शुरू किया और पश्चिमी देशों के सरीखे ‘जनवाद’ को सऊदी अरब में लागू करने की बात कह रहा था। वह सऊदी अरब की राजशाही को मध्यकालीन रिवाजों को त्यागने की नसीहत ‘वाशिंगटन पोस्ट’ के जरिये दे रहा था। हालाँकि उसे इसलिए मारा गया क्योंकि वह बहुत कुछ जानता था और सऊदी अरब की सत्ता का पिट्ठू न रहकर राजशाही की मन्द आलोचना कर रहा था। वह दरबार के अन्दर ना होते हुए भी दरबार के बारे में बहुत कुछ जानता था। गौरतलब है कि यही जमाल ख़शोजी सऊदी अरब के नये खूनी सलमान को ब्लैक पैंथर फिल्म के मुख्य किरदार ट’चल्ला बनने की राय दे रहा था। शायद जवान राजकुमार ने इसे ज़्यादा ही सच मान लिया और बिलकुल फिल्म की तरह ही ख़शोजी का ही कत्ल करवा दिया (फिल्म में ट’चल्ला सुपरहीरो ब्लेक पैंथर बनकर दुश्मनों का सफाया करता है)। ख़शोजी का सफाया करने का मौका सऊदी अरब की खुफिया एजेंसी को तब मिला जब खशोज़ी तुर्की में सऊदी अरब के कॉन्सुलेट में किसी काम से आया। इस घटना पर पूरी दुनिया भर में काफी शोर मचाया जा रहा है और तमाम लोग इसे सऊदी अरब के राजतंत्र की बुराई के रूप में पेश कर रहे हैं कि उन्हें इस किस्म से नहींं मारा जाना चाहिए था। अमरीका से लेकर ब्रिटेन तक नसीहतें दे रहे हैं कि ऐसे कत्ल नहीं करवाया जाना चाहिए था! (अधिक ‘शिष्ट’ तरीके से करना चाहिए था!) सऊदी अरब ने भी बहुत छिःथू होने के बाद स्वीकार किया कि क़त्ल हुआ है और वे इसके लिए कानूनी कार्यवाही करवाने के लिए तैयार हैं परन्तु सत्ता के महल के भीतर इस कीड़े की मौत पर तो ये साम्राज्यवादी हायतौबा मचा रहे है पर सऊदी अरब से सटे एक पूरे देश यमन को खून में डूबा देने के खिलाफ ये मुरदाखोर चुपाई मारे बैठे हैं क्योंकि जिन हथियारों से सऊदी अरब यमन में मासूमों का कत्ल कर रहा है वे अमरीका, ब्रिटेन, फ्रांस और कनाडा ने ही बेचे हैं। यमन में जनता के खून की नदी के किनारे खड़े होकर सभी साम्राज्यवादी सऊदी अरब को कत्ल करने का शिष्टाचार सिखा रहे हैं। लीबिया में गद्दाफ़ी को मारते वक्त साम्राज्यवादियों ने इस कत्ल के शिष्टाचार का परिचय दिया था।

 यमन में पिछले 3-4 सालों में सऊदी अरब ने मौत का ताण्डव किया है। अरब जनउभार के जरिये क्रान्ति की ड्रेस रिहर्सल कर रही जनता यमन को अपने संघर्षों से गढ़ रही थी परन्तु उसे सऊदी अरब ने युद्ध थोपकर थाम दिया। यह इसलिए है ताकि यमन में एक ऐसी सरकार रहे जो अमरीका-इस्राइल-सऊदी अरब की धुरी से अलग न हटे। पर सऊदी अरब दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी सेना और आधुनिक हथियारों के बावजूद भी यमन को हरा नहींं पाया है। कायर और डरपोक राजकुमार सलमान यमन की जनता के आगे बौना साबित हो रहा है जैसे अरब की जनता के शौर्य के आगे तमाम साम्राज्यवादी कुत्ते साबित हुए हैं। यमन की जनता मर रही है, उसे लगभग मध्य काल में पहुँचा दिया गया है परन्तु इससे यमन हारेगा नहींं बल्कि यह आने वाले संघर्षों की तैयारी साबित होगा। युद्ध में हुई मौतों का हिसाब सऊदी अरब के शासकों को देना ही होगा।

यमन में सत्ता के संघर्ष का लंबा इतिहास

यह यमन का पहला संघर्ष नहींं बल्कि इसके उथल-पुथल भरे इतिहास का नतीजा है। पूरे अरब जगत में चल रहे राष्ट्रीय आन्दोलनों की लहर में यमन भी उथल-पुथल से गुज़र रहा था। 1967 में यमन गृहयुद्ध के बाद दो हिस्से में बँट गया था। दक्षिणी यमन में संसदीय ढाँचे की गणतन्त्र की सरकार बनी तो दूसरे हिस्से में तानाशाही थी। दक्षिणी यमन जहाँ पर सामाजिक जनवादियों ने सरकार पर अपना नियंत्रण स्थापित किया और सोवियत रूस के साथ करीबी बनायी वहीं दूसरी सरकार खुलकर सऊदी अरब पर अन्दर तक निर्भर थी। 1990 आते-आते दोनों सरकार विलय कर गयी और दोनों देश एक देश में तब्दील हो गये। संयुक्त यमन में सलाह 1990 में गद्दी पर आसीन हुआ और वह 2011 तक सत्ता में रहा। इससे पहले 1978 से सलाह उत्तरी यमन पर शासन कर रहा था। यमन में कभी भी केन्द्रीकृत सत्ता की मौजूदगी नहींं थी। इस देश को सम्भालने वाला राज्य तंत्र बेहद बिखरा था। देश में तीन सेनाओं की मौजूदगी है जिसमें दो सेनाएँ निजी सेना की तरह ही काम करती हैं। एक तरफ सरकारी सेना है तो दूसरी सलाह के बेटों की सेना है तो वहीं तीसरी विपक्ष के नेता की भी अपनी सेना है। ये तीनों सेनाएँ ही यमन की मुख्य हथियारबन्द ताक़तें थी। दक्षिणी यमन में अधिकतर उपजाऊ ज़मीन व संसाधन की मौजूदगी का हवाला देकर दक्षिण यमन को अलग देश बनाने की माँग 2007 से ही ज़ोर उठा रही थी। अलकायदा का भी यमन में प्रभाव मौजूद है और 2011 से पहले से ही अलकायदा के कब्जे में कुछ इलाके थे। मौजूदा युद्ध में अरब जगत की ताकतों (यूएई) ने अलकायदा में भी निवेश किया और उन्हें आगे बढ़ाया है। उधर 2004 से बड़े स्तर पर फैलना शुरू हुए हौदी आन्दोलन ने भी हथियारबन्द होकर उत्तरी यमन से राजधानी सना की तरफ बढ़ना शुरू किया और 2011 के बाद से पैदा हुए राजनीतिक संकट का फायदा उठाकर 2011 में सत्ता छोड़ने को मजबूर हुए सलाह के जरिये 2015 में सत्ता तक पहुँच गये। इस तख्तापलट के कारण अबतक  सऊदी अरब और अमरीका के हितों कि रक्षा करने वाली सरकार के बरक्स सऊदी अरब की खिलाफत करने वाली हौदी सरकार के सत्तासीन होने से अमरीका और सऊदी अरब के रणनीतिक व आर्थिक तौर पर फायदेमंद निवेश पर आँच आ सकती थी और इसके मद्देनजर सऊदी अरब ने यमन पर हमला कर दिया। सिर्फ सऊदी अरब ही नहींं अमरीका और अन्य पश्चिमी देशों ने भी बमवर्षा कर यमन को खून में डुबाया है।

2011 में अरब जनउभार की लपटें यमन तक पहुंची और यहाँ ये जंगल की आग में तब्दील हो गयी जिसके कारण सलाह को सत्ता छोड़नी पड़ी। इस संघर्ष में बेरोजगार नौजवान, छात्र, मजदूर शामिल थे। यह ट्यूनीशिया के बाद सबसे आक्रामक संघर्ष था जो 2015 तक चलता रहा और इस संघर्ष के कारण राजनीतिक धरातल पर एक तरल स्थिति पैदा हुई जिसका फायदा उठाकर 2015 में हौदी के लड़ाकों ने यमन की सरकार का तख़्ता पलट कर दिया और अपनी सरकार बनाई। इन्हें यमन की जनता के बड़े हिस्से का समर्थन प्राप्त था। परन्तु सऊदी अरब ने यमन पर युद्ध थोप दिया क्योंकि आज जिस आर्थिक संकट से दुनिया गुज़र रही है ऐसे में किसी भी आर्थिक सौदे पर खतरा सबसे बड़ा ‘गुनाह’ है और यह सैन्य हस्तक्षेप की तरफ ही बढ़ेगा। हालाँकि यमन सऊदी अरब के लिए वैसा ही साबित हो रहा है जैसे कि अमरीका के लिए वियतनाम साबित हुआ था। यमन में गृहयुद्ध ने एक ऐसा रुख लिया कि सत्ता में बैठी सरकार का हौदी विद्रोहियों ने तख्तापलट कर नयी सरकार बनाने की घोषणा की। इस दौरान यमन की तमाम सत्ता की दावेदार शक्तियों ने कई बार पलटी मारी। 2011 में अरब जनउभार के बाद सलाह को सत्ता छोड़नी पड़ी और उप-राष्ट्रपति हादी सरकार में बैठ गया जो कि सऊदी अरब के पक्ष का ही प्रतिनिधित्व कर रहा था। सलाह के बेटों की समर्थक सेना और विपक्ष के नेता की सेना और सरकार की सेना यमन के शासन के तंत्र हैं जो केंद्रीकृत नहींं हैं। 2015 में हौदी लड़ाके जब सना शहर के पास पहुंचे तो सलाह ने अपनी सेना को हौदी लड़ाकों का समर्थन किया जिसके बाद सरकार का तख्तापलट हुआ और हौदी लड़ाकों ने यमन की हादी सरकार को भंग कर दिया। साम्राज्यवादी ताकतों ने हौदी सरकार से भी बातचीत की पेशकश की परन्तु वे सऊदी अरब और अमरीका के खिलाफ बोल रहे थे और ईरान से अपनी करीबी जता रहे थे। सऊदी अरब ने यमन के हौदी द्वारा बातचीत के लिए न तैयार होने पर युद्ध की घोषणा कर दी परन्तु तीन साल बाद भी सऊदी अरब अभी हौदी सरकार को नहींं हारा पाया है। यमन की अर्थव्यवस्था में लंबे समय से अनाज मुख्यतः आयात किया जाता रहा है। अमरीका द्वारा ‘फूड एड पॉलिसी’ शुरू करने के बाद से यमन अमरीका के अन्न पर निर्भर अरब जगत का सबसे गरीब देश है। युद्ध शुरू होने के बाद से हौदी सरकार के मातहत यमन में सभी आयात किये जाने वाले अनाज को रोक दिया गया है। इस कारण ही यमन में जनता भूख से मर रही है। इस युद्ध के दौरान जो युद्ध आर्थिकी पैदा हुई है इसे इस युद्ध को निरंतर जारी रखने में ही फायदा है। वहीं जमाल खशोग्गी का ‘ब्लैक पैंथर’ बुजदिल राजकुमार सलमान अपनी हैवानियत और अपनी नाकामियों को छिपाने के लिए स्कूलों, अस्पतालों, शादी के पण्डालों और घरों पर मिसाइल बरसाकर मौत का ताण्डव मचा रहा है। सऊदी अरब ने यमन के स्कूल, घर, मस्जिद, फ़ैक्टरी, शादी, स्कूलबस से लेकर तमाम जगहों पर हमला किया है जिसमें सरकारी आँकड़ें के मुताबिक करीब 10,000 लोग मारे गये हैं जबकि यह संख्या असल में 50000 से भी ऊपर जाती है। इन मौतों का पाँचवाँ भाग बच्चों का है। इस दौरान दो बार हैजा फैल चुका है जिसके कारण दस लाख से अधिक लोग बीमार हैं जिसमें करीब आधे बच्चे हैं।

यमन: साम्राज्यवादी खंजरों से गोदा हुआ देश 

दरअसल पूरा अरब जगत अमरीका-इस्राइल धुरी बनाम रूस-ईरान धुरी के बीच युद्धों का थिएटर बन चुका है। सीरिया से लेकर यमन में लोगों को बमों से उड़ाया जा रहा है। अरब जगत का भूदृश्य इन दृश्यों को जोड़ कर उभरता है: कहीं रासायनिक बमों से मांस पिघल रहा है तो कहीं ज़हरीली गैसों में बच्चे दम तोड़ रहे हैं तो कहीं स्नाईपार निहत्थे प्रदर्शनकारियों पर गोली चला रहे हैं। यमन पिछले 100 सालों में दुनिया के सबसे भयंकर अकाल को झेल रहा है। देश में भयंकर बेरोजगारी है। परन्तु दोनों साम्राज्यवादी धुरी अपने हितों का जमकर फायदा उठा रही है। इस युद्ध में कहीं भी रूस और ईरान सीधे मशगूल नहींं है। पर ईरान अप्रत्यक्ष रूप से हौदी विद्रोहियों की मदद कर रहा है। परन्तु अभी तक इसने कोई प्रत्यक्ष कदम नहीं उठाया है। यमन के लड़ाकुओं ने ही सऊदी अरब की सेना के नाकों चने चबवा दिये हैं। इन लड़ाकों ने साधारण रॉकेट लॉंचर से सऊदी अरब के अरबों दिनार के टैंक उड़ा दिये हैं। सैन्य मोर्चे पर सऊदी अरब ने सीधे लड़ाई में मुँह की खाई है और वह बदहवासी में स्कूल बसों, नागरिकों, अस्पतालों पर मिसाइल बरसा रहा है।

               एक लंबे समय से सऊदी अरब अमरीका इज़रायल धुरी की चाल यह रही है कि जिन देशों में ‘जनवाद’ स्थापित करना चाहते हैं उन्हें टुकड़ों में बाँट दो, वहाँ की सत्ता को अपनी नीतियों के पक्ष में झुकाओ, ऐड देकर या युद्ध थोपकर। यमन के युद्ध में अमरीका, ब्रिटेन, फ़्रांस और कनाडा ने जमकर पैसा लगाया है। अमरीका का लठैत इज़रायल तो सऊदी अरब के साथ मासूमों पर बम बरसाता ही रहा है। अमरीका और ब्रिटेन की हथियार बनाने वाली कंपनियों ने सऊदी अरब को जमकर हथियार बेचे हैं। इतना सब कुछ करने के बावजूद भी ये साम्राज्यवादी डाकू इस कत्लेआम पर मौन हैं और इन देशों में सबसे अधिक हो-हल्ला जमाल खशोज़ी कि मौत पर उठ रहा है । तमाम राजनेता इसे भयानक बात बता रहे हैं । दरअसल इनके लिए इनकी जमात का एक आदमी मर जाना ही सबसे महत्वपूर्ण है। यह गिद्धों और परजीवियों की कौम यमन के खून पर ही पलती है। यमन की लड़ाई में पहला कदम मजदूरों की पार्टी का बनना होगा। अरब जन उभार के समय में जो स्वतःस्फूर्त आन्दोलन खड़ा हुआ है उससे सकारात्मक और नकारात्मक सीखकर ही यमन की जनता क्रान्तिकारी पार्टी के नेतृत्व में आगे बढ़ सकती है वरना तमाम कट्टर पन्थी ताक़तें जिन्हें कोई न कोई साम्राज्यवादी ताकत समर्थन देती है अपना पिट्ठू बनाकर संघर्ष को अन्धी गलियों में घुमाती रहेंगी।

मुक्तिकामी छात्रों-युवाओं का आह्वान,जुलाई-दिसम्बर 2018

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