अटल बिहारी वाजपेयी को भारत रत्न – संघ की अथक सेवा का मेवा!

बेबी

अटल जी को संघ की अथक सेवा का मेवा मिलने के लिए इससे मुफ़ीद वक़्त और कोई हो ही नहीं सकता था! 1939 से लेकर अब तक उदारता का मुखौटा पहनते-उतारते, कविता उचारते, ऊँचाइयाँ आँकते, गहराइयाँ नापते उनके राजनीतिक जीवन का सात दशक से भी ज़्यादा वक़्त गुज़र गया। दरअसल संघ जैसा भारत बनाना चाहता है उसके “रत्न” अटल जी हो सकते हैं, इसमें कोई आश्चर्य नहीं। और मोदी को उत्तराधिकार का धर्म भी तो निभाना था!

संघ की राजनीतिक पार्टी के रूप में भाजपा को स्थापित करने में अटल जी की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। इससे पहले वह संघ के प्रचारक के रूप में काम कर रहे थे। भाजपा की स्थापना से पहले ‘जनसंघ’ संघ परिवार की राजनीतिक पार्टी के रूप में काम कर रहा था। जनसंघ की स्थापना 1951 में श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने की थी। जनसंघ के संस्थापक सदस्यों में से एक रहे अटल जी 1952 में इसके सचिव चुने गये। 1953 में श्यामा प्रसाद मुखर्जी की मृत्यु के बाद जनसंघ की कमान दीनदयाल उपाध्याय ने सँभाली। इन्दिरा गाँधी के ख़िलाफ़ अस्तित्व में आयी जनता पार्टी में जनसंघ भी शामिल था। 1968 में दीनदयाल उपाध्याय की मृत्यु के बाद जनसंघ को अटल जी ने नेतृत्व दिया। जनता पार्टी अपने अन्तर्विरोधों के कारण 1979 में टूट गयी और उसके बाद वाजपेयी, लालकृष्ण आडवाणी, भैरोसिंह शेखावत ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के कुछ लोगों के साथ 1980 में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) की स्थापना की जिसके प्रथम अध्यक्ष के रूप में वाजपेयी को नियुक्त किया गया। तब से भाजपा ने देशभर में संघ की हिन्दुत्ववादी राजनीति को स्थापित करने का काम काफ़ी कुशलता से किया।

ataljibw-cartoonचूँकि हमारा समाज किसी जनवादी क्रान्ति की प्रक्रिया से नहीं गुज़रा इसलिए यहाँ मध्ययुगीन सामन्ती मान्यताओं के अवशेष आज भी मौजूद हैं। एक तरफ़ आधुनिक पूँजीवादी अर्थव्यवस्था का असमाधेय संकट लगातार समाज के मज़दूरों को तबाह-बर्बाद करने के साथ टटपुँजिया वर्गों को भी अनिश्चितता और असुरक्षा के गर्त में धकेलता है। ये चीज़़़ें जहाँ परिवर्तनकामी क्रान्तिकारी राजनीति के लिए भी एक सम्भावना पैदा करती हैं, वहीं फ़ासीवादी उभार की ज़मीन भी तैयार करती है। मध्ययुगीन सामन्ती मूल्य-मान्यताओं और प्राक्-आधुनिक, ग़ैर-जनवादी प्रवृत्तियों की मौजूदगी फ़ासीवादी उभार को खाद-पानी देती हैं, वहीं आधुनिक पूँजीवाद का आर्थिक संकट उसकी ज़मीन तैयार करता है। अपने समाज में आज भी तमाम तरह की सड़ी-गली मान्यताओं, अन्धविश्वासों, पुरातनपन्थी सोच, स्त्रियों को दोयम दर्जे का समझा जाना, धर्म के प्रति मध्ययुगीन जड़ता, अतार्किकता आदि से रोज़ हमारा पाला पड़ता है। दरअसल यहाँ का पूँजीवाद रुग्ण और बौने किस्म का पूँजीवाद है जिसने सामन्ती मूल्य-मान्यताओं से भी समझौते किये और साम्राज्यवाद से भी। फ़ासीवाद पुरातनपन्थी और आधुनिकता-विरोधी, जनवाद और समानता विरोधी विचारों का आधुनिक पूँजीवादी अवसरवादी इस्तेमाल करता है। लगातार ज़मीनी स्तर पर संघ और उसके आनुषंगिक संगठनों ने जो ज़हर बोने का काम किया था, 1992 उसकी ही अभिव्यक्ति था। अयोध्या में राममन्दिर के मुद्दे को विश्व हिन्दू परिषद की अगुआई में उछाला गया जिसका सीधा फ़ायदा भाजपा को मिला। अपने एक लेख में वाजपेयी ने इस बात को स्वीकार भी किया है कि राममन्दिर के मुद्दे ने भाजपा को और ज़्यादा मजबूती प्रदान की क्योंकि रामराज्य के सुशासन के मॉडल को भाजपा ही कार्यरूप दे सकती है। इस घटना को अंजाम देने में उनके “उदार” भाषणों की बड़ी भूमिका रही और उन्होंने एक ही साँस में कई बातें कहने की अपनी कला का अद्भुत प्रदर्शन किया! शब्दों के आगे-पीछे, ऊपर-नीचे के अर्थ निकालने में उन्हें महारत हासिल है। वैसे भी संघ वाचिक परम्परा का पालन करता है क्योंकि इसका सबसे बड़ा फ़ायदा यह है कि बात बदलने में आसानी रहती है। 2002 में गुजरात के बाद नरेन्द्र मोदी की प्रशंसा करते हुए वाजपेयी ने कहा कि उन्होंने “राजधर्म” का पालन किया है। जब इस बात पर विवाद उठा तो तुरन्त पल्टी मार गये और कहा कि यह तो “राजधर्म निभाने की नसीहत” थी। इसके बाद मोदी को ताजपोशी का आशीर्वाद भी दे आये! इस पूरी घटना के दौरान कई अन्य बयानों से भी वह मुकरते रहे हैं। जैसे गोवा में मुस्लिम समुदाय को “गुपचुप तरीक़े से प्रचार करनेवाला और समाज से कटकर रहनेवाला” बताया और जब इस पर विरोध हुए तो तुरन्त पलट गये। दरअसल हिटलर और मुसोलिनी के मानस पुत्रों ने उनकी ही तरह एक साथ कई बातें बोलने में महारत हासिल की हुई है। इनका एक नर्म चेहरा है, एक उग्र चेहरा और एक मध्य का चेहरा, जब जैसी ज़रूरत हो उसे आगे कर दिया जाता है। चाल-चेहरा-चरित्र बदलने में इनका कमाल पीसी सरकार की कला को भी मात देता है! आज़ादी स्वर्ण जयन्ती पूरा होने पर अटल जी ने अपने एक लेख में कहा कि भाजपा एक ऐसा राष्ट्र बनाना चाहती है जहाँ सुशासन हो और हर व्यक्ति को समान अवसर प्राप्त हों चाहे वह किसी भी धर्म, जाति और लिंग का हो। लेकिन यह बस कहने भर के लिए है जबकि करनी में कुछ और ही है।

संघ परिवार का “स्‍वदेशी” आर्थिक चिन्तन सिर्फ़ दिखाने भर को है। इसका आर्थिक मॉडल शुरू से ही विदेशी पूँजी और अमेरिकापरस्त रहा है। जनसंघ के संस्थापक श्यामा प्रसाद मुखर्जी नेहरू के तथाकथित समाजवाद के मॉडल यानी राजकीय पूँजीवाद के मॉडल के कटु आलोचक थे। आरएसएस के भोंपू ‘ऑर्गेनाइज़र’ ने 3 अप्रैल 1950 के अपने अंक के सम्पादकीय में लिखा था, “अमेरिका भारत के प्रति उतना उत्साही नहीं है क्योंकि भारत कम्युनिज़्म के ख़िलाफ़ उसके विश्वसंघर्ष में सहयोग नहीं कर रहा है। हम भारत के लोग अपनी प्राचीन उदार परम्पराओं के चलते आंग्ल-अमरीकी लोगों से अधिक निकट हैं। ऐसा प्रतीत होता है कि अमरीका के साथ जुड़कर ही एक राष्ट्र के रूप में हम अपने पूर्ण स्थान को प्राप्त कर पायेंगे।” 1996 से लेकर 2004 तक वाजपेयी के नेतृत्व में भाजपा की सरकार ने देश में आर्थिक उदारीकरण-निजीकरण की नीतियों को लागू करने में एड़ी-चोटी का ज़ोर लगा दिया। देशी-विदेशी पूँजी और अमेरिकापरस्ती की वे मिसालें कायम कीं कि आज नरेन्द्र मोदी उन्हें ही आगे ले जाने का काम कर रहे हैं। ओबामा की भारत यात्रा पर मोदी ने ऐसा सतखेला दिखाया है कि कुटनी बुढ़िया भी शरमा जाये! पूरे देश में जिस नंगई की हद तक उतरकर नौटंकी की गयी है वह संघ की आर्थिक नीति का ही प्रदर्शन है। वाजपेयी की सरकार के दौरान ही अरुण शौरी के नेतृत्व में विनिवेश मन्त्रालय के नाम पर जनता की गाढ़ी कमाई के दम पर खड़े किये गये सारे पब्लिक सेक्टर को देशी-विदेशी पूँजीपतियों को औने-पौने दामों पर बेचने का काम किया गया। जिस एफ़डीआई का विरोध भाजपा चिल्ला-चिल्लाकर करती रही है उसे वाजपेयी सरकार ने फ़ार्मास्युटिकल, रिटेल सहित बीमा आदि क्षेत्रों में लागू किया और मोदी सरकार भी रेलवे, सुरक्षा आदि में कर रही है। वाजपेयी सरकार ही पेटेण्ट (संशोधन) बिल लेकर आयी जिसका सीधा असर दवाइयों की क़ीमतों पर पड़ना था। भय, भूख और भ्रष्टाचार को ख़त्म करने का नारा देकर सत्ता में आयी एनडीए की सरकार के दौरान कमरतोड़ मँहगाई, बेरोज़गारी और भुखमरी बढ़ी। भ्रष्टाचार का तो यह आलम रहा कि इतिहास प्रसिद्ध घोटालों की झड़ी सी लग गयी – यूटीआई घोटाला, बाल्को घोटाला, तहलका, कारगिल युद्ध के समय ताबूत घोटाला, गुजरात में सहकारी बैंक घोटाला आदि। देश की सार्वजनिक सेक्टर की सबसे बड़ी कम्पनी ‘कोल इण्डिया लिमिटेड’ जिसमें 3.50 लाख मज़दूर काम करते हैं, उसके निजीकरण (कोल माइंस अमेण्डमेण्ट बिल) की दिशा में वाजपेयी ने ही शुरुआत कर दी थी जिस छूटे हुए काम को नरेन्द्र मोदी करने जा रहे हैं!

वाजपेयी की देशभक्ति (इसे पूँजीपति वर्ग और फ़ासीवाद की भक्ति समझें) अब किसी से छिपी नहीं है। संघ के प्रति उनकी निष्ठा के कई उदाहरण हैं। 1942 के भारत छोड़ो आन्दोलन के समय वह अँग्रेज सरकार को माफ़ीनामा लिखकर दे आये जिसमें यह साफ़-साफ़ लिखा था कि वह इस तरह की किसी भी गतिविधि में शामिल नहीं हैं। संघ चाहे कितना भी गला फाड़कर आज अपनी देशभक्ति का राग अलाप ले, लेकिन उसकी नीतियों में ब्रिटिश साम्राज्यवाद का विरोध कहीं भी शामिल नहीं था। बाद में संघ ने इस बात का प्रचार करना शुरू किया कि उसके नेताओं ने भारतीय स्वतन्त्रता संग्राम में सक्रिय भूमिका निभायी, जबकि इस बात के कई प्रमाण उपलब्ध हैं कि संघियों ने अंग्रेज़ सरकार की मुख़बिरी भी की।

दरअसल अटल जी ने संघ की नीतियों को हर तरीक़े से स्थापित करने का काम कुशलता से किया है। कभी उदारता का मुखौटा पहनकर, कभी उतारकर उठक-बैठक लगाते रहे हैं! संघ अगर उन्हें अपना नायक मानता है तो इसमें कोई आश्चर्य नहीं। आख़िरकार उनके “जीवन की डोर” ने “उछलकर छोर छू” ही लिया; “जीवन की ढलती साँझ” में ही सही!

 

मुक्तिकामी छात्रों-युवाओं का आह्वान, जनवरी-अप्रैल 2015

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