उत्तराखण्ड त्रासदीः यह कोई दैवीय आपदा नहीं और न ही यह प्रकृति का प्रकोप है! यह पूँजीवादी विकास की तार्किक परिणति है!

आनन्द

‘आह्वान’ के पन्नों पर हम लगातार यह कहते आये हैं कि पूँजीवादी व्यवस्था का एक-एक दिन मानवता पर भारी पड़ रहा है। कभी न तृप्त होने वाली मुनाफ़े की अपनी हवस की ख़ातिर यह व्यवस्था दिन-ब-दिन, घण्टे-दर-घण्टे आम मेहनतकश जनता का खून चूसती  है। पिछले कुछ वर्षों से आश्‍चर्यजनक रूप से नियमित अन्तराल पर दुनिया के किसी न किसी कोने में ऐसी विभीषिकाएँ घटित हो रही हैं जो इस बात के स्पष्ट संकेत देती हैं कि पूँजीवादी व्यवस्था का अस्तित्व न सिर्फ मानवता के लिए घातक है बल्कि यह पृथ्वी और उस पर रहने वाले तमाम जीव-जन्तुओं और वनस्पतियों या यूँ कहें कि उसके समूचे पारिस्थितिक तन्त्र के लिए विनाश का सबब है। गत जून के दूसरे पखवाड़े में उत्तराखण्ड में बादल फटने, भूस्खलन, हिमस्खलन और बाढ़ से आयी तबाही का जो ख़ौफ़नाक मंज़र देखने में आया वह ऐसी ही विनाशकारी घटनाओं का एक प्रातिनिधिक उदाहरण है। इस त्रासदी से निपटने में पूरी तरह विफल साबित होने के बाद अपनी छीछालेदर से बचने के लिए उत्तराखण्ड सरकार ने अभी भी इस त्रासदी में मारे गये  लोगों की ठीक-ठीक संख्या नहीं बतायी है, परन्तु विभिन्न गैर सरकारी संस्थाओं और स्वतन्त्र एजेंसियों का दावा है कि यह संख्या 10 से 15 हज़ार हो सकती है। यही नहीं उत्तराखण्ड के सैकड़ों गाँव तबाह हो गये हैं और लाखों लोगों के लिए जीविका का संकट उत्पन्न हो गया है।

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इस त्रासदी में मरने वाले और ग़ायब होने वाले लोगों की एक बड़ी संख्या तीर्थयात्रियों की थी जो चार धाम (केदारनाथ, बदरीनाथ, गंगोत्री और यमुनोत्री) यात्रा के लिए आये थे। देवभूमि के नाम से जानी जाने वाली उत्तराखण्ड की सरज़मीं पर होने वाली इस भयंकर तबाही के दिल दहला देने वाले दृशय देखकर धर्म भीरू लोगों ने और साम्प्रदायिक राजनीति का घटिया खेल खेलने वाले मदारियों ने तुरत-फुरत में इसे एक दैवीय आपदा क़रार दे दिया। ऐसे लोगों से तो बस वही सवाल पूछना काफ़ी होगा जो बरसों पहले शहीद-ए-आज़म भगतसिंह ने अपने सुप्रसिद्ध लेख ‘मैं नास्तिक क्यों हूँ?’ में पूछा था कि “ईश्‍वर कहाँ है? वह क्या कर रहा है? क्या वह मानवजाति के इन सब दुखों और तकलीपफ़ों का मज़ा ले रहा है? तब तो वह नीरो है, चंगेज़ खाँ है, उसका नाश हो!” तमाम पर्यावरणविद् इस तबाही के कारणों की टुकड़ों-टुकड़ों में तो सही पड़ताल करते हैं परन्तु उनकी सीमा यह है कि कुल मिलाकर वे इस तबाही का कारण मानव सभ्यता के विकास की एक ख़ास मंजिल में क़ायम हुई उत्पादन प्रणाली यानी पूँजीवादी उत्पादन प्रणाली को न मानकर समूची मानवता को ही कोसने लगते हैं और उनमें से कुछ तो आधुनिक विज्ञान को ही ऐसी त्रासदियों के लिए ज़िम्मेदार ठहराने लगते हैं। यह सही है कि उत्तराखण्ड की त्रासदी की भयावहता किसी प्राकृतिक प्रकोप का नहीं बल्कि प्रकृति के नैसर्गिक गति में अवांछित मानवीय हस्तक्षेपों का नतीजा है। परन्तु इसके लिए समूची मानव जाति को ज़िम्मेदार ठहराना सर्वथा अनुचित है क्योंकि पूँजीवादी व्यवस्था में प्रकृति के साथ छेड़छाड़ व्यापक मानवता के हितों के मद्देनज़र न होकर समाज के मुट्ठी भर लोगों के मुनाफ़े के लिए होती है। यह व्यवस्था व्यापक मानवता द्वारा आम सहमति से चुनी नहीं गयी है बल्कि बलपूर्वक पर उस पर थोपी गयी है। इसलिए ऐसी त्रासदियों के लिए यदि कोई ज़िम्मेदार है तो इस व्यवस्था के रहनुमा यानी पूँजीपति शासक वर्ग की जमात है जिसके इशारों पर पूँजीवादी विकास का रथ मानवता के साथ ही साथ प्रकृति को भी रौंदता हुआ सरपट दौड़ लगा रहा है। इस लेख में हम तफ़सील से देखेंगे कि उत्तराखण्ड जैसी त्रासदियों के लिए पूँजीवादी व्यवस्था किस प्रकार ज़िम्मेदार है।

हिमालय की पहाड़ियों और घाटियों में प्रकृति की अन्धाधुन्ध पूँजीवादी लूट-खसोट

गढ़वाल हिमालय, जहाँ सबसे अधिक तबाही मची, अभी भी अपने भूगर्भीय विकास की प्रक्रिया में है और इस वजह से यह समूचा इलाका पारिस्थितिक रूप से काफ़ी नाजु़क और अस्थिर माना जाता है। ऐसे नाजुक और अस्थिर क्षेत्र में किसी भी किस्म का निर्माण पूर्ण नियोजित और विनियमित होना चाहिए और विकास की परियोजनाओं के पर्यावरण पर पड़ने वाले असर की सांगोपांग जाँच पड़ताल के बाद ही उनको हरी झण्डी मिलनी चाहिए। उत्तराखण्ड में ठीक इसका उल्टा हुआ! वर्ष 2000 में जब यह राज्य बनाया गया था तो इसके पीछे यह तर्क दिया गया था कि चूँकि इस राज्य का अधिकांशा हिस्सा पहाड़ी क्षेत्र में आता है इसलिए अलग राज्य बनने से इसका सन्तुलित विकास सम्भव हो सकेगा और हिमालय के नाजुक पारिस्थितिक तन्त्र को बचाया जा सकेगा। परन्तु राज्य बनने के बाद बिल्डरों, होटल व्यवसायियों और तमाम धन्धेबाजों के हितों को ध्यान में रखते हुए जिस किस्म का विकास वहाँ पर हुआ उससे वहाँ का पारिस्थितिक तन्त्र और ज़्यादा अस्थिर हो गया। पर्यावरणविदों की तमाम चेतावनियों को दरकिनार कर वहाँ अन्धाधुन्ध तरीके से पहाड़ियों को बारूद से उड़ाकर सड़कें और सुरंगें बनायी गयीं, छोटे-बड़े तमाम बाँधों को आनन-फ़ानन में हरी झण्डी दे दी गयी, तीर्थस्थानों में नदियों के ठीक किनारे और डूब क्षेत्रों में होटलों और धर्मशालाओं की बाढ़-सी आ गयी, निर्माण कार्यों के बढ़ने के साथ ही वहाँ अवैध खनन और वनों की अन्धाधुन्ध कटाई में भी अभूतपूर्व रूप से बढ़ोतरी हुई।

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विडम्बना तो यह है कि मौजूदा त्रासदी के ठीक पहले तक वहाँ की सरकारें इन सभी गतिविधियों को राज्य के “चहुँमुखी विकास” के रूप में प्रचारित एवं प्रसारित कर रही थीं और कांग्रेस और भाजपा में इसका श्रेय लेने की होड़ मची हुई थी। विभिन्न पार्टियों के नेता इस त्रासदी के बाद भले ही कितने घड़ियाली आँसू बहाएँ, परन्तु उनके ये घड़ियाली आँसू इस सच्चाई को नहीं छिपा सकते कि हिमालय के पारिस्थितिक सन्तुलन के बिगड़ने के फलस्वरूप होने वाली इस भयावह त्रासदी में उनकी भी प्रत्यक्ष भूमिका रही है। इसकी एक मिसाल इस त्रासदी के डेढ़ महीने पहले 6 मई को देखने में आयी जब उत्तराखण्ड के मुख्यमन्त्री विजय बहुगुणा वहाँ के संसद सदस्यों और विधायकों के एक प्रतिनिधिमण्डल के साथ दिल्ली आये और प्रधानमन्त्री पर केन्द्र की उस अधिसूचना को वापस लेने का दबाव बनाया जिसके तहत गंगोत्री से उत्तरकाशी के बीच के 130 कि.मी. के इलाके को पारिस्थितिक रूप से संवेदनशील क्षेत्र (इको सेन्सिटिव ज़ोन) घोषित किया गया था।

सड़कें, सुरंगें व बाँध बनाने के लिए अन्धाधुन्ध तरीके से पहाड़ियों को बारूद से उड़ाने की वजह से इस पूरे इलाके की चट्टानों की अस्थिरता और बढ़ने से भूस्खलन का ख़तरा बढ़ गया। वनों की अन्धाधुन्ध कटाई और अवैध खनन से भी पिछले कुछ बरसों में हिमालय के इस क्षेत्र में भूस्खलन, मृदा क्षरण और बाढ़ की परिघटना में बढ़ोत्तरी देखने में आयी है। पहाड़ों की ढलानों पर वनस्पतियों की मौजूदगी से वर्षा के पानी के बहाव की गति धीमी हो जाती है और उसके एक हिस्से को भूमिगत जल में मिल जाने का पर्याप्त अवसर मिल जाता है इससे निचले इलाकों में बाढ़ की सम्भावना भी कम हो जाती है। वनस्पतियों की गैर मौजूदगी में वर्षा का पानी काफ़ी तेज़ गति से पहाड़ों की ढलान पर बहते हुए अपने साथ चट्टानों, कंकड़, पत्थर और मिट्टी को लेता हुआ भारी मात्रा में घाटियों में पहुँचता है और बाढ़ की विभीषिका को जन्म देता है। यही नहीं इस पूरे इलाके में पिछले कुछ वर्षों में हिमालय की नदियों पर जो बाँध बनाये गये या जिन बाँधों की मंजूरी मिल चुकी है उनसे भी बाढ़ की सम्भावना बढ़ गयी है क्योंकि इनमें से ज़्यादातर की मंजूरी पर्यावरण पर पड़ने वाले प्रभाव की सांगोपांग पड़ताल के बिना ही दे दी गयी। साथ ही साथ इन बाँधों में होने वाली सिल्टिंग को भी हटाने की कोई कारगर योजना न होने से आने वाले दिनों में भी भीषण त्रासदियों की सम्भावनाओं से इनकार नहीं किया जा सकता है।

जलवायु परिवर्तन और उसके प्रभाव

दुनिया भर के वैज्ञानिक और पर्यावरणविद् यह बात बरसों से कहते आये हैं कि पिछले कुछ दशकों में समूचे भूमण्डल में जलवायु परिवर्तन के लक्षण दिख रहे हैं। ग्लोबल वार्मिंग की परिघटना इसी परिवर्तन की एक बानगी है जिसमें पृथ्वी पर कुछ ख़ास गैसों (ग्रीन हाउस गैसों जैसे कार्बन डाई ऑक्साइड) के अधिकाधिक उत्सर्जन की वजह से वातावरण का औसत तापमान बढ़ रहा है जिसकी परिणति दुनिया के विभिन्न हिस्सों में भारी वर्षा, बाढ़ व सूखा जैसी प्राकृतिक आपदाओं की बढ़ती बारम्बारता के रूप में देखने को आ रही है। ग्रीन हाउस गैसों का उत्सर्जन मुख्य तौर पर जीवाशमीय ईंधन (फॉसिल फ्रयूएल) के इस्तेमाल में अभूतपूर्व बढ़ोतरी से जुड़ा हुआ है जो सीधे तौर पर विश्‍वव्यापी पूँजीवादी ऑटोमोबाइल उद्योग के सनक भरे विकास की वजह से हुआ है। ग़ौरतलब है कि उत्तराखण्ड की त्रासदी के पीछे एक मुख्य कारण मानसून का समय से काफी पहले और भीषण रूप में आना भी रहा। मानसून की अनिश्चितता का बढ़ना भी जलवायु परिवर्तन की व्यापक परिघटना से जोड़ कर देखा जा रहा है। इसके अतिरिक्त ग्लोबल वार्मिंग का एक अन्य प्रभाव ग्लेशियरों के पिघलने के रूप में सामने आ रहा है जिसकी वजह से बाढ़ की सम्भावनाएँ और बढ़ जाती हैं। केदारनाथ घाटी की आपदा की भीषणता का एक कारण चोराबारी ग्लेशियर का पिघलना भी रहा जो मन्दाकिनी नदी का स्रोत है। इस ग्लेशियर के पिघलने की वजह से केदारनाथ घाटी में जल के बहाव में भारी वृद्धि हुई और भूस्खलन से आने वाली चट्टानों और भारी भरकम पत्थरों के साथ जब यह जल केदारनाथ कस्बे में पहुँचा तो वहाँ लोगों को सम्भलने का मौका भी नहीं मिला और देखते ही देखते पूरे क़स्बे में तबाही मच गयी।

तीर्थयात्रा का पर्यटन उद्योग के रूप में विकसित होना

उत्तराखण्ड की इस भीषण त्रासदी में जान-माल की अभूतपूर्व क्षति का एक कारण यह भी रहा कि जब यह आपदा घटित हुई उस वक़्त वहाँ अन्य राज्यों से बहुत भारी संख्या में आये तीर्थयात्री मौजूद थे। एक अनुमान के मुताबिक इस साल मई और जून के महीने में ही प्रसिद्ध चार धाम में पहुँचे तीर्थयात्रियों की संख्या लगभग 13 लाख थी। ग़ौरतलब है कि इतनी बड़ी संख्या में तीर्थयात्रियों का चार धाम यात्रा में आना स्वतः स्फूर्त नहीं है, बल्कि इसके पीछे पूरे पर्यटन उद्योग का ताना-बाना काम करता है जिसमें टूर ऑपरेटर्स से लेकर होटल व्यवसायी और कुकुरमुत्तों की तरह पनपने वाले किस्म-किस्म के आध्यात्मिक गुरू और बाबा शामिल हैं। जहाँ एक ओर पूँजीवाद समाज में असमानता और अराजकता फैला कर लोगों को “पाप” करने और अपराध करने के लिए हमेशा उकसाता रहता है वहीं दूसरी ओर धर्म में मौजूद इन पापों के प्रायिश्‍चत करने और मोक्ष प्राप्ति के तमाम तरीकों को सहयोजित कर मुनाफ़ा कमाने के नित नये अवसर भी खोजता रहता है। तीर्थयात्रा ऐसा ही एक तरीका है जिसने देखते ही देखते पिछले कुछ सालों में ही एक संगठित पर्यटन उद्योग का रूप धारण कर लिया है।

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उत्तराखण्ड पर्यटन विभाग के ही आँकड़े के मुताबिक वर्ष 2000 में नया राज्य बनने के बाद यहाँ पर्यटकों की संख्या में 155 फीसदी का इज़ाफ़ा हुआ। राज्य में हर साल लगभग 2.8 करोड़ पर्यटक पहुँचते हैं जो पूरे राज्य की आबादी का दुगुना है। ज़ाहिर है कि इतनी बड़ी संख्या में पर्यटकों का राज्य में पहुँचना अपने आप में हिमालय के अस्थिर पारिस्थितिक तन्त्र और वहाँ के सीमित संसाधनों पर और बोझ बढ़ाता है। पर्यटन उद्योग से मिलने वाले राजस्व की वजह से सरकारें भी इसे खूब बढ़ावा देती रही है जिसकी परिणति अन्धाधुन्ध निर्माण की गतिविधियों में होती है जो समस्या को और बढ़ा देती हैं। बरसों से पर्यावरणविद् यह चेताते आये हैं कि चार धाम में हर साल पहुँचने वाले तीर्थयात्रियों की संख्या को नियन्त्रित किया जाये, परन्तु चाहे वह भाजपा की सरकार हो या काँग्रेस की सरकार, किसी ने इस दिशा में कोई कदम नहीं उठाया। उल्टे विभिन्न सरकारों ने इस धार्मिक पर्यटन को बढ़ावा ही दिया जिससे पूरे देश से आने वाले तीर्थयात्रियों की संख्या में हर साल बढ़ोतरी होती रही।

आपदा प्रबन्धन के मामले में शासन-प्रशासन की आपराधिक लापरवाही

इस त्रासदी में इतने बड़े पैमाने पर हुई तबाही के लिए प्रकृति के प्रकोप को ज़िम्मेदार ठहराया जा रहा है। केन्द्र व राज्य सरकार दोनों के प्रतिनिधियों ने इसके लिए किसी भी प्रकार की ज़िम्मेदारी लेने से इनकार कर दिया है। यह बात सही है कि इस त्रासदी में बाढ़ के साथ-साथ बहुत बड़ी मात्रा में मलबे के बहने से इसने भीषण रूप अख्त़ियार कर लिया। परन्तु यह भी उतना ही सही है कि ऐसी भीषण त्रासदी में भी शासन और प्रशासन की चुस्ती और मुस्तैदी से जान-माल की हानि को कम किया जा सकता था। केन्द्र सरकार के अन्तर्गत काम करने वाले मौसम विभाग का कहना है कि उसने इस बार समय से पहले मानसून के आने की स्पष्ट चेतावनी दी थी और उसने उत्तराखण्ड सरकार को यह भी जानकारी दी थी कि 16, 17 और 18 जून को वहाँ भारी वर्षा होने की सम्भावना है। परन्तु राज्य सरकार का यह कहना है कि यह चेतावनी ठोस रूप में न होकर बहुत सामान्य रूप में दी गयी थी, इसलिए प्रशासन ने कोई कदम उठाना ज़रूरी नहीं समझा। ज़ाहिर है कि प्रशासनिक हलके में मौसम विभाग की भविष्यवाणी महज़ रस्मअदायगी बनकर रह गयी है। इस पूरे वाक़ये से भारत की पूँजीवादी नौकरशाही का घनघोर जनविरोधी और संवेदनहीन चरित्र सामने आता है।

वर्ष 2004 में आयी सुनामी के बाद आपदा प्रबन्धन के बारे में लम्बी-चौड़ी बातें की गयीं थीं। आपदा प्रबन्धन के बारे में अपनी गम्भीरता दिखाने के मक़सद से केन्द्र सरकार ने आपदा प्रबन्धन कानून 2005 बनाया और प्रधानमन्त्री की अध्यक्षता  में राष्ट्रीय आपदा प्रबन्धन प्राधिकरण (एन.डी.एम.ए.) का गठन किया । परन्तु जैसा कि आमतौर पर होता है, यह संस्था भी भारत के विराट नौकरशाही तन्त्र में एक और कड़ी मात्र बनकर रह गयी। शुरुआती कुछ मीटिंगों के बाद इसकी कोई मीटिंग भी नहीं हुई। इसका काम महज़ कुछ आँकड़े एकत्र करना रह गया। उत्तराखण्ड त्रासदी के दो महीने पहले ही सीएजी (कम्पट्रोलर एण्ड ऑडिटर जनरल) ने अपनी एक रिपोर्ट (परफार्मेंस ऑडिट रिपोर्ट, 23 अप्रैल 2013) में आपदा प्रबन्धन के मामले में केन्द्र एवं राज्य सरकारों के लचर दृष्टिकोण की आलोचना की थी। रिपोर्ट में यह साफ़ लिखा है कि 2007 में मुख्यमन्त्री की अध्यक्षता में गठित उत्तराखण्ड आपदा प्रबन्धन प्राधिकरण ने आज तक राज्य में आपदा प्रबन्धन को लेकर कोई नीति नहीं बनायी और कोई दिशानिर्देश भी नहीं ज़ारी किया। आपदा प्रबन्धन कानून 2005 के अनुसार हर राज्य को अपनी आपदा प्रबन्धन योजना बनाने की ज़िम्मेदारी थी। परन्तु उत्तराखण्ड सहित तमाम राज्य सरकारों ने ऐसी कोई योजना नहीं बनायी और न ही विभिन्न प्रकार की आपदाओं की बारम्बारता और गहनता के आँकड़े एकत्र करने की दिशा में कोई प्रयास किया गया। प्रधानमन्त्री की अध्यक्षता वाली एन.डी.एम.ए. की यह ज़िम्मेदारी है कि वह राज्यों के ऊपर दबाव डाले कि वे आपदा प्रबन्धन को लेकर अपनी योजनायें बनायें और दिशानिर्देश ज़ारी करें। परन्तु एन.डी.एम.ए. ने अपनी इस ज़िम्मेदारी का निर्वहन करना भी ज़रूरी नहीं समझा।

सीएजी की रिपोर्ट में यह महत्वपूर्ण तथ्य भी चिह्नित किया गया है कि उत्तराखण्ड सरकार ने वर्ष 2008 में आयी त्रासदी के बाद जियालॅाजिकल सर्वे ऑफ इण्डिया की उस रिपोर्ट पर भी कोई कार्रवाई नहीं की जिसमें राज्य के 223 गाँवों में से 101 को आपदा की दृष्टि से सुभेद्य बताया गया था और इन गाँवों के शिफ़्ट करने की बात कही गयी थी। इसके अतिरिक्त आपदा प्रतिक्रिया कोष में भी बड़े पैमाने पर भ्रष्टाचार की बात सीएजी की रिपोर्ट में कही गई है। ऐसे में यह आश्‍चर्य की बात नहीं कि आपदा आने के बाद उत्तराखण्ड के मुख्यमन्त्री बगलें झाँकते नज़र आये और राज्य में आपदा प्रबन्धन की देखरेख करने की बजाय दिल्ली में डेरा डाले रहे और देशवासियों से मदद की गुहार लगाते फिरते रहे।

अन्त में यह जोड़ना ज़रूरी है कि उत्तराखण्ड की त्रासदी के बाद जो लोग हर किस्म के आधुनिक निर्माण मसलन पहाड़ों पर सड़कें, सुरंगें, बाँध इत्यादि बनाने का निरपेक्ष विरोध कर रहे हैं वो भी इस किस्म की त्रासदी से निजात पाने का कोई व्यावहारिक उपाय नहीं बता रहे हैं। मानव सभ्यता के जन्म के साथ ही मनुष्य और प्रकृति के बीच अन्तर्विरोधों की शुरुआत हो चुकी थी। यह सही है कि पूँजीवादी उत्पादन प्रणाली में अन्तर्निहित अराजकता की वजह से इस अन्तर्विरोध ने विनाशकारी रूप अख्त़ियार कर लिया है। परन्तु इसका समाधान यह नहीं हो सकता कि हम हर किस्म की आधुनिकता का त्याग कर मानव सभ्यता की पिछली मंजिलों की ओर वापस मुड़ जायें। इस त्रासदी का समाधान हमें अतीत की बजाय भविष्य की उत्पादन प्रणाली में ढूँढ़ना होगा। ऐसा समाधान समाजवादी उत्पादन प्रणाली ही दे सकती है जिसका अस्तित्व समाज के मुट्ठी भर लोगों की मुनाफ़े की सनक को पूरा करने की बजाय व्यापक मानवता की वास्तविक ज़रूरतों को पूरा करने के लिए हो। केवल ऐसी उत्पादन प्रणाली में ही मनुष्य और प्रकृति के बीच के अन्तर्विरोधों को योजनाबद्ध और सौहार्दपूर्ण तरीके से हल किया जा सकता है। समाजवादी उत्पादन प्रणाली ही वह प्रणाली है जिसमें समाज का हर सदस्य विकास की परियोजनाओं का निष्क्रिय उपभोक्ता और उनके कहर का भुक्तभोगी होने की बजाय योजना से लेकर अमल तक उत्पादन के हर स्तर व मंजिल में सक्रिय भागीदार बन सकता है। पहाड़ों जैसे अस्थिर और नाजुक पारिस्थितिक तन्त्र में ऐसी भागीदारीपूर्ण और योजनाबद्ध विकास की और भी ज़्यादा ज़रूरत है। विकास के मौजूदा पूँजीवादी मॉडल के बरक्स समाजवादी मॉडल में लोग न सिर्फ स्थानीय आबादी की ज़रूरत के हिसाब से मिलजुलकर योजनायें बनायेंगे बल्कि किसी भी आपदा की सूरत में हाथ पर हाथ रखकर टीवी पर त्रासदी का मंजर देखकर चकित और दुखी होने की बजाय आपदा प्रबन्धन में भी सक्रिय भागीदारी करेंगे जिससे तबाही को कम करना सम्भव हो सकेगा।

 

मुक्तिकामी छात्रों-युवाओं का आह्वान, जुलाई-अगस्‍त 2013

 

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