उठो, जागो और इस दुनिया को बदल दो!

प्रियान्शु ‘विप्लवी’, पटना, बिहार

इस वक्त में पाते हैं हम रातों को दरवाजों पर दस्तक,
फिर कहीं होती है दिल में धक-धक,
न जाने किस घर में खाकी वर्दी आई है,
खाकी वर्दी के लोगों के चेहरों पर झाँई हैं,
चारों ओर सायरनों का शोर है,
रात के सन्नाटे में मचाता आतंक घनघोर है,
कल गायब होंगे कुछ लोग यहाँ से,
परिवार चेहरे ढूँढेंगे जहाँ भर में,
ऐसे में खड़ा होना होगा हम सबको,
जनता के हाथों को मिल जाना होगा बदलने इस जग को!

साथियों आज हमें फिर से भगतसिंह के विचारों को आम जनता तक पहुँचाना ही होगा क्योंकि अगर अब देर कि तो इतिहास में बर्बरता के लिए हम जिम्मेदार होंगे। मैं आह्वान का नियमित पाठक हूँ और इस पत्रिका को अधिक से अधिक लोगों तक पहुँचने कि कोशिश करता हूँ। परन्तु पत्रिका को निरन्तर बनाइये।
क्रान्तिकारी सलाम,

मुक्तिकामी छात्रों-युवाओं का आह्वान,जुलाई-दिसम्बर 2018