खुदरा व्यापार में प्रत्यक्ष विदेशी निवेशः समर्थन, विरोध और सही क्रान्तिकारी अवस्थिति

सम्‍पादकीय

संसद सत्र के दौरान ही संप्रग सरकार के कैबिनेट द्वारा खुदरा व्यापार के क्षेत्र में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश को मंजूरी देने की बात पर खूब हल्ला मचा। अब इस मुद्दे पर सरकार रक्षात्मक मुद्रा में आ गयी है और कह रही है कि यह राज्य सरकारों के ऊपर होगा कि वे खुदरा व्यापार में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश की आज्ञा देती हैं या नहीं और राष्ट्रीय स्तर पर इस पर निर्णय संसद में विचार-विमर्श के बाद ही लिया जाएगा। इस मुद्दे पर उठा-पटक अभी भी जारी है। भाजपा और संसदीय वामपंथियों समेत तमाम क्षेत्रीय दल इस प्रस्ताव के विरोध की कवायद शुरू कर चुके हैं। ज्ञात हो कि भाजपा-नीत राजग सरकार ने खुदरा व्यापार में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश के प्रस्ताव को पास कराने की बात पहले ही 2002 में कही थी। इसके बाद, 2004 के अपने चुनाव घोषणा-पत्र में राजग ने यह वायदा भी किया था वह जीतने पर खुदरा व्यापार में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश करेगी। अब भाजपा कह रही है कि यह उसकी ग़लती थी! ख़ैर, भाजपा की तो बात ही क्या कहें! सभी फासीवादियों के समान यह अपनी बातों को हमेशा ही बदलती और तोड़ती-मरोड़ती रही है।

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जहाँ तक संसदीय वामपंथियों का सवाल है, वे हमेशा से ही छोटी पूँजी को बचाने की कवायद में लगे रहते हैं। वे पूँजीवाद का कोई विकल्प न तो दे सकते हैं और न ही देना चाहते हैं; लिहाज़ा, उनकी पूरी कोशिश यह रहती है कि पूँजीवाद की पूँजी संचय की हवस और विध्वंसक रफ्तार पर थोड़ी रोक लगायी जाय जो कि उसके लिए आत्मघाती सिद्ध हो सकती है। इसलिए संसदीय वामपंथी भी खुदरा व्यापार में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश का विरोध कर रहे हैं। इतिहास बताता है कि सामाजिक जनवाद ही मज़दूर आन्दोलन को उस हताशाजनक अन्त पर ले जाता है, जहाँ से प्रतिक्रिया के तौर पर फासीवाद का जन्म होता है। सामाजिक जनवाद और फासीवाद का यह ऐतिहासिक सम्बन्ध समकालीन भारतीय राजनीति में स्पष्ट तौर पर उभर कर आ रहा है। एक के बाद एक हर मुद्दे पर संसद में मौजूद फासीवादी और संसदीय वामपंथी एक मंच पर नज़र आ रहे हैं! स्पष्ट है, दोनों का वर्ग आधार आम तौर पर टटपुंजीया वर्गों के अलग-अलग हिस्सों से ही आता है। फ़र्क बस इतना होता है कि फासीवाद इस वर्ग आधार के बावजूद सत्ता में आने पर बड़ी पूँजी की खुल्लम-खुल्ला सेवा करता है और सामाजिक जनवाद जहाँ कहीं भी सत्ता में आता है, छोटी पूँजी और बड़ी पूँजी के हितों में इस प्रकार सन्तुलन करने की कोशिश करता है कि पूँजीवाद दीर्घायु बने! भाकपा (माले) लिबरेशन भी खुदरा व्यापार में विदेशी निवेश का विरोध इसी टटपुंजिया ज़मीन से कर रही है और उसके पार्टी दस्तावेज़ों से लेकर मुखपत्रें तक में इस मुद्दे पर माकपा के पार्टी दस्तावेज़ों, मुखपत्रें और माकपा के ही बुद्धिजीवियों-अर्थशास्त्रियों के लेखों से (शब्दों में कुछ हेर-फेर के साथ) पैरा उठा-उठाकर काम चला लिया गया है!

क्रान्तिकारी वाम शिविर में अधिकांश पार्टियों की अवस्थिति छोटी पूँजी के तबाह होने पर हाय-तौबा मचाने की है। अधिकांश ऐसे संगठन और समूह छोटी पूँजी का प्रतिनिधि “राष्ट्रीय पूँजीपति वर्ग” को मानते हैं और यह मानते हैं कि भारत का “बड़ा, नौकरशाह, दलाल पूँजीपति वर्ग” अपने साम्राज्यवादी महाप्रभुओं के इशारों पर खुदरा व्यापार में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश को बढ़ावा दे रहा है और वास्तव में सरकार के इस प्रस्ताव के पीछे “बाह्य साम्राज्यवादी दबाव” का हाथ है। उनके अनुसार, इस नीति से इस देश का किसान तबाह होगा; छोटा व्यापारी और छोटा उद्योगपति तबाह होगा; और इसका असर देश के मज़दूरों पर भी पड़ेगा। अधिकांश क्रान्तिकारी वाम संगठनों और समूहों की यह पूरी अवस्थिति आज से 40 वर्ष पहले भी यही होती! कारण यह है कि भारत के विघटित होते क्रान्तिकारी वाम शिविर के अधिकांश समूह व संगठन आज भी भारत को एक अर्द्धसामन्ती अर्द्धऔपनिवेशिक देश मानते हैं, जिसमें एक दलाल नौकरशाह पूँजीपति वर्ग सामन्ती भूस्वामियों के वर्ग के साथ मिलकर शासन करता है, और अपने साम्राज्यवादी आकाओं के इशारों पर निर्णय लेता है; और देश का राष्ट्रीय बुर्जुआ, समूचा किसान वर्ग, मज़दूर वर्ग और मध्यवर्ग इसकी नीतियों से तबाह होता है और आज देश में इन चार वर्गों को मिलकर साम्राज्यवाद और अर्द्धसामन्तवाद-अर्द्धउपनिवेशवाद विरोधी नवजनवादी क्रान्ति करनी होगी। कोई इसके लिए तत्काल सशस्त्र संघर्ष की बात करता है तो कोई इसके लिए पहले जनान्दोलन खड़ा करने और फिर दीर्घकालिक जनयुद्ध शुरू करने की बात करता है, तो कोई दोनों साथ-साथ करने की बात करता है। लेकिन अधिकांश क्रान्तिकारी वाम संगठनों की यह अवस्थिति एक बड़ी त्रासद स्थिति पैदा करती है। कारण यह है कि यह पूरी अवस्थिति 1963 में चीन की कम्युनिस्ट पार्टी द्वारा दी गयी अन्तरराष्ट्रीय आम कार्यदिशा के अनुसार अभी तक अपने देश की क्रान्ति की रणनीति और आम रणकौशल को तय करती है। यह और कुछ नहीं बल्कि यही दिखलाता है कि भारत के क्रान्तिकारी वाम शिविर के अधिकांश घटक एक टाइम कैप्स्यूलमें कैद रह गये हैं। दुनिया 2011 में पहुँच गयी है और वे अभी तक 1960 के दशक में ही जी रहे हैं (हालाँकि, उस स्थिति में भी भारत की सामाजिक संरचना को अर्द्धसामन्ती अर्द्धऔपनिवेशिक घोषित किये जाने पर कई वैध और शक्तिशाली प्रश्न खड़े किये जा सकते थे)। अपने देश की ठोस परिस्थितियों का ठोस विश्लेषण करने की बजाय अन्तरराष्ट्रीय नेतृत्व के व्यापक सामान्य मार्गदर्शन को ही अपने देश में क्रान्ति का ठोस कार्यक्रम मान लेने की प्रवृत्ति भारत के क्रान्तिकारी आन्दोलन में पुरानी रही है; अपने देश की सामाजिक संरचना, उत्पादन सम्बन्धों, उत्पादक शक्तियों के विकास के स्तर, शासक वर्ग के वर्ग चरित्र के बारे में क्रान्तिकारी वाम शिविर के अधिकांश संगठनों की स्थिति दुखद, बल्कि कहें कि, त्रासद है। अपनी इसी कठमुल्लावादी सोच और अतीतग्रस्तता, क्रान्तियों का अनुसरण करने की प्रवृत्ति और अपने देश की स्थितियों पर मार्क्सवाद को रचनात्मक तरीके से लागू कर स्वतन्त्र नतीजे निकालने के स्वतन्त्र विवेक के अभाव के चलते, बिखरते हुए क्रान्तिकारी वाम शिविर के संगठन खुदरा व्यापार में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश पर टटपुंजिया ज़मीन पर खड़े होकर छोटी पूँजी के तबाह होने पर स्यापा कर रहे हैं। वे इस बात को नहीं समझते कि भारत में पूँजीवादी उत्पादन सम्बन्ध कम से कम पिछले पाँच दशकों से प्रमुख उत्पादन सम्बन्ध बन चुके हैं, और भारत का पूँजीपति वर्ग साम्राज्यवाद के दलाल के तौर पर नहीं बल्कि उसके जूनियर पार्टनरके तौर पर अपनी राजनीतिक स्वतन्त्रता को कायम रखते हुए पूँजीवादी विकास का रास्ता अख़्ति‍यार किये हुए है। आज भूमण्डलीकरण के दौर में तो नवजनवादी क्रान्ति और दीर्घकालिक लोकयुद्ध को भारत में लागू करने की कठमुल्लावादी सोच और भी हास्यास्पद है!

वे यह नहीं समझ पाते कि पूँजीवादी विकास की नैसर्गिक गति छोटी पूँजी को तबाह करेगी ही करेगी और छोटे उत्पादकों, उद्यमियों और व्यापारियों के एक बड़े हिस्से को बरबाद कर सर्वहारा की कतार में ला खड़ा करेगी। ऐसे में, एक वैज्ञानिक क्रान्तिकारी का काम इस छोटी पूँजी को ज्यों-का-त्यों बचाये रखने की गुहार लगाना नहीं, बल्कि इस टटपुंजिया वर्ग में और ख़ास तौर इसके सबसे निचले हिस्सों में (जिसमें कि वास्तव में अर्द्धसर्वहाराओं की बहुसंख्या है) यह क्रान्तिकारी प्रचार करना है कि पूँजीवादी व्यवस्था में छोटी पूँजी की यही नियति है और पूँजीवादी व्यवस्था और समाज के दायरे में रहते हुए इस तबाही और बरबादी से छोटा निम्न पूँजीपति वर्ग नहीं बच सकता है। अगर उसे इस नियति से बचना है तो उसे इस व्यवस्था की चौहद्दी के पार सोचना होगा; एक ऐसी व्यवस्था के बारे में सोचना होगा जो हरेक नागरिक को रोज़गार, शिक्षा, चिकित्सा, आवास और हर प्रकार की बुनियादी सामाजिक व आर्थिक सुरक्षा मुहैया करा सके। ऐसी व्यवस्था एक समाजवादी व्यवस्था ही हो सकती है। पूँजीवाद का यही एकमात्र सही, व्यावहारिक और वैज्ञानिक विकल्प है। इसलिए इतिहास उसके समक्ष एक ही उपयुक्त विकल्प रखता है-सर्वहारा अवस्थिति को अपनाना। आखि़रकार, मानव जीवन का लक्ष्य एक वैविध्यपूर्ण, भौतिक व आत्मिक रूप से सन्तोषकारी, सुन्दर जीवन प्राप्त करना होता है। दो बीघा ज़मीन, या कुछ पूँजी, या किसी भी किस्म का छोटा मालिकाना ऐसा जीवन न पूँजीवाद के रहते मुहैया करा सकता है और न ही पूँजीवाद के बाद। जो व्यवस्था इन चीज़ों की गारण्टी ले सकती है वह एक ऐसी व्यवस्था ही हो सकती है जो समस्त संसाधनों, उत्पादन के साधनों, प्राकृतिक सम्पदा और बौद्धिक सम्पदा के सामूहिक मालिकाने पर आधारित हो और जिसमें फैसला लेने का अधिकार सामूहिक तौर पर समाज के मेहनकतश तबके के हाथ में हो।

इस क्रान्तिकारी प्रचार की लम्बी, निरन्तरतापूर्ण और सतत प्रक्रिया को चलाना-यही सर्वहारा वर्ग की अवस्थिति को मज़बूत बनायेगाः भौतिक तौर पर, राजनीतिक तौर पर और सामाजिक तौर पर। लेकिन सर्वहारा अवस्थिति पर खड़े होकर इस प्रचार को करने की बजाय क्रान्तिकारी वाम शिविर का बड़ा हिस्सा छोटे उद्यमी, छोटे व्यापारी, और कुलकों-फार्मरों को बचाओ!’ नामक गाने के कोरस में सुर मिला रहा है, जिसमें उसके साथी संसदीय वामपंथियों से लेकर साम्प्रदायिक फासीवादी तक हैं। इस बेमेल और असुविधाजनक कोरस को उसके पुराने, बासी और उबाऊ गीत के साथ छोड़कर, आइये हम भारत में खुदरा व्यापार की स्थिति और उसमें प्रत्यक्ष विदेशी निवेश के निहितार्थों पर संक्षेप में एक निगाह डाल लें!

भारत के खुदरा व्यापार में विदेशी निवेश पहले से ही था, लेकिन सीमित और अप्रत्यक्ष रूप में। यह विशेष रूप से थोक व्यापार, फ्रैंचाइज़ी प्रदान करने, और कमीशन एजेंसी सेवाओं के जरिये होता रहा है। इनके द्वारा वास्तव में खुदरा व्यापार में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश की ज़मीन पहले से ही तैयार कर दी गयी थी। फिलहाल इन रूपों में विदेशी निवेश खुदरा व्यापार के क्षेत्र में हो रहा है-पहला, संयुक्त उद्यम के रूप में जिसमें विदेशी कम्पनियाँ भारतीय कम्पनियों के साथ मिलकर खुदरा व्यापार में निवेश कर रही हैं; दूसरा फ्रैंचाइज़ी देने के जरिये, जैसे कि केएफसी, एडिडास, नाइकी आदि जैसी कम्पनियाँ कर रही हैं; तीसरा, छोटे पैमाने के उद्योगों द्वारा सोर्सिंग कराकर; चौथा, ‘कैश एण्ड कैरीगतिविधियों के जरिये, जैसे कि मेट्रो’, ‘जायण्ट’, आदि जैसी कम्पनियाँ कर रही हैं; और पाँचवा, गैर-स्टोर रूपों के जरिये जैसे कि एमवे’, ‘जापान लाइफ इण्डियाआदि जैसी नेटवर्क मार्केटिंग की कम्पनियाँ कर रही हैं। इन रूपों में खुदरा व्यापार में अप्रत्यक्ष विदेशी निवेश पहले से ही मौजूद है। इसके अलावा, देशी कारपोरेट घरानों ने भी खुदरा व्यापार में अपनी जगह बनानी शुरू कर दी है जैसे कि रिलायंस फ्रेश, बिग एपल, आदि। इसका प्रभाव भी छोटी पूँजी पर वैसा ही है जैसा कि प्रत्यक्ष विदेशी निवेश होने पर विदेशी कम्पनियों का होगा, लेकिन उसका विरोध इतने ज़ोर-शोर से कोई नहीं करता है। इसी से स्पष्ट पता चलता है कि स्वयं क्रान्तिकारी वाम भी एक छद्म राष्ट्रवादी अवस्थिति पर खड़ा है और उसका विरोध काफ़ी हद तक साम्प्रदायिक फासीवाद द्वारा अपनायी गयी अवस्थिति के कारण उसके लिए एक बाध्यता बन गया है। विदेशी निवेश की बात पर वापस आते हैं। वॉलमार्ट ने बैंगलोर में कुछ वर्षों पहले एक वैश्विक सोर्सिंग कार्यालय खोला था और इसने भारतीय कम्पनी भारती के साथ एक संयुक्त उद्यम भी शुरू किया था। इस तरह भारत के खुदरा व्यापार के क्षेत्र में विदेशी निवेश अनुपस्थित रहा हो, ऐसा नहीं है। अगर प्रत्यक्ष विदेशी निवेश का प्रस्ताव पास हो भी जाता है तो फर्क सिर्फ इतना आयेगा कि यह विदेशी निवेश प्रत्यक्ष और व्यवस्थित हो जायेगा।

अब भारत के खुदरा व्यापार के वर्तमान दृश्य पर आते हैं। कुल खुदरा व्यापार का करीब 20 प्रतिशत भारत में स्वतन्त्र खुदरा व्यापार पूँजी द्वारा या फिर सीधे उत्पादकों द्वारा किया जाता है। इसे अर्थशास्त्र की भाषा में वर्टिकल इण्टीग्रेशन मॉडल कहा जाता है, जिसमें उत्पाद उत्पादक द्वारा सीधे विपणित होता है या फिर ग्राहक और उत्पादक के बीच एक ही मध्यस्थ होता है जो कि एक स्वतन्त्र व्यापारिक संस्थान होता है। दूसरा मॉडल है वर्टिकल सेपरेशन मॉडल जिसके तहत भारत में करीब 80 फीसदी खुदरा व्यापार होता है। इसमें उत्पाद कई मंज़ि‍लों से होता हुआ ग्राहक के पास पहुँचता है। इन मंज़ि‍लों में छोटे पैमाने के एजेण्टों, स्टॉकिस्टों, वितरकों, किराना स्टोरों, आदि से लेकर खुदरा व्यापारियों की एक पूरी श्रृंखला होती है जो स्थानीय धरातल और स्तर पर काम करती है और उपभोक्ताओं से प्रत्यक्ष और वैयक्तिकीकश्त सम्बन्ध पर आधारित होती है।

यह दूसरा मॉडल भारत के पूँजीवादी विकास के लिए अब तक एक ज़रूरी अंग का काम करता रहा है। क्योंकि इसके जरिये भारत के करोड़ों बेरोज़गारों और अर्द्धबेरोज़गारों की बेरोज़गारी छिप जाती है। वास्तव में, कृषि के बाद प्रच्छन्न बेरोज़गारों की सबसे बड़ी तादाद खुदरा व्यापार में लगी हुई है। कारखानों, काम-धन्धों से बेरोज़गार हुई एक अच्छी-ख़ासी तादाद काम चलाने के लिए स्वरोज़गार के तौर पर खुदरा व्यापार के क्षेत्र को अपनाती है। पूँजीवाद जिन्हें बेरोज़गार करता है और असुरक्षित और अरक्षित स्थिति में छोड़ देता है, उनके लिए खुदरा व्यापार भुखमरी की रेखा पर जीते रहने के लिए एक शरणस्थली बन जाता है। अगर खुदरा व्यापार में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश होता है तो यह विशालकाय अर्द्धबेरोज़गार और प्रच्छन्न रूप से बेरोज़गार आबादी खुले तौर पर बेरोज़गारों की भीड़ में नज़र आना शुरू हो जायेगी। यह समाज में असन्तोष को बढ़ायेगा और विस्फोटक स्थितियाँ पैदा करेगा। यही कारण है कि सामाजिक जनवादी और समाजवादी अपनी सुधारवादी अवस्थिति पर खड़े होकर इस पर काप़फ़ी हल्ला मचा रहे हैं और ‘दि हिन्दू’ और ‘जनसत्ता’ जैसे अखबारों के सम्पादकीय पेज को अनथक रूप से रंगे चले जा रहे हैं! करीब 4 करोड़ की आबादी जो प्रच्छन्न और अर्द्धबेरोज़गार के तौर पर खुदरा व्यापार के क्षेत्र में दयनीय रूप से जी पा रही है, वह प्रत्यक्ष विदेशी निवेश होने पर खुले तौर पर बेरोज़गार हो जायेगी और उनके भ्रम और उम्मीदें मिट्टी में मिल जाएँगे। यह वाकई भयंकर असन्तोष को जन्म देगा।

निश्चित तौर पर कोई भी सर्वहारा क्रान्तिकारी प्रत्यक्ष विदेशी निवेश का समर्थन नहीं करेगा। लेकिन इस पर वह ठीक वही अप्रोच अपनायेगा जो कि वह पूँजीवाद की नैसर्गिक गति से तबाह होने वाले सभी छोटे मालिकों के प्रति अपनाता है-यानी, वह उनमें अतीत की छोटे मालिकाने वाली छोटी-सुन्दर दुनिया का नॉस्टैल्जिया नहीं पैदा करेगा, बल्कि बतायेगा कि पूँजीवाद अपनी प्रकृति से ही आदमखोर होता है और चाहे देशी बड़ी पूँजी के हाथों या फिर विदेशी बड़ी पूँजी के हाथों, पूँजीवाद के रहते उसे लुटना और बरबाद ही होना है। पूँजीवाद अपनी नैसर्गिक गति से छोटी पूँजी को उजाड़ता है। हमें उजड़ने वाली अर्द्धसर्वहारा, ग़रीब टटपुंजिया आबादी के बीच इस मौके को पूँजीवाद-विरोधी प्रचार का अवसर बनाना चाहिए और उन्हें पूँजीवाद की सच्चाई से अवगत कराते हुए सही सर्वहारा अवस्थिति पर लाने का प्रयास करना चाहिए। तात्कालिक तौर पर भी, एक सही सर्वहारा अवस्थिति पर खड़े होकर यही प्रचार किया जा सकता है। खुदरा व्यापार के क्षेत्र में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश पूँजीवादी व्यवस्था की स्वाभाविक गति का अगला चरण ही है। यह स्वाभाविक गति है बड़ी पूँजी द्वारा छोटी पूँजी को निगल लिये जाने की गति। यह प्रक्रिया, जैसा कि हम पहले ही ज़ि‍क्र कर चुके हैं, खुदरा व्यापार में बड़ी देशी कम्पनियों के प्रवेश के साथ ही शुरू हो चुकी थी और प्रत्यक्ष विदेशी निवेश इसका अगला तार्किक चरण है। पूँजीवाद के रहते और कुछ हो भी नहीं सकता है। अगर कोई इससे इतर उम्मीद करता है या औरों में ऐसी उम्मीद पैदा करता है, तो या तो वह मूर्ख है या फिर सामाजिक जनवादी या सुधारवादी!

भूमण्डलीकरण के दौर में और विशेष तौर पर पूँजीवाद के मौजूदा आर्थिक संकट के दौर में पूँजी के लिए उत्पादक निवेश की सम्भावनाएँ विकसित पूँजीवादी देशों में लगातार सन्तृप्ति के स्तर पर पहुँच रही हैं। ऐसे में, विकासशील पूँजीवादी देशों में पैदा होता नया उपभोक्ता वर्ग, जो उन देशों की आबादी का तो महज़ 15-20 फीसदी है लेकिन मन्दी की मार खाई पूँजी के लिए निरपेक्ष रूप में यह विशालकाय बाज़ार पैदा करता है, वैश्विक पूँजी के लिए उम्मीद की एक किरण के समान है। खुदरा व्यापार में भी वॉलमार्ट, टेस्को, आदि जैसी विशालकाय कम्पनियाँ इन देशों के उभरते बाज़ारों पर अपनी निगाहें गड़ाये हुए हैं। स्वयं भारत का बड़ा पूँजीपति वर्ग इस कम इस्तेमाल हुए और कम भीड़ वाले क्षेत्र पर अपनी गिद्ध-दृष्टि जमाये बैठा है, जैसे कि अम्बानी, आदि। स्पष्ट है कि मन्दी के इस दौर में पूँजी अपने ढाँचागत संकट से तात्कालिक तौर पर निपटने के लिए ऐसे क्षेत्रें की तलाश में है जहाँ वह अपनी प्रचुरता को खपा सके। ऐसे में, विकासशील देशों में खुदरा व्यापार का क्षेत्र एक ललचा देने वाला क्षेत्र है। वैश्विक पूँजीवादी संकट के दौर में यह लाज़ि‍मी है कि इन देशों में खुदरा व्यापार को मिलने वाला संरक्षण अब और नहीं चल सकता। और निश्चित तौर पर, इस प्रक्रिया में साम्राज्यवादी पूँजी को वरीयता मिलेगी और देशी पूँजी उसके साथ संयुक्त रूप से जनता को लूटने में लगेगी, हालाँकि कई मौकों पर वह उससे प्रतिस्पर्द्धा भी करेगी। भारतीय पूँजीपति वर्ग के लिए भी यह अस्तित्व का प्रश्न है कि यह संरक्षण ख़त्म हो और खुदरा व्यापार के क्षेत्र का उदारीकरण हो।

खुदरा व्यापार में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश के समर्थक यह दावा कर रहे हैं कि व्यापार में बहुसंस्तरीय मध्यस्थों के ढाँचे के समाप्त होने और किसानों व अन्य उत्पादकों और विशालकाय खुदरा व्यापार कम्पनियों के बीच प्रत्यक्ष सम्बन्ध स्थापित होने से किसानों को, उत्पादकों को अपनी उपज व उत्पाद की बेहतर कीमत मिलेगी और साथ ही उत्पाद की कीमत भी कमीशन के बहुसंस्तरीय ढाँचे के ख़त्म होने के साथ नीचे आयेगी और महँगाई कम होगी। इस तर्क के विरोधी यह कह रहे हैं कि शुरुआत में ऐसा हो सकता है लेकिन जैसे ही खुदरा व्यापार से छोटी पूँजी का सफ़ाया हो जायेगा और बड़ी कम्पनियों की इज़ारेदारी स्थापित हो जायेगी, वैसे ही, किसान/उत्पादक और साथ ही उपभोक्ता इन बड़ी कम्पनियों की दया पर होंगे। बड़ी कम्पनियाँ जिस दर से खरीद के लिए भुगतान करेंगी उस दर को किसानों/उत्पादकों को स्वीकार करना होगा और साथ ही वे जो कीमतें तय करेंगी, उपभोक्ता को उसे स्वीकार करना पड़ेगा। ये दोनों ही तर्क भ्रामक हैं, हालाँकि दोनों के ही पक्ष में अपनी तरह से छाँटकर उदाहरण और प्रमाण दिये जा सकते हैं। प्रत्यक्ष विदेशी निवेश से किसानों/उत्पादकों की स्थिति में थोड़ा फ़र्क आ भी सकता है और नहीं भी। यह फ़र्क सकारात्मक भी हो सकता है और नकारात्मक भी। अगर कुछ अन्य तीसरी दुनिया के देशों के उदाहरण देखें तो दोनों ही पक्षों की मिसालें मिलती हैं। फिलहाल भारत में किसानों को अपने उत्पाद की कीमत के हर एक रुपये में से 20 से 22 पैसे तक मिलते हैं। कई विकासशील देशों में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश के बाद से यह हिस्सा 30 से 35 प्रतिशत भी हुआ है और कुछ देशों में यह गिरकर 15 फीसदी तक भी हो गया है। मुद्दे की बात यह है कि अन्ततः पूँजीवाद की स्वाभाविक गति में किसानों के एक बड़े हिस्से को लगातार सर्वहाराओं की कतार में शामिल होना ही है। अब इस प्रक्रिया में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश का हाथ हो भी सकता है और नहीं भी। कई देशों में बिना प्रत्यक्ष विदेशी निवेश के यह काम हो गया है। जो काम विदेशी कम्पनियाँ करतीं, वह देशी कारपोरेट घरानों ने कर दिया। इसलिए यह पूरी बहस ही विचारधारात्मक और राजनीतिक रूप से डिस्लोकेटेडहै। इज़ारेदारीकरण की प्रक्रिया को आप नहीं रोक सकते हैं। अब इस प्रक्रिया में एक सम्भावित अभिकर्ता विदेशी पूँजी भी हो सकती है। लेकिन अगर वह अनुपस्थित रहे तो भी यह प्रक्रिया अन्य अभिकर्ताओं के जरिये मुक़ाम पर पहुँच ही जायेगी। यह ज़रूर हो सकता है कि प्रत्यक्ष विदेशी निवेश के कारण यह प्रक्रिया थोड़ी त्वरित हो जाए। लेकिन यह प्रक्रिया उसके बिना देशी बड़ी पूँजी के जरिये भी घटित होती। और इसके नतीजे वही होंगे, चाहे यह दोनों में से किसी भी रास्ते से होः टटपुंजिया वर्गों और अर्द्धसर्वहारा का एक बड़ा हिस्सा तबाह होकर सर्वहाराओं की कतार में शामिल होगा; और दूसरा, जो सर्वहारा वर्ग इस समय खुदरा व्यापार में लगा हुआ है उसमें छँटनी होगी और बेरोज़गारी बढ़ेगी। ये दोनों ही पूँजीवादी व्यवस्था के अनिवार्य परिणाम हैं जो घटित होने से रोके नहीं जा सकते हैं।

ऐसे में, अगर हम ‘छोटी पूँजी को बचाओ’ का अनैतिहासिक सुधारवादी नारा देते हैं, या यह उम्मीद करते हैं कि छोटा उद्यमी और छोटा व्यापार भारत की कल्पित “सामन्तवाद-विरोधी, साम्राज्यवादी-विरोधी, दलाल नौकरशाह पूँजीपति वर्ग-विरोधी नवजनवादी क्रान्ति” का मित्र है और उसे इस मुद्दे पर सर्वहारा वर्ग के साथ जोड़ा जा सकता है, तो हम या तो मूर्ख कठमुल्लावादी कहलाएँगे या शातिर सामाजिक जनवादी और समाजवादी सुधारवादी। किसी भी रूप में, कोई सर्वहारा क्रान्तिकारी आज के समय में एक पूँजीवादी समाज और व्यवस्था में यह अवस्थिति नहीं अपना सकता है।

तो ऐसे में उसकी अवस्थिति क्या होगी? उसकी अवस्थिति होगी, सतत, निरन्तरतापूर्ण, धैर्यपूर्ण और विवेकपूर्ण पूँजीवाद-विरोधी प्रचार की; उसकी नीति होगी टटपुंजिया वर्गों और अर्द्धसर्वहारा वर्ग के बीच यह प्रचार करने की कि पूँजीवादी व्यवस्था के भीतर उसकी यही नियति हो सकती है और यह कि छोटे पैमाने का मालिकाना और पूँजी की छोटी-सी पोटली उसे एक असुरक्षित, अरक्षित और डरा-सहमा सा जीवन ही दे सकती है। केवल एक समाजवादी व्यवस्था ही उसे एक सुन्दर, वैविध्यपूर्ण और बेहतर जीवन दे सकती है। इसे वह आज जुबानी प्रचार से न भी समझे तो व्याकुल होने की कोई ज़रूरत नहीं है; आज वह इस या उस झण्डे या बैनर की पीछे खड़ा हो जाये, जो उसकी पोटली को बचा लेने की गारण्टी दे रहा है, तो भी घबराने की कोई बात नहीं है। वह आने वाले समय में इसे ठोस अनुभव और व्यवहार में समझ जायेगा। कुछ सर्वहाराकरण से पहले और कुछ सर्वहाराकरण के बाद! लेकिन समझेगा ज़रूर! हमें विज्ञान पर भरोसा रखते हुए सतत प्रचार जारी रखना चाहिए। पूँजीवादी व्यवस्था के रहते यही हो सकता है और यही होगा, क्योंकि पूँजीवाद के पास और कोई विकल्प नहीं है।

आनुभविक तौर पर भी देखें तो यह प्रक्रिया पिछले लम्बे समय से जारी है और विशेष तौर पर नयी आर्थिक नीतियों के बाद से यह प्रक्रिया और तेज़ हो गयी है। 1991 में वित्त मन्त्री के तौर पर मनमोहन सिंह ने विक्तोर ह्यूगो को उद्धृत करते हुए कहा था कि ‘जिस चीज़ का समय आ गया हो, धरती पर कोई चीज़ उसे होने से नहीं रोक सकती है।’ बाद में इस कथन को उन्होंने प्रत्यक्ष विदेशी निवेश का समर्थन करते हुए भी दुहराया था। अपनी जगह पर मनमोहन सिंह एकदम सही हैं। पूँजीवादी व्यवस्था के पास इसके अलावा कोई और विकल्प नहीं है और अपने संकट से निपटने के लिए वह हर सम्भावना को खंगाल रही है। ऐसे में खुदरा व्यापार में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश का समय भी अब आ गया है। सन् 2000 में भाजपा-नीत राजग सरकार ने आयात और निर्यात के कई आइटमों को 100 प्रतिशत प्रत्यक्ष विदेशी निवेश के लिए खुला कर दिया था। 2006 से 2010 के बीच अलग-अलग सामानों के लिए ऐसे करीब 100 प्रस्ताव पेश किये गये जिसमें से 57 स्वीकार कर लिये गये जिसके परिणामस्वरूप कई लक्ज़री वस्तुएँ, जीवन शैली वस्तुएँ, हैंड बैग, ज्यूलरी आदि को प्रत्यक्ष विदेशी निवेश के लिए खुला कर दिया गया। साथ ही, सिंगल-ब्राण्ड विपणन में भी 51 प्रतिशत प्रत्यक्ष विदेशी निवेश को मंजूरी दे दी गयी, जिसे भविष्य में 74 प्रतिशत किया जाने वाला है। पूँजीवादी दायरे के भीतर अब जिस चीज़ का समय आ गया है, उसे कोई रोक नहीं सकता है। हम देख सकते हैं कि अपनी ज़मीन पर मनमोहन सिंह ने एकदम यथार्थवादी बात कही है। लेकिन विक्तोर ह्यूगो के इस उद्धरण को एक दूसरे रूप में भी समझा जा सकता है। यानी, इस यथार्थ का एक द्वन्द्वात्मक अदरभी है। पूँजीवादी व्यवस्था की यही नैसर्गिक गति उसे लगातार उस बिन्दु पर ले जा रही है जहाँ हम कह सकते हैं कि समाजवादी विकल्प के नये रूप में स्थापित होने का वक्त आ गया है, और अब इसे धरती पर कोई रोक नहीं सकता है। पूरे संकटग्रस्त पूँजीवादी विश्व के घटनाक्रम लगातार इसी बात की ओर इशारा कर रहे हैं। वह वक्त आ रहा है और हमें उसके लिए तैयार रहना है और जनता को तैयार करना है। वरना, वह वक्त निकल जायेगा और डेनियल गुएरिन के शब्दों में हमारी सज़ा होगी फासीवाद!

मुक्तिकामी छात्रों-युवाओं का आह्वान, नवम्‍बर-दिसम्‍बर 2011

 

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