मन्दी के मारे अमेरिकी खाने की ख़ातिर बन्दूकें बेचने को मजबूर!

नेहा

हाल ही में एक दिलचस्प ख़बर सामने आई है। लॉस एंजेल्स के कॉम्प्टन शहर में लोग पिस्तौलों के बदलें में खाने का सामान जुटा रहे हैं। यह लॉस एंजेल्स के दक्षिण में पड़ने वाला सापेक्षतः ग़रीब आबादी वाला एक शहर है। ज्ञात हो कि अमेरिकी लोग बन्दूक रखना अपना जनतांत्रिक अधिकार मानते हैं। यहाँ तक तो बात समझ में आती है लेकिन वे बन्दूक से लगभग-लगभग प्यार करते हैं और यह उनके सबसे कीमती सामानों में से एक होता है। ख़ास तौर पर कैलीफ़ोर्निया में लगभग हर घर में दो से तीन बन्दूकें पाई जा सकती हैं। लेकिन अमेरिकी अर्थव्यवस्था में आई भयंकर मन्दी ने इस लगाव और प्यार पर गहरा असर डाला है। लोगों को अपनी बन्दूकों और अन्य आग्नेय अस्त्रों को खाने की ख़ातिर बेचना पड़ रहा है! क्योंकि अब बन्दूक तो खाई नहीं जा सकती!

A-family-compare-handguns-008इसके कारणों की तलाश हमें बतलाती है कि 2007 में अमेरिकी अर्थव्यवस्था के मन्दी के भँवर में फ़ँसने के बाद से लगभग 30 लाख अमेरिकी अपनी नौकरियों से हाथ धो चुके हैं। बैंकों और वित्त के पूरे क्षेत्र में शुरू हुई मन्दी तेज़ी से मैन्युफ़ैक्चरिंग और सेवा क्षेत्र में प्रवेश कर चुकी है। नतीजतन, तमाम बड़ी कम्पनियों में छँटनी शुरू हो चुकी है।

बन्दूकों के बिकने की पूरी कहानी कुछ यूँ है। दरअसल, अमेरिकी समाज इस्लामी आतंकवाद से उतना पीड़ित नहीं है जितना कि अपने समाज में ही मौजूद विक्षिप्त और मानसिक रूप से बीमार लोगों से। अमेरिकी संस्कृति जिस किस्म के अपराध और हिंसा को सम्माननीय और आकर्षक बनाती है उसके असर के तौर पर हर दो-तीन साल में हमें अमेरिका में कहीं न कहीं होने वाले गोलीकाण्डों के बारे में सुनने को मिलता है। कभी कोई लड़का अपने बाप की बन्दूक लेकर वीडियो गेम की तर्ज़ पर अपनी कक्षा के लोगों को भून डालता है तो कभी कोई पागल किसी अस्पताल में मरीज़ों पर गोलियों की बौछार कर देता है। अपनी ही पैदा की गई इस बीमारी से निपटने के लिए न्यूयॉर्क, सैन फ्रांसिस्को और लॉस एंजेल्स में प्रशासन एक योजना चलाता है। इस योजना के तहत बन्दूक देने वालों को तीन निजी कम्पनियों के कूपन दिये जाते थे जिसके बदले में वे उन कम्पनियों के स्टोरों से 100 डॉलर की खरीदारी कर सकते थे! इससे मन्दी से निपटने में भी मदद मिलती है। पहले जिन कम्पनियों के कूपन दिये जाते थे वे आम तौर पर इलेक्ट्रॉनिक सामानों की कम्पनियाँ थीं। अब मन्दी के बाद के दौर में तीन में से दो कम्पनियाँ खाने के सामानों की हैं।

नवम्बर महीने में ही कैलीफ़ोर्निया निवासियों ने 1000 बन्दूकें प्रशासन के हवाले कीं जिनके बदले में उन्हें कूपन मिले। इनमें से 590 पिस्तौलें थीं और 2 हैण्डग्रेनेड। पिछले वर्ष पूरे साल के दौरान सिर्फ़ 387 बन्दूकें ही प्रशासन को सौंपी गई थीं। ज़ाहिर है कि मन्दी का असर व्यापक है। इस मन्दी ने अमेरिकियों में समृद्ध होने के अहसास (‘वेल्थ इफ़ेक्ट’) को कम किया है। उपभोक्ता खर्च तेज़ी से नीचे आया। अमेरिकी समाज में 62 प्रतिशत वयस्क आबादी शेयर मार्केट में निवेश करती है। शेयर मार्केट के गिरने के साथ ही इस हिस्से को भारी नुकसान उठाना पड़ा। इन सभी परिघटनाओं के नीचे तक छन कर आने से एक बात तो साबित हो गई है। पूँजीवादी दुनिया में समृद्धि ट्रिकल डाउन करे न करे, दरिद्रता ट्रिकल डाउन ज़रूर करती है!

 

मुक्तिकामी छात्रों-युवाओं का आह्वान, जनवरी-मार्च 2009

 

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