यूएपीए : जनप्रतिरोध को कुचलने का औज़ार

सम्पादकीय

फ़ासीवादी भाजपा सरकार ने पूरे देश को सामाजिक कार्यकर्ताओं, मानवाधिकारकर्मियों, बुद्धिजीवियों, धार्मिक अल्पसंख्यकों, दलितों-आदिवासियों और मेहनतकश आबादी के लिए जेलख़ाने में तब्दील कर दिया है। इस फ़ासिस्ट सरकार के समय में कश्मीर, पूर्वोत्तर राज्यों का राष्ट्रीय दमन पहले से गुणात्मक मुकाम पर पहुँच गया है। मोदी सरकार की जनविरोधी नीतियों, महँगाई, बेरोज़गारी, भुखमरी, तबाह स्वास्थ्य और शिक्षा व्यवस्था, कोरोना महामारी में सरकार की आपराधिक लापरवाही आदि के ख़िलाफ़ जनता के असन्तोष को गुमराह करने के लिए जहाँ एक तरफ पूरे देश में साम्प्रदायिक ज़हर (अब इसकी ज़द में उत्तर भारत के अलावा तेलंगाना, असम, पश्चिम बंगाल आदि भी आ गये हैं) फैलाया जा रहा है, वहीं दूसरी तरफ़, मोदी सरकार की नीतियों के ख़िलाफ़ मुखर सामाजिक-राजनीतिक कार्यकर्ताओं को चुन-चुन कर फ़र्जी मामलों में बिना यथोचित सबूत के यूएपीए जैसे क़ानूनों के तहत जेलों में ठूँसा जा रहा है। कांग्रेस सरकार द्वारा लादे गये आपातकाल से सबक लेते हुए फ़ासिस्ट मोदी सरकार द्वारा यूएपीए जैसे काले क़ानूनों के जरिये टार्गेटेड गिरफ़्तारियाँ और दमन जारी है। पिछले लम्बे समय से आनन्द तेलतुम्बड़े, गौतम नौलखा, साईं बाबा, रोमा सेन, सुधा भारद्वाज, उमर ख़ालिद, शरजील इमाम, हैनी बाबू जैसे तमाम बुद्धिजीवी, मानवाधिकारकर्मी सामाजिक-राजनीतिक कार्यकर्ता जेलों में बन्द हैं। कुछ समय पहले काफ़ी मशक्कत के बाद वारवरा राव ज़मानत पर रिहा हो पाये। नताशा नरवाल को उनके बीमार पिता से मिलने तक की छूट नहीं दी गयी थी और फिर ज़मानत मिलने के बाद भी नताशा को जेल में रखने के लिए दिल्ली पुलिस द्वारा काफ़ी दाँव-पेंच किया गया। हाल ही में 84 वर्षीय फ़ादर स्टेन की जेल में मौत के बारे में यह जगज़ाहिर है कि ये मौत नहीं बल्कि इस फ़ासीवादी सरकार द्वारा की जाने वाली न्यायिक हत्या थी। फ़ादर स्टेन लम्बे समय से उन आदिवासियों की लड़ाई लड़ रहे थे, जिन्हें माओवादी होने का आरोप लगाकर जेलों में ठूँस दिया गया था। एक साल पहले फ़ादर स्टेन को भीमा कोरेगाँव मामले में फ़र्जी आरोप लगाकर जेल में डाल दिया गया था। हाल ही में मणिपुर के दो जनपक्षधर पत्रकारों, किशोरचन्द्र वांगखेम और इरेन्द्र लेईचोम्बम को फ़ेसबुक पर गोबर और गौमूत्र को कोरोना का इलाज़ बताये जाने पर कुछ व्यंग्य करने पर राष्ट्रीय सुरक्षा क़ानून के अन्तर्गत गिरफ़्तार कर लिया गया। हाथरस बलात्कार की रिपोर्टिंग करने वाले केरल के पत्रकार सिद्दीक़ कप्पन को यूएपीए के तहत जेल में डाल दिया गया। पूर्व पुलिस अधिकारी संजीव भट्ट बरसों से जेल में बन्द हैं। कोरोना की दूसरी लहर के दौरान अपनी आपराधिक लापरवाही को छुपाने के लिए यूपी सरकार के पहले शिकार अमेठी के शशांक यादव, बने जिन्होंने बस ट्विटर पर अपने दादाजी के लिए ऑक्सीजन सिलेण्डर की ज़रूरत के बारे में लिखा था। दिल्ली पुलिस ने सुल्तानपुरी और मंगोलपुरी इलाक़े में रहने वाले 25 युवा मेहनतकशों को दीवारों पर “मोदी जी हमारे बच्चों की वैक्सीन विदेश क्यों भेज दी?” का केवल पोस्टर लगाने के आरोप में गिरफ़्तार कर लिया था।
मोदी सरकार के मौजूदा फ़ासीवादी निज़ाम में न्याय व्यवस्था, पुलिस प्रशासन पूरी तरह सत्ता के हाथ की कठपुतली की तरह काम कर रही है। भीमा कोरेगाँव के मामले में पिछले साल अक्टूबर में एनआईए ने दस हज़ार पन्नों का अभियोग-पत्र दाख़िल किया है, लेकिन मुक़दमे की सुनवाई अभी तक शुरू भी नहीं हुई है! जेल में बन्द लोगों की ज़मानत की याचिकाएँ बार-बार ख़ारिज की जा चुकी हैं! सत्ता की साज़िश की स्थिति तो यह है कि ‘वाशिंगटन पोस्ट’ की भारत संवाददाता निहा मसीह की एक रिपोर्ट के हवाले से पता चला है कि अमेरिका के मैसाचुसेट्स की डिजिटल फोरेंसिक फर्म ‘आर्सेनल कंसल्टिंग’ ने भीमा कोरेगाँव मामले में, माओवादी षड्यन्त्र और प्रधानमन्त्री की हत्या की साज़िश में जेल में बन्द आरोपियों में से दो- रोना विल्सन और सुरेन्द्र गाडगिल के डिजिटल रिकार्ड्स और ई-मेल की जाँच के बाद पाया है कि किसी हैकर के ज़रिये इन दोनों के कम्प्यूटर में आपत्तिजनक सामग्री डलवायी गयी थी। गिरफ़्तारी से ठीक पहले फ़ादर स्टेन, गौतम नौलखा और आनन्द तेलतुम्बडे ने भी यही कहा था। इस रिपोर्ट पर एनआईए प्रवक्ता अदालती कार्रवाई का हवाला देकर चुप्पी साधे हुए हैं। आर्सेनल की तीन रिपोर्टें आ चुकी हैं, लेकिन गोदी मीडिया के सनसनीख़ेज “देशद्रोह-देशद्रोह” के क़ातिलाना शोर में इन बातों पर किसी का ध्यान नहीं गया! इनमें से अधिकांश लोग साठ या सत्तर के पार उम्र वाले हैं और किसी न किसी ‘टर्मिनल डिजीज़’ के मरीज़ हैं! ज़ाहिर है, सरकार इन्हें लम्बे मुक़दमे के दौरान जेल में ही मार डालना चाहती है या उन्हें शारीरिक रूप से इतना जर्जर कर देना चाहती है कि वे फिर किसी तरह की सक्रियता लायक रह ही न जायें! शरीर से अस्सी प्रतिशत विकलांग जी.एन. साई बाबा की भी स्थिति अच्छी नहीं है। पूरे देश में यूएपीए जैसे काले क़ानूनों के अन्तर्गत जेल में हज़ारों लोग बन्द पड़े हैं और दस-बीस साल जेल में बिताने के बाद बेक़सूर साबित होने के बाद ‘ज़िन्दा लाश’ बनकर बाहर आने वालों के मामले भी दर्ज़नों की संख्या में हैं! अभी हाल ही में पिछले डेढ़ साल से यूएपीए के तहत जेल में बन्द उमर ख़ालिद के मुक़दमे की सुनवाई में सरकार और पुलिस प्रशासन की घिनौनी मिलीभगत का फिर से एक बार पर्दाफ़ाश हुआ। जिस वीडियो क्लिप के आधार पर उमर ख़ालिद पर यूएपीए लगाया गया था, कोर्ट में सुनवाई के दौरान जब उसका पूरा फ़ुटेज माँगा गया तो दिल्ली पुलिस ने बताया कि उसने रिपब्लिक टीवी से वो क्लिप ली थी और जब रिपब्लिक टीवी से पूरा फ़ुटेज माँगा गया तो उसने बताया कि उनके पास कोई रॉ फ़ुटेज नहीं है क्योंकि उनका कोई रिपोर्टर वहाँ मौजूद नहीं था। रिपब्लिक टीवी ने बताया कि वो क्लिप उसे भाजपा आईटी सेल के अमित मालवीय के ट्वीट से मिला था। अमित मालवीय ने जो क्लिप ट्वीट किया था वो डॉक्टर्ड था। मज़ेदार बात ये है कि दिल्ली दंगों से लेकर सरेआम गोली चलाने वाले, भीमा कोरेगाँव के अपराधी, जन्तर-मन्तर पर ख़ुलेआम मुस्लिमों के ख़िलाफ़ हिंसा का नारा लगाने वाले संघियों-भाजपाइयों को छुट्टा छोड़ दिया गया या तुरन्त ज़मानत मिल गयी।
एनसीआरबी के रिकॉर्ड्स के मुताबिक़ पिछले 5 सालों में 7840 लोगों को गिरफ्तार किया गया जिसमें मात्र 155 लोगों पर ही आरोप साबित किया जा सका। अपवादों को छोड़कर, न्यायपालिका सीधे-सीधे सरकार के इशारों पर काम कर रही है और एनआईए, सीबीआई, आईबी, ईडी आदि एजेंसियों की स्वतन्त्रता और निष्पक्षता की बात करना तो एक मज़ाक से अधिक कुछ भी नहीं है!
यही वजह है कि हमें इन क़ानूनों/दमन के ख़िलाफ़ प्रतिरोध को जनान्दोलन का रूप देना होगा। इन क़ानूनों के ख़िलाफ़ लड़ाई की कमज़ोरी ये रही है कि हम प्रतीकात्मक विरोध प्रदर्शनों, सेमिनार, गोष्ठियों, जनहित याचिकाओं, फ़ैक्ट फ़ाइण्डिंग तक ही सीमित रहे। निश्चित तौर पर ये सब भी होना ही चाहिए। लेकिन जब तक ये आम जनता का मुद्दा नहीं बन पाता, जब तक आम जनता सड़कों पर बड़ी तादाद में नहीं उतरती तब तक फ़ासिस्ट सत्ताधरियों पर कोई फ़र्क नहीं पड़ेगा। मीडिया, संघ परिवार का भोंपू जनता में अपनी पैठ का फ़ायदा उठा कर जनता के हितों के लिए लड़ने वालों को देश विरोधी, फूट डालने वाला, आतंकवादी आदि के रूप में प्रचारित करती है और उनके लिए बोलने वालों को भी उसी श्रेणी में खड़ा कर देती है।
कुछ समय पहले इस मसले पर राजनीतिक कार्यकत्री और कवियत्री कात्यायनी ने इस सन्दर्भ में बहुत ही ज़रूरी बात समाचारपत्र (देखें मज़दूर बिगुल, जुलाई 2021) और सोशल मीडिया के प्लेटफॉर्म पर रखी थीं। उन्होंने 1970 के दशक में भारत में आपातकाल की काली पृष्ठभूमि पर शुरू हुए जनवादी अधिकार आन्दोलन के सन्दर्भ में लिखा कि – “यह आन्दोलन अगले दशक के अन्त तक ही सिमटने-बिखरने और संकुचित होने लगा था। इसके कारणों की चर्चा करते हुए उन्होने लिखा कि- “सत्तर के दशक के अन्त में पीयूसीएल में हुई फूट और पीयूडीआर के गठन के पीछे जो राजनीतिक-वैचारिक आग्रह काम कर रहे थे; नज़रिये की जो भिन्नता काम कर रही थी, वह अगले दशक तक राजनीतिक संकीर्णता की शक़्ल अख़्तियार कर चुकी थी। 1980 के दशक में पूरे देश में दर्जनों जनवादी अधिकार संगठन काम कर रहे थे, लेकिन वे किसी साझा न्यूनतम कार्यक्रम के आधार पर एक साथ आने या किसी फ़ेडरेशन या कॉन्फ़ेडरेशन जैसा ढाँचा बना पाने में असफल रहे। सच पूछें तो इस पर किसी का विशेष ज़ोर भी नहीं रहा। कई संगठन सिर्फ़ दमन-उत्पीड़न-विस्थापन की घटनाओं पर जाँच टीम बनाकर रिपोर्ट जारी करने, जनहित याचिकाएँ और बन्दी-प्रत्यक्षीकरण याचिकाएँ दाख़िल करने, ज्ञापन देने, प्रेस-विज्ञप्ति देने जैसी कार्रवाइयों तक सिमट कर रह गये। कुछ दूसरे थे जो केवल राजनीतिक बन्दियों की रिहाई, उनके उत्पीड़न और फ़र्ज़ी मुक़दमे हटाने जैसे सीमित मुद्दों पर ही काम करते रहे। इनमें से ज़्यादातर वे थे जो कमोबेश किसी मा-ले संगठन के फ़्रण्टल संगठन की तरह काम कर रहे थे। इससे कुल-मिलाकर, नागरिक आज़ादी और जनवादी अधिकार आन्दोलन के मूल लक्ष्य को क्षति ही पहुँची।”
वर्तमान हालात में आज ज़रूरत इस बात की है कि एक साझा लक्ष्य और साझा न्यूनतम कार्यक्रम पर नागरिक और जनवादी अधिकार आन्दोलन को फ़िर से खड़ा किया जाये और एक व्यापक जन-समर्थन वाले ज़मीनी आन्दोलन के रूप में खड़ा किया जाये। तमाम विचारधारात्मक और राजनीतिक मुद्दों पर मतभेद, बहस और अलग-अलग राजनीतिक सामाजिक प्रयोग चलते रहेंेगे। लेकिन जनवादी अधिकारों के मामले में एक साझा लड़ाई लड़ी जा सकती है और ज़रूर लड़ी जानी चाहिए। इस मामले में कोई भी राजनीतिक-सांगठनिक संकीर्णता आत्मघाती होगी।
फ़ासिस्टों के हाध में सत्ता होने के अलावा नागरिक और जनवादी अधिकारों के सन्दर्भ में भारतीय समाज के ताने-बाने में गम्भीर समस्या है। भारत जैसे देश में, (i) जहाँ संविधान आपको जो नागरिक और जनवादी अधिकार देता है, उनको छीन लेने के सभी उपाय और प्रावधान संविधान के भीतर ही मौजूद हों, (ii) जहाँ मुट्ठी भर पढ़े-लिखे लोगों को छोड़कर ‘जुडिशियल रेमेडी’ तक आम लोगों की पहुँच ही न हो और केवल ‘लीगल रेमेडी’ ही वे हासिल कर सकते हों, (iii) जहाँ तमाम छिटफुट सुधारों, पुलिस आयोगों की रपटों आदि के बावजूद क़ानून-व्यवस्था, आईपीसी-सीआरपीसी आदि, पुलिस तन्त्र और जेलों की व्यवस्था और नियमन औपनिवेशिक काल से, यूँ कहें कि उन्नीसवीं शताब्दी से ही, कमोबेश वैसी ही चली आ रही हो, (iv) जिस देश में अकेले आज़ादी के बाद, केन्द्र और राज्यों के स्तर पर बने काले क़ानूनों की संख्या दर्ज़न भर से भी अधिक हो, (v) जहाँ आम लोगों की ख़ुद अपने नागरिक और जनवादी अधिकारों के प्रति सजगता और जानकारी न के बराबर हो, (vi) जिस देश के उत्तर-औपनिवेशिक समाज के ताने-बाने में ही जनवादी मूल्यों और संस्कृति का अभाव हो जिसका क्रूरतम और वीभत्सतम रूप जाति-व्यवस्था, दलित-उत्पीड़न, जेण्डर-आधारित उत्पीड़न के रूप में रोज़ हमारे सामने आता हो, (vii) जिस देश में जम्मू-कश्मीर और उत्तर-पूर्व के राष्ट्रों और राष्ट्रीयताओं के दमन का सात दशकों से भी लम्बा इतिहास हो और बहुसंख्यक आबादी को इस सच्चाई का पता ही न हो और इन इलाक़ों में सत्ता की सैन्य कार्रवाइयों को वह “अलगाववादी ताक़तों के ख़िलाफ़ सरकार की देशभक्तिपूर्ण कार्रवाई” के रूप में देखती रही हो, (viii) जो देश आज़ादी के बाद से ही बड़ी परियोजनाओं, खदानों, बाँधों आदि के निर्माण के लिए बड़े पैमाने पर बलात् विस्थापन और पुनर्वास के झूठे वायदों का गवाह रहा हो, (ix) जिस देश ने तेलंगाना किसान संघर्ष के सैनिक दमन के बाद, 1960 और 1970 के दशक के बड़े पैमाने के पुलिसिया दमन, एनकाउण्टर्स, गिरफ़्तारियाँ और फिर आपातकाल के काले उन्नीस महीने देखे हों; उस देश के जनवादी चेतना सम्पन्न नागरिकों को पहले ही एक व्यापक जनाधार वाले जनवादी अधिकार आन्दोलन को संगठित करने के प्रोजेक्ट पर काम शुरू कर देना चाहिए था।
निश्चित तौर पर यह काम संसदीय वामपन्थी और एनजीओपन्थी नहीं कर सकते। किसी के भी जनवादी अधिकारों के दमन का पुरज़ोर विरोध करते हुए हमें कांग्रेस, सपा, बसपा और संसदीय वामपन्थी पार्टियों के चरित्र को नहीं भूलना होगा। कांग्रेस के समय में चिदम्बरम के ‘ऑपरेशन ग्रीन हण्ट’ को और यूपीए काल के काले क़ानूनों को भला कोई कैसे भूल सकता है? इस बात को कैसे भूला जा सकता है कि जिस एनआईए और यूएपीए का मोदी-शाह बर्बर इस्तेमाल कर रहे हैं, वे यूपीए काल की ही देन हैं जब कांग्रेस के साथ कई क्षेत्रीय दल और संसदीय वाम दल भी सत्ता में भागीदार थे! नागरिकों के निजी जीवन पर साइबर निगरानी का तन्त्र खड़ा करने के प्रोजेक्ट पर भी यूपीए शासनकाल में ही काम शुरू हो चुका था, जब आधार कार्ड की योजना बनी थी।
दूसरे, हमें यह बात समझनी होगी कि इन ख़तरनाक काले क़ानूनों, दमन और साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण करने के पीछे फ़ासिस्ट मोदी सरकार का असली मक़सद मुट्ठी भर बड़े पूँजीपतियों की सेवा करना है। देश के खनिज संसाधन, जल-जंगल-ज़मीन सब कुछ पूँजीपतियों की भेंट चढ़ाना है। शिक्षा-स्वास्थ्य जैसे क्षेत्रों को भी पूँजी की अन्धी लूट का अखाड़ा बनाना है। सारे सरकारी विभागों को निजी हाथों में बेचना है। इनसे पैदा होने वाले गुस्से को भटकाने के लिए मोदी सरकार हिन्दू और मुस्लिम समुदाय में नफ़रत और फूट का माहौल, आतंकवाद का हौवा खड़ा करती रहती है ताकि लोग एकजुट न हो सकें। पूँजीपतियों की मीडिया व संघ की तमाम शाखाएँ इस काम में मुस्तैदी से लगी हैं। संघ परिवार के लम्बे समय से संगठित और संस्थाबद्ध साम्प्रदायिक कारोबार की वजह से भले ही एक बड़ी आबादी संघ के ‘हिन्दू राष्ट्र’ से नज़दीकी महसूस करती है, लेकिन सच ये है कि हिन्दू आबादी का बहुसंख्यक मेहनतकश तबका संघ और भाजपा के असली आका अम्बानी-अडानी जैसे पूँजीपतियों की चक्की में पीसा जा रहा है। केवल मुस्लिम नहीं बल्कि मोदी सरकार की नीतियों का विरोध करने वाले किसी भी जाति या धर्म के हों, सब पर दमन का पाटा चलाया जा रहा है। हमें संघ परिवार के ‘हिन्दू, हिन्दू के लिए’ नारे के अलावा मुस्लिम वोटों की सियासत करने वालों के ‘मुस्लिम, मुस्लिम के लिए’ के नारे से सावधान रहना होगा। क्योंकि भाजपा व मुस्लिम वोटों की सियासत करने वालों की रोटी हिन्दू-मुस्लिम ध्रुवीकरण पर ही सिंक सकती है। आज हमें फ़ासिस्टों के इस दमनचक्र का मुकाबला करने लिए सभी धर्मों-जातियों-क्षेत्रों के उत्पीड़ितों-इंसाफ़़पसन्द लोगों, मेहनतकश आबादी की एक क्रान्तिकारी एकजुटता का निर्माण करना होगा। इसके अलावा और कोई रास्ता नहीं है।
निष्कर्ष के तौर पर कहें तो, अदालती-क़ानूनी स्तर पर लड़ने, शहरों के जागरूक नागरिकों में समर्थन-आधार बनाकर सत्ता पर दबाव बनाने और मीडिया के मोर्चे पर अपनी मुस्तैदी के साथ ही जनता में व्यापक आधार वाले आन्दोलन को तृणमूल स्तर से संगठित करना और आम शहरी-देहाती आबादी के बीच भी जनवादी अधिकार आन्दोलन को पैठाना होगा। आज बेहद ज़रूरी है कि आम लोगों को उनके जनवादी अधिकारों के प्रति जागरूक बनाने के लिए शिक्षा और प्रबोधन की व्यापक मुहिम चलायी जाये! जन अधिकार कमेटियों का गठन किया जाय। दूसरे, यह भी ज़रूरी होगा कि जो सामाजिक संस्थाएँ-मूल्य-मान्यताएँ जाति और जेण्डर आधारित उत्पीड़न का कारक बनती हैं और दमनकारी राज्यसत्ता के लिए सामाजिक समर्थन-आधार का काम करती हैं; दलित-उत्पीड़न तथा स्त्री-उत्पीड़न की घटनाओं के विरुद्ध व्यापक जन अभियान और जन-लामबन्दी की कोशिश की जाये! केवल तभी एक ऐसा व्यापक जनाधार वाला जनवादी और नागरिक अधिकार आन्दोलन खड़ा किया जा सकता है, जो उजाड़, विस्थापन, सैन्य-अर्द्ध-सैन्य बलों द्वारा दमन, अवैध गिरफ्तारियों, राजनीतिक बन्दियों के उत्पीड़न, साम्प्रदायिक शक्तियों के खूनी उत्पात, मॉब-लिंचिंग और काले क़ानूनों के ख़िलाफ़ मीडिया में बयान जारी करने, उच्च न्यायालय और मानवाधिकार आयोग के दरवाज़े खटखटाने, देश और दुनिया के गणमान्य बुद्धिजीवियों के बीच हस्ताक्षर अभियान चलाने और अन्तरराष्ट्रीय मंचों तक बात पहुँचाने तक ही सीमित नहीं रहेगा, बल्कि हज़ारों-हज़ार की संख्या में लोगों को सड़कों पर उतारने, जन-सत्याग्रह चलाने आदि में भी सक्षम होगा! तब हमारे विरोध के जो तरीके आज प्रतीकात्मक प्रतीत होते हैं, उनकी शक्ति भी सौगुनी अधिक हो जायेगी!
आज हमारे कुछ फौरी कार्यभार भी बनते हैं! सबसे पहले सोशल मीडिया और तमाम वैकल्पिक माध्यमों के द्वारा, और विभिन्न शहरों में मीटिंगें आयोजित करके यह माँग उठायी जानी चाहिए कि (1) भीमा कोरेगाँव से लेकर दिल्ली दंगों के फर्जी मुक़दमे को तत्काल रद्द करके सभी राजनीतिक बन्दियों व आरोपियों को अविलम्ब रिहा किया जाये, (2) सिद्दीक कप्पन और संजीव भट्ट और ऐसे तमाम लोगों पर लादे गये मुक़दमे हटाकर उन्हें अविलम्ब रिहा किया जाये, (3) यू.ए.पी.ए. जैसे सभी काले क़ानूनों को निरस्त किया जाये और एन.आई.ए. को तत्काल प्रभाव से भंग किया जाये, (4) आर्सेनल की रिपोर्ट पर सरकार अन्तरराष्ट्रीय जाँच के लिए सहमति दे !
एक बेहद ज़रूरी काम यह भी है कि देश के कुछ गणमान्य न्यायविदों और जनवादी अधिकारकर्मियों को लेकर एक ‘पीपुल्स ट्रिब्यूनल’ या जन-अदालत का गठन किया जाये जो भीमा कोरेगाँव मामले, आर्सेनल की रिपोर्ट, फ़ादर स्टेन की मृत्यु और एनआईए की गतिविधियों पर विस्तृत सुनवाई के बाद अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत करे! इस तरह के पीपल्स ट्रिब्यूनल बनाने की परम्परा अगर एक बार स्थापित हो जाये तो छत्तीसगढ़ में आदिवासियों और कश्मीर और उत्तर-पूर्व में दमन और नर-संहारों को अंजाम दिया जा रहा है, उन पर और फ़ासिस्ट गुण्डा वाहिनियों द्वारा की जाने वाली हत्याओं, गुजरात, मुजफ़्फ़रनगर और दिल्ली जैसे दंगों की साज़िशों और मॉब लिंचिंग की घटनाओं पर भी ऐसे ट्रिब्यूनल बैठाये जा सकते हैं!

अब न समय है, जूझना ही हल है!

मुक्तिकामी छात्रों-युवाओं का आह्वान, जुलाई-अगस्त 2021

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