पाठक मंच 

जी चाहता है

संजू, कलायत, हरियाणा

मुबारकबाद दे दूँ, नववर्ष की
फिर सोचता हूँ
क्या ख़ास होगा नये साले में?
वही भूखे, नंगे तन
कूड़ा बीनते
ग़रीब बेबस
कुपोषित बच्चे जिन्हें छोड़ दिया, तमाम सरकारों ने
अपने हाल में

जी चाहता है
मुबारक़बाद दे दूँ, नववर्ष की
फिर सोचता हूँ
क्या ख़ास होगा नये साले में?
हाथों में डिग्रियाँ,
फिर भी ख़ाली हाथ
ख़ाली घूमते, आवारा से
युवा बेरोज़गार
जो बनते ही गये
राजनेताओं के झाँसे,
और राजनीति का शिकार
फँस कर रह गये, बस!
सत्ता परिवर्तन के जाल में
दयनीय हालत! देश में,
ग़रीब, मज़दूर किसानों की
बेवजह! असमय मौत!
सीमा पर जवानों की
भ्रमित हैं जो, राजनीतिज्ञों की
कुटिल चाल से
बढ़ते ही जा रहे,
महँगाई, मुनाफ़ाखोरी
लूट और दुष्कर्म के मामले
बदलते रहे राज,
नहीं मिली व्यवस्था “वो”
जो इस दुष्चक्र को, थाम ले
सुनाने को, क़िस्से,
और भी बहुत
मगर लोग कहेंगे
सूंज घुराता ही जा रहा
बाल की खाल में

जी चाहता है
मुबारकबाद दे दूँ नववर्ष की
फिर सोचता हूँ
क्या ख़ास होगा न
ये साल में?

मुक्तिकामी छात्रों-युवाओं का आह्वान, जनवरी-अप्रैल 2015