डार्विन की कश्मकश और जीवन का उद्विकास
(जीवन का उद्विकास श्रृंखला की चौथी किस्त)

सनी

पिछली किस्त में हमने जीवित पदार्थ की गतिकी को व्याख्यायित करते हुए जीवन के उद्भव को रासायनिक उद्विकास से जैविक उद्विकास में छलाँग के तौर पर परिभाषित किया था। अजीवन का जीवन में परिवर्तित होना और मानव-उद्भव जीवविज्ञान की सबसे बड़ी गुत्थी रहे हैं। हम यह चर्चा भी कर चुके हैं कि जीवन का उद्भव ही वह बिन्दु है जिसकी स्पष्ट समझदारी से जीवन के उद्विकास के विज्ञान को आधार मिल सकता था। जीवन का उद्भव यानी रासायनिक उद्विकास से जैविक उद्विकास में छलाँग एक ऐसी प्रक्रिया थी जिसमें रासायनिक परिवर्तनों में एक गुणात्मक बदलाव होता है और यह एक नयी संरचना के रूप में एकीकृत होता है, यह नयी संरचना ‘आदिम कोशिका’ है जिस अस्तित्व-रूप में जीवन प्रकट होता है। धरती पर घटित होने वाले इन परिवर्तनों के लिए अनुकूल पर्यावरण, जिसे बायोस्फियर कहते हैं,वह भी साथ इस समय बन चुका था क्योंकि यह दोनों एक दूसरे से जुड़े हुए हैं। रासायनिक उद्विकास के क्रम में आदिम कोशिका संरचना का प्रकट होना आकस्मिक था जो बाद में अनिवार्य तौर पर घटित होने लगा। हालिया शोधों में कोशिका के इस आदिम रूप सरीखी आद्य संरचनाओं को प्रयोगशालाओं में भी बनाया गया है।
अधिकतर वैज्ञानिकों का मानना है कि जीवन के सभी रूपों का उद्भव बिन्दु एक है। यह आदिम-कोशिका का जन्म लेना है और यही करोडों वर्ष पुराने जीवन-वृक्ष का ‘बीज’ है जिससे जीवन का अंकुरण हुआ। आदिम-कोशिका के भीतर जितनी भी जटिल गतिकी थी वह रासायनिक उद्विकास का ही एक निषेधित रूप था। निषेधित रूप कहने का अर्थ है कि वे रासायनिक प्रक्रियाएँ एक नये रूप में कोशिका के भीतर भी दोहरायी जाती हैं। यह प्रकृति की अन्य प्रक्रियाओं जैसे तारों के भीतर नाभिकीय अभिक्रिया, धरती की तहों से पर्वत बनने, माचिस के जलने या गन्ने के रस से शराब बनने की प्रक्रिया से समानता रखती है, परन्तु साथ ही इन सब से बिलकुल अलग होती है। लेकिन जीवन के उद्भव का 20वीं शताब्दी में ही सैद्धान्तीकरण किया जा सका था और हम उपरोक्त चर्चा हालिया समय की शोध की रौशनी में कर रहे हैं। यह इसलिए कि ओपेरिन और हाल्डेन ने इस जटिल प्रक्रिया के बारे में एक वैज्ञानिक के तौर पर अन्दाज़ा लगाया था जिसे कुछ सालों बाद सिद्ध किया जा सका। जीवन के उद्विकास के सिद्धान्त ने ने जीवन और मानव उद्भव की अवधारणा में ईश्वरीय हस्तक्षेप को निरर्थक सिद्ध कर दिया। वैज्ञानिक तौर पर पहले जीवन के उद्विकास का सिद्धान्त स्थापित हुआ और उसके बाद जीवन के उद्भव को समझा जा सका। जीवन के उद्विकास का सिद्धान्त डार्विन ने दिया और इस तरह जीव-विज्ञान को प्रकृति विज्ञान की शाखा के रूप में स्थापित किया।
डार्विन से पहले जीवन का पैदा होना, करोड़ों प्रजातियों का अस्तित्व में आना धार्मिक नज़र से या तो एक चमत्कार का कमाल था या कई चमत्कारों की श्रृंखला था। इसके बरक्स भौतिकवादी परम्परा के अनुसार जीवन भी पदार्थ जगत का ही हिस्सा है, चेतना प्रकृति का ही उत्पाद है। जैविक उद्विकास को सबसे पहले प्रस्तुत करने वालों में इपीक्युरस थे जिन्होंने मनुष्य और विश्व की भौतिकवादी व्याख्या की। उनके ही नक़्शेक़दम पर ल्युक्रिटस ने अपनी ईपिकल कविता में जीवन के धरती से पैदा होने की बात कही। भारत में भौतिकवादी परम्परा का अनुसरण करते हुए चरक और सुश्रुत संहिता में जीवविज्ञान पर टिप्पणियाँ मिलती हैं हालाँकि यह व्यावहारिक सर्जरी सम्बन्धी मसलों पर केन्द्रित रचनाएँ थीं। पुर्नजागरण काल में वैनीनी ने इस विचार को पुन: पेश किया। वैसेलियस और हार्वी ने अपनी खोजों से जीवन के प्रति भौतिकवादी नज़रिया स्थापित किया।
प्रजातियों के वर्गीकरण को यूनान में अरस्तु तो भारत में चरक और सुश्रुत संहिता में पेश किया गया था लेकिन इस पर विशद कार्य भी 18वीं शताब्दी में हो सका जब लायनस ने प्रजाति वर्गीकरण की पद्धति विकसित की, हालाँकि लायनस क्रिएशनिज़्म (सृष्टिवाद) के समर्थक थे। 19वीं शताब्दी की शुरूआत में ही वनस्पति और जीव खोजे जा रहे थे। जीवाश्म और धरती के अतीत पर क्युवियर और लायल ने काम किया और यह प्रजातियों के अपरिवर्तनीय रहने पर सन्देह उठा रहा था।
भौतिकवादी परम्परा को अपनाते हुए डार्विन के दादा इरेसमस डार्विन ने ल्युक्रिटस की तरह ही उद्विकास को इहलौकिक परिघटना बताया। इनसे आगे बढ़ते हुए डार्विन पूर्व सबसे निर्णायक क़दम लामार्क ने उठाया। लामार्क ने बताया कि प्रजातियाँ बदलती हैं और प्रजातियों में आने वाला बदलाव किसी जीव द्वारा अपने जीवन काल में अर्जित गुणों के कारण होता है। लामार्क ने अब प्रचलित हो चुके उदाहरण से बताया कि जिराफ की गर्दन लम्बी इसलिए हुई कि उसने पेड़ों की शाखाओं के ऊँचा होने पर अपनी गर्दन को खींचा और इस कारण ही उसकी गर्दन लम्बी हो गयी। यह प्रजातियों के विराट जीवन वृक्ष को इहलौकिक तौर पर व्याख्यायित करने की पहले गम्भीर कोशिश थी। लामार्क ने जीवन के आन्तरिक द्वन्द्व के चलते प्रजातियों में बदलाव को व्याख्यायित किया था। लेकिन यह हर जीव के प्रयासों के कारण उनमें होने वाले बदलावों को स्वीकार करता था। लेकिन यह अवधारणा पूर्णत: सही साबित नहीं हुई क्योंकि किसी जीव द्वारा अपने जीवन काल में हासिल गुण उसकी सन्तानों में पूर्णत: स्थानान्तरित नहीं होते हैं और जीवों में वेरिएशन का कारण मुख्यत: जीन होते हैं लेकिन यह अभी तक सामने नहीं आया था। लामार्क के अनुसार सभी जीव ‘एक निश्चित लक्ष्य’ की तरफ़ उद्विकास में विकसित हो रहे हैं जो कि एक अदृश्य ताक़त की तरह काम करता है, वहीं अनुकूलता हर प्रजाति के अन्दर शारीरिक परिवर्तन लाती है। ‘एक निश्चित लक्ष्य’ की तरफ़ उद्विकास का सिद्धान्त ग़लत था। प्रजातियों के सभी अन्तरों और उसकी सम्पूर्णता में उद्विकास को समझाने में लामार्क का सिद्धान्त मूलतः और मुख्यतः असफल था। यह प्रश्न डार्विन ने ही हल किया। डार्विन का सिद्धान्त इस मायने में प्राक्रतिक विज्ञान की सबसे महानतम खोजों में से है। डार्विन ने जिस प्रक्रिया से उद्विकास को समझाया वह नैचुरल सैलेक्शन (प्राकृतिक चयन) था। यह एक पथप्रदर्शक खोज थी।
डार्विन का जीवन एक बेहद दिलचस्प दौर में बीता। डार्विन 1809 में इंग्लैण्ड के श्रियूसबरी में जन्मे थे और उनका अधिकतर जीवन लन्दन के पास एक गाँव ‘डाउन’ में बीता। यह वह समय था जब पुरानी दुनिया मर रही थी और नयी दुनिया पैदा हो रही थी। फ़्रांस से लेकर जर्मनी में औद्योगिक केन्द्र खड़े हो रहे थे और सामन्ती विचारों और संस्थानों की जगह आधुनिक विचार और संस्थान स्थापित हो रहे थे। विचारों की दुनिया में शासक बुर्जुआ वर्ग भौतिकवादी विचारों के प्रति अनाग्रही था। इंग्लैण्ड में अज्ञेयवाद,जर्मनी में हेगेल के विचारों का बोलबाला था तो फ़्रांस में भी भौतिकवादी विचारों को शासक वर्ग त्याग चुका था। पश्चिमी यूरोप में समाजवादी विचारकों में यांत्रिक भौतिकवाद का प्रभाव था। औद्योगिक क्रान्ति के साथ ही मैनचेस्टर से लेकर लिवरपूल सरीखे शहरों में आधुनिक उद्योग के साथ-साथ बीमारी और गन्दगी में डूबी ठसाठस भरी मज़दूरों की बस्तियाँ भी जन्म ले रही थीं। इंग्लैण्ड में 1851 में लगा व्यापार मेला औद्योगिक पूँजीपति वर्ग के वर्चस्व का प्रतीक था। इस समय तक ‘मक्का क़ानून’ पारित हो चुका था और यह औद्योगिक पूँजीपति वर्ग के समक्ष भूस्वामियों की राजनीतिक शक्तिमत्ता के कम होने का ही परिणाम था।
डार्विन के दादा ने ख़ुद उद्विकास के भौतिकवादी नज़रिये को पेश किया था। डार्विन के परिवार में कई लोग नास्तिक थे। ख़ुद डार्विन भी नास्तिक थे। परन्तु डार्विन सामाजिक तौर पर पूँजीपति घराने से थे। माल्थस के विचारों का पूरे डार्विन के परिवार पर प्रभाव था। डार्विन बुर्जुआ वर्ग के ऐसे वैज्ञानिक थे, जो तार्किक थे और वैज्ञानिक विचारों के प्रति प्रतिबद्ध थे। लेकिन अपने वैज्ञानिक शोध के नतीजों पर शासक वर्ग और धार्मिक जगत से जिस क़िस्म की प्रतिक्रिया उन्हें मिलने वाली थी उसके प्रति सजग भी थे। डार्विन उद्विकास के सिद्धान्त तक 1837 में ही, बीगल यात्रा के बाद पहुँच चुके थे। परन्तु उन्होंने उसे प्रकाशित नहीं किया और बार्नेक्लेस के ऊपर एक विशद शोध में लग गये और इसे अन्ततः 1859 में ही प्रकाशित किया। 1830 के दशक से ही इंग्लैंड के शहरों में वर्ग संघर्ष भी ज़ोर पकड़ रहा था जिसका उदाहरण चार्टिस्ट आन्दोलन के रूप में मज़दूर वर्ग का एक देशव्यापी संगठित आन्दोलन खड़ा होना था। डार्विन की सामाजिक पृष्ठभूमि के चलते उन्हें अपनी खोज के निहितार्थ पता थे। लामार्क के प्रति शासक वर्ग का शत्रुतापूर्ण नज़रिया स्पष्ट ही था। समाजवादी विचारक (लेवेलेर्स) लामार्क के विचारों को चर्च और शासक वर्ग की विचारधारा को चुनौती मानते थे। इंग्लैंड का शासक वर्ग तो अपनी वैचारिक समझदारी के मामले में फ़्रांस और जर्मनी के बुर्जुआ वर्ग से ज़्यादा चालाक था। अंग्रेज़ी बुर्जुआ वर्ग के इतिहास की चर्चा से डार्विन की इस कश्मकश को समझा जा सकता है। एंगेल्स बताते हैं कि: “… यदि भौतिकवाद फ़्रांसीसी क्रान्ति का दर्शन बन गया, तो धर्मभीरु अंग्रेज़ बुर्जुआ वर्ग अपने धर्म के साथ और भी दृढ़ता से चिपक गया। पेरिस के आतंक-राज ने क्या यह सिद्ध नहीं कर दिया था कि जनता की धार्मिक वृत्तियों के नष्ट हो जाने का परिणाम क्या होता है? जितना ही भौतिकवाद फ़्रांस के पड़ोसी देशों में फैलता गया, जितना ही उसे समान सैद्धान्तिक धाराओं – विशेषरूप से जर्मन दर्शन से बल मिलता गया और वस्तुतः शेष यूरोप में भौतिकवाद तथा मुक्त चिन्तन एक सुसंस्कृत व्यक्ति की आवश्यक योग्यताएँ बनते गये, उतनी ही दृढ़ता के साथ ब्रिटिश मध्यवर्ग अपने धार्मिक मत-मतान्तरों से चिपकता चला गया। ये मत एक-दूसरे से भिन्न होते हुए भी ये सभी स्पष्ट रूप से धार्मिक, ईसाई मत ही थे।” (एंगेल्स, मार्क्स-एंगेल्स, धर्म के बारे में, राहुल फाउण्डेशन, 2008, पृ. 300-301)। आगे एंगेल्स लिखते हैं: “…व्यवहारकुशल अंग्रेज़ मध्यवर्ग जर्मन प्रोफ़ेसरों से अधिक दूर तक देखता था। उसने अपनी शक्ति को मज़दूर वर्ग के साथ बाँटकर उपभोग बेशक किया था पर एकदम अनिच्छा से किया था। उसने चार्टिस्टों के ज़माने में यह समझ लिया था कि यह मोटा-तगड़ा, किन्तु उद्दण्ड लड़का यानी जनता क्या-कुछ करने में समर्थ है। और इसी से विवश होकर उसे पीपुल्स चार्टर के एक बड़े अंश को ब्रिटेन के क़ानून का अंग बनाना पड़ा था। यदि जनता को कभी भी नैतिक साधनों से वश में रखा जाना था, तो अब जनता को प्रभावित करने का सर्वोत्तम साधन धर्म ही है। इसीलिए स्कूलों की प्रबन्ध समितियों में पादरियों का बहुमत है, और इसलिए यह बुर्जुआ वर्ग कर्मकाण्डवाद से लेकर मुक्तिसेना तक अनेक प्रकार के पुनरुत्थानवाद को प्रश्रय(बढ़ावा) देने के लिए स्वयं पर अधिकाधिक कर लगाता है।” (एंगेल्स, मार्क्स-एंगेल्स, धर्म के बारे में, राहुल फाउण्डेशन, 2008, पृ 307-308)
डार्विन को पता था कि उनकी खोज समाजवादी-भौतिकवादी विचारों को वैज्ञानिक आधार देने वाली है और इस खोज के सामाजिक निहितार्थ के चलते ही उन्होंने अपने शोध को लगभग 20 साल तक प्रकाशित नहीं किया।1859 में जब वॉलेस डार्विन की खोज तक स्वतंत्र तौर पहुँचते है तब डार्विन ने भी ‘इतिहास की जड़ शक्ति’ के ख़िलाफ़ मोर्चा खोलने का साहस किया और ‘उद्विकास के सिद्धान्त’ को एक गोष्ठी में वॉलेस के साथ पेश किया। बीगल जहाज़ पर नौजवानी में सालों एकत्रित किये गये तथ्यों के आधार पर उद्विकास के सिद्धान्त का सामान्यीकरण करते हुए डार्विन ने सालों बाद अपने शोध को पेश किया और अपने अन्तरविरोधों को पार पा लिया। उनकी पृष्ठभूमि और विचारधारात्मक चिन्तन को पारकर वे एक वैज्ञानिक के तौर पर अपनी खोजों से उन नतीजों को पेश करते हैं जो खुद उनके सामाजिक वर्ग के आम विचारों के विरुद्ध जाते थे।
वैज्ञानिक सिद्धान्त के तौर पर यह कैसे हुआ यह हम अगले लेख में देखेंगे जब हम डार्विन की पुस्तक ‘प्रजातियों का उद्भव’ में पेश ‘जीवन के उद्विकास’ के सिद्धान्त पर चर्चा करेंगे।

मुक्तिकामी छात्रों-युवाओं का आह्वान, जुलाई-अगस्त 2025

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