मतदान के जनवादी अधिकार पर फ़ासीवादी हमले का नया दौर
अविनाश (इलाहाबाद)
मोदी सरकार और केन्द्रीय चुनाव आयोग (केंचुआ) का नापाक गठबन्धन हर दिन बेपर्दा होता जा रहा है। फ़ासीवादी ताक़तों के सत्ता में आने बाद से ही चुनाव आयोग की कार्यपद्धति पर सवाल उठने लगे थे। आज फ़ासीवादी मोदी सरकार और चुनाव आयोग ईवीएम, फ़र्ज़ी वोटरों, मतदाता सूची में बदलाव, वोट प्रतिशत में बदलाव, पुलिस की ज़ोर-ज़बरदस्ती से वोटिंग के दिन भाजपा-विरोधी मतदाता आबादी को चुनिन्दा तौर पर वोट न डालने देने, आदि हथकण्डों के ज़रिये चुनावों में पारदर्शिता और वोट डालकर अपना प्रतिनिधि चुनने के सबसे बुनियादी जनवादी अधिकार पर अन्धेरगर्दी भरी डाकाज़नी कर रहे हैं। 2019 के चुनावों के बाद से ही गोदी मीडिया और भाजपा के गोयबल्सी प्रचारतंत्र की लाख कोशिशों के बावजूद ईवीएम की अविश्वसनीयता देशव्यापी चर्चा का विषय बन गयी थी। चुनावों में धाँधली, वोट चोरी, नोट के बदले वोट और सांसदों-विधायकों की खुलेआम ख़रीद-फ़रोख्त अब आम नियम बन गया है। हालिया घटनाओं और नेता प्रतिपक्ष राहुल गाँधी द्वारा एक प्रेस वार्ता में चुनाव आयोग के आँकड़ों के आधार पर पेश किये गये विश्लेषण के बाद अब 2024 लोकसभा चुनाव और समूची चुनावी प्रक्रिया ही सन्देह के घेरे में आ चुकी है। राहुल गाँधी के खुलासे के बाद भाजपा नेता अनुराग ठाकुर और चुनाव आयोग द्वारा अलग-अलग प्रेस वार्ताओं में दिये गये जवाबों के बाद चुनावों में धाँधली का सन्देह न केवल मज़बूत हुआ है बल्कि धाँधली का मामला भी पुख़्ता होता जा रहा है। चुनाव आयोग तथ्यों पर जवाब देने की जगह लीपापोती करने में जुट गया है। अपने ही आँकड़ों पर राहुल गाँधी से शपथ लेने की बेतुकी माँग कर रहा है। चुनावों में अपारदर्शिता के इस गम्भीर मामले को साफ़ करने की जगह चुनाव आयोग और भाजपा द्वारा बिहार में वोट चोरी की एक नयी पटकथा लिखी जा रही है।
बिहार विधानसभा चुनावों के ऐन पहले फ़ासीवादी मोदी सरकार के इशारे पर चुनाव आयोग द्वारा राज्य में ‘विशेष गहन पुनरीक्षण’ (स्पेशल इण्टेन्सिव रिविज़न – एसआईआर) करवाया जा रहा है। एसआईआर के तहत चुनाव आयोग द्वारा भाजपा की शह पर सारे नियम-क़ानूनों की तिलांजलि देकर नागरिकता की जाँच करते हुए मतदाताओं की छँटनी की जा रही है। एसआईआर के लिए लोगों से ऐसे-ऐसे दस्तावेज़ माँगे गये हैं जो आम ग़रीब आबादी के लिये मुहैया करा पाना असम्भव है। इन दस्तावेज़ों पर टिप्पणी करते हुए एक जज ने कहा कि ये दस्तावेज़ तो ख़ुद उनके पास उपलब्ध नहीं हैं। दस्तावेज़ मुहैया न कर पाने की सूरत में अपने ही देश की एक बड़ी आबादी से मतदान का अधिकार छीनकर दूसरे दर्ज़े का नागरिक बनाने का षड्यंत्र रचा जा रहा है। बिहार में ‘स्पेशल इण्टेंसिव रीविज़न’ की प्रक्रिया में जारी पहली ही ड्राफ्ट सूची में 65 लाख से अधिक वोटरों के नाम काट दिये गये हैं और जिनके नाम बताने से चुनाव आयोग सुप्रीम कोर्ट में भी आनाकानी कर रहा है। इतना ही नहीं, चुनाव आयोग ने बिहार में दुनिया की सबसे उम्रदराज़ महिला को खोज निकला है, जिसकी उम्र 124 साल है। दरअसल पिछले लम्बे समय से राज्य में सत्तासीन नितीश-मोदी की डबल इंजन सरकार जनता में अपनी विश्वसनीयता खो चुकी है। राम मन्दिर, साम्प्रदायिकता, आपरेशन सिन्दूर के जरिये फैलाये गये अन्धराष्ट्रवाद उन्माद से भी जब दाल गलती हुई नहीं दिखाई दी तो चुनाव से पहले एसआईआर के ज़रिये मतदाता सूची में सुधार के नाम पर भाजपा जनता के वोट देने का जनवादी अधिकार छीन रही है और देश की मेहनतकश जनता से नागरिकता छीनने की कोशिश में लगी है। यह चोर दरवाज़े से एनआरसी लागू करने वाली प्रक्रिया है। यह प्रक्रिया देश के कई राज्यों में अंजाम दी जा रही है। दूसरी तरफ़ मतदाताओं को बड़ी संख्या में जोड़ा जा रहा है। महाराष्ट्र विधानसभा चुनावों के ठीक पहले 5 महीनों के भीतर एक करोड़ से ज़्यादा नये मतदाताओं के नाम जोड़े गये जो 2019-2024 के बीच 5 वर्षों में जोड़े गये कुल मतदाताओं की सख्या से भी कई गुना ज़्यादा है। घपलेबाज़ी की इन्तहाँ तो यह है कि महाराष्ट्र में मतदाताओं की संख्या कुल वयस्कों की संख्या से भी अधिक हो गयी है। ईवीएम में धाँधली से लेकर मतदाताओं के नाम काटने के तथ्यों को गोदी मीडिया चाहकर भी छिपा नहीं पा रही है। और अब फ़र्ज़ी वोटों को जोड़ने का यह घोटाला इस बात को सिद्ध करता है कि पूरी चुनावी प्रक्रिया को ही फ़ासीवादियों ने ‘हाईजैक’ कर लिया है। 2024 के लोकसभा चुनाव में ईवीएम मशीन के नग्न हेर-फ़ेर और मतगणना के दिन सरकारी मशीनरी का इस्तेमाल कर भाजपा 240 सीट हासिल कर सकी। राहुल गाँधी ने 2024 के चुनाव में फ़र्ज़ी वोटर घोटाले को उजागर कर भाजपा और चुनाव आयोग की इस मिलीभगत के पुख़्ता सबूत सामने रख दिये हैं।
राहुल गाँधी द्वारा वोट घोटाले के सम्बन्ध में पेश किये गये साक्ष्यों पर बात करने की जगह भाजपा और संघ परिवार एक बार फिर से हिन्दुत्ववादी/अन्धराष्ट्रवादी उन्माद फ़ैलाने की कोशिश में लगे हुए हैं। भाजपा और संघ परिवार वोट चोरी के इस खुलासे को विदेशी चाल और अराजकता फैलाने की साज़िश बता रही है। अपने प्रेस वार्ता में राहुल गाँधी ने चुनाव आयोग के ही आँकड़ों से ही बंगलुरु सेण्ट्रल की महादेवपुरा विधानसभा निर्वाचन क्षेत्र में एक लाख से अधिक वोटों के फ़र्ज़ीवाड़े का भण्डाफोड़ किया है।
| कुल मतदाता | 6.5 लाख |
| कुल फ़र्ज़ी मतदाता | 1,00,250 |
| फ़र्ज़ी व नकली पते (जैसे मकान नम्बर 0) | 40,009 |
| एक ही पते फ़र्ज़ी वोटर (जैसे एक ही पते पर 80 मतदाता) | 10,452 |
| डुप्लीकेट मतदाता (एक ही व्यक्ति का एक से अधिक बार नाम) | 11,965 |
| बिना फ़ोटो या अमान्य फ़ोटो वाले मतदाता | 4,132 |
| फॉर्म 6 का दुरुपयोग | 33,692 |
उपरोक्त आँकड़ों से स्पष्ट है कि महादेवपुरा विधानसभा सीट पर 6.5 लाख में से 15.42 फ़ीसदी फ़र्ज़ी वोट हैं। यही नहीं हज़ारों मतदाता ऐसे भी थे, जिन्होंने चार या उससे अधिक बूथ पर मतदान किया है! 18- 23 वर्ष के मतदाताओं का नाम मतदाता सूची में जोड़ने के लिए फॉर्म-6 का प्रयोग किया जाता है लेकिन महादेवपुरा विधानसभा में फ़ॉर्म-6 के जरिये जोड़े गए नये वोटरों की कुछ की उम्र 70 वर्ष, 80 वर्ष तक भी है। पहले से मतदाता सूची में शामिल मतदाताओं को फ़ॉर्म-6 के जरिए दुबारा जोड़ा गया है। ऐसे एक-दो मामले नहीं है बल्कि 33,692 मामले हैं। लोकसभा चुनाव 2024 में भाजपा बंगलुरु सेण्ट्रल के अन्तर्गत आने वाले 8 में सात विधानसभा क्षेत्र में से 7 पर चुनाव हारने के बाद केवल महादेवपुरा विधानसभा क्षेत्र में धाँधली के दम पर भाजपा चुनाव जीत पायी। इन तथ्यों के आधार पर राहुल गाँधी ने आरोप लगाया कि बंगलुरु सेण्ट्रल लोकसभा सीट के तहत आने वाले विधानसभा निर्वाचन मण्डल महादेवपुरा में भाजपा ‘वोटचोरी’ के चलते यह लोकसभा सीट जीत गयी। इन आँकड़ों से सहज ही समझा जा सकता है कि भाजपा और केंचुआ की मिलीभगत से देश में कितने बड़े पैमाने पर वोट चोरी को अंजाम दिया जा रहा है। राहुल गाँधी की प्रेस वार्ता के दौरान ही चुनाव आयोग कर्नाटक द्वारा नियमों का ग़लत हवाला देकर लालफीताशाही पर उतारू हो गया। चुनाव आयोग कर्नाटक ने आयोग के अनुच्छेद -20 का हवाला देकर राहुल गाँधी से शपथ लेने की माँग कर रहा है। आयोग के अनुच्छेद-20 के मुताबिक ड्राफ्ट मतदाता सूची पर सवाल खड़ा करने वाले व्यक्ति को सबसे पहले शपथ पत्र देना होता है। लेकिन राहुल गाँधी किसी ड्राफ्ट मतदाता सूची पर नहीं बल्कि 2024 के लोकसभा चुनाव में इस्तेमाल किये गये मतदाता सूची पर सवाल खड़ा कर रहे हैं। लेकिन चुनाव आयोग द्वारा अब तक यह स्पष्ट नहीं किया गया है कि राहुल गाँधी ग़लत हैं।
राहुल गाँधी की प्रेस वार्ता के जवाब में चुनाव आयोग द्वारा भी एक प्रेस वार्ता का आयोजन किया गया। प्रेस वार्ता को सम्बोधित कर रहे ज्ञानेश कुमार गुप्ता द्वारा पेश किये गये तर्कों से ऐसा प्रतीत हो रहा था कि वो चुनाव आयोग के प्रतिनिधि के तौर पर नहीं बल्कि भाजपा के प्रवक्ता के तौर पर प्रेस को सम्बोधित कर रहे हैं। राहुल गाँधी द्वारा उठाये गये किसी भी सवाल का ठोस जवाब देने की जगह ज्ञानेश महोदय ने ज्ञान की ऐसी गंगा बहायी कि लोगों का चुनाव आयोग से भरोसा ही उठ गया।
2024 लोकसभा चुनाव के दौरान यह देखने में आया कि शाम 5 बजे के बाद मतदान प्रतिशत में अचानक वृद्धि हो जाती थी। चुनाव के दौरान भी यह मुद्दा बनता रहा। विपक्ष इसे देखने के लिए चुनाव आयोग से सीसीटीवी फुटेज उपलब्ध कराने की माँग करता रहा है। इसके जवाब में चुनाव आयोग ने सबसे पहले यह कहा कि सीसीटीवी फुटेज को रखने की जगह न होने के कारण इसे 45 दिनों के भीतर ख़त्म कर दिया जायेगा। फिर चुनाव आयोग ने यह कहा कि सीसीटीवी फुटेज को खंगालने में 3600 सालों का वक्त लगेगा इसलिए यह विपक्ष को नहीं दिया जा सकता है। अब प्रेस वार्ता में ज्ञानेन्द्र कुमार ने कहा कि, “क्या अपनी माताओं, बहुओं, बेटियों सहित किसी भी मतदाता की सीसीटीवी वीडियो चुनाव आयोग को साझा करनी चाहिए क्या?” लेकिन यही चुनाव आयोग तब चुप था जब मतदान अधिकारी, पुलिस और भाजपा के एजेण्ट चुनावों में मुस्लिम महिलाओं का बुर्का उठाकर पहचान कर रहे थे। सच्चाई यह है कि आधार और डिजीलॉकर के नाम पर पूरे देश की बहन बेटियों समेत हर नागरिक का बॉयोमेट्रिक पहले ही लिया जा चुका और यहाँ तक कि इसे कई निजी कम्पनियों को मुनाफ़ा कमाने के लिए बेचने की रिपोर्ट भी आ चुकी है। तब सरकार और चुनाव आयोग इसको लेकर फ़िक्रमन्द नहीं था और चुनाव के डाटा की बात आने पर निजता को लेकर यह सक्रियता अपने आप में कई प्रकार के सवाल खड़ा कर रही है। इसी तरह मकान नम्बर शून्य के सवाल पर उनका जवाब था कि ये वो मतदाता हैं जो सड़कों पर, पुलों और लैम्पपोस्ट के नीचे सोते हैं। चुनाव आयोग ऐसे मतदाताओं के साथ खड़ा है!? चलिए गनीमत है कि ज्ञानेश जी ने यह नहीं कहा की जिनके पिता के नाम के आगे ‘fojgaidf” ये वो लोग हैं जिनके पिता नहीं हैं। मशीन रीडेबल वोटर लिस्ट देने के सवाल पर ज्ञानेश जी ने फिर से निजता की घुट्टी पिलाने की कोशिश की। पूरी प्रेस वार्ता ऐसे ही चुटकुलों से भरी पड़ी है।
इसी तरह राहुल गाँधी की प्रेस कान्फ्रेंस के जवाब में भाजपा नेता अनुराग ठाकुर ने 5 लोकसभा सीट पर घोटाले की बात कही। अनुराग ठाकुर द्वारा पेश किये गये आँकड़ों के मुताबिक़ वायनाड में 20,365 डुप्लीकेट मतदाता समेत 93,499 सन्दिग्ध मतदाता है। इसी तरह रायबरेली, कनौज, मैनपुरी और डायमण्ड हार्बर में क्रमशः 2 लाख 99 हज़ार, 2 लाख 91 हज़ार 798, 2 लाख 22 हज़ार 914 और 54 हज़ार 784 संदिग्ध मतदाता हैं। अनुराग ठाकुर ने तमिलनाडु कोलाथुर विधानसभा में 9,133 फ़र्ज़ी आवासीय पते समेत 19,476 सन्दिग्ध मतदाता होने की बात कही। अनुराग ठाकुर की इस प्रेस वार्ता के बाद यह सवाल उठने लगा कि ठाकुर को यह आँकड़े कहाँ से मिले? जिस चुनाव आयोग ने निजता के नाम पर विपक्ष को मतदाता सूची की सॉफ्ट कॉपी या मशीन रीडेबल कॉपी देने से मना कर दिया था, क्या उसने अनुराग ठाकुर के साथ इसे साझा किया है? इसके बाद देश के विभिन्न हिस्सों से चुनाव आयोग द्वारा हलफ़नामा पेश करने की माँग उठने लगी है। राहुल गाँधी के जवाब में अनुराग ठाकुर द्वारा पेश किये गये आँकड़े अपने आप में चुनाव आयोग और समूची चुनावी प्रक्रिया पर सवालिया निशान खड़े करते हैं। गोदी मीडिया और चुनाव आयोग अपनी निष्पक्षता का शोर मचा रहा है। लेकिन निष्पक्षता की स्थिति को इस तथ्य से समझा जा सकता है कि अलग-अलग प्रेस कान्फ्रेंस में वोट चोरी का सवाल राहुल गाँधी और अनुराग ठाकुर दोनों ने उठाया है लेकिन हलफ़नामा देने की हास्यास्पद माँग केवल राहुल गाँधी से की जा रही है, अनुराग ठाकुर से नहीं! इस रूप में फ़र्ज़ी वोट घोटाले की हालिया घटना में तो भाजपा और चुनाव आयोग मिलीभगत रंगे हाथ पकड़ी गयी है।
भाजपा, संघ परिवार व पालतू मीडिया भी लगातार मुद्दे को भटकाने और डैमेज कण्ट्रोल करने में लगी हुई है। सबसे पहले भाजपा द्वारा विपक्ष को ही वोट चोर साबित करने की कोशिश की गई जो दाँव के लिए उल्टा पड़ गया। बाद में महाराष्ट्र चुनावों में धाँधली और वोट हेराफेरी का खुलासा करने वाले सीएसडीएस संस्था के संजय कुमार के माफ़ी माँगने के बाद भाजपा और और मीडिया लगातार यह भ्रम फैलाने की कोशिश कर रही हैं कि राहुल गाँधी का आरोप निराधार है और राहुल गाँधी को भी सार्वजानिक तौर पर माफ़ी माँगनी चाहिए। लेकिन वास्तविकता कुछ और ही है। संजय कुमार ने अपने विश्लेषण में महाराष्ट्र का आँकड़ा पेश किया था और राहुल गाँधी ने कर्नाटक के महादेवपुरा विधान सभा क्षेत्र का आँकड़ा पेश किया था। लेकिन भाजपा और गोदी मीडिया इस सच्चाई को गोल कर रहे हैं। जब यह चाल भी कामयाब नहीं हुई तो गृहमंत्री अमित शाह द्वारा आनन-फ़ानन में तीन बिल पेश किये गये हैं। इसमें एक महत्वपूर्ण बिल 130वाँ संविधान संशोधन विधेयक है। यह बिल विपक्ष को पूरी तरह पंगु बना देगा। स्थानाभाव के कारण इस बिल पर विस्तार से बात करना सम्भव नहीं है और इसकी ज़रूरत भी नहीं है। वास्तविकता यह हैं कि मोदी-शाह की फ़ासीवादी जोड़ी को भी यह मालूम है कि संविधान संशोधन के लिए ज़रूरी संख्या बल (361 सांसद) भी भाजपा नीत एनडीए गठबन्धन के पास के पास नहीं है लेकिन इस बिल के बाद भाजपा, संघ परिवार और गोदी मीडिया विपक्ष को आड़े हाथ लेने का भ्रम फैलाते हुए वोट चोरी के मुद्दे को भटकाने में लगी है। गोदी मीडिया द्वारा पूरे विपक्ष को भ्रष्टाचारी और भाजपा को साफ़-सुथरा और सदाचारी घोषित करने का नरेटिव गढ़ा जा रहा है।
कुल मिलाकर केन्द्रीय चुनाव आयोग (केचुआ) और भाजपा के हथकण्डों और गोदी मीडिया के झूठे प्रचार के बावजूद भी जनता का बड़ा हिस्सा समूची चुनावी प्रक्रिया पर सन्देह कर रहा है। लम्बे समय से ईवीएम हटाने की माँग को भाजपा, चुनाव आयोग और उच्चतम न्यायालय हठधर्मिता के साथ बार-बार नकारते रहे हैं और मतदाताओं को मिलने वाली रसीद के साथ सौ प्रतिशत वीवीपैट वेरीफ़िकेशन की माँग को भी नज़रन्दाज़ करते रहे हैं। कुल मिलकर इन सभी बातों से चुनावी प्रक्रिया में व्यापक धाँधली पर जनता का शक़ पुख़्ता हो रहा है। मोदी सरकार व चुनाव आयोग के रवैये से साफ़ है कि दाल में कुछ काला नहीं है बल्कि पूरी दाल ही काली है।
कहने की ज़रूरत नहीं है इसके पहले भी बैलेट बॉक्स में स्याही डाल देने, चुनी हुई सरकारों को अपदस्थ कर देने आदि रूपों में इस तरह की घटनाएँ होती रही हैं। लेकिन मौजूद फ़ासीवादी दौर में वोट चोरी, चुनावों में धाँधली कोई अपवाद नहीं बल्कि नियम बन चुका है। 21वीं सदी के फ़ासीवाद की एक महत्वपूर्ण चारित्रिक अभिलाक्षणिकता यह है कि यह 20वीं सदी के फ़ासीवाद के भाँति सभी जनवादी संस्थाओं, लोकतान्त्रिक प्रक्रियाओं मसलन चुनाव आदि को निरस्त नहीं करता है बल्कि इन संस्थाओं-प्रक्रियाओं का व्यवस्थित फ़ासीवादीकरण करता है और इन संस्थाओं और प्रक्रियाओं पर आन्तरिक क़ब्ज़ा करके इनके जनवादी अन्तर्य को नष्ट कर देता है। नौकरशाही, न्यायपालिका, सेना, पुलिस, चुनाव आयोग, प्रवर्तन निदेशालय, सीबीआई आदि पर आरएसएस और भाजपा ने आन्तरिक क़ब्ज़ा कर लिया है। इनका इस्तेमाल कर भाजपा वह सब कर पाने में सक्षम है जो वह करना चाहती है। शिक्षा व्यवस्था, कला, संस्कृति, सिनेमा आदि के ज़रिये फ़ासीवादी विचारों को जनता में पैठाया जा रहा है। टेलीविजन फ़ासीवादियों के लिए नॉन-स्टॉप प्रोपेगेण्डा मशीन बन गयी है। सरकार से बाहर होने के बावजूद राज्यसत्ता और समाज में फ़ासीवाद ने पिछले सात और विशेष तौर पर चार दशकों में इस क़दर आन्तरिक पकड़ बनायी है कि सरकार से बाहर जाने की सूरत में भी राज्यसत्ता व समाज दोनों में फ़ासीवाद की यह पकड़ बनी रहेगी और दीर्घकालिक संकट के समूचे दौर में वे बार-बार सरकार में भी आम तौर पर पहले से ज़्यादा आक्रामकता के साथ वापसी करेंगे। सामान्य रूप में आज फ़ासीवादी ताक़तें पूँजीवादी लोकतंत्र के खोल का परित्याग नहीं करेंगी क्योंकि उन्हें इसकी कोई ज़रूरत नहीं है और ख़ुद उन्होंने भी बीसवीं सदी के फ़ासीवादी प्रयोगों से सबक़ लिए हैं।
पूँजीवादी लोकतंत्र की संस्थाओं, प्रक्रियाओं आदि में एक लम्बी प्रक्रिया में आन्तरिक घुसपैठ के ज़रिये और राज्यसत्ता की समूची मशीनरी का ‘टेक-ओवर’ करके चुनावी प्रक्रिया में किसी भी प्रकार के फ़र्ज़ीवाड़े को अंजाम देना फ़ासीवादी भाजपा और संघ परिवार के लिए काफ़ी आसान हो भी गया है। बूथ स्तर पर पन्ना प्रमुख बीएलओ के साथ मिलकर बाकायदा भाजपा और संघ विरोधी मतदाताओं को चिन्हित कर मतदाता सूची से बाहर करवा सकता है। गाँव-गाँव मे जिस तरह से संघ और भाजपा ने अपने कार्यकर्ताओं का पूरा जाल बिछाया है, उसके बरक्स इन चुनावी दलों के पास इतना प्रतिबद्ध काडर ही नहीं है जो यह काम करवा सके और इस धाँधली के ख़िलाफ़ बोल सके। वास्तव में भाजपा वोट चोरी को इतने बड़े पैमाने पर अंजाम दे रही हैं कि अन्य सभी बुर्जुआ और तथाकथित वामपन्थी चुनावबाज़ पार्टियों के लिए भी अस्तित्व का संकट पैदा हो गया है। यही वजह है कि राहुल गाँधी से लेकर अखिलेश, तेजस्वी, ममता, स्टालिन, दीपांकर भट्टाचार्य आदि सभी बुर्जुआ चुनावबाज़ नेता भी वोट चोरी के मुद्दे पर मुखर है और सड़कों पर उतरने के लिए मजबूर हैं। पिछले 11 सालों के फ़ासीवादी शासन में बढ़ती महँगाई, बेरोज़गारी, भ्रष्टाचार, नफ़रत से त्रस्त जनता का एक हिस्सा सड़कों पर उतर भी रहा है। बिहार जैसे चुनावी राज्यों में वोटर अधिकार यात्रा जैसे आयोजन निश्चित तौर पर इस मुद्दे को तूल देने में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है लेकिन दूसरी तरफ सच्चाई यह भी है कि इन रैलियों और यात्रा में जो भीड़ इकठ्ठा हो रही है या ट्रकों पर लाद कर लायी जा रही है वह सड़कों पर जुझारू तरीके से संघर्ष संगठित नहीं कर सकती है। आज के चुनावबाज़ पार्टियों के पास न तो इतनी नैतिक शक्ति है और न ही ज़मीनी कार्यकर्ता जो फ़ासिस्टों के इस कुकर्म के ख़िलाफ़ सड़कों पर उतर सकें, लाठी खाने और जेल जाने के लिए तैयार हों, जैसा कि 1960 के दशक के उत्तरार्द्ध और 1970 के दशक के पूर्वार्द्ध में जनवादी अधिकारों पर होने वाले हर हमले और जनता के मुद्दों को लेकर लोहियावादी और समाजवादी तक किया करते थे।
चुनावों में भ्रष्टाचार और धाँधली के ख़िलाफ़ जो जनाक्रोश सड़कों पर फूट रहा है, इसके कुछ सम्भावित नतीजे हो सकते हैं। सबसे पहला, यह कि फ़ासीवादी भाजपा राज्य मशीनरी और अपने बगलबच्चा गुण्डा संगठनों के जरिये इस जनाक्रोश का बर्बर दमन करे। लेकिन इस प्रकार के दमन से तात्कालिक तौर पर जनता को शान्त कराया जा सकता है परन्तु इससे जनता का ग़ुस्सा और व्यापक और गहरा होता जायेगा जो अन्ततः फ़ासिस्टों के लिए नुक़सानदेह होगा। दूसरा, यह कि इस जनाक्रोश पर फ़ासिस्ट प्रतिक्रिया देने की जगह अपना काम करते रहें। किसी दंगे के सहारे, साम्प्रदायिकता फैलाकर या फिर अन्धराष्ट्रवादी उन्माद फैलाकर जनता के एक बड़े हिस्से में भ्रम की स्थिति पैदा कर दें, जिसकी सम्भावना ज़्यादा दिख रही है। इस परिस्थिति में फ़ासिस्ट नक़ली मुद्दों को उछाल कर वापस सत्ता में आ सकते हैं और इस रूप में फ़ासीवादी दमन का चक्र और भी गहरा जायेगा। तीसरे, यह हो सकता है कि जनता के भारी असन्तोष के कारण फ़ासीवादी शक्तियाँ चुनाव में पराजित होकर सत्ता से बाहर हो जायें। हमें यह समझना होगा कि दीर्घकालिक पूँजीवादी संकट के इस दौर में फ़ासीवाद आम तौर पर पूँजीपति वर्ग की ज़रूरत है। यदि फ़ासीवादी शक्तियों की चुनावी हार हो भी जाती है और सत्ता किसी उदार बुर्जुआ, सेण्ट्रिस्ट, या सेण्टर-राइट बुर्जुआ पार्टियों के हाथ में आ भी जाती है तब भी उसे फ़ासीवादी शक्तियों पर कोई निर्णायक क़दम उठाने की इज़ाज़त पूँजीपति वर्ग नहीं देगा। नवउदारवादी दीर्घकालिक आर्थिक संकट के इस दौर में जो भी सरकार आयेगी उसका चारित्र निरंकुश दमनकारी ही होगा। राहुल गाँधी, कांग्रेस और इण्डिया गठबन्धन के तमाम दल पूँजीपति वर्ग के ही किसी न किसी हिस्से की नुमाइन्दगी करते हैं। जिन राज्यों में विपक्षी दलों की सरकारें हैं वहाँ भी जनता के बुनियादी अधिकारों यानी शिक्षा, रोज़गार, आवास, चिकित्सा आदि में जनविरोधी नीतियाँ यानी पूँजीपरस्त नीतियाँ ही लागू हो रही हैं। निश्चित ही ये सरकारें कुछ दिखावटी कल्याणकारी नीतियों लागू करती हैं और उनके शासन में अल्पसंख्यकों व उत्पीड़ित जनसमुदायों का नग्न बर्बर दमन भी सापेक्षिक तौर पर कम है। लेकिन पूँजीवाद की निहित आन्तरिक गति से बेरोज़गारी, महँगाई आदि बढ़ेगी और इस प्रक्रिया में जनता का असन्तोष भी बढ़ेगा। पिछले 100 सालों में, और विशेष रूप से 21वीं सदी में फ़ासीवाद ने समाज में आण्विक व्याप्ति बना ली है। इसलिए प्रत्यक्ष राजनीतिक सत्ता में ना होने के बावजूद राज्य मशीनरी पर इनका क़ब्ज़ा बना रहेगा, समाज में विभिन्न संगठनों के माध्यम से ये अपना काम करते रहेंगे। क्रान्तिकारी शक्तियों की अनुपस्थिति में जनता के बढ़ते असन्तोष का फ़ायदा फ़िर से फ़ासीवादी शक्तियों द्वारा उठाने की सम्भावना बनी रहेगी, जिसके परिणामस्वरूप पहले से ज़्यादा निरंकुश और दमनकारी रूप में फ़ासीवादी शक्तियों की सत्ता में वापसी का रास्ता खुल जायेगा।
विपक्षी दलों और विशेष कर राहुल गाँधी उठाये जा रहे सवाल बिल्कुल वाजिब हैं। फ़ासीवादी शासन के दौरान यह पहला मौका है जब विपक्ष इतने बड़े पैमाने पर सत्ता पर हमलावर हुआ है और भाजपा को बैकफुट पर धकेलने में एक हद तक कामयाब भी हुआ है। निश्चित तौर पर इसका नुकसान फ़ासिस्टों को होने वाला है और आगामी चुनावों में इसका फायदा विपक्षी गठबन्धन को भी मिलेगा। लेकिन एक बात हम फिर से स्पष्ट करना चाहते हैं कि चुनावी हार के जरिये सत्ता से बेदखली फ़ासीवादी शक्तियों की निर्णायक हार नहीं होने वाली है। दरअसल फ़ासीवाद को चुनावों के रास्ते हराया ही नहीं जा सकता है। फ़ासीवाद उभरते और उजड़ते टूटपूँजियावर्ग का तृणमूल स्तर का एक धुर प्रतिक्रियावादी सामाजिक आन्दोलन होता है जो एक प्रतिक्रियावादी कल्पित अतीत के विचारधारात्मक आधार पर खड़ा होता है और एक नक़ली और काल्पनिक दुश्मन का निर्माण करता है। फ़ासीवादी आन्दोलन एक काडर आधारित फ़ासीवादी संगठन द्वारा संचालित होता है और अपने अन्तिम विश्लेषण में पूँजीपति वर्ग और विशेष रूप से बड़े पूँजीपति वर्ग की सेवा करता है। इसलिए फ़ासीवाद को निर्णायक तौर पर सर्वहारा वर्ग के नेतृत्व में काडर आधारित संगठन द्वारा संचालित तृणमूल स्तर के प्रगतिशील सामाजिक आन्दोलन के जरिये ही हराया जा सकता है। फ़ासीवाद की निर्णायक पराजय आज के दौर मे एक नयी समाजवादी क्रान्ति के साथ ही सम्भव है।
भाजपा और चुनाव आयोग द्वारा की जा रही ‘वोटचोरी’ के ख़िलाफ़ और जनता के जनवादी अधिकार की रक्षा के लिए राहुल गाँधी और तमाम विपक्षी दल जो सीमित संघर्ष कर रहे हैं, उसका समर्थन करते हुए भी इस मसले को पूरी तरह इन पूँजीवादी चुनावबाज़ पार्टियों के हाथों में नहीं छोड़ा जा सकता है। सबसे बुनियादी जनवादी अधिकार पर हो रहे फ़ासीवादी हमले के ख़िलाफ़ आज क्रान्तिकारी शक्तियों को व्यापक तौर पर जनता को संगठित करना होगा। यही हमारे सामने एकमात्र विकल्प है। •
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