ऊपर के कमरे सब अपने लिए बन्द हैं
(‘चाँद का मुँह टेढ़ा है’ कविता का एक अंश, मुक्तिबोध के जन्मदिवस के अवसर पर)

मुक्तिबोध

पेण्टर ने हँसकर कहा–

पोस्टर लगे हैं,

कि ठीक जगह

तड़के ही मज़दूर

पढ़ेंगे घूर-घूर,

रास्ते में खड़े-खड़े लोग-बाग

पढ़ेंगे ज़िन्दगी की

झल्लायी हुई आग !

प्यारे भाई कारीगर,

अगर खींच सकूँ मैं–

हड़ताली पोस्टर पढ़ते हुए

लोगों के रेखा-चित्र,

बड़ा मज़ा आयेगा ।

कत्थई खपरैलों से उठते हुए धुएँ

रंगों में

आसमानी सियाही मिलायी जाय,

सुबह की किरनों के रंगों में

रात के गृह-दीप-प्रकाश की आशाएँ घोलकर

हिम्मतें लायी जायँ,

स्याहियों से आँखें बने

आँखों की पुतली में धधक की लाल-लाल

पाँख बने,

एकाग्र ध्यान-भरी

आँखों की किरनें

पोस्टरों पर गिरे–तब

कहो भाई कैसा हो ?

कारीगर ने साथी के कन्धे पर हाथ रख

कहा तब–

मेरे भी करतब सुनो तुम,

धुएँ से कजलाये

कोठे की भीत पर

बाँस की तीली की लेखनी से लिखी थी

राम-कथा व्यथा की

कि आज भी जो सत्य है

लेकिन, भाई, कहाँ अब वक़्त है !!

तसवीरें बनाने की

इच्छा अभी बाक़ी है–

ज़िन्दगी भूरी ही नहीं, वह ख़ाकी है ।

ज़माने ने नगर के कन्धे पर हाथ रख

कह दिया साफ़-साफ़

पैरों के नखों से या डण्डे की नोक से

धरती की धूल में भी रेखाएँ खींचकर

तसवीरें बनाती हैं

बशर्ते कि ज़िन्दगी के चित्र-सी

बनाने का चाव हो

श्रद्धा हो, भाव हो ।

कारीगर ने हँसकर

बगल में खींचकर पेण्टर से कहा, भाई

चित्र बनाते वक़्त

सब स्वार्थ त्यागे जायँ,

अंधेरे से भरे हुए

ज़ीने की सीढ़ियाँ चढ़ती-उतरती जो

अभिलाषा–अन्ध है

ऊपर के कमरे सब अपने लिए बन्द हैं

अपने लिए नहीं वे !!

मुक्तिकामी छात्रों-युवाओं का आह्वान,जुलाई-दिसम्बर 2018