विदा कॉमरेड मीनाक्षी!
लाल सलाम!

हमारी वरिष्ठतम कामरेड मीनाक्षी 21 अप्रैल की सुबह हमारे बीच नहीं रहीं।
कोविड की महामारी और इस हत्यारी सरकार की आपराधिक लापरवाही ने उन्हें हमसे छीन लिया। हम जीवनरक्षक दवाओं और प्लाज़्मा डोनर के लिए तीन दिनों तक ज़मीन-आसमान एक करते रहे, ऑक्सीजन और अस्पताल में बेड के लिए दौड़ते रहे। जब कुछ सफलता मिली, तभी कई दिनों की जद्दोजहद से थकी हुई साँसों ने का. मीनाक्षी का साथ छोड़ दिया। कोविड की महामारी जो क़हर बरपा कर रही है, उसे इस हत्यारी व्यवस्था ने सौ गुना बढ़ा दिया है। हम इस फ़ासिस्ट सत्ता के ऐतिहासिक अपराध को कभी नहीं भूलेंगे, कभी नहीं माफ़ करेंगे।
कई निकटवर्ती और दूर के शहरों से ऑक्सीजन और जीवनरक्षक दवाएँ जुटाने के लिए साथी दिन-रात एक किये रहे और क़ीमती समय हाथ से फिसलता चला गया। कठिन मेहनत से काला बाज़ार से हासिल ऑक्सीजन और दवाएँ काम न आ सकीं और का. मीनाक्षी का बहुमूल्य जीवन हम बचा नहीं सके। का. मीनाक्षी सिर्फ़ कोविड का ही शिकार नहीं हुईं, बल्कि उससे भी अधिक इस हत्यारी बर्बर बुर्जुआ व्यवस्था का शिकार हुईं, जिसने आज पूरे देश को एक मृत्यु उपत्यका में बदल डाला है। यह बात हम कभी नहीं भूलेंगे!
21 अप्रैल की शाम को का. मीनाक्षी के शरीर को लाल झण्डे में लपेटकर कई शहरों से आये कॉमरेडों के लाल सलाम के नारों के साथ अन्तिम विदाई दी गयी।

 

 

 

22 अप्रैल को अनुराग पुस्तकालय में का. मीनाक्षी की स्मृति सभा में उपस्थित कामरेडों ने अपनी वरिष्ठतम कामरेड के व्यक्तित्व और जीवन के विविध पक्षों और रंगों को भावविह्वल होकर याद किया, उनके साथ बिताये गये अपने दिनों की चर्चा की और यह संकल्प लिया कि वे शोक को शक्ति में बदलकर आजीवन मज़दूर क्रान्ति और मानव-मुक्ति की उस परियोजना को मूर्त रूप देने में जुटे रहेंगे जिसमें का. मीनाक्षी ने अपना पूरा जीवन लगा दिया।

का. मीनाक्षी से गहन भावनात्मक स्तर पर जुड़े सैकड़ों कार्यकर्ता और हमदर्द साथी गोरखपुर, बनारस, लखनऊ, दिल्ली, इलाहाबाद, कानपुर आदि शहरों में बिखरे हुए हैं। देश के विभिन्न हिस्सों के जो साथी उनसे विविध आयोजनों में मिले थे, वे भी उनके निश्छल, सरल, पारदर्शी व्यक्तित्व और बेहद जनवादी मृदुल व्यवहार के कारण बहुत निकटता महसूस करते थे। लेकिन कोविड दुष्काल में स्मृति सभा में उनका आ पाना किसी भी तरह से सम्भव नहीं था। हालात देखकर लखनऊ के मित्रों-शुभचिंतकों को भी या तो सूचना नहीं दी गयी, या आग्रहपूर्वक आने से रोक दिया गया। फिर भी शहर के सभी सहकर्मी कामरेडों के साथ गोरखपुर, इलाहाबाद, पटना, दिल्ली, हरियाणा और पंजाब के कई साथी स्मृति सभा में शामिल हुए, जिनमें का. मीनाक्षी के दशकों के राजनीतिक जीवन के सहयात्री वरिष्ठ साथियों से लेकर वे युवा साथी भी शामिल थे जिन्होंने विभिन्न मोर्चों पर उनके साथ काम किया था और राजनीतिक शिक्षा-दीक्षा ली थी। इनके साथ ही कुछ वे साथी भी उपस्थित थे जिनका बचपन गोरखपुर में मीनाक्षी के निर्देशन में संचालित बाल कम्यून में बीता था। सभा में सभी वक्ताओं ने अपनी दिवंगत कामरेड के साथ बिताये गये दिनों को याद किया।
का. मीनाक्षी 1980 में ही एक हमदर्द के रूप में क्रान्तिकारी वाम आन्दोलन से जुड़ चुकी थीं। इस भूमिका को और प्रभावी बनाने के लिए ओ.एन.जी.सी के अधिकारी पद की नौकरी ठुकरा कर उन्होंने दो वर्ष तक मुम्बई हाई कोर्ट में प्रैक्टिस की, और फिर पूरा समय राजनीतिक कामों में देने के फ़ैसले के साथ गोरखपुर लौट आयीं। 1985-86 से एक पूरावक्ती संगठनकर्ता के रूप में उनके जीवन की नयी शुरुआत हुई। इन छत्तीस वर्षों के दौरान उन्होंने गोरखपुर, कानपुर, बनारस, लखनऊ और दिल्ली में छात्रों-युवाओं के बीच, स्त्री मज़दूरों के बीच, आम मेहनतकश आबादी के बीच और बुद्धिजीवियों के बीच काम किया, कामरेडों के परिवारों के बच्चों को लेकर एक बाल कम्यून चलाने का मौलिक और सफल प्रयोग किया तथा शुरुआत से ही ‘जनचेतना’ पुस्तक प्रतिष्ठान के साथ ही हम लोगों के प्रकाशन प्रभाग के एक स्तम्भ की भूमिका निभायी। राहुल फ़ाउण्डेशन की कार्यकारिणी की वह संस्थापक सदस्य थीं। इस समय वह ‘अरविन्द स्मृति न्यास’ की अध्यक्ष की ज़िम्मेदारी सम्हालने के साथ ही ‘कोंपल’ बाल पत्रिका और ‘अनुराग ट्रस्ट’ के बाल साहित्य के सम्पादन और प्रकाशन का काम भी देख रही थीं।

 

वे एक कुशल लेखक और अनुवादक भी थीं। ‘दायित्वबोध, ‘आह्वान’, ‘मज़दूर बिगुल’, ‘रविवार’, ‘जनसत्ता’, ‘समयान्तर’ आदि में उनके अनेक लेख और अनुवाद प्रकाशित हुए थे। उन्होंने मैरी वोल्सटनक्राफ़्ट की प्रसिद्ध कृति ‘स्त्री अधिकारों का औचित्य-साधन’ का भी अनुवाद किया था जो राजकमल प्रका‍शन की विश्व क्लासिक्स श्रृंखला में प्रकाशित हुआ।
का. मीनाक्षी बच्चों के मोर्चे पर और क्रान्ति के युवा उत्तराधिकारियों की तैयारी पर बहुत अधिक बल देती थीं और आश्चर्य नहीं कि उनके सानिध्य में शिक्षित-प्रशिक्षित युवा क्रान्तिकारी कार्यकर्ताओं की एक पूरी क़तार आज हमारे साथ है जो उनके सपनों को पूरा करने के लिए आजीवन संघर्षरत रहने को संकल्पबद्ध है। देश के विभिन्न हिस्सों में ऐसे ढेर सारे मेहनतकश और बुद्धिजीवी साथी हैं जो का. मीनाक्षी के ओजस्वी, सरल, निश्छल, पारदर्शी, प्रेरक व्यक्तित्व और मृदुल जनवादी व्यवहार को कभी नहीं भूल सकते।
लगभग एक दशक से कुछ अधिक समय के भीतर हमने का. अरविन्द, शालिनी और नितिन जैसे साथियों के बाद का. मीनाक्षी को भी खो दिया। का. मीनाक्षी, का. अरविन्द की जीवन साथी भी थीं और सही मायने में दोनों एक-दूसरे के लिए बने थे। इत्तेफ़ाक़ यह भी है कि का. शालिनी ने भी लम्बे समय तक जनचेतना और प्रकाशन के मोर्चे पर अपनी प्रिय मीनाक्षी दी के साथ काम किया था। आज, इस कठिन अन्धकारमय समय में ये अप्रतिम साथी हमारे साथ नहीं हैं, लेकिन उनका जीवन हमारी प्रेरणा है और उनकी स्मृतियाँ हमारी शक्ति हैं।
का. मीनाक्षी के सपनों, विचारों और संघर्षों के सच्चे उत्तराधिकारी अभी भी मैदान में डटे हुए हैं और आगे भी डटे रहेंगे। माना कि इतिहास आज एक अन्धी सुरंग से गुज़र रहा है। लेकिन रोशनी की घाटी की ओर यात्रा जारी रहेगी। हमारा कारवाँ चलता रहेगा, बढ़ता रहेगा!
विदा कामरेड मीनाक्षी! आप हमारे संकल्पों में हमेशा जीवित रहेंगी! लाल सलाम! लाल सलाम!!
– अरविन्द स्मृति न्यास, राहुल फ़ाउण्डेशन, अनुराग ट्रस्ट और जनचेतना के साथी।
– नौजवान भारत सभा, दिशा छात्र संगठन, बिगुल मज़दूर दस्ता, स्त्री मुक्ति लीग, स्त्री मज़दूर संगठन और विभिन्न मज़दूर संगठनों, यूनियनों तथा बौद्धिक मंचों के साथी।

मुक्तिकामी छात्रों-युवाओं का आह्वान, मार्च-जून 2021

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