फ़िलिस्तीन की जनता के बहादुराना संघर्ष ने एक बार फिर ज़ायनवादियों को धूल चटाई और पीछे हटने को मजबूर किया!

लता

फ़िलिस्तीन जीवन, मुक्ति के सपनों, संघर्ष, और सृजन का दूसरा नाम है!
फ़िलिस्तीन जिजीविषा और युयुत्सा का पर्याय है!
फ़िलिस्तीन असह्य दुखों के लम्बे सिलसिले की, दुर्द्धर्ष मुक्ति संघर्ष की और उद्दाम आशावाद की एक महाकाव्यात्मक गाथा है!
हर स्वप्नदर्शी, मुक्तिकामी मनुष्य के भीतर धड़कता रहता है एक फ़िलिस्तीन!
अँधेरे समय में क्षितिज पर जलती एक मशाल!
-कविता कृष्णपल्लवी

इस वर्ष 10 मई से 21 मई तक 11 दिनों तक इज़रायल ने गाज़ा पर एक बार फिर भयंकर बमबारी की। बड़े अपार्टमेण्ट विशेषकर रिहायशी मकानों को लक्षित करते हुए बमबारी की गयी ताकि अधिक से अधिक लोगों की जानें जायें। छोटे-छोटे मासूम बच्चे इस हमले में मारे गये, कई घायल हुए। कितने ही बच्चे हर साल भय, आतंक के माहौल में अपनी मानसिक शान्ति खो बैठते हैं। इस बार गाज़ा और पश्चिम तट (वेस्ट बैंक) पर हमलों में लगभग 238 लोग केवल ग़ाजा में मारे गये। यदि इसमें वेस्ट बैंक(पश्चिमी तट) में मरे लोगों की संख्या जोड़ दी जाये तो यह संख्या काफी बढ़ जाएगी। गाज़ा में मरे लोगों में 65 बच्चे , 39 औरतें और 17 बुज़ुर्ग हैं। यह नरसंहार हर एक-दो साल में ज़ायनवादी इज़रायल करता है। ऐसे हमले ज़ायनवाद की नस्ली सफ़ाये पर आधारित घोर मानवद्रोही विषैली विचारधारा को बेनक़ाब करते हैं, साथ ही यह पूरे बुर्ज़ुआ समाज की खोखली मानवता की धज्जियाँ उड़ाते है।
इज़रायल तो फ़िलिस्तीनी लोगों के नरसंहार की अपनी मुहिम को जारी रखना चाहता था लेकिन हमेशा की तरह फ़िलिस्तीनियों के ज़बरदस्त बहादुराना संघर्ष और उनके समर्थन में पूरी दुनिया में सड़कों पर उमड़े जन सैलाब ने, और मुख्यत: इसी के कारण अमेरिका के दबाव ने इज़रायल को पीछे हटने पर मजबूर कर दिया। हमास की ओर से दागे रॉकेटों से इज़रायल में 12 लोग मारे गये। युद्धविराम की घोषणा होते ही संयुक्त राष्ट्र ने गाज़ा के लिए फण्ड इकट्ठा करने की घोषणा कर दी। हर बमबारी के बाद पूरी तत्परता से चन्दा जुटाने का साम्राज्यवादी लुटेरों के नियन्त्रण में काम करने वाली इस संस्था का मानवतावाद का ड्रामा होता ही है, सिवाय इसके किसी मानवीय समाधान के! जबकि संघर्ष विराम के बाद भी इज़रायल लगातार उकसावे की कार्यवाइयाँ करता रहा है। संघर्ष विराम घोषित होने के कुछ ही घण्टों के बाद इज़रायली सैनिकों ने यरुशलम में ऐतिहासिक अल अक्सा मस्ज़िद के परिसर में घुसकर स्टन ग्रेनेड और गोलियाँ दागीं जिससे 20 लोग घायल हो गये। पास के अल जर्राह इलाक़े में भी प्रदर्शनकारियों पर गोलियाँ चलायी गयीं। सैकड़ों फ़िलिस्तीनियों को गिरफ़्तार भी किया गया है।
आज यह समझना बहुत ज़रूरी है कि इंसाफ़ और आज़ादी के लिए फ़िलिस्तीन का संघर्ष अकेले उनका संघर्ष नहीं है। यह पूरी दुनिया में नस्लवाद और साम्राज्यवादी दबंगई के विरुद्ध शानदार लड़ाई का एक प्रतीक है। पूरी दुनिया का इंसाफ़पसन्द अवाम उनके पक्ष में बार-बार लाखों की तादाद में सड़कों पर उतरता रहा है। साम्राज्यवादी ताकतों के अलावा भारत के संघी फ़ासिस्टों का झूठा और जहरीला प्रचार फ़िलिस्तीन के संघर्ष की बहुत ही उल्टी तस्वीर पेश करता है। जनता के इस ऐतिहासिक संघर्ष को आतंकवाद का रूप दे देता है। एक बड़ी आबादी फ़िलिस्तीन के संघर्ष को या तो जानती नहीं या फिर साम्राज्यवादी और संघियों के जहरीले प्रचार को जानती है। इसलिए फ़िलिस्तीन के संघर्ष की सच्चाई को ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य में समझने की ज़रूरत है।
इतिहास में थोड़ा पीछे जा कर आधुनिक साम्राज्यवाद के लिए मध्यपूर्व के महत्व को समझते हुए हम फ़िलिस्तीन की इस त्रासदी को बेहतर समझ पायेंगे। यह कहा जा सकता है कि इतिहास के एक मोड़ बिन्दु पर फ़िलिस्तीन ने बदलती विश्व परिस्थितियों में साम्राज्यवादी क़ब्ज़े, लूट, बँटवारे और नियन्त्रण की नई भू-राजनीतिक उलट-फेर में अपने आप को ग़लत जगह पर पाया। कोयले की जगह ईंधन के तौर पर पेट्रोल के इस्तेेमाल और भारत तक का सीधा रास्ता होने की वजह से फ़िलिस्तीन और पूरा का पूरा मध्यपूर्व आधुनिक साम्राज्यवाद के लिए सबसे महत्वपूर्ण भू-रणनीतिक क्षेत्र बन गया। पेट्रोल एक रणनीतिक माल (स्ट्रैटजिक कमोडिटी) माना जाता है। जिस साम्राज्यवादी देश का नियन्त्रण इस माल पर सर्वाधिक होगा उसकी चौधराहट विश्व साम्राज्यवाद पर होगी। मध्यपूर्व में तेल का अकूत भण्डार है। इन वजहों से मध्यपूर्व पर नियन्त्रण विश्व साम्राज्यवाद में अग्रणी महत्व रखता था। यह बात सभी साम्राज्यवादी देश समझ गये थे। इसलिए बीसवीं सदी के आरम्भ से ही ब्रिटेन, फ़्रांस और अमेरिका लगातार ज़ोर आज़माइश, तीन तिकड़म कर इस क्षेत्र को अपने क़ब्ज़े में करने के प्रयास में जुटे हुए थे। दोनों विश्व युद्धों के दौरान गहराते साम्राज्यवादी अन्तरविरोधों ने औपनिवेशिक नियन्त्रण के नये रूपों को जन्म दिया। विशेषकर द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद स्पष्ट हो गया कि उपनिवेशों का प्रत्यक्ष नियन्त्रण साम्राज्यवादी लूट के लिए बेहद ख़र्चीला साबित हो रहा है। नव-स्वावधीन देशों की सत्ताओं में अपने मित्रों व संश्रयकारियों की खोज साम्राज्यवाद का नया मोडस ऑपरेण्डी बना। सभी प्रमुख साम्राज्यवादी ताकतें इस क्षेत्र पर नियन्त्रण स्थापित करने के लिए एक-दूसरे के साथ प्रतिद्वन्द्विता में थीं। इस बदले विश्व राजनीतिक परिदृश्य में यदि हम इज़रायल के अस्तित्व में आने और फ़िलिस्तीन की जनता के संघर्ष को देखें तो फ़िलिस्तीन की त्रासदी को ज़्यादा बेहतर समझ पायेंगे।

फ़िलिस्तीन का एक संक्षिप्त इतिहास

उस्मानिया सल्तनत के विघटन के बाद 1920 में मित्र राष्ट्रों के इटली के सान रेमो में हुए शान्ति अधिवेशन में पराजित उस्मानिया सल्तनत का बँटवारा हुआ। फ़िलिस्तीन ब्रिटेन का मैण्डेट बना लेकिन उसके पहले ही 1917 में बाल्फ़ोर घोषणा के साथ ब्रिटेन ने फ़िलिस्तीन में इज़रायल के राष्ट्रीय पितृभूमि के गठन की लगभग आधिकारिक घोषणा कर दी थी। ब्रिटेन की बन्दूक के ज़ोर पर ज़ायनवादी संगठन फ़िलिस्तीनी अरब जनता की ज़मीनें हथियाना शुरू कर देते हैं। उनके साथ ज़ोर-ज़बरदस्ती और उनका उत्पीड़न शुरू करते हैं। ब्रिटेन ने फ़िलिस्तीन की जनता से उनकी राय जाने बिना एकतरफ़ा तौर से फ़िलिस्तीन में इज़रायल की स्थापना पर मुहर लगा दी। चाहे 1917 की बाल्फ़ोर घोषणा हो या आधिकारिक तौर पर बाल्फ़ोर घोषणा को मैण्डेट में शामिल करने की बात हो, दोनों ही निर्णयों में फ़िलिस्तीन की कोई राय नहीं ली गयी। उपनिवेश और उपनिवेशों की जनता साम्राज्यवादी हित और मुनाफ़े के साधन मात्र होते हैं इसलिए उपनिवेशों के सन्दर्भ में लिए निर्णयों में अक्सर वहाँ की जनता की कोई भागीदारी नहीं होती। राष्ट्रीय आन्दोलनों के दबाव में साम्राज्यवादी कुछ रियायतें देते हैं लेकिन फ़िलिस्तीन तो अभी पूरी तरह एक स्पष्ट भूभाग के साथ राष्ट्र के तौर पर स्थापित होने की प्रक्रिया में ही था। फ़िलिस्तीन का संघर्ष, ज़ायनवादी उत्पीड़न और साम्राज्यवादी शोषण की दोनों अखिल-अरब राष्ट्र और फ़िलिस्तीनी राष्ट्र के ठोस रूप ग्रहण करने में महत्वपूर्ण भूमिका रही। इस पर हम आगे चर्चा करेंगे। ख़ैर, अचानक फ़िलिस्तीनियों को पता चला कि उनकी ज़मीन पर एक अन्य राज्य बसने जा रहा है जिसका उद्देश्य है फ़िलिस्तीनी अरब आबादी का नस्ली सफ़ाया और साम्राज्यवाद के हितों की रक्षा। इज़रायल को फ़िलिस्तीन चाहिए था फ़िलिस्तीनियों के बिना।
1920 में सान रेमो में मित्र राष्ट्रों के शान्ति अधिवेशन में पराजित उस्मानिया सल्तनत का बँटवारा हुआ। इराक और फ़िलिस्तीन ब्रिटेन को मिले और लेबनान तथा सीरिया फ़्रांस का हुआ। प्रथम विश्वयुद्ध के समाप्त होने के बाद कुछ समय पहले (जनवरी 1920) बने लीग ऑफ नेशंस ने 1922 में प्रशासनिक कार्यवाइयों के लिए ब्रिटेन को फ़िलिस्तीन की मैण्डेटरी आधिकारिक तौर पर दी। इस मैण्डेटरी ने 1917 के बाल्फ़ोर घोषणा को मान्यता दी। एशिया और अफ़्रीका के उपनिवेशों में गति पकड़ चुके राष्ट्रीय आन्दोलन इस बात का संकेत देने लगे थे कि आने वाले समय में प्रत्यक्ष उपनिवेशों का दौर ख़त्म होने वाला है। जारी राष्ट्रीय संघर्षों के समक्ष नये उपनिवेश बनाना और उन्हें सँभालना सम्भव नहीं होने जा रहा था इसलिए समाधान के तौर पर मैण्डेट व्यवस्था लायी गयी। जिसके तहत नव गठित लीग ऑफ नेशंस नये उपनिवेशों या क्षेत्रों के प्रशासन के लिए साम्राज्यों को एक निश्चित काल के लिए मैण्डेट देगा और उन साम्राज्यवादी देशों को समय-समय पर मैण्डेट की प्रशासन व्यवस्था की रिपोर्ट लीग ऑफ नेशंस के समक्ष प्रस्तुत करनी होगी। अपनी औपनिवेशिक लूट, शोषण और उत्पीड़न के काल को लदते देख चिन्तित साम्राज्यवादी देश लूट जारी रखने के नये उपाय खोज रहे थे। राष्ट्रीयताओं के आत्मनिर्णय को 1917 की अक्टूबर क्रान्ति के बाद सोवियत रूस द्वारा अमल में लाने की वजह से राष्ट्रीयताओं का दमन या नये उपनिवेशों का गठन और कठिन हो गया। एक ओर राष्ट्रीय आन्दोलन और दूसरी ओर राष्ट्रीयताओं के आत्मनिर्णय को मान्यता इन परिस्थितियों में पश्चिमी साम्राज्यवाद के लिए प्रत्यक्ष उपनिवेश बनाना अब कठिन होता जा रहा था। लेकिन यह सम्भव भी तो नहीं था कि पश्चिमी साम्राज्यवादी देश “पूरी दुनिया को बर्बर होने दें”; अभी भी एशिया, अफ़्रीका या लातिन अमेरिकी देश “व्हाइट मैन्स बर्डेन” बने हुए थे, इसलिए उपाय के तौर पर मैण्डेट व्यवस्था लायी गयी। मतलब कान सीधे नहीं घुमा कर पकड़ना था। फ़िलिस्तीन का मैण्डेट 1922 से 1948 तक के लिए ब्रिटेन को मिला। प्रथम विश्वयुद्ध में उस्मानिया सल्तनत ने धुरी राष्ट्रों का साथ दिया इसलिए ब्रिटेन ने सल्तनत के विरुद्ध युद्ध का ऐलान किया। ब्रिटेन ने अरब विश्व से युद्ध में साथ देने की बात कही जिसके बदले में स्वतन्त्र अरब राज्य की स्थापना में मदद करने का वायदा किया। यह बात हुसैन-मैक्मॉन संवाद के रूप में हुई थी। हासिमाइत वंश का हुसैन इब्न अली उस समय मक्का का अमीर था। यह पत्र संवाद हुसैन और मिस्र के हाई कमिश्नर हेनरी मैक्मॉन के बीच हुआ था। लेकिन इस पत्र संवाद के साथ ही गुप्त तौर पर फ़्रांस के साथ समझौता भी हुआ। तय बात थी साम्राज्यवादी ब्रिटेन और फ़्रांस इस क्षेत्र में अपनी पकड़ इतनी आसानी से जाने नहीं देना चाहते थे। ब्रिटेन के साम्राज्यवादी हितों में इस क्षेत्र के तेल भण्डारों पर नियन्त्रण के अलावा सबसे प्रमुख था स्वेज़ नहर पर क़ब्ज़ा! स्वेज़ नहर से होकर भारत तक पहुँचने का सीधा रास्ता जाता था जिसे किसी भी क़ीमत पर ब्रिटेन हाथ से जाने नहीं देना चाहता था, क्योंकि भारत उसका सबसे फ़ायदेमन्द उपनिवेश था। इसलिए इस क्षेत्र में सक्रिय दोनों प्रमुख साम्राज्यवादी देशों ने समझौते के तहत अपने-अपने हितों की रक्षा की। एक स्वतन्त्र अरब राज्य उनके हितों को पूरा नहीं कर सकता था, इसलिए हुसैन-मैक्मॉन संवाद सिर्फ़ एक संवाद रह गया और अन्दर ख़ाने अरब क्षेत्र का साम्राज्यवादी बँटवारा सम्पन्न हुआ। फ़िलिस्तीन और इराक ब्रिटेन ने अपने पास रखा और फ़्रांस ने सीरिया तथा लेबनान। इस साम्राज्यवादी बँटवारे के अलावा ब्रिटेन ने स्वेज़ नहर पर अपने नियन्त्रण को सुरक्षित बनाये रखने के लिए एक और पुख़्ता योजना अमल में लायी।
किसी भी निर्णय के आम तौर पर कई पहलू होते हैं और विशेषकर जब यह निर्णय शोषक साम्राज्यवादी राष्ट्रों का हो तो वह कई कुटिलताओं, स्वार्थसिद्धि, पाखण्ड और तुष्टीकरण का जीता जागता नमूना होता है। बाल्फ़ोर घोषणा ऐसे ही तमाम स्वार्थों और तुष्टीकरणों की मिसाल थी। 1917 में की गयी इस घोषणा के पीछे कई योजनाएँ और वायदों की तहें छुपी थीं। यह बात सही है कि साम्राज्यवादी देश उपनिवेशों के सन्दर्भ में किसी भी निर्णय का हिस्सा उपनिवेश की जनता को नहीं बनाते। लेकिन उस दौर में जब रूसी क्रान्ति के बाद राष्ट्रीयताओं के आत्मनिर्णय को सोवियत रूस ने मान्यता दी तो अरब विश्व को उम्मीदें जगी कि उन्हें भी आत्मनिर्णय का मौका मिलेगा। अरब विश्व की पढ़ी-लिखी बुर्ज़ुआजी आत्मनिर्णय और राष्ट्रीयताओं के संघर्ष से परिचित थी। हुसैन-मैकमॉन संवाद से उसे एक उम्मीद जगी थी। लेकिन जल्दीं ही यह धराशायी भी हो गयी क्योंकि अभी उस्मानिया सल्तनत की पूरी तरह हार भी नहीं हुई थी उसके पहले ही फ़्रांस और ब्रिटेन के बीच गुप्त रूप से साइक-पीको समझौता हो गया और फिर बाल्फ़ोर घोषणा। इन दोनों ने साम्राज्यवादी देशों की असली मंशा को उजागर कर दिया और अरब विश्व को औपनिवेशिक दमन और उत्पीड़न हाथ लगा। बाल्फ़ोर घोषणा पर चर्चा करने से पहले एक बार हम इसकी पृष्ठभूमि पर चर्चा कर लेते हैं। एक और बात कि बाल्फ़ोर घोषणा को 1948 में फ़िलिस्तीनी जनता के साथ हुए घोर अन्याय, नरसंहार और बर्बरता की ज़मीन तैयार करने वाला भी माना जाता है जिसे नकबा के नाम से जाना जाता है।

ज़ायनवाद और इज़रायल की अवधारणा

ज़ायनवाद का संस्थापक थियोडोर हर्ज़ल लम्बेे समय से यहूदियों के अपने राष्ट्र की माँग कर रहा था, जिसमें स्पष्ट तौर पर माँग की गई थी कि यह कहीं भी हो सकता है लेकिन अच्छा हो अगर यह उनकी धार्मिक ऐतिहासिक भूमि फ़िलिस्तीन में हो। इस बात की पुष्टि बेसल में 1903 में हुए ज़ायनवादी कांग्रेस से होती है। हर्जल ने यहूदियों के अपने राष्ट्रीय पितृभूमि के लिए ब्रिटेन के नियन्त्रण वाले युगाण्डा का प्रस्ताव रखा। हालाँकि आपसी मतभेद की वजह से यह प्रस्ताव रद्द कर दिया गया। इससे स्पष्ट है कि ज़ायनदवादियों के लिए फ़िलिस्तीन की अहमियत थी लेकिन सिर्फ यही उनका एक मात्र विकल्प हो ऐसा नहीं था।
ज़ायनवादी विचारधारा पूर्ण रूप से नस्ली श्रेष्ठता, काल्पनिक शत्रु ‘दि अदर’ के नस्ली सफ़ाये और विस्तारवाद पर आधारित है। जिसमें फ़िलिस्तीनियों को उनकी जगह-ज़मीन से बेदख़ल कर उनकी पूरी आबादी का सफ़ाया करना तथा उस ज़मीन पर इज़रायली राज्य की स्थापना की बात स्पष्ट शब्दों में की गयी है। इस आधुनिक दक्षिणपन्थी विचारधारा का यहूदी-विरोधी विचारधारा (एण्टी-सेमेटिज्म) से कोई अन्तरविरोध नहीं था और न है। कई मायनों में कहा जा सकता है कि दोनों ने साथ मिल कर काम किया ताकि यूरोप को यहूदी आबादी से मुक्त कर उन्हेंं कहीं व्यवस्थित किया जा सके और साथ ही अरब विश्व में यूरोप की अपनी जगह बन सके। यदि यहूदी-विरोधी विचारधारा से कोई अन्तरविरोध होता तो ज़ायनवादी संगठन जिनकी पैदा होने की ज़मीन यूरोप ही है, वहाँ यहूदियों के हक अधिकार के लिए ज़ायनवादी संगठन संघर्ष करते। लेकिन ऐसा नहीं हुआ और तब भी नहीं जब जर्मनी और अन्य यूरोपीय देशों में यहूदियों के साथ भीषण अत्यााचार हो रहे थे, उन्हें यन्त्रणा शिविरों के गैस चेम्बर में तिल-तिल कर ज़िन्दा मारा जा रहा था। एक तथ्य इस बात को स्पष्ट़ उजागर करता है; इज़रायल की कम्युननिस्ट पार्टी के 16वें कन्वेंशन में प्रस्तुत एक आलेख जिसमें स्पष्ट लिखा गया कि ‘जब पूरे विश्व के लगभग सभी फ़ासीवाद विरोधी और यहूदी संगठन नाज़ी जर्मनी का विरोध कर रहे हैं तो इस समय भी ज़ायनवादी नेता और हिटलर आपसी सम्पर्क में हैं, उनके साथ सहयोग में काम कर रहे हैं।’’ जब जर्मनी में जर्मन कम्युनिस्ट फ़ासीवाद विरोधी पॉपुलर फ़्रण्ट बनाने का प्रयास कर रहे थे, तब वहाँ के ज़ायनवादी संगठनों ने इसमें कोई रुचि नहीं दिखायी। उन्हेंं जर्मनी से नौजवान और मजबूत यहूदी चाहिए थे ज़ायनवादी इज़रायल के निर्माण के लिए। जर्मनी में हो रहे अत्याचारों के खिलाफ़ चुप्पी साधे रहने और कुछ न करने के बाद हाइम विज़मान का वक्तव्य इस बात की और अधिक पुष्टि करता है – ‘‘जर्मनी में यहूदियों के साथ जो कुछ भी हुआ है उसका जबाव है ऐरेत्ज़े इज़रायल में एक बड़ा, खूबसूरत और एक न्यायपूर्ण घर – एक मजबूत घर।’’ स्पष्ट है यहूदियों के साथ होने वाले उत्पीड़न में ज़ायनवादियों को इज़रायल के विस्तार के सपने दिख रहे थे।
ब्रिटेन को जायनवादियों की योजना और महत्वाकांक्षा की ख़बर थी और पूर्वी अफ़्रीका के सेक्रेटरी जोसे चैम्बरलिन ने युगाण्डा में इज़रायल के निर्माण का प्रस्ताव स्वीकार भी कर लिया था क्योंकि इसमें ब्रिटेन का कोई नुकसान नहीं था। लेकिन स्वयं ज़ायनवादी नेताओं में इस प्रस्ताव को लेकर मतभेद थे। ब्रिटेन के लिए ज़ायनवाद और ज़ायनवादियों की माँग कितना महत्व रखती थी, इसका अन्दाज़ा इस बात से लगाया जा सकता है कि यूरोपीय देशों में ब्रिटेन ही पहला देश था जिसने 1290 में यहूदियों को देश निकाला दिया था और 1871 तक यहूदियों को राजनीतिक आज़ादी हासिल नहीं थी। ज़ायनवाद और ज़ायनवादी राज्य में रुचि मात्र प्रथम विश्वयुद्ध के दौरान ही जागी। इसकी प्रमुख वजह इस रणनीतिक क्षेत्र पर नियन्त्रण था जिसकी चर्चा हम पहले कर चुके हैं। बीसवीं सदी के आरम्भ से ही इस क्षेत्र की प्रमुखता बनी हुई थी और नई परिस्थितियों में इस भू-रणनीतिक क्षेत्र पर नियन्त्रण साम्राज्यवादी चौधराहट बनाये रखने के लिए महत्वपूर्ण था जो अभी ब्रिटेन के हाथों में थी। हर्ज़ल और उसके बाद हाइम विज़मान अपनी ज़ायनवादी योजना की फ़ाइल लिए पहले ब्रिटेन, फिर 1919 में हासीमाइ प्रिंस फैज़ल और बाद में अमेरिका के पास पहुँचे।

बाल्फ़ोर घोषणा

ब्रिटेन को ज़ायनवाद की योजना समझाने का काम हाइम विज़मान ने किया। उसने हर्जल की बात को लॉयड जॉर्ज (ब्रिटेन के तत्का‍लीन प्रधानमन्त्री) को समझायी कि इज़रायल शत्रुतापूर्ण अरब विश्व में इंग्लैण्ड के लिए ‘‘अल्स्टर’’ होगा। आयरलैण्ड को उपनिवेश बनाने के बाद अल्स्टर द्वीप आयरलैण्ड में ब्रिटिश दमन का चेक पोस्ट बनता था। मध्यपूर्व में अपनी महत्वाकांक्षा के मद्देनज़र यह बात साम्राज्यवादी ब्रिटेन को तुरन्त समझ में आ गयी। साथ ही प्रथम विश्वयुद्ध में फ़्रांस के कमज़ोर पड़ने के बाद ब्रिटेन ने युद्ध का मुख्य भार उठाया लेकिन उसकी स्थिति भी कुछ अच्छी नहीं थी। ब्रिटेन चाहता था कि मित्र राष्ट्रों की ओर से अमेरिका युद्ध में शामिल हो। इसके लिए ब्रिटेन के यहूदियों के सामने यह प्रस्ताव रखा गया कि वे अमेरिकी यहूदियों (यहूदी पूँजीपतियों) को राजी करें कि वे अमेरिकी सरकार पर युद्ध में शामिल होने का दबाव बनायें। इसके बदले में फ़िलिस्तीन में यहूदी राज्य बनाने का वायदा किया गया। जैसा कि हमने पहले भी लिखा है किसी भी निर्णय के कई पहलू होते हैं जिनमें से कुछ प्रधान होते हैं लेकिन प्रधान और गौण पहलुओं का समुच्चय ही उस निर्णय का निर्माण करता है। और बात जब साम्राज्यवादी हितों की होती है तो इस तरह के निर्णय कई हितों, महत्वाकांक्षाओं, रणनीतियों और कूटनीतियों की एक बेहद जटिल गुत्थी बनाते है। युद्ध में अमेरिका का शामिल होना मात्र अमेरिकी यहूदी पूँजीपतियों के दबाव का परिणाम नहीं था। इस क्षेत्र को लेकर अमेरिकी साम्राज्यवाद की अपनी महत्वाकांक्षाएँ तो थी हीं, साथ ही जर्मनी के विदेश सचिव आर्थर जि़मरमान ने मेक्सिको को टेलीग्राम भेजा और युद्ध में शामिल होने पर आरिज़ोना, न्यू मेक्सिको और टेक्सस दुबारा से मेक्सिको को देने की बात कही जिसे अमेरिका ने मेक्सिको से हड़प लिया था। यह अमेरिका के लिए चेतावनीपूर्ण था। विश्वयुद्ध का उसके इतना क़रीब आना ठीक नहीं था।
इज़रायल को लेकर अपनी लम्बी योजना के साथ-साथ तात्कालिक योजना के पूरा होते ही ब्रिटेन ने अपनी बात पूरी की। अमेरिका अप्रैल 1917 में युद्ध में शामिल होता है और नवम्बर 1917 में बाल्फ़ोर घोषणा सामने आती है। अरब विश्व और फ़िलिस्तीन के साथ विश्वासघात करते हुए ब्रिटेन ने ज़ायनवादियों के साथ मिल कर इज़रायल राज्य की स्थापना की योजना बनायी। यह योजना थी बाल्फ़ोर घोषणा। बाल्फ़ोर घोषणा जिसे 1948 के नकबा (प्रलय) का आधार माना जाता है, फ़िलिस्तीनियों को उनकी ज़मीन और घरों से बेदख़ल करने और उनके नरसंहार की पृष्ठभूमि बना।
ब्रिटेन के ज़ायनवादियों का प्रतिनिधित्व करने वाले हाइम वि‍ज़मान और रूसी ज़ायनवादी पत्रकार नाउम सोक्लोंव के प्रयासों का परिणाम मानी जाने वाली बाल्फ़ोर घोषणा असल में इस क्षेत्र के रणनीतिक महत्व के मद्देनज़र ब्रिटेन का सोचा-समझा रणनीतिक क़दम था। ब्रिटेन को मध्यपूर्व में अपना ‘अल्स्टर’ चाहिए था। इस घोषणा के साथ यहूदियों को फ़िलिस्तीन में उनके राष्ट्रीय पितृभूमि देने की बात कही गयी। ज़ायनवादियों को इतने से भी खुशी नहीं थी उन्हें तो पूरा फ़िलिस्तीन अपने नाम चाहिए था। इन परजीवियों की इच्छा थी कि ब्रिटेन पूरे फ़िलिस्तीन को इज़रायल राष्ट्र की तरह घोषित कर दे। ऐसा नहीं हुआ लेकिन यह घोषणा अपने आप में फ़िलिस्तीन की अरब जनता के अधिकारों और हितों के विरुद्ध थी। यह एकतरफ़ा घोषणा फ़िलिस्तीन के साथ ऐतिहासिक अन्याय थी जो उसकी त्रासदी का कारण बनी।
फ़िलिस्तीनी जनता तब भी लड़ी और आज भी लड़ रही है। 1917 का दौर अलग था, अभी नव जागृत अखिल-अरब राष्ट्र और फ़िलिस्तीनी राष्ट्र दोनों ही अनगढ़ थे लेकिन अरब विश्व की बुर्ज़ुआजी अपने हितों के अन्तर्गत राष्ट्रों में गठित हो रही थी। अपने साझा शत्रु, पश्चिमी साम्राज्यवादी देश, मुख्यत: फ़्रांस और ब्रिटेन के विरुद्ध संघर्षरत थे लेकिन ज़मीनी स्तर पर कोई ठोस आकार या आन्दोलन की शक़्ल अभी अख़्तियार नहीं कर पाये थे। इस क्षेत्र में फ़िलिस्तीन के विरुद्ध जारी अन्याय आने वाले समय में दोनों ही राष्ट्रीयताओं को आकार देने का काम करेगा।

फ़िलिस्तीन का प्रतिरोध संघर्ष
1939 का विद्रोह

1917 के बाल्फ़ोर घोषणा के बाद ब्रिटेन के संरक्षण में फ़िलिस्तीन में ज़ायनवादियों की गुण्डागर्दी शुरू हुई। इज़रायली फ़िलिस्तीनियों से ज़बरदस्ती ज़मीनें हथियाने लगे, संसाधनों पर अपना अन्यायपूर्ण अधिकार जमाने लगे। इन अत्याचारों और ब्रिटिश शोषण और उत्पीड़न के विरुद्ध ज़मीनी स्तर पर किसानों और खेतिहर मज़दूरों का प्रतिरोध जारी था जो बीच-बीच में मुखर हो जाया करता था। 1920, 1921, 1929 की हड़तालें, हिंसा और विद्रोह ऐसे ही मुखर प्रतिरोध थे। इनमें से हर एक अपने पहले वाले से ज़्यादा आक्रामक, संगठित और विस्तारित होते गये। जारी उत्‍पीड़न, दमन और ज़मीन हथियाने के खि़लाफ सबसे ज़्यादा मुखर था 1939 का विद्रोह। 1936 में 6 महीने तक आम हड़ताल चली और यह विकसित होती-होती 1939 तक विद्रोह की शक्ल अख्तियार कर चुकी थी। फ़िलिस्तीन के पूरे औपनिवेशिक इतिहास में यह सबसे लम्बी चली हड़ताल थी। यह विद्रोह ज़मीनी स्तर पर अखिल अरब भावना को भी एक हद तक प्रदर्शित करती थी क्योंकि इस विद्रोह में हज़ारो फ़िलिस्तीनी और गैर-फ़िलिस्तीनी अरब शामिल हुए थे। इज़रायल ज़्यादा से ज़्यादा भूमि अपने अधिकार क्षेत्र में चिन्हित किये जा रहा था और प्रतिरोध होने पर ब्रि‍टेन हिंसक दमन किया करता था। 1936 में हुई आम हड़ताल की जाँच पड़ताल के लिए ब्रिटेन ने एक आयोग को गठित किया। इस आयोग ने फ़िलिस्तीनि‍यों के असंतोष और आज़ादी की चाहत को भाँप लिया और बँटवारे की सलाह दी। आयोग की इस सिफारिश का अरब लोगों ने विरोध किया और विद्रोह की शुरुआत हो गयी। इस विद्रोह में पाँच हज़ार से अधिक फ़िलिस्तीन और पड़ोसी देशों से आए अरब मारे गये तथा पंद्रह हज़ार से भी ज़्यादा घायल हुए।

1948 नकबा (प्रलय)

1930 के दशक में जर्मनी में नाजि़यों के सत्ता में आने के बाद फ़िलिस्तीन में यहूदियों का प्रवास बढ़ा। 1936-39 के विद्रोह के जुझारूपन को देखने के बाद ब्रिटेन को इस बात का अन्दाज़ा हो गया था कि फ़िलिस्तीन और अन्य अरब देश मनमाने ढंग से नियन्त्रित नहीं हो सकते। उसे समझ आ गया कि यह मामला नाज़ुक है और ज़ायनवादियों को बेलगाम छूट देना ख़तरनाक होगा। दूसरे विश्वयुद्ध की शुरुआत हो चुकी थी। उपनिवेशों में किसी तरह के विद्रोह की स्थिति में ब्रिटेन के लिए फौज़ों को फ़ाज़ि‍ल कर पाना कठिन होता इसलिए उसने किसी भी उथल-पुथल से बचने के लिए प्रति वर्ष यहूदियों के प्रवास की सीमा तय कर दी। असीमित प्रवास से इसे सीमित कर प्रति वर्ष 10,000 कर दिया गया। इस समय तक अन्य अरब देश फ़िलिस्तीन के संकट को ज़्यादा क़रीब से महसूस कर रहे थे, फ़िलिस्तीनी प्रवासियों की संख्या दिन पर दिन बढ़ती जा रही थी, साथ ही अरब विश्व में इज़रायल के पीछे की साज़िश उन्हें भी समझ आ रही थी। फ़िलिस्तीन के एक प्रतिनिधिमण्डल ने ब्रिटेन से बातचीत की और यह स्परष्ट किया कि जर्मनी में यहूदियों के साथ जो कुछ हो रहा है उसके प्रति उनकी गहरी संवेदना है लेकिन यहूदी-विरोध और ज़ायनवाद के बीच फ़र्क़ किया जाना चाहिए। फ़िलिस्तीन में जो हो रहा है वह ज़ायनवादियों का विस्ताार है। इनके विस्तारवाद ने फ़िलिस्तीनियों को उनके खेतों, घरों, गाँव और शहरों से बेदख़ल कर दिया है और करते जा रहे हैं। अन्य अरब देशों में फ़िलिस्तीनी शरणार्थियों की संख्या बढ़ रही है।
ब्रिटेन को मिला फ़िलिस्तीन का मैण्डेट 1948 में पूरा होने जा रहा था। ज़ायनवादियों के बढ़ते हमले और अरब देशों का प्रतिरोध देख कर ब्रिटेन को यह समझ आने लगा कि फ़िलिस्तीन पर नियन्त्रण उसके लिए महँगा साबित हो रहा है। उसका ‘अल्स्टर’ उतना स्वीट नहीं रह गया था। द्वितीय विश्वयुद्ध ने उसे पहले ही बेहाल कर दिया था। अब इस “बिगड़ैल बच्चे” का बोझ वह उठा सकने की स्थिति में नहीं था इसलिए 1947 में उसे संयुक्त राष्ट्र के सुपुर्द कर दिया। संक्षेप में यहाँ पर इस बात की चर्चा अनिवार्य है कि यही वह दौर था, जब ब्रिटेन की साम्राज्यवादी चौधराहट ख़त्म हो रही थी। द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद ब्रिटेन की हालत भी अन्य यूरोपीय देशों की तरह बदहाल थी। अमेरिका अपने मार्शल प्लान के साथ यूरोप के देशों में पुनर्निर्माण कर रहा था और द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद यह सबसे बड़ी साम्राज्यवादी ताक़त की तरह उभरा। ब्रिटेन की जगह अब अमेरिका ने ले ली और ‘अल्स्टर’ के भरण-पोषण की ज़िम्मेदारी अमेरिका ने अपने हाथों में ले लिया। मध्य पूर्व में अपनी चौधराहट बनाये रखने के लिए इस लठैत को पालने में अमेरिका 1949 से लेकर अब तक प्रत्येेक वर्ष करोड़ों डॉलर खर्च करता आया है।
1948 में संयुक्त राष्ट्र में फ़िलिस्तीन और इज़रायल के बँटवारे का प्रस्ताव पारित हो गया। इस प्रस्ताव के पारित होने में जर्मनी और यूरोप के अन्य़ देशों में यहूदियों के साथ हुये घोर अन्याय की वजह से पैदा हुई सहानुभूति की भावना महत्वपूर्ण कारक बनी। द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद उन्हेंं किसी भी यूरोपीय देश में शरण नहीं मिल रही थी। प्रताडि़त और यातना शिविरों से निकले यहूदियों के जहाज़ यूरोप के एक बन्दरगाह से दूसरे बन्दरगाह पर भटक रहे थे लेकिन कोई देश लंगर डालने नहीं दे रहा था। इन वजहों से संयुक्त राष्ट्र में उनके प्रति संवेदना की भावना प्रबल थी। संयुक्त राष्ट्र ने उन्हें “राज्य से वंचित राष्ट्र” बताते हुए उनकी प्राचीन ज़मीन पर उनके राज्य बनाने का प्रस्ताव पारित किया। हम पहले ही बता चुके हैं कि यहूदियों के साथ हो रहे अत्याचारों के प्रति ज़ायनवादी कितने संवेदनशील थे। प्रताडि़त यहूदियों को न्याय देने का फ़ायदा ज़ायनवादियों को मिला। इन परिस्थितियों में इज़रायल को आधिकारिक मान्यता मिलने और फ़िलिस्तीन के बँटवारे के साथ इज़रायल की बर्बरता का इतिहास रचा गया। 1947 से 1949 के बीच 75 लाख फ़िलिस्तीनि‍यों को उनके घरों और ज़मीनों से ज़बरन बेदख़ल कर दिया गया। 19 लाख से भी अधिक फ़िलिस्तीनी पड़ोसी देशों के शरणार्थी शिविरों में ठूँस दिए गये। पूरे फ़िलिस्तीन के लगभग 78 प्रतिशत हिस्से पर इज़रायल ने क़ब्ज़ा कर लिया। नस्ली़ सफ़ाये के लिए 70 से अधिक संगठित नरसंहारों में 15 हज़ार से अधिक फ़िलिस्तीनि‍यों को मौत के घाट उतार दिया गया और 530 के करीब गाँवों और शहरों को तबाहो-बर्बाद कर दिया गया। आधुनिक इतिहास में किसी भी देश और किसी भी जनता के साथ इतनी क्रूरता, इतनी हिंसा और इतना अन्याय नहीं हुआ है। यह नस्लावाद और साम्राज्यवाद द्वारा रची आधुनिक विश्व की सबसे बड़ी त्रासदी है, जो आज तक चलती चली आ रही है। यह क़त्ले आम, घरों को बारूद से उड़ाना, छोटे-छोटे बच्चों की मौत और तबाही-बर्बादी उस घोर अन्याय को दर्शाती है जिसके भागीदार हम सभी होते हैं, अगर हम गाज़ा और फ़िलिस्तीन की त्रासदी पर चुप रहते हैं।
अरब विश्व में और विश्व के दूसरे हिस्सों में प्रवासी फ़िलिस्तीनी आज भी अपने घरों को लौटने के सपने देखते हैं। उनकी इस उम्मीद को प्रदर्शित करती है वह चाबी जो नकबा का प्रतीक बन गयी है। यह घोर विडम्बना है कि इज़रायल, एक परजीवी उपनिवेशवादी राज्य 15 मई को अपना स्वतन्त्रता दिवस मनाता है और उस देश और ज़मीन के लाखों बाशिंदे हाथों में अपने छिने घरों की चाबी लिए एक दिन वापस लौटने की उम्मीद लिए शरणार्थी शिविरों और अन्य देशों में प्रवासी का जीवन बिता रहे हैं।

अखिल अरब राष्ट्र (पैन-अरब नैशन) और फ़िलिस्तीन का संघर्ष

उस्मानिया सल्तनत से युद्ध के दौरान अखिल-अरब राष्ट्र खुल कर सामने आयी। यदि कहा जाए तो इसकी शुरुआत उस्मानिया सल्तनत के मातहत ही हो गई थी। लेकिन तब भी यह कोई एकाश्मी अवधारणा नहीं थी या कह सकते हैं कि यह कोई ठोस अवधारणा के तौर पर विकसित नहीं हो रही थी। उस्मानिया सल्तनत से आज़ादी के काल में इस पैन-अरब राष्ट्र की चेतना की भूमिका रही लेकिन उस समय भी इसमें तीन मुख्य साहित्यिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक धाराएँ शामिल थी, सीरिया, फ़िलिस्तीन और इराक। लेकिन पहले उस्मानिया सल्तनत और बाद में ब्रिटि‍श तथा फ़्रांसीसी साम्राज्यवाद के विरुद्ध अपनी भिन्नताओं के साथ ही विकसित हो रही थी। आने वाले काल में मिस्र के शामिल होने पर एक और भिन्न संस्कृति शामिल हुई। पश्चिमी साम्राज्यवाद विरोधी प्रबल भावना इनके बीच एकता का प्रमुख कारक बनी जिसके बिना पर ज़ायनवादी इज़रायल के खिलाफ़ 1956, 1967, 1973, 1982 और 2006 के युद्ध लड़े गये। 1950 के दशक में अरब विश्व के अधिकतर देशों में अपने-अपने क़िस्म की उपनिवेश विरोधी जनवादी क्रान्तियाँ सम्पन्न हुईं जैसे मिस्र, लीबिया, सीरिया और इराक। ट्यूनीशिया और अल्जीरिया में अलग ढंग से राष्ट्रीय जनवादी क्रान्तियाँ हुई थीं। इन सभी क्रान्तियों के नेता साम्राज्यवाद विरोधी थे। यही भावना उन्हें अखिल अरब राष्ट्रवाद के सूत्र से जोड़ती थी। अरब विश्व में इज़रायल का होना साम्राज्यवाद की उपस्थिति का प्रतीक था। इज़रायल सभी नवस्वाधीन अरब राष्ट्रों के लिए समान शत्रु था और फ़िलिस्तीन की जनता के साथ हुए अन्यााय की वज़ह से उनसे भावनात्मक जुड़ाव भी था। 1950, 60 और 70 के दशक में यह अखिल अरब उभार साम्राज्यवाद के लिए इस क्षेत्र में कठिन चुनौती बन रहा था। हम यहाँ पर मात्र अखिल अरब राष्ट्रवाद के उन संघर्षों की चर्चा करेंगे जिसमें फ़िलिस्तीन की मुक्ति का प्रश्न प्रधान था।
नकबा की चर्चा हम पहले कर चुक हैं। इज़रायल पूरी बर्बरता और अमानवीयता की सीमा पार करते हुए जब ब्रिटिश सेना की मदद से फ़िलिस्तीनियों का नरसंहार कर रहा था, उन्हें विस्थापित कर उनके शहर के शहर, गाँव के गाँव खाक़ में मिला रहा था उस समय एक बेहद कमज़ोर अरब सेना ने प्रतिरोध दर्ज किया जिसे प्रतीकात्मक ही कहा जा सकता है क्योंकि मिस्र, इराक, जॉर्डन की राजशाहियाँ अंग्रेजों और इज़रायलियों के सामने समर्पण कर चुकी थीं। लेकिन इस तटस्थता और समझौतापरस्ती ने इन देशों में जारी राष्ट्रीय आन्दोलनों में तेज़ी लायी। मिस्र, इराक और जॉर्डन के सैनिक जिस प्रतिरोध में हिस्सा ले रहे थे वह एक प्रहसन मात्र रह गया था, जिसे मात्र प्रतीकात्मक तौर पर इन देशों की राजशाहियों ने आरम्भ किया था। लेकिन नकबा अखिल अरब राष्ट्रवाद के लिए एक कैटलिस्ट बना। इन देशों में चल रहे राष्ट्रीय आन्दोलन को भी गति मिली। राष्ट्रवादी सैन्य कमाण्डर जिनकी अरब राष्ट्रों की स्थापना में प्रमुख भूमिका रही, इस हार और राजशाहियों के साम्राज्यवाद के सामने घुटने टेकने पर बेहद असन्तुष्ट थे। यह हार उनके लिए अपमान थी।
1950 के दशक में गमाल अब्देल नासेर पैन अरब नैशनलिज़्म के प्रमुख नेता बन कर उभरे। वह पश्चिमी साम्राज्यवाद के खिलाफ़ एक सशक्त अरब राष्ट्र की सोच रखते थे। नासेर ने यूनाइटेड अरब रिपब्लिक का एक असफल प्रयास भी किया लेकिन शासन के बाद के वर्षों में नासेर का तानाशाहाना रवैया और प्रतिद्वन्द्वियों का हिंसक दमन (जिसमें कम्युनिस्टों का बर्बर दमन भी शामिल है) किसी भी सकारात्मक एकता और अखिल अरब राष्ट्र के रास्ते में रोड़ा बना। नासेर द्वारा 1957 में स्वेज़ नहर का राष्ट्रीकरण पश्चिमी साम्राज्यवाद को एक क़रारा ज़वाब था। स्वेज़ नहर के राष्ट्रीकरण के बाद इज़रायल के साथ ब्रिटेन और फ़्रांस की सेना ने स्वेज़ नहर पर फिर से अधिकार हासिल करने के लिए मिस्र पर हमला बोल दिया। सोवियत खेमे के साथ मिस्र की क़रीबी बढ़ रही थी। यह भी अमेरिका और पश्चिमी साम्राज्यवाद के लिए चेतावनीपूर्ण था। स्टालिन की मृत्यु के बाद सोवियत रूस भी अपनी साम्राज्यवादी महत्वाकांक्षाओं से प्रेरित था। यह चर्चा पहले की जा चुकी है कि किस प्रकार मध्य पूर्व साम्राज्यवाद के लिए बेहद महत्वपूर्ण भू-रणनीतिक क्षेत्र बना तो यह भी तय था कि यहाँ भी सोवियत साम्राज्यवाद की घुसपैठ निश्चित ही बनती। शीत युद्ध अपने एक और मुखर दौर में प्रवेश कर रहा था। सोवियत साम्राज्यवाद भी विश्व में अपने मित्रों व संश्रयकारियों की तलाश में था। इस क्षेत्र में साम्राज्यवादी खींच-तान मची हुई थी और अखिल अरब राष्ट्रवाद को भी साम्राज्यवादी अन्तरविरोध का लाभ होने की सम्भावना थी। लेकिन साम्राज्यवादियों के आपसी अन्तरविरोध का अपने फ़ायदे के लिए इस्तेमाल कर पाने में अरब विश्व सफल नहीं रहा।
इसी दौर में इस्लाम के सिद्धान्तों पर आधारित अरब समाजवादी बाथ पार्टी (1947) भी अस्तित्व में आई जिसका उद्देश्य भी फ़िलिस्तीन की मुक्ति और अरब विश्व की एकता था। बाथ पार्टी अलग चर्चा की माँग करती है। हम अभी फ़िलहाल फ़िलिस्तीन के मुक्ति संघर्ष पर चर्चा को केन्द्रित कर रहे हैं।
फ़िलिस्तीन पर वापस लौटते हुए, 1956 में यासर अराफात ने धर्म निरपेक्ष अल फ़तह की स्थापना की। अखिल अरब राष्ट्रवाद का अगला प्रमुख संघर्ष रहा 1967 का सिक्से डे वार। 1967 के युद्ध के नाम से जाना जाने वाले इस युद्ध को इज़रायल ने खुले तौर पर ब्रिटेन, फ़्रांस और अमेरिका की सैन्य सहायता और पैसे के बूते लड़ा, जिसमें इज़रायली सेना सबसे आधुनिकतम हथियारों से लैस मिस्र, जॉर्डन और सीरिया की सेना के साथ लड़ रही थी। इस युद्ध में फ़िलिस्तीन का वह हिस्सा भी इज़रायल के कब्ज़े में आ गया जो फ़िलिस्तीनियों के नियन्त्रण में था। 1964 में फ़िलिस्तीन मुक्ति संगठन (पैलेस्टी़नियन लिबरेशन ऑर्गनाइज़ेशन, पीएलओ) की स्थागपना हुई। अल फ़तह के साथ-साथ इसमें फ़िलिस्तीन की तमाम प्रमुख पार्टियाँ शामिल हुई। 1967 के युद्ध के बाद पीएलओ में अल फ़तह सबसे प्रमुख पार्टी की तरह उभरी और पीएलओ का नेतृत्व भी फ़तह के नेता यासर अराफात के हाथों में आ गया। अल फ़तह के संघर्ष भी अखिल अरब राष्ट्रवाद को प्रदर्शित करते हैं। फ़तह के योद्धाओं को लेबनान, मिस्र और जॉर्डन संरक्षण देते थे और उनकी सैन्य मदद करते थे।
1973 के अक्टूबर युद्ध के बाद मध्य एशिया में समीकरण बदलने लगे। इस युद्ध में सीरिया और मिस्र इज़रायल के खिलाफ लड़ रहे थे। युद्ध, मिस्र और इज़रायल के बीच युद्ध विराम के समझौते के साथ समाप्त हुआ। लेकिन अब अरब विश्व में अन्तरविरोध और समीकरण बदलते जा रहे थे। नवस्वाधीन अरब देशों के शासक वर्ग में भी फ़िलिस्तीन के अन्याय के विरुद्ध लड़ने का दृढ़ संकल्प कमज़ोर पड़ रहा था। 1970 के अन्त-अन्त तक जॉर्डन ने फ़िलिस्तीन के गेरिल्ला योद्धाओं को बाहर निकाल दिया। मिस्र और इज़रायल के बीच 1978 में कैम्प डेविड समझौता हुआ। यह अखिल अरब राष्ट्रवाद को लगा सबसे ग़हरा धक्का था। अपने हितों की पूर्ति के लिए मिस्र अरब बिरादरी से अलग हटकर फ़िलिस्तीनी हितों की बलि चढ़ा चुका था और अधिकृत क्षेत्र इज़रायली प्रभुत्व के अन्तर्गत तथाकथित फ़िलिस्तीनी स्वायत्तता की अस्पष्ट अवधारणा को मान्यता दे चुका था।
1982 में फ़िलिस्तीनी मुक्ति संघर्ष को एक और धक्का लगा। लेबनान पर इज़रायल के दूसरे आक्रमण, शातिला और साविरा शरणार्थी शिविरों के भीषण नरसंहार और उसके बाद सीरिया समर्थित लेबनानी ग्रुपों एवं सीरिया की सेनाओं द्वारा फ़िलिस्तीनी मुक्ति योद्धाओं के अड्डों के घेराव तथा लेबनान से उनके हटने के बाद फ़िलिस्तीनी मुक्ति संघर्ष को एक गम्भीर क्षति पहुँची।
1980 वह दौर था जब एक-एक कर सभी देश फ़िलिस्तीनी योद्धाओं और फ़िलिस्तीन के मुक्ति संघर्ष का साथ छोड़ने लगे। अरब देशों के आपसी अन्तरविरोध, फूट और साम्राज्यवादी योजनाएँ अखिल अरब राष्ट्र के संघर्ष को कमज़ोर करने के लिए ज़िम्मेदार कारक रहे। साम्राज्यवाद के लिए यह विशेष महत्व रखता था क्योंकि इस क्षेत्र की सबसे बड़ी चुनौती पर अब उसने पार पा लिया था।

इन्तिफ़ादा

8 दिसम्बर 1987 को फ़िलिस्तीनी शरणार्थियों की तीसरी पीढ़ी हाथों में पत्थर लिये और मुट्ठियाँ ताने अपने नारों और लहराते झण्‍डों की ताल पर जोश में आगे बढ़ते ऐलान कर रही थी कि फ़िलिस्तीन पर विजय हासिल करना असम्भव है क्योंकि हम हारे नहीं हैं इसलिए इज़रायल कभी जीत नहीं सकता। साम्राज्यवाद और इज़रायली उपनिवेश से फ़िलिस्तीन को मुक्त कराने में अरब राष्ट्रों के सहयोग से लड़ी गयी लड़ाइयाँ तथा अरब राष्ट्रों द्वारा लड़ी गयी लड़ाइयाँ क़ामयाब नहीं रहीं। 21 साल पहले शुरू हुआ दमन-उत्पीड़न और बेदख़ली बदस्तूर जारी थी। अब एक-एक कर सीरिया, जॉर्डन, मिस्र, लेबनान, लीबिया आदि भी साथ छोड़ रहे थे। फ़िलिस्तीनी मुक्ति के छापामार योद्धाओं के लिए संघर्ष जारी रख पाना दिन पर दिन कठिन होता जा रहा था क्योंकि लेबनान से निकाले जाने के बाद अरब देशों ने उन्हें संरक्षण देने से इनकार कर दिया। मात्र ट्यूनीशिया ने उन्हें शरण दी। स्वयं पीएलओ के भीतर भी टूट और बिखराव का दौर जारी था। इन हालातों में फ़िलिस्तीनी जनता की अरब देशों पर टिकी उम्मीदें टूट रहीं थी। लेकिन उनकी मुक्ति का हौसला बुलन्द था। 1987 में फ़िलिस्तीनी मुक्ति संघर्ष में एक नये दौर का आगाज़ हुआ। आम फ़िलिस्तीनी जनता के हाथों में पत्थर, गुलेल और प्रतिरोध के रचनात्मक रूपों के साथ शुरू हुआ इन्तिफ़ादा जो ज़ायनवादी इज़रायल और पश्चिमी साम्राज्यवाद के लिए अप्रत्याशित प्रतिरोध था। चन्द दिनों में ही गाज़ा मुक्ति संघर्ष के इस नये दौर को जन्म देने वाली उर्वर ज़मीन बना। इन्तिफ़ादा की गर्मी गाज़ा से फैलती हुई पश्चिमी तट (वेस्ट बैंक) और शरणार्थी शिविरों तक पहुँची। मुख्यत: यह इन्तिफ़ादा की उष्मा ही थी जिसकी वजह से स्वतन्त्र फ़िलिस्तीनी राज्य की घोषणा हुई। 1988 में संयुक्त राष्ट्र में 80 देशों ने स्वतन्त्र फ़िलिस्तीनी राज्य को मान्यता दी। अपनी ज़मीन, प्रतिष्ठा़, जैतून के बगीच़ों, सम्मानित ज़िन्दगी और बच्चों के भविष्य के लिए छ: सालों तक चला इन्तिफ़ादा अक्टूबर 1991 में मैड्रिड में हुए शान्ति वार्ता के समय से बिखरने लगा। लोगों को शान्ति वार्ता से उम्मीद थी। उम्मीद थी कि उनके लम्बे संघर्ष को जीत हासिल होगी। लेकिन यह वार्ता बिना किसी परिणाम के समाप्त हुई। साम्राज्यवाद के पंजे फ़िलिस्तीन में गहरे धँसे हुए हैं, इसलिए इतिहास में लड़ाई अभी लम्बी जारी रहेगी।

ओस्लो समझौता और हमास

1991 मैड्रिड की शान्ति वार्ता बिना किसी समाधान के समाप्त हुई। लेकिन अब पीएलओ समझौते के लिए प्रयासरत था। 1993 में ओस्लो समझौता हुआ और पीएलओ के सेक्युलर, रैडिकल बुर्ज़ुआ नेतृत्व और उसके सामाजिक जनवादी सहयोगियों ने संघर्ष के बजाय समझौते के ज़रिये ज़ायनवादियों और उनके अमेरिकी सरपरस्तों से कुछ हासिल करने की कोशिशें शुरू कर दीं। ओस्लो समझौते की ज़मीन कैम्प डेविड में ही तैयार हो गयी थी। अरब विश्व के आपसी मतभेद थे जो धीरे-धीरे और मुख़र होते चले गय। पश्चिमी साम्राज्यवादी देश अन्तत: अरब एकता को तोड़ने में क़ामयाब रहे। अब इस तरह पीएलओ को मिलने वाले समर्थन का स्रोत एक-एक कर सूखता चला गया। अरब विश्व की सबसे मज़बूत ताक़त मिस्र के समझौतापरस्त होने और फ़िलिस्तीनी संघर्ष की पीठ में छुरा घोंपने के बाद पीएलओ के लिए संघर्ष जारी रख पाना सम्भव नहीं रह गया था। इन्तिफ़ादा के दौरान ही अल-फ़तह से जनता की दूरी बढ़ने लगी थी और उसके समझौता परस्ता रवैये की भनक मिलने लगी थी। लेकिन 1993 में गुप्त रूप से हुए ओस्लोे समझौते से यह स्पष्ट हो गया कि पीएलओ का नेतृत्व अब जुझारू संघर्ष की जगह समझौते की राह लेने को तैयार है। अगर यह समझौता समय हासिल करने की रणनीति होती तो जनता को यह सन्देश सम्प्रेषित हो जाता और शायद जनता यही उम्मीद भी लगाये थी। लेकिन समझौता ज़ल्द ही समझौतापरस्ती में बदलता गया। ज़ल्द ही जनता को इन शान्ति वार्ताओं और समझौतों की व्यर्थता उजागर होती चली गयी।
हमास का इतिहास पीएलओ से क़रीबी से जुड़ा हुआ है। यह वह दौर था जब पीएलओ जनता के संघर्ष को जुझारू नेतृत्व दे रहा था और आम फ़िलिस्तीनियों में इसकी गहरी पैठ थी। 1960, 1970 और 1980 के दशक के पूर्वार्ध में फ़िलिस्तीन के स्कूलों-कॉलेजों तथा शरणार्थी शिविरों के स्कूलों में फ़तह और पीएलओ के संगठनों के प्रभाव में एक पूरी पीढ़ी तैयार हो रही थी। इन्तिफ़ादा के समय इन्हीं स्कूलों-कॉलेजों के छात्र सड़कों पर आम जनता के साथ लड़े। हालाँकि पहले इन्तिफ़ादा के समय से ही पीएलओ की लोकप्रियता कम होने लगी थी। ख़ैर, जब पीएलओ फ़िलिस्तीन के मुक्ति संघर्ष के लिए जुझारू तरीके से लड़ रहा था तब पीएलओ इज़रायल और पश्चिमी साम्राज्यवाद के लिए सिर दर्द बना हुआ था। इसलिए साम्राज्यवाद के लिए ज़ल्द ही उसका तोड़ खोजना ज़रूरी था। मिस्र के ‘मुस्लिम ब्रदरहुड’ से जुड़े धार्मिक कट्टरपन्थी संगठन ‘हमास’ को पीएलओ के प्रतिद्वन्द्वी के रूप में उभारा गया। इज़रायली शासकों और अमेरिकी साम्राज्यवादियों का हमास के उभार में परोक्ष समर्थन था। मैड्रिड शान्ति सम्मेलन (1991) और ओस्लो समझौते (1993) के बाद पीएलओ के नेतृत्व की समझौतापरस्ती जैसे-जैसे फ़िलिस्तीन की जनता के सामने उजागर होती चली गई वैसे-वैसे हमास का सामाजिक आर्थिक आधार विस्तारित होता चला गया। दरअसल पीएलओ के जुझारूपन खोते बुर्ज़ुआ नेतृत्व से मोहभंग की शुरुआत तो 1987 के उस व्यापक जनउभार से ही हो चुकी थी, जिसे पहले इन्तिफ़ादा के नाम से जाना जाता है। पीएलओ द्वारा समझौतापरस्ती का रास्ता अपनाने के बाद अमेरिकी-इज़रायली स्कीम में हमास को परोक्ष शह देने की न ज़रूरत रह गयी थी, न ही गुंज़ाइश। इधर मुक्तिकामी जनता की आकांक्षाओं के दबाव तले हमास के चरित्र में भी बदलाव आया। हमास आज ‘अल क़ायदा’ या आईएसआइएस जैसा या ‘मुस्लिम ब्रदरहुड’ जैसा कट्टरपन्थी आतंकवादी संगठन नहीं है (ऐसे कुछ अन्य छोटे संगठन वहाँ हैं)। यह एक व्यापक जनान्दोलन है, जिसका सशस्त्र दस्ता है। यह मुक्त फि़लिस्तीेन में शरिया क़ानून लागू करने, स्त्रियों के लिए पर्दापोशी अनिवार्य करने जैसी या दुनिया के पैमाने पर ज़ेहाद छेड़ने जैसी बातें भी नहीं करता। सच्चाई यह है कि फ़िलिस्तीन में यह सम्भव नहीं। फ़िलिस्तीन की जनता मध्यपूर्व में सबसे आधुनिक, धर्मनिरपेक्ष और प्रगतिशील अवाम में से एक थी और आज भी है। इसी धर्मनिरपेक्ष और प्रगतिशील अवाम के दबाव में आज का हमास वह आतंकवादी हमास नहीं है जिसे साम्राज्यवादियों ने अपने हितों की रक्षा के लिए पैदा किया था। हमास के पास आज सिर्फ़ इसलिए व्यापक समर्थन आधार है, क्योंकि वह ज़ायनवादियों के विरुद्ध जुझारू ढंग से लड़ रहा है। जैसे ही हमास की यह भूमिका नहीं रहेगी, या वह जनता पर किसी क़िस्म की कट्टरपन्थी निरंकुश सत्ता थोपने का प्रयास करेगा वैसे ही कोई नया रैडिकल विकल्प हमास का स्थान ले लेगा। यह याद रखना होगा कि पीएलओ में शामिल जॉर्ज हबाश के नेतृत्व वाले वामपन्थी संगठन पी.एफ.एल.पी ने जब मुख्य घटक (राष्ट्रीय बुर्ज़ुआ चरित्र वाले) अल फ़तह के पिछलग्गू की भूमिका अपनाते हुए समझौते का मार्ग चुना और पी.एफ.एल.पी से अलग हुए रैडिकल वाम धड़े भी जब अपनी यान्त्रिक, संकीर्णतावादी और वाम दुस्साहसवादी ग़लतियों के कारण कोई विकल्प नहीं बन सके, तो इन्हीं स्थितियों में हमास अपनी ताक़त और आधार बढ़ाने में सफल रहा। जनता के पास जनवादी और क्रान्तिकारी विकल्प की रिक्तता में हमास आगे आया। लेकिन आज हमास जनता के बीच रचा-बसा हमास है जिसके योद्धाओं की भर्ती आम फ़िलिस्तीनियों के घरों के नौजवानों से होती है।

इक्कीसवीं सदी और फ़िलिस्तीन का मुक्ति संघर्ष

फ़िलिस्तीन में इक्कीसवीं सदी की शुरुआत एक बार फिर जनसंघर्षों के आगाज़ से हुई। शान्ति वार्ताओं से थकी हुई फ़िलिस्तीन की जनता अपनी मुक्ति के लिए फिर उठ खड़ी हुई। फ़िलिस्तीनी जनता को पीएलओ से कोई उम्मीद बाक़ी नहीं रह गयी थी, वह फिर सड़कों पर उतरी। पहला इन्तिफ़ादा उसकी इसी अथक और दुर्द्धर्ष संघर्ष की शुरुआत थी। ओसलो समझौते और शान्ति वार्ताओं के झुनझुने से ऊबी फ़िलिस्तीन की आबादी और नौजवान 2000 में फिर से मुट्ठियाँ भींचे, गुलेल खींचे और पत्थरों से निशाना साधते सड़कों पर उमड़े। आहत उम्मीदें, रौंदे विश्वास और मुक्ति की आदिम चाहत के साथ एक बार फिर शुरू हुआ इन्तिफ़ादा, फ़िलिस्तीन का दूसरा इन्तिफ़ादा। फ़िलिस्तीनी की जनता ख़ामोश अपने सपनों को बर्बाद होते, अपनी ज़िन्दगी को फ़ौजी बूटों के तले रौंदते और घरों को बारूद से उड़ते नहीं देखना चाहती थी। उसे आदत हो गयी है विश्व के गूँगे-बहरे हुक़्मरानों की और ख़ुद अपने अरब देशों के शासकों की नीची निगाहों की। वह फिर से सड़कों पर उतरी अपने सपनों के साथ और अपनी मुक्ति के अमिट गान के साथ गुलेल, पत्थर, भिंची मुट्ठियों और लहराते झण्डों के साथ!
वेस्ट बैंक (पश्चिमी तट) में जनता लड़ रही थी और गाज़ा में जनता के साथ हमास भी लड़ रहा था। गाज़ा में हुए मिसाइल हमले का जवाब हमास ने भी मिसाइल और बमों से दिया। दूसरे इन्तिफ़ादा ने 15,000 कट्टर ज़ायनवादियों और यहूदी बस्तियाँ बसाने वालों को गाज़ा और वेस्ट बैंक के उत्तर के इलाके से बाहर करने के लिए इज़रायल को मजबूर कर दिया। यहूदी बस्तियाँ तो हट गयीं लेकिन जल और थल के सारे रास्ते बन्द कर इज़रायल ने गाज़ा को एक खुली जेल में तब्दील कर दिया।
2006 में इज़रायल के अपराजेय होने का घमण्ड टूटा। लेबनान में एक छोटे से छापामार समूह हिजब्बुल्ला के हाथों इज़रायल की बेइज़्जती वाली हार हुई। 2006 में आम चुनावों में हमास गाज़ा में सबसे बड़ी पार्टी की तरह उभरा और उसने चुनी हुई सरकार का गठन किया। लेबनान में मुँह की खाने और हमास की सरकार बनने से घबराया इज़रायल और अमेरिकी साम्राज्यवाद हमास को आतंकवादी क़रार दे कर गाज़ा में हमले करता है। शुरुआत 2006 से हुई फिर 2008-09, 2012, 2014, 2018 और अब 2021। जिस तरह इन हमलों में गाज़ा के आम नागरिक, मासूम बच्चे , औरतें, बुज़ुर्ग और बीमार निशाना बनते हैं, इसमें कोई गुंज़ाइश नहीं रह जाती कि नस्ली श्रेष्ठता पर आधारित ज़ायनवादी सोच पूरी फ़िलिस्तीन की आबादी का ही सफ़ाया करना चाहती है। इज़रायल के नेता और मन्त्री, चाहे स्त्री हो या पुरुष एक सुर में नस्ली सफ़ाये की बात चीख-चीख कर करते हैं।
इस वर्ष मई 2021 की शुरुआत में इज़रायली हमले का कारण बने यरुशलम के पूर्व में शेख ज़र्रा इलाक़ा, जो अरब फ़िलिस्तीनियों के अधिकार में है। वहाँ इज़रायली सेना राजधानी के निर्माण के नाम पर ज़बरन उनके घरों में घुस कर उन्हें बाहर निकालने और घरों पर क़ब्ज़ा जमाने का प्रयास करने लगी। 2017 में यरुशलम को इज़रायल की राजधानी होने के इज़रायल के दावे का अमेरिका के तत्कालीन राष्ट्रपति ट्रम्प ने समर्थन किया था। हालाँकि संयुक्त राष्ट्र के 128 देशों ने इस प्रस्ताव को रद्द कर दिया। यरुशलम के इज़रायल की राजधानी होने का ख़ुद ही दावा करते हुए इज़रायल का तत्काकलीन प्रधानमन्त्री नेतन्याहू अब उसके एक हिस्सें में बसे फ़िलिस्तीनियों को बाहर निकाल रहा था। लेकिन असलियत क्या है? हम जानते हैं कि इज़रायल फ़िलिस्तीन में एक औपनिवेशिक सेटलर परियोजना है जो पश्चिमी साम्राज्यवादियों के हितों की मध्य पूर्व में सेवा के लिए बनाया गया है। और इस “स्वायत्त राष्ट्र्’’ में “राजधानी का निर्माण’’ वहाँ के असली राष्ट्र्, यानी फ़िलिस्तीनियों को बेदख़ल कर, उनका क़त्ल कर और उन पर बेइन्तहाँ ज़ुल्म ढा कर किया जा रहा है। सीधे शब्दों में इसे गुण्डागर्दी, लठैती और दबंगई कहते हैं जो ज़ायनवादी रोज़ साम्राज्यवादियों की शह पर वहाँ करते हैं। फ़िलिस्तीनियों ने हज़ारों की संख्या में एकत्र हो प्रतिरोध किया। प्रतिरोध की जगह अल-अक्सा मस्ज़िद बना। और अगले ही दिन प्रतिरोध में हमास ने गाज़ा से बमबारी की। फिर इज़रायल की ओर से गाज़ा पर बमबारी शुरू हो गयी। हमास ने इज़रायलियों द्वारा फ़िलिस्तीनियों को उनके घरों से बाहर निकालने और अल-अक्सा मस्ज़िद पर हमले के प्रतिरोध में मिसाइल हमला किया। हालाँकि अत्याधुनिक सैन्य तकनीक से लैस इज़रायल के लिए यह हमला बहुत भारी नहीं पड़ता। लेकिन ज़मीनी लड़ाई में वह गाज़ा में नहीं टिक सका। अमेरिका के बूते तैयार उन्नत सैन्य तकनीक और विकसित सुरक्षा इन्तज़ाम (डिफेंस मेकेनिज्म) के बूते ग़ाजा पर मिसाइल हमले करता है और अपनी रक्षा कर लेता है। लेकिन गाज़ा के जाँबाज़ इनसे डरते नहीं, वे लड़ते हैं।
अरब विश्व के देशों ने अपनी स्वाधीनता के बाद जो रास्ता चुना, वह पूँजीवादी विकास का रास्ता था। कई देशों में अलग-अलग अंशों में रैडिकल बुर्ज़ुआ सुधार के क़दम उठाये गये, कुछ देशों में सामन्ती सम्बन्धों के क्रमिक पूँजीवादी रूपान्तरण का रास्ता अपनाया गया। वे सभी विश्व पूँजीवादी तन्त्र का हिस्सा बने रहे। कुछ ही दशकों में इन देशों में इस रास्ते के परिणाम नज़र आने लगे। एक ओर मुट्ठीभर अमीरों की जमात पैदा हुई तो दूसरी ओर जनता की बदहाली बढ़ती गयी। बुर्ज़ुआ जनवाद का दायरा वहाँ बेहद सीमित होता गया। अपनी अर्थव्यवस्थाओं के ठहराव को तोड़ने के लिए पश्चिम की पूँजी के लिए दरवाज़ा खोलना उनके लिए लाज़िमी हो गया। निजीकरण, उदारीकरण की नीतियों की वजह से बेरोज़़गारी, महँगाई और भ्रष्टाचार में बेतहाशा बढ़ोत्तरी हुई। चाहे साम्राज्यवाद के पिट्ठू शेखों-शाहों की सत्ता हो, लोकप्रिय जनउभार की लहर पर सवार होकर व्यापक जनसमर्थन से तख़्तापलट करके सत्ता में आये सैनिक शासक हों या फिर अल्जीरिया और ट्यूनीशिया की रैडिकल बुर्ज़ुआजी का प्रतिनिधित्व करने वाले बेन बेला एवं बूमेदियेन और हबीब बूर्गीबा के उत्तराधिकारियों की सत्ताएँ हों, उदारीकरण के दौर में पूँजी का पाटा चला, तो सब एक ही श्रेणी में पहुँच गये। साम्राज्यवादी पूँजी के आगे घुटने टेकने के अलावा उनके पास कोई विकल्प नहीं था। एक समय लोकप्रिय रही सत्ताएँ भी भ्रष्टाचार, संसाधनों की लूट और निरंकुश दमनकारी शासन के कारण लोगों की नफ़रत का पात्र बन गयीं। साथ ही इन सत्ताओं द्वारा फ़िलिस्तीनी मुक्ति संघर्ष को धोखा देना इन्हें इनकी जनता की निगाह में और गिरा देता है।
आज पूरा का पूरा मध्यपूर्व ही ज्वालामुखी के मुहाने पर बैठा है। आधुनिक साम्राज्यवाद के लिए सबसे महत्वपूर्ण रणनीतिक क्षेत्र होने की क़ीमत फ़िलिस्तीनी और पूरे मध्यपूर्व की जनता बीसवीं सदी के दूसरे दशक से चुकाती चली आयी है। विश्व में सबसे अधिक प्रवासी और शरणार्थी अगर कहीं के हैं, तो वह है मध्यपूर्व। इराक़, ईरान, सीरिया, यमन, फ़िलिस्तीन, मिस्र, सहित इस पूरे क्षेत्र को साम्राज्यवादी हितों की रक्षा और साम्राज्यवादी चौधराहट बनाये रखने के लिए अमेरिका जलाता-सुलगाता रहा है। मध्यपूर्व एक खुला युद्ध क्षेत्र बना हुआ है जहाँ शहरों, गाँवों और बस्तियों पर बिना सोचे बेरहमी से बमबारी की जाती है; छोटे बच्चे जहाँ रातों को भय से सो नहीं पाते, माएँ हर रात दुआ कर सोती हैं कि सुबह अपने बच्चों का मुँह देख पायें; पिता असहाय-लाचार अपने जले खेतों-खलिहानों को देख कर डरता है कि आने वाले दिन वह अपने भूखे बच्चों का मुँह कैसे देखेगा; यह सतत् त्रासदी से गुज़रता क्षेत्र है जिसकी तुलना कहीं से नहीं की जा सकती। वज़ह हम पहले ही बता चुके हैं इस क्षेत्र का रणनीतिक महत्व। स्पष्ट है कि जनता इस क़दर भयभीत, लाचार और मुफ़लिसी का जीवन लगातार जीती नहीं चली जायेगी। वह लगातार लड़ तो रही है लेकिन एक सही मुकम्मल मंजि़ल तक पहुँचने के लिए सही राजनीतिक दिशा और समझदारी की आवश्यकता है।
फ़िलिस्तीन एक राष्ट्र के तौर पर अपने दमन और उत्पीाड़न के खि़लाफ़ संघर्ष कर रहा है और यह संघर्ष कई दौरों से गुज़र चुका है। फ़िलिस्तीन की आज़ादी के साथ दो पहलू जुड़े हुए हैं। एक राष्ट्र के तौर पर फ़िलिस्तीन की स्वतन्त्रता; दूसरा जा़यनवादी इज़रायल का साम्राज्यवादी निर्मिति होने की वजह से फ़िलिस्तीन का पूरे मध्य पूर्व से जुड़ा होना। इज़रायल पश्चिमी साम्राज्यवाद का लठैत है। 1949 से लेकर अब तक अमेरिका ने इज़रायल को जितने पैसे दिये हैं उसे देख कर यह अन्दाज़ा लगाया जा सकता है कि अमेरिका ने इस लठैत को पूरे लाड़ से पाल-पोस कर बड़ा किया है जो पहले ब्रिटेन का बच्चा ‘अल्स्टर’ था, बाद में अमेरिका का लठैत हुआ। शान्ति के लिए नोबल पुरस्कार पाने वाले बराक ओबामा ने सहयोग के तौर पर अब तक की सबसे बड़ी राशि देने की शुरुआत की। 2016 से आने वाले दस सालों के लिए प्रति वर्ष 380 करोड़ डॉलर की राशि इज़रायल को मिल रही है। निश्चित ही यह पैसा इज़रायल को फ़िलिस्तीनियों पर ज़्यादती करने, उनकी ज़मीने हड़प कर यहूदी बस्तियाँ बसाने मात्र के लिए नहीं दी जाती। यह क़ीमत है इस क्षेत्र पर अपने नियन्त्रण को बनाये रखने की। इसलिए फ़िलिस्तीन की मुक्ति इस पूरे क्षेत्र से साम्राज्यवादी नियन्त्रण की समाप्ति से जा कर जुड़ती है। पश्चिमी साम्राज्यवाद के निहित स्वार्थों की वजह से यह क्षेत्र लम्बे समय से साम्राज्यवाद की एकल गाँठ बना हुआ है। समूचे अरब में अमेरिका और इज़रायल के ख़िलाफ़ जो नफ़रत भरी है, वह आने वाले समय में फूटेगी। अरब वसन्त के अनुभव से यह बात स्पष्ट हो जाती है कि सच्ची जनवादी और प्रगतिशील क्रान्तिकारी ताक़तों का नये अरब जनउभार को नेतृत्व देना अनिवार्य शर्त है क्योंकि तब ही ये ताकतें अमेरिकी साम्राज्यवाद और ज़ायनवादी इज़रायल के विरुद्ध दृढ़ता से खड़ी होंगी। अभी भले ही इस दिशा में मुखर कुछ होता नहीं दिख रहा है लेकिन फिर भी, दो बातें स्पष्ट हैं। एक यह कि ऐसी क्रान्तिकारी ताक़तों के खड़े होने की प्रक्रिया साम्राज्यवाद और ज़ायनवाद के हर आक्रमण के साथ बढ़ेंगी। दूसरे, अरब जनता भी देख रही है कि इस्लामिक कट्टरपन्थी ताक़तें निरन्तरतापूर्ण तरीक़े से अमेरिकी साम्राज्यवाद और इज़रायली ज़ायनवाद का विरोध नहीं कर रही हैं। तमाम वर्तमान उदाहरण मौजूद हैं जिसमें कि धार्मिक कट्टरपन्थी ताक़तें साम्राज्यवादियों और ज़ा‍यनवादियों के साथ समझौते और सौदे कर रही हैं। ऐसे में, जनता के बीच नये क्रान्तिकारी विकल्पों के खड़े होने की सम्भावनाएँ पैदा हो सकती हैं, क्योंकि अरब जनता ने साम्राज्यवाद और ज़ायनवाद के धार्मिक कट्टरपन्थी विरोध की सीमा और असलियत देख ली है।
अरब विश्व में क्रान्ति की शुरुआत कहीं से हो सकती है। किसी भी अरब देश से और यह पूरे क्षेत्र में जंगल की आग की तरह फैल जाएगी। एक उन्नत स्तर की अखिल अरब एकजुटता सामने आयेगी। 1960 के दशक के बाद इतिहास में अखिल अरब राष्ट्र को नेतृत्व देने वाली बुर्ज़ुआजी अपनी प्रगतिशील सम्भावनाओं से रिक्त हो चुकी है। इ‍सलिए किसी भी नये अखिल अरब उभार का चरित्र सर्वहारा होने की सम्भावनाएँ अधिक हैं। फ़िलिस्तीन में आज क्रान्ति की मंजिल राष्ट्रीय जनवादी है। चूंकि वहाँ की बुर्ज़ुआजी का बड़ा हिस्सा ढुलमुल है और समझौतापरस्त हो गया है, इसलिए अधिक सम्भावना यह है कि यह निम्न-मध्य वर्ग, मध्यवर्ग और किसान आबादी को साथ लेकर सर्वहारा वर्ग के नेतृत्व में ही सम्पन्न हो सकती है। यह भी सच है कि ऐसी क्रान्ति के सम्पन्न होते ही वह बिना रुके बेहद जल्दी समाजवादी क्रान्ति की मंजिल में पहुँच जाएगी क्योंकि फ़िलिस्तीन में सामन्ती अवशेष लुप्तप्राय ही हैं और राष्ट्रीय जनवादी क्रान्ति की मंजिल सिर्फ राष्ट्रीय कार्यभार के अपूर्ण होने की वजह से है। दूसरी सम्भावना यह है कि फ़िलिस्तीन में ऐसे किसी भी ‘ब्रेकथ्रू’ का नतीजा समाजवादी क्रान्ति की आग के पूरे अरब विश्व में फैलने के रूप में सामने आएगी। और तीसरी सम्भावना यह है कि यह आग अरब विश्व में भी सीमित नहीं रहेगी। वजह यह है कि पहले से संकट से कराह रहे साम्राज्यवाद के हाथ से मध्य पूर्व के क्षेत्र के निकलने का अर्थ उसके संकट का अन्तकारी रूप से गहराना होगा जो ऐसे युद्धों को जन्म दे सकता है जो कि नयी समाजवादी क्रान्तियों की एक श्रृंखला की शुरुआत कर सकता है। मध्यं-पूर्व और विशेष तौर पर फ़िलिस्तीन आज साम्राज्यवाद की एक महत्वपूर्ण गांठ है जहां कई अन्तरविरोधों के सन्धि-बिन्दु बनते हैं। लेकिन अभी निकट भविष्य में ऐसी कोई शक्ति फ़िलिस्तीन में दिखाई नहीं दे रही है, जो इस प्रक्रिया की शुरुआत कर सके। लेकिन इतिहास और क्रान्ति अपना रास्ता बना लेते हैं।

ज़ुल्म और मौत के
काले, अँधेरे समन्दर में
लहरों से जूझती कश्तियों के
तने हुए पालों के ऊपर
सिर उठाये चमकती हैं
शहादतों की कन्दीलें
दुनिया को पुकारती हुई,
अन्याय के विरुद्ध
अनवरत संघर्ष का सन्देश
सभी जीवित दिलों तक
भेजती हुई!
– कविता कृष्णपल्लवी

मुक्तिकामी छात्रों-युवाओं का आह्वान, मार्च-जून 2021

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