हिटलर के तम्बू में

नागार्जुन

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अब तक छिपे हुए थे उनके दाँत और नाख़ून।

संस्कृति की भट्ठी में कच्चा गोश्त रहे थे भून।

छाँट रहे थे अब तक बस वे बड़े-बड़े क़ानून।

नहीं किसी को दिखता था दूधिया वस्त्र पर ख़ून।

अब तक छिपे हुए थे उनके दाँत और नाख़ून।

संस्कृति की भट्ठी में कच्चा गोश्त रहे थे भून।

 

मायावी हैं, बड़े घाघ हैं, उन्हें न समझो मन्द।

तक्षक ने सिखलाये उनको ‘सर्प नृत्य’ के छन्द।

अजी, समझ लो उनका अपना नेता था जयचन्द।

हिटलर के तम्बू में अब वे लगा रहे पैबन्द।

मायावी हैं, बड़े घाघ हैं, उन्हें न समझो मन्द।

गुजरात – 2002

कात्यायनी (अप्रैल 2002)

modi

भूतों के झुण्ड गुज़रते हैं

कुत्तों-भैसों पर हो सवार

जीवन जलता है कण्डों-सा

है गगन उगलता अन्धकार।

यूँ हिन्दू राष्ट्र बनाने का

उन्माद जगाया जाता है

नरमेध यज्ञ में लाशों का

यूँ ढेर लगाया जाता है।

यूँ संसद में आता बसन्त

यूँ सत्ता गाती है मल्हार

यूँ फासीवाद मचलता है

करता है जीवन पर प्रहार।

इतिहास रचा यूँ जाता है

ज्यों हो हिटलर का अट्टहास

यूँ धर्म चाकरी करता है

पूँजी करती वैभव-विलास।
 

मुक्तिकामी छात्रों-युवाओं का आह्वान, सितम्‍बर-दिसम्‍बर 2013