मिस्र के बहादुर नौजवानों को सलाम!
नौजवान जब भी जागा, इतिहास ने करवट बदली है!

सत्यम

मिस्र के बहादुर नौजवानों और मज़दूरों की बग़ावत ने दिखा दिया है कि ताकतवर से ताकतवर तानाशाह भी जनता की ताकत के सामने बौने साबित होते हैं। ज़बरदस्त जनउभार के 18 दिनों के बाद 11 फरवरी को 30 साल से मिस्र पर राज कर रहे तानाशाह हुस्नी मुबारक को इस्तीफ़ा देकर भागना पड़ा। बेशक, मिस्र की जनता की जीत अभी अधूरी है, मुबारक के बाद सत्ता उसी सेना के हाथों में आयी है जिसके दम पर मिस्र में शोषक-उत्पीड़क शासन का ढाँचा टिका हुआ है। लेकिन, लड़ाई अभी ख़त्म नहीं हुई है। पिछले 3 हफ़्तों में सड़कों पर उतरे लाखों-लाख लोग चुपचाप घरों में नहीं बैठ जायेंगे। इस जनोद्रेक ने पूरे मिस्री समाज में जो ज़बरदस्त उथल-पुथल पैदा की है, वह दूध के उबाल की तरह शान्त होने वाली नहीं है। न मिस्र का समाज और न पूरा अरब जगह अब पहले जैसा रह पायेगा। इन 18 दिनों ने पूरे अरब जगत ही नहीं, दुनिया को भी हिलाकर रख दिया है। अल्जीरिया और यमन में अगले ही दिन हज़ारों लोग सड़कों पर उतर आये। जॉर्डन और सूडान में भी प्रदर्शन शुरू हो गये हैं। पूरे अरब क्षेत्र में खलबली मची हुई है।

25 जनवरी से 11 फरवरी तक सारी दुनिया की नज़रें मिस्र की राजधानी काहिरा के तहरीर चौक (आज़ादी चौक) पर टिकी रहीं, जहाँ मिस्र के नौजवान, मेहनतकश और औरतें, जानलेवा गोलियों, आँसू गैस के गोलों, पानी की बौछारों और बर्बर पिटाई का सामना करते हुए डटे रहे और सत्ता के नशे में चूर उद्दण्ड तानाशाह को घुटने टेकने पर मजबूर कर दिया। 18 दिनों में 350 से ज़्यादा आन्दोलनकारी मारे गये और 5000 से भी ज़्यादा ज़ख़्मी हुए लेकिन लोगों को कुचलने की हर कोशिश के जवाब में पहले से भी ज़्यादा लोग सड़कों पर उतर आये।

दुनियाभर के इंसाफपसन्द और आज़ादीपसन्द नौजवानों के लिए तहरीर चौक उम्मीद और प्रेरणा का नया स्रोत बन गया, मगर इस जनविस्फोट ने अरब विश्व की तमाम निरंकुश सत्ताओं के होश उड़ा दिये हैं। भारत और चीन जैसे देशों के पूँजीवादी अत्याचारी शासकों की बेचैनी भी बढ़ गयी है।

Egypt youths

यह लेख लिखे जाने तक मुबारक ने एकाएक रुख़ पलटते हुए इस्तीफ़ा दे दिया था और सारे अधिकार सेना को सौंप दिये थे। ज़ाहिर है कि यह कदम अमेरिका और दूसरे साम्राज्यवादी देशों के दबाव में उठाया गया जिन्हें डर था कि लगातार उग्र और व्यापक होते जन-आन्दोलन की आँधी में कहीं उनके हितों की रखवाली करने वाला पूरा ढाँचा ही न उखड़ जाये। मिस्र के मज़दूरों की इस आन्दोलन में बढ़ती हिस्सेदारी से वे और घबरा गये थे। पिछले कई दिनों से मिस्र में जारी औद्योगिक हड़तालों की लहर और 11 फरवरी को लाखों मज़दूरों के तहरीर चौक पहुँचने के ऐलान ने भी मिस्र के सत्ताधारियों और उनके सरपरस्तों को मुबारक को हटाने का फ़ैसला लेने पर मजबूर कर दिया।

दशकों से दबा ग़ुस्सा फूटा और खौलते लावे की तरह उमड़ पड़ी जनता सड़कों पर

विस्फोट की पहली चिंगारी अरब विश्व के एक और देश ट्यूनीशिया में फूटी थी। 17 दिसम्बर, 2010 को 26 वर्ष के एक ग़रीब सब्ज़ीवाले ने पुलिस उत्पीड़न से तंग आकर सरेआम आत्मदाह कर लिया। भयानक महँगाई और व्यापक बेरोज़गारी से जूझ रही ट्यूनीशिया की जनता को इस घटना ने झकझोर डाला। एक शहर में शुरू हुआ विरोध जल्दी ही देशभर में फैल गया। राष्ट्रपति ज़ैनुल आबेदीन बेन अली की सत्ता ने विरोध प्रदर्शनों के हिंसक दमन का सहारा लिया, लेकिन हर दमन के बाद विरोध की लहरें और प्रचण्ड होती गयीं और आख़ि‍रकार 14 जनवरी को बेन अली को देश छोड़कर भागना पड़ा। ट्यूनीशिया में विरोध-प्रदर्शन अब भी जारी हैं, लोग माँग कर रहे हैं कि बेन अली की सत्ता से जुड़े सभी अधिकारियों और नेताओं को नयी सरकार से बाहर किया जाये।

बेन अली की क्रूर सत्ता के पतन से पूरे अरब विश्व में जैसे बिजली दौड़ गयी। ट्यूनीशिया के पड़ोसी देश अल्जीरिया में व्यापक प्रदर्शन शुरू हो गये। इससे पहले ही, जनवरी के शुरू में वहाँ चार दिनों तक चले विरोध-प्रदर्शनों पर पुलिस के हमलों में सैकड़ों लोग घायल हुए थे और कम से कम तीन की मौत हो गयी थी। क्षेत्र के सबसे ग़रीब देश यमन में व्यापक विरोध-प्रदर्शन हुए। जॉर्डन में भी महँगाई के ख़िलाफ जनता सड़कों पर उतर आयी।

मिस्र में 25 जनवरी को तहरीर चौक पर एक बड़े विरोध-प्रदर्शन का आह्वान किया गया। इसके पीछे मुख्य शक्ति मिस्र के शिक्षित नौजवानों के समूह थे, जिन्होंने अपना सन्देश फैलाने के लिए फ़ेसबुक जैसी सोशल नेटवर्किंग साइटों का बड़े पैमाने पर इस्तेमाल किया। दरअसल मिस्र में सतह के नीचे बारूद तो लम्बे समय से जमा हो रहा था। 6 जून 2010 को खालिद सईद नाम के एक नौजवान को पुलिस ने क्रूर यातनाएँ देकर इसलिए मार डाला था, क्योंकि उसने ज़ब्त की गयी नशीली दवाओं को आपस में बाँटते पुलिसवालों का एक वीडियो अपने ब्लॉग पर अपलोड किया था। मिस्र की सरकार ने इस हत्या को पहले तो दबाने की कोशिश की और फिर सरकारी टीवी और प्रिण्ट मीडिया खालिद को ड्रग्स का तस्कर साबित करने में जुट गये। इसके विरोध में नौजवानों ने “हम सब खालिद सईद हैं” नाम से वेबसाइट बनाकर ऑनलाइन मुहिम छेड़ दी। इस मुहिम को मिस्र के 29 साल पुराने इमरजेंसी कानून के ख़िलाफ चल रहे युवाओं के आन्दोलन का समर्थन मिला और जल्दी ही यह मुहिम ऑनलाइन चर्चा समूहों से मिस्र के दूसरे सबसे बड़े शहर सिकन्दरिया की सड़कों पर विरोध-प्रदर्शनों में तब्दील हो गयी। 1981 में राष्ट्रपति बनने के बाद से हुस्नी मुबारक की सत्ता विरोध की हर आवाज़ को दबाने के लिए इमरजेंसी कानून का जमकर इस्तेमाल करती रही थी। आज भी कम से कम 30,000 लोग इस काले कानून के तहत जेलों में हैं, जो पुलिस को बिना आरोप किसी को भी गिरफ़्तार करने का अधिकार देता है, सरकार को राजनीतिक संगठनों पर पाबन्दी लगाने की शक्ति देता है और बिना इजाज़त पाँच से अधिक लोगों के इकट्ठा होने को ग़ैर-कानूनी ठहराता है।

इस अभियान को पूरे मिस्र के नौजवानों का समर्थन मिला। इनमें से एक समूह था ‘6 अप्रैल युवा आन्दोलन’। इसकी शुरुआत 29 साल के इस्रा अब्दुल फतह और 30 साल की सिविल इंजीनियर अहमद माहिर ने अल-मुहल्ला अल-कुबरा नाम के एक शहर में 6 अप्रैल 2010 को होने वाली मज़दूरों की हड़ताल के समर्थन में फ़ेसबुक पर पेज बनाकर की थी। उन्होंने अपने फ़ेसबुक पेज पर हज़ारों लोगों को इस मज़दूर हड़ताल में शामिल होने और इसका समर्थन करने के लिए प्रेरित किया और कुछ ही हफ़्तों में इसके एक लाख से भी ज़्यादा सदस्य बन गये। हड़ताल के बर्बर दमन के साथ ही अब्दुल फतह और माहिर को भी गिरफ़्तार करके यातनाएँ दी गयीं और कई सप्ताह तक जेल में रखा गया, मगर बाहर आकर उनका संकल्प और भी फ़ौलादी हो गया।

26 वर्षीय अस्मा महफ़ूज़ भी इस समूह की एक सक्रिय सदस्य है। उसी ने अपने फ़ेसबुक पेज पर डाली गयी भावनात्मक वीडियो अपील के ज़रिये 25 जनवरी को तहरीर चौक पर पहुँचने का आह्वान किया था। फ़ेसबुक पर यातना, ग़रीबी, भ्रष्टाचार और बेरोज़गारी के ख़िलाफ इन्‍क़लाब का दिन के नाम से जारी आह्वान पर एक लाख लोगों ने दस्तख़त करते हुए कहा कि इसका मकसद है – “हमारे देश में जो कुछ हो रहा है उस पर जारी चुप्पी को तोड़ना और सिर झुकाकर सहते जाने का अन्त करना।” 25 जनवरी को हज़ारों-हज़ार लोग काहिरा की सड़कों पर उतर पड़े। सिकन्दरिया, मंसूरा, असवान, और असीयत शहरों में भी बड़े प्रदर्शन हुए। जल्दी ही इसने एक देशव्यापी जनउभार का रूप ले लिया।

सरकार ने पहले दिन से ही दमन का सहारा लिया। शुरुआती तीन दिनों में ही कम से कम 150 लोग मारे गये और सैकड़ों घायल हो गये। इनमें से ज़्यादातर पुलिस की गोलियों और नज़दीक से चलाये गये आँसू-गैस के गोलों के शिकार हुए थे। बढ़ते देशव्यापी विरोध को देखकर हुस्नी मुबारक ने 1 फरवरी को ऐलान किया कि वह सितम्बर में गद्दी छोड़ देगा। लेकिन अगले ही दिन प्रदर्शनकारियों पर बर्बर हमला करवा दिया गया। ऊँटों और घोड़ों पर सवार हज़ारों बिना वर्दी के पुलिसवालों और अपराधियों ने डण्डों, चाबुकों और तलवारों से तहरीर चौक में जमा लोगों पर हमला बोल दिया। वे गोलियाँ भी चला रहे थे। जेलों से हज़ारों अपराधियों को लूटपाट करने और अफरा-तफरी फैलाने के लिए छोड़ दिया गया, ताकि मुबारक के इस दावे पर लोगों को यकीन हो जाये कि आन्दोलन से देश में अराजकता फैल रही है। लेकिन मिस्त्र के नौजवान इसके लिए भी तैयार थे। उन्होंने तहरीर चौक में हमलावरों की हर लहर का ज़बरदस्त मुकाबला किया और उन्हें खदेड़कर ही दम लिया। रिहायशी इलाकों में नौजवानों, महिलाओं और बुज़ुर्गों ने पीपुल्स कमेटियाँ बनाकर पहरा दिया और लूटपाट करने आये अपराधियों को पकड़-पकड़कर सेना के हवाले कर दिया। 2 फरवरी की रात तहरीर चौक में हुए संघर्ष में सैकड़ों नौजवान बुरी तरह ज़ख़्मी हुए और बहुतेरे मारे भी गये लेकिन उन्होंने मोर्चा नहीं छोड़ा। इतना ही नहीं, मिस्त्र के नौजवानों ने अपनी ऐतिहासिक विरासत की हिफाज़त भी शानदार तरीके से की। तहरीर चौक के पास स्थित ‘इजिप्ट म्यूजियम’ मिस्त्र की प्राचीन सभ्यता का सबसे बड़ा संग्रहालय है। उस रात लुटेरों के हुजूम बार-बार लूटपाट और आगज़नी के लिए उस पर धावा बोलते रहे लेकिन नौजवानों ने ख़ुद भारी नुकसान उठाकर भी संग्रहालय पर कोई आँच नहीं आने दी।

तहरीर चौक की तस्वीरें तो मीडिया के ज़रिये सारी दुनिया में देखी गयी हैं लेकिन काहिरा की विशालकाय झुग्गी-बस्तियों (जिनमें राजधानी की कुल 80 लाख में से 50 लाख आबादी रहती है) में भी मेहनतकश लोग लगातार पुलिस से जूझते रहे। मिस्त्र के कपड़ा उद्योग के केन्द्र अल-मुहल्ला अल-कुबरा में और हज़ारों छोटे-छोटे कारख़ानों वाले स्वेज़ शहर में मज़दूरों ने सड़कों पर पुलिस से लोहा लिया। पुलिस की गोलियों से एक ही दिन कम से कम 11 मज़दूर मारे गये और 200 घायल हो गये। फ़िलस्तीन और इज़रायल की सीमा से लगे सिनाई रेगिस्तान में बसने वाले बद्दू कबीलाई लोगों और पुलिस के बीच कई जगह जमकर गोलीबारी हुई।

आन्दोलन के दौरान मुबारक ने कई बार पैंतरे बदले। 28 जनवरी को उसने अपना मन्त्रिमण्डल बर्खास्‍त कर दिया (जैसा वह पहले भी कर चुका था) लेकिन हटने से इंकार कर दिया। विरोध-प्रदर्शनों के बर्बर दमन को जायज़ ठहराते हुए उसने दावा किया कि “पूलिस बल नौजवानों से जिस ढंग से निपट रहे हैं वह दरअसल उन्हें बचाने की कोशिश है… वरना ये प्रदर्शन ऐसे दंगे-फसाद का रूप ले लेंगे जो व्यवस्था को ख़तरे में डाल देंगे और नागरिकों की जिन्दगी को बाधित कर देंगे।” प्रदर्शनों का दायरा और उग्रता जैसे-जैसे बढ़ती गयी, अमेरिका और दूसरे साम्राज्यवादी मुल्कों के दबाव में मुबारक ने अपने विश्वासपात्र खुफिया प्रमुख उमर सुलेमान को उप-राष्ट्रपति बनाकर बातचीत का दाँव खेला। मुसलिम ब्रदरहुड, वफ्द पार्टी और अल-बरदेई जैसी शक्तियाँ जो काफी बाद में विरोध-प्रदर्शनों में शामिल हुई थीं, और कुछ अन्य विपक्षी दल इस जाल में फँस भी गये। लेकिन नौजवान लगातार इस रुख़ पर डटे रहे कि मुबारक के हटने तक कोई बातचीत नहीं होगी। उन्होंने विपक्षी पार्टियों को भी अपना रुख़ बदलने पर मजबूर कर दिया।

संघर्षों के बीच से उभरा नया युवा, गतिशील, जुझारू नेतृत्व

मिस्र के जनउभार को लेकर कई तरह की भ्रान्तियाँ मौजूद हैं। कुछ लोगों को लगता है कि यह पूरी तरह स्वतःस्फूर्त उभार था जिसके पीछे कोई संगठित ताकत या नेतृत्व नहीं है, तो कुछ लोग इस्लामी संगठन मुसलिम ब्रदरहुड या फिर संयुक्त राष्ट्र के पूर्व शस्त्र निरीक्षक अल-बरदेई के प्रभाव को काफ़ी बढ़ा-चढ़ाकर आँकते हैं। बेशक आन्दोलन का कोई बहुत संगठित नेतृत्व नहीं था लेकिन न तो यह पूरी तरह स्वतःस्फूर्त बग़ावत थी और न ही नेतृत्वविहीन। विभिन्न शक्तियों ने इसे संगठित करने और नेतृत्व देने में भूमिका निभायी है। इनमें सबसे बड़ी और प्रभावी भूमिका नौजवानों के विभिन्न समूहों की रही है, जिनमें प्रमुख हैं – ‘6 अप्रैल युवा आन्दोलन’ और हम सब खालिद सईद हैं’ समूह। इसके अलावा, डेमोक्रेटिक फ़्रण्ट, करामा (सम्मान) पार्टी, किफ़ाया (बहुत हो चुका) आन्दोलन, वफ्ऱद पार्टी और कई अन्य राजनीतिक संगठन लम्बे समय से मुबारक की सत्ता के ख़िलाफ संघर्ष करते रहे हैं। इस जनउभार के दौरान ही एक नया नेतृत्व भी उभरता दिखायी दिया। 6 फरवरी को युवा समूहों ने मिलकर यूनीफ़ाइड लीडरशिप ऑफ द यूथ ऑफ द रेज रिवोल्यूशन (रोष क्रान्ति के युवाओं का एकीकृत नेतृत्व) नाम से एक गठबन्धन बनाया। इसमें ज़मीनी आधार वाले पाँच समूह शामिल थे और इसे ही विद्रोह की संगठित गतिविधियों को संचालित करने वाली मुख्य शक्ति माना जा रहा है। इस गठबन्धन में ‘6 अप्रैल युवा आन्दोलन’, ‘जस्टिस एण्ड फ़्रीडम ग्रुप’, ‘अल-बरदेई के समर्थन में जनअभियान’, ‘डेमोक्रेटिक फ़्रण्ट पार्टी’ और ‘मुसलिम ब्रदरहुड मूवमेण्ट’ के दो-दो सदस्य शामिल हैं। इनके अलावा चार स्वतन्त्र सदस्यों को भी नेतृत्व में शामिल किया गया। ये सभी 14 सदस्य 27 से 35 वर्ष के बीच के हैं। गठबन्धन के प्रवक्ता ने सात माँगों की घोषणा की: मुबारक का इस्तीफ़ा, इमरजेंसी कानून वापस लेना, सभी राजनीतिक बन्दियों की रिहाई, संसद के दोनों सदनों को भंग करना, नये चुनाव तक एक राष्ट्रीय एकता सरकार का गठन, जनउभार के दौरान सुरक्षा बलों द्वारा किये गये दमन की न्यायिक जाँच और सेना द्वारा प्रदर्शनकारियों को सुरक्षा देना। इनमें से पहली माँग तो पूरी हो गयी है और सेना ने इमरजेंसी कानून वापस लेने की बात की है। अन्य माँगों के अमल का रास्ता आसान नहीं होगा, यह भी दिखायी देने लगा है।

इन नेतृत्वकारी युवाओं की वर्गीय पृष्ठभूमि और उनके विचारों में अन्तर भी मुबारक के हटने के बाद सामने आने लगा है। अल-बरदेई के समर्थक युवाओं के समूह के नेता वायल ग़नीम ने 12 फरवरी को ट्विटर पर कहा कि “मिस्र के नवनिर्माण के लिए मिस्र के उद्योगपतियों से 100 अरब पौण्ड जुटाने होंगे, मैंने एक उद्योगपति से 1 अरब देने के लिए बात भी कर ली है।” ग़नीम ख़ुद एक बहुराष्ट्रीय कम्पनी गूगल में वरिष्ठ अधिकारी है, मगर आन्दोलन की मुख्य शक्ति, मध्य या निम्न मध्य वर्ग के नौजवान और मेहनतकश जनता इस रास्ते को स्वीकार करेगी – यह कहना मुश्किल है। मिस्र में पैसे बटोरने वाले सभी उद्योगपति घराने मुबारक की सत्ता के साथ ही थे।

मिस्र में रैडिकल शिक्षित युवाओं की एक बड़ी आबादी है जो सेक्युलर, साम्राज्यवाद विरोधी, पूँजीवाद विरोधी, इंसाफपसन्द और आधुनिक विचारों वाली है। इन नौजवानों के पास कोई संगठित विचारधारा अभी नहीं है लेकिन उन्होंने साबित कर दिया है कि वे न्याय और बराबरी के पक्ष में हैं और उनमें साहस, सूझबूझ और गतिशीलता की कमी नहीं है। उम्मीद की जानी चाहिए कि मेहनतकश जनता के साथ वे और करीबी से जुड़ेंगे और उनके बीच से एक ऐसा नेतृत्व उभरेगा जो मिस्री समाज के नवनिर्माण के आन्दोलन को सही दिशा में आगे ले जायेगा।

मिस्र में वामपन्थी शक्तियों की ताकत आज बहुत कम है जो इस आन्दोलन को एक क्रान्तिकारी दिशा दे सकती थीं। पूरे अरब जगत में क्रान्तिकारी वाम शक्तियों की कमज़ोरी के ऐतिहासिक कारण हैं। वहाँ उपनिवेशवाद विरोधी आन्दोलनों का नेतृत्व करने वाली ताकतों ने शुरू से वाम शक्तियों के प्रति कड़ा रुख़ अपनाया। मिस्र के राष्ट्रपिता कहे जाने वाले जमाल अब्दुल नासिर के शासन काल में कम्युनिस्ट पार्टी का बुरी तरह दमन किया गया और 1950 के दशक से ही अधिकांश समय वह प्रतिबन्धित रही है। रही-सही कसर सोवियत संघ में पूँजीवादी पुनर्स्थापना के बाद ख्रुश्चेवी संशोधनवाद के प्रभाव ने पूरी कर दी। अरब क्षेत्र की ज़्यादातर कम्युनिस्ट पार्टियाँ बुर्जुआ पार्टियों का पुछल्ला बनकर रह गयीं। मिस्र की पार्टी का एक बड़ा हिस्सा तो नासिर की पार्टी में ही शामिल हो गया। आज वहाँ कई छोटे-छोटे भूमिगत वामपन्थी ग्रुप मौजूद हैं जो वर्तमान जनउभार में भी शामिल थे, लेकिन किसी की भी उपस्थिति ज़्यादा प्रभावशाली नहीं है।

जनविरोधी सत्ता को साम्राज्यवादी समर्थन

मिस्र में हुए जनविस्फोट पर साम्राज्यवादियों की प्रतिक्रिया ने उनके दोगलेपन को उजागर कर दिया है। शुरू में तो उन्हें लग रहा था कि प्रदर्शनकारी मुबारक की सत्ता के दमन के आगे टिक नहीं सकेंगे और वे चुप्पी साधे रहे। जब लाखों लोग सड़कों पर उमड़ने लगे और बर्बर दमन की तस्वीरें सारी दुनिया की जनता के सामने आने लगीं, तब भी अमेरिकी विदेश मन्त्री हिलेरी क्लिंटन “अभिव्यक्ति की आज़ादी” बनाये रखने की सलाह देने से आगे नहीं बढ़ीं। अन्ततः जब यह साफ हो गया कि अगर मुबारक सत्ता में बना रहा तो जनता का ग़ुस्सा पूरी तरह बेकाबू हो जायेगा, तब कहीं जाकर अमेरिका ने अपने पिट्ठू जनरलों पर दबाव डाला कि वे मुबारक को हटने के लिए राजी करें और सारे अधिकार अपने हाथ में ले लें।

मुबारक की सत्ता इतने दिनों तक अमेरिकी साम्राज्यवाद के समर्थन के बिना नहीं टिकी रह सकती थी। इज़रायल के बाद मिस्र ही दुनिया में सबसे अधिक अमेरिकी सैनिक सहायता प्राप्त करने वाला देश है। हर साल अरबों डॉलर की सैनिक सहायता अमेरिका उसे देता है। 1978 में हुए कैम्प डेविड समझौते में मिस्र ने फ़िलस्तीनियों के संघर्ष की पीठ में छुरा भोंककर इज़रायल को यह गारण्टी दे दी कि उसे पश्चिमी एशिया के सबसे बड़े और ताकतवर देश से सैनिक चुनौती नहीं मिलेगी। इस गारण्टी से इज़रायल को फ़िलस्तीनी जनता का उत्पीड़न और तेज़ कर देने तथा क्षेत्र में अमेरिकी साम्राज्यवाद के लठैत की भूमिका जमकर निभाने की खुली आज़ादी मिल गयी। इसके बदले में अमेरिका पहले अनवर सादात और उसके बाद मुबारक की सत्ताओं को टिकाये रखने के लिए भारी सहायता देता रहा है।

ऐतिहासिक पृष्ठभूमि

मिस्र अरब विश्व में सबसे अधिक आबादी वाला देश है। ब्रिटिश उपनिवेशवादियों की पिट्ठू हुकूमत के ख़िलाफ युवा फ़ौजी अफसरों के नेतृत्व में वहाँ 1952 में तख़्तापलट हुआ जिसे व्यापक जनसमर्थन हासिल था। उसी समय के आसपास लीबिया, सीरिया और इराक में भी देशभक्त सैन्य अफसरों के नेतृत्व में अलग-अलग ढंग से उपनिवेशवाद विरोधी जनवादी क्रान्तियाँ सम्पन्न हुई थीं। ट्यूनीशिया और अल्जीरिया में अलग ढंग से राष्ट्रीय जनवादी क्रान्तियाँ हुई थीं। इन सभी क्रान्तियों के नेता साम्राज्यवाद विरोधी थे, मगर उन्होंने विकास का जो रास्ता चुना, वह पूँजीवादी विकास का रास्ता था। कई देशों में अलग-अलग अंशों में रैडिकल बुर्जुआ सुधार के कदम उठाये गये, कुछ देशों में सामन्ती सम्बन्धों के क्रमिक पूँजीवादी रूपान्तरण का रास्ता अपनाया गया। वे सभी विश्व पूँजीवादी तन्त्र का हिस्सा बने रहे। कुछ ही दशकों में इन देशों में इस रास्ते के परिणाम नज़र आने लगे। एक ओर मुट्ठीभर अमीरों की जमात पैदा हुई तो दूसरी ओर जनता की बदहाली बढ़ती गयी। बुर्जुआ जनवाद का दायरा वहाँ बेहद सीमित होता गया। अपनी अर्थव्यवस्थाओं के ठहराव को तोड़ने के लिए पश्चिम की पूँजी के लिए दरवाज़ा खोलना उनके लिए लाज़िमी हो गया। निजीकरण-उदारीकरण की नीतियों के बाद बेरोज़गारी, महँगाई और भ्रष्टाचार में बेतहाशा बढ़ोत्तरी हुई। चाहे साम्राज्यवाद के पिट्ठू शेखों-शाहों की सत्ताएँ हों, या लोकप्रिय जनउभार की लहर पर सवार होकर व्यापक जनसमर्थन से तख़्तापलट करके सत्ता में आये सैनिक शासक हों या फिर अल्जीरिया और ट्यूनीशिया की रैडिकल बुर्जुआजी का प्रतिनिधित्व करने वाले बेन बेला एवं बूमेदियेन और हबीब बूर्गीबा के उत्तराधिकारियों की सत्ताएँ हों, उदारीकरण के दौर में पूँजी का पाटा चला, तो सब एक ही श्रेणी में पहुँच गये। साम्राज्यवादी पूँजी के आगे घुटने टेकने के अलावा उनके पास कोई विकल्प नहीं था। एक समय लोकप्रिय रही सत्ताएँ भी भ्रष्टाचार, संसाधनों की लूट और निरंकुश दमनकारी शासन के कारण लोगों की नफ़रत का पात्र बन गयीं।

फ़िलस्तीनी जनता के साथ अरब शासकों के विश्वासघात ने जनता की नज़रों में उन्हें और भी गिरा दिया। पूरी अरब जनता एक-दूसरे से बहुत मज़बूत एकता महसूस करती है और लाखों निर्वासित फ़िलस्तीनी कई देशों में बिखर कर रहते रहे हैं। अरब देशों में जनता की चेतना को ‘रैडिकलाइज़’ करने में फ़िलस्तीनी लोगों की बहुत बड़ी भूमिका रही है।

इस शानदार जीत के बाद

एक चुनौतीभरी राह सामने है

मिस्र के नौजवानों और मेहनतकशों ने एक बड़ी जीत हासिल की है लेकिन हमें जनविद्रोह और क्रान्ति के फ़र्क़ को समझना होगा। इस जनविद्रोह का कोई ऐसा नेतृत्व नहीं है जो पूँजीवाद को ख़त्म कर साम्राज्यवादी तन्त्र से अलग विकास का वैकल्पिक रास्ता चुन सके। लेकिन वर्ग-संघर्ष में जनता जब भी सड़कों पर उतरती है तो वह कुछ हक हासिल करती है और उन्नत धरातल के वर्ग-संघर्ष का एक मंच तैयार होता है। मुबारक के हटने के बाद किस तरह की ताकतें सत्तारूढ़ होंगी, यह कहना अभी मुश्किल है, लेकिन यह तो तय है कि जनता को, सीमित ही सही, जनवादी अधिकार हासिल होंगे और राजनीति तथा अर्थव्यवस्था में भ्रष्टाचार और निरंकुशता पर थोड़ा अंकुश लगेगा। मज़दूरों को ट्रेड यूनियन आदि के कुछ अधिकार मिलेंगे, और खुलेपन के माहौल में विचारों के प्रचार-प्रसार, बहस-मुबाहसों के सापेक्षिक अवसर बढ़ेंगे।

अरब विश्व के जिन देशों में शेखों-शाहों की साम्राज्यवाद-परस्त घोर प्रतिक्रियावादी सरकारें हैं वहाँ जनता में असन्तोष गहराता जा रहा है। जिन देशों में चुनाव आदि के ज़रिये बनी सरकारें हैं, वहाँ भी बेहद भ्रष्ट और निरंकुश शासन तन्त्र कायम हैं। इन सभी देशों में मिस्र के विद्रोह की लहरें देर-सबेर पहुँचेंगी। अरब विश्व जैसा है, वैसा नहीं रह जायेगा, यह तय है। साम्राज्यवाद को दो कदम पीछे हटने के लिए मजबूर होना पड़ेगा।

अरब विश्व पिछले कई दशकों से साम्राज्यवाद के अन्तरविरोधों की गाँठ बना हुआ है। मिस्र की घटनाओं के बाद पूरे अरब विश्व में समीकरणों में आने वाले बदलावों का व्यापक असर होगा। इससे फ़िलस्तीनी जनता के संघर्ष को नयी ताकत मिलेगी। अरब बुर्जुआ शासकों के लिए उनके संघर्ष के साथ विश्वासघात करना अब इतना आसान नहीं होगा। इससे अरब क्षेत्र में अमेरिकी चेकपोस्ट की भूमिका निभा रहे इज़रायल के ज़ियनवादी शासकों पर भी दबाव बढ़ेगा। इराक में साम्राज्यवादी कब्ज़े के ख़िलाफ लड़ रही जनता का संघर्ष भी तेज़ हो जायेगा। ईरान ने अपने अमेरिका विरोधी तेवर और कड़े करने शुरू कर दिये हैं। कुल-मिलाकर पूरे अरब जगत में वर्ग-संघर्ष को और उन्नत धरातल पर ले जाने की ज़मीन तैयार होगी। अमेरिका अगर पीछे हटता है तो भी जनता की लड़ाई को बल मिलेगा और अगर वह दमन-दबाव की नीति अपनाता है, तब भी इसके परिणामस्वरूप संघर्ष और तीखा ही हो जायेगा। विश्व स्तर पर अमेरिकी चौधराहट भी इससे और कमज़ोर पड़ेगी।

मिस्र और इससे पहले दुनिया के बहुत से देशों में तानाशाहों के ख़िलाफ हुई बग़ावतों ने साम्राज्यवादी नीति- निर्माताओं को सोचने के लिए मजबूर कर दिया है। वे यह भी जानते हैं कि बहुत अधिक दमन कट्टरपन्थ को भी बढ़ावा दे सकता है जिसके उदाहरण वे इराक और अफगानिस्तान में देख चुके हैं। इसलिए अब उनकी पूरी कोशिश होगी कि मिस्र में कोई ऐसी सत्ता आये जो उदार लोकतन्त्र के ढाँचे में पूँजीवादी-साम्राज्यवादी हितों की रखवाली कर सके।

इतिहास में ऐसे उदाहरणों की कमी नहीं है जब नौजवानों के ख़ून से लाल हुई सड़कों पर चलते हुए और ‘नौजवान ज़िन्दाबाद’ के नारे लगाते हुए ऐसी ताकतें सत्ता पर काबिज़ हो जाती हैं जो लूट और शोषण के उसी तन्त्र की सेवा करती रहती हैं और जनता ठगी-सी देखती रह जाती है। छोटे स्तर पर भारत में हम 1974 के आन्दोलन के हश्र से भी इसे समझ सकते हैं। मिस्र के नौजवानों को भी सतर्क रहना होगा। अभी से इसके संकेत दिखने लगे हैं। अल-बरदेई जैसे पश्चिम परस्त नेता एक साल के लम्बे संक्रमण काल की बात कर रहे हैं।

मिस्र की सेना ने अपने कारणों से प्रदर्शनकारियों का दमन नहीं किया, लेकिन यह सोचना खामख़्याली होगी कि वह किनारे हटकर नागरिक नेतृत्व के लिए जगह ख़ाली कर देगी। सेना के युवा अफसरों के एक हिस्से और आम सिपाहियों में आन्दोलन के प्रति सहानुभूति है, लेकिन सेना के बड़े अफसर 58 साल से सत्ता के भागीदार रहे हैं और अपने आर्थिक व राजनीतिक हितों को वे आसानी से नहीं छोड़ेंगे। उन पर अमेरिका का भी दबाव होगा। जनता में इज़रायल के ख़िलाफ गहरी नफ़रत है और तहरीर चौक के बहुतेरे आन्दोलनकारी साइबर स्पेस में गाज़ा पट्टी पर इज़रायली हमलों के ख़िलाफ मुहिम चलाते रहे हैं। लेकिन सेना ने मुबारक के हटने के बाद अपने पहले ही बयान में साफ कह दिया कि इज़रायल के साथ हुई सन्धि का पालन किया जायेगा।

भारत और चीन जैसे देशों के शासक भी मिस्र की घटनाओं से चिन्तित हैं। चीन ने तो मिस्र के जनउभार की ख़बरों को रोकने के लिए इण्टरनेट पर मिस्र के नाम से कुछ भी खोजने को ही रोक दिया था। इन देशों के सत्ताधारियों का डरना वाजिब है। चीन में समाजवाद के नाम पर नग्न-निरंकुश पूँजीवादी शासन का रोड-रोलर चला रहे शासकों के ख़िलाफ वहाँ की मेहनतकश जनता का ग़ुस्सा लगातार बढ़ता जा रहा है और बीच-बीच में उग्र आन्दोलनों के रूप में फूटने भी लगा है। भारत में भीषण महँगाई, बेरोज़गारी, बेलगाम भ्रष्टाचार और जनान्दोलनों के क्रूर दमन ने शासकों को जनता की नज़रों में नफ़रत का पात्र बना दिया है। इतिहास गवाह है कि शासन करने वालों के हाथ में जनता की नब्ज़ कभी नहीं होती। जनता का ग़ुस्सा सुषुप्त ज्वालामुखी की तरह कब फट पड़ेगा, वे कभी नहीं जान पाते। हुस्नी मुबारक की विशालकाय, अत्याधुनिक ख़ुफ़िया पुलिस और साम्राज्यवादियों की तमाम गुप्तचर एजेंसियाँ भी नहीं जान पायीं कि मिस्र की जनता क्या करने वाली है।

मिस्र के बहादुर नौजवानों ने सारी दुनिया के नौजवानों के सामने एक नज़ीर पेश की है। क्या हिन्दुस्तान के नौजवान मिस्र के युवाओं से प्रेरणा लेकर अपने देश में जारी इस लूटतन्त्र के ख़िलाफ आगे बढ़ेंगे? क्या वे अपने देश में भयानक शोषण के शिकार करोड़ों मज़दूरों और भारी ग़रीब आबादी के साथ खड़े होंगे?

 

मुक्तिकामी छात्रों-युवाओं का आह्वान, जनवरी-फरवरी 2011

 

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