आर्कटिक पर कब्जे की जंग

विराट

पिछले पचास वर्षों में आर्कटिक महासागर की बर्फ लगातार तेज़ गति से पिघलती जा रही है और इसके गर्भ में छिपे असीम तेल व प्राकृतिक गैस के भण्डार अब विश्व के सामने आ रहे है। इस कारण इसके आस-पास के सभी साम्राज्यवादी देशों में इन तेल भण्डारों के दोहन को लेकर ज़बर्दस्त तनातनी चल रही है।

arctic

आर्कटिक क्षेत्र उत्तरी ध्रुव के आसपास का बर्फ से पूरी तरह ढका हुआ क्षेत्र है। रूस, कनाडा, डेनमार्क, अमेरिका, नोर्वे, आइसलैण्ड, स्वीडन आदि देशों की सीमाओं से घिरे इस क्षेत्र की बर्फ लगातार पिघलती जा रही है। इसका मुख्य कारण बेशक ग्लोबल वॉर्मिंग है और इसके अतिरिक्त शीत युद्ध के दौरान हुए परमाणु परीक्षण भी हैं। पर्यावरण की दृष्टि से यह क्षेत्र काफी महत्वपूर्ण है और इसे अक्सर पृथ्वी का एयर कण्डीशनर कहा जाता है। चूँकि यह पूरा इलाका बर्फ से ढँका हुआ है इसलिए जो सूर्य की किरणें इस पर पड़ती हैं वे परावर्तित होकर वापस लौट जाती हैं। इसलिए यह क्षेत्र पृथ्वी को ठण्डा रखने में अत्यन्त महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। वैज्ञानिकों का दावा है कि इस क्षेत्र में कम से कम 90 बिलियन बैरल तेल के भण्डार है। यह विश्व के अनखोजे तेल का लगभग 13 प्रतिशत है। वहीं प्राकृतिक गैस का भी अब तक न खोजी गई गैस में से 30 प्रतिशत होने का अनुमान है। अब इसी कारण से विभिन्न साम्राज्यवादी देशों के बीच इस क्षेत्र के बँटवारे को लेकर मतभेद चल रहे हैं। रूस, अमेरिका, कनाडा, डेनमार्क, आदि सभी देश जो इस क्षेत्र को घेरे हुए हैं इसे लूटने के लिए हर सम्भव कोशिश करने में लग गए है चीन भी अब इस क्षेत्र में लगातार अपनी नाक घुसेड़ रहा है। आर्कटिक क्षेत्र इन सभी देशों की विदेश नीतियों का मुख्य मुद्दा बना हुआ है। चीन का कहना है कि यदि वह आर्कटिक क्षेत्र से सटा हुआ नहीं है तो कम से कम उसके पास तो ज़रूर ही है अतः उसे भी इस क्षेत्र के संसाधनों की लूट में बराबर का हिस्सा मिलना चाहिए। इसके अतिरिक्त ग्रीनलैण्ड (एक स्वशासित राज्य जो डेनमार्क के अधिकार में है) में भी बर्फ के पिघलने से अनेक दुर्लभ खनिज मिले हैं जो मोबाइल फोन बनाने व संचार व्यवस्था के विकास के लिए बहुत महत्वपूर्ण हैं। इस कारण से ये सभी देश ग्रीनलैण्ड की तरफ भी खूब आकर्षित हो रहे हैं। चीन बड़े-बड़े व्यापारिक प्रस्ताव लेकर लगातार यहाँ के दरवाजे खटखटा रहा है। वहीं दूसरी ओर यूरोपीय संघ के उपाध्यक्ष  अन्तोनियो तजानी भी जून में सैकड़ों मिलियन डॉलर लेकर दौड़ते-दौड़ते ग्रीनलैण्ड पहुँचे। उनकी यह माँग थी कि चीन को यहाँ के खनिज लूटने के एकनिष्ठ अधिकार न दिये जाएँ। अमेरिका की हिलैरी क्लिंटन भी पीछे नहीं रही और वह भी अपना जनवादी चेहरा लिए ग्रीनलैण्ड जा पहुँची। दक्षिणी कोरिया के राष्ट्रपति ली-म्युंग-वका भी यहाँ गए। आर्कटिक क्षेत्र केवल अपने तेल के भण्डारों के कारण ही साम्राज्यवादी महत्व नहीं रखता बल्कि इसके अलावा और भी कई कारणों से महत्व रखता है। आर्कटिक की बर्फ पिघलने से उत्तर-पश्चिमी दर्रों के खुलने की भी सम्भावना बन गई है। यदि यह दर्रा खुल जाता है तो इससे पूर्वी देशों और पश्चिमी देशों के बीच की समुद्री यात्रा की दूरी बेहद कम हो जायेगी। टोकयो से न्यूयार्क जाने की यात्रा में 3,200 किलोमीटर की बचत होगी। जापान से हॉलैण्ड की दूरी जो स्वेज़ नहर के रास्ते से 21,000 किलोमीटर है, उत्तर पश्चिमी दर्रे के खुलने से वह महज़ 13,000 किलोमीटर रह जायेगी। चूँकि ये सभी साम्राज्यवादी देश यात्रा के समय और लागत को कम से कम करना चाहते हैं इसलिए ये ज़बर्दस्ती भी इस दर्रे को खोलने से पीछे नहीं हटना चाहते। रूस बड़े-बड़े आइसब्रेकर लेकर मार्ग बनाने को तैयार है वहीं कनाडा भी इस मार्ग पर पूरी तरह से अपना अधिकार बता रहा है ताकि इस मार्ग से मिलने वाले कर उसकी झोली में जाएँ। इन साम्राज्यवादी देशों को आर्कटिक क्षेत्र को दोहन करने के लिए सबसे पहली कठिनाई है वहाँ की बर्फ । जब तक यह बर्फ यहाँ से नहीं हटाई जाती तब तक तेल का दोहन करने में काफी परेशानी है। इसलिए ये देश बर्फ पिघलाने के लिए गर्म पानी के विशालकाय होजर्स इस्तेमाल करने के लिए तैयार हैं। जैसा कि हम पहले ही बता चुके हैं कि आर्कटिक क्षेत्र की बर्फ सूर्य की किरणों को परावर्तित करके धरती का तापमान सामान्य रखती है, इसलिए बर्फ पिघलने का सीधा सा मतलब है कि सूर्य की ऊष्मा को लगातार पानी के द्वारा सोखा जाना और आर्कटिक क्षेत्र का पृथ्वी के तापमान को सामान्य न रख पाना। इसके अतिरिक्त, तेल निकालने की प्रक्रिया से भारी मात्र में मीथेन गैस निकलेगी जो कि अभी बर्फ से ढँके होने के कारण कोई हानि नहीं करती। लेकिन जब यह बाहर निकलेगी तो भारी मात्रा में पर्यावरण को हानि पहुँचाएगी। मीथेन गैस स्वयं एक ऐसी गैस है जो ग्लोबल वार्मिंग के लिए जिम्मेदार है। इस गैस में कार्बन-डाई-ऑक्साइड से बीस गुना ज्यादा ऊष्मा पैदा करने की क्षमता होती है। वैसे तो इस गैस का इस्तेमाल किया जा सकता है पर साम्राज्यवादियों को इससे ज्यादा मतलब नहीं है क्योंकि इसके लिए उन्हें महँगी पाइपलाइन बिछानी पड़ेगी जिसमें उनकी बिल्कुल भी दिलचस्पी नहीं है। फिलहाल उनका मुख्य लक्ष्य तेल है जिसको आसानी से कण्टेनरों में भरकर रखा जा सकता है। इस तरह से यह साफ है कि ये सभी साम्राज्यवादी देश अपने साम्राज्यवादी हितों को लेकर बदहवास हो रहे हैं और कुछ भी करने को तैयार हैं। वैसे तो अमेरिका पर्यावरण को बचाने को लेकर और ग्लोबल वार्मिंग के मुद्दे को लेकर हमेशा ही नौटंकी करना रहता है लेकिन अपने साम्राज्यवादी हितों के लिए सबसे पहले पर्यावरण का शत्रु बन जाता है। वैसे भी प्राकृतिक संसाधनों के बँटवारे को लेकर हमेशा से ही साम्राज्यवादी देशों के बीच कुत्ता-घसीटी रही है। यही साम्राज्यवाद का चरित्र है। साम्राज्यवाद जो पूँजीवाद की चरम अवस्था है वह हमें बर्बादी के सिवा और कुछ नहीं दे सकता। जब इसे मानवता की ही कोई चिन्ता नहीं है तो फिर पर्यावरण की चिन्ता का ही क्या मतलब रह जाता है। इस व्यवस्था का एक-एक दिन हमारे ऊपर भयंकर श्राप की तरह है। पर्यावरण की चिन्ता भी वही व्यवस्था कर सकती है जिसके केन्द्र में मानव हो न कि मुनाफा।

 

मुक्तिकामी छात्रों-युवाओं का आह्वान, जनवरी-जून 2013

 

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