अरुण कुमार की कविताएँ

डर लगता है

ठहर जाऊँ ये सोचकर डर लगता है

जो ठहरे हैं उन्हें देखकर डर लगता है

सफ़र में जो भी है कठिन है

बिन सफ़र सब हादसा लगता है

कुछ भी नहीं ‘मेरा’ ये सच है

कोई नहीं उनका ये बड़ा सच लगता है

कमज़ोरियाँ हममें भी हैं मगर

उन्हें न मानूँ तो डर लगता है

कमज़ोरियों को छुपाकर उनका जीवन चलता है

बदलते हम भी हैं मगर, अच्छा लगता है

देखकर उनका बदलना डर लगता है

प्यार अपनी कमज़ोरी है

जिसके लिए कुछ कर गुज़रने का मन करता है

उनकी कोई कमज़ोरी नहीं

ये सोचकर डर लगता है।

 

मैंने पूछा

मैने पेड़ों से पूछा

तुम्हारी डालियों में लगा फल आखिरी है क्या ?

खड़े रहे निर्विकार

जैसे एक पागल कुछ कहता जा रहा हो।

मैंने दूब से पूछा

क्या तुम अन्तिम अंकुरण हो

नन्ही फुनगी को देखकर मुस्कुरा दिया वह

मैंने डूबते सूरज से पूछा

क्या आज तुम अन्त के लिए उगे थे

उसने कहा शुभ रात्रि

मैने प्रेमी जोड़े से पूछा

क्या तुम दुनिया के आखिरी प्रेमी हो

वे मुड़ गये उधर

जहाँ खेल रहे थे दो छोटे अबोध!

आह्वान कैम्‍पस टाइम्‍स, जुलाई-सितम्‍बर 2006